एहतेशाम हुदवी
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इस्लामी साल में कुछ दिन ऐसे हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने विशेष महत्व दिया है। उन्हीं महत्वपूर्ण दिनों में से एक है यौम-ए-आशूरा, यानी मुहर्रम की दसवीं तारीख़। यह केवल एक ऐतिहासिक दिन नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की मदद, नबियों की मुक्ति, सब्र, शुक्र और ईमान की जीत की याद दिलाने वाला दिन है।
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जब हम इस्लाम के इतिहास का अध्ययन करते हैं तो एक घटना ऐसी दिखाई देती है जिसने पूरे इतिहास की दिशा बदल दी। यह घटना है "हिजरत" (Migration)। सामान्य रूप से लोग हिजरत को मक्का से मदीना की यात्रा समझते हैं, लेकिन वास्तव में यह केवल एक यात्रा नहीं थी।
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नमाज़ तकबीर, तस्बीह और क़ुरआन की तिलावत का सुंदर संगम है। नमाज़ में क़ुरआन की कोई भी सूरह पढ़ी जाए, तो फ़र्ज़ अदा हो जाता है और नमाज़ सही (Valid) हो जाती है। लेकिन कुछ सूरहें ऐसी हैं जिनके बारे में अहादीस में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने उन्हें नमाज़ में पढ़ा, बल्कि कई सूरहों की...
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इस्लाम में कुछ ऐसे मुबारक औक़ात, मुक़द्दस लम्हात और बाबरकत दिन होते हैं जिनकी अहमियत दूसरी तारीख़ों से कहीं ज़्यादा होती है। इन दिनों में अल्लाह तआला अपनी रहमत, मग़फ़िरत, इनायत और रज़ा के ख़ज़ानों को अपने बंदों के लिए खोल देता है।
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क़ुर्बानी उस मुसलमान पर वाजिब (Obligatory) है जो मालिक-ए-निसाब (Owner of Nisab) हो। मालिक-ए-निसाब वह व्यक्ति है जिसके पास ईदुल-अज़हा के दिन अपनी ज़रूरी ज़रूरतों (Basic Needs) के अलावा साढ़े बावन तोला चाँदी या साढ़े सात तोला सोना, या उसकी कीमत के बराबर माल मौजूद हो।
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इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की कहानी भारत की सियासत में एक बहुत ही खास और अलग पहचान रखती है। यह पार्टी 1948 में उस समय बनी जब देश बंटवारे (Partition) के गहरे जख्म से गुजर रहा था। उस समय “मुस्लिम लीग” नाम अपने साथ एक भारी नकारात्मक छवि (negative image) लेकर आता था
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भारत में मुसलमानों के खिलाफ साजिशें अब नई ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। नौकरियों में तो पहले से भेदभाव चल रहा था, जहां मुसलमानों को मजहब की बुनियाद पर जॉब से महरूम किया जाता है। अब प्राइवेट कंपनियों, खासकर मल्टीनेशनल कंपनियों में भी उन्हें रोजगार से बाहर करने की खतरनाक प्लानिंग की जा रही है।
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इज़राइल की नेसेट (Knesset) ने 30 मार्च, 2026 को एक कानून पारित किया, जिसके तहत फ़िलिस्तीनियों के लिए मृत्युदंड (Death Penalty) को डिफ़ॉल्ट सज़ा बना दिया गया।
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औरतों को चाहिए कि फ़र्ज़, नफ़्ल और तरावीह — यानी तमाम नमाज़ें अपने-अपने घरों में पढ़ें। कुछ जगहों पर तरावीह के नाम पर औरतें इकट्ठा हो रही हैं और देर रात के बाद घर वापस लौटती हैं। शरीअत के मुताबिक यह सही नहीं है।
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रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का सबसे मुबारक और रूहानी बदलाव लाने वाला महीना है। इसी महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, जो पूरी इंसानियत के लिए हिदायत, सही और ग़लत के बीच फर्क बताने वाला) और रहमत है।
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ईमान (Faith) एक बेहद नाज़ुक और अनमोल दौलत है। यह सिर्फ़ कुछ मान्यताओं (Beliefs) का नाम नहीं, बल्कि एक जीवित, संवेदनशील और लगातार देखभाल चाहने वाली आध्यात्मिक अवस्था (Spiritual State) है।
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6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत भारतीय गणराज्य (Indian Republic) के संवैधानिक और नैतिक इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक माना जाती है। भारतीय मुसलमानों के लिए यह सिर्फ़ एक पुरानी मस्जिद का ढहाया जाना नहीं था, बल्कि यह उनकी गरिमा (Dignity), सुरक्षा (Security) और समान नागरिकता (Equal Citizenship)...
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इस्लाम अल्लाह पर विश्वास को अंधी मान्यता (blind belief) के रूप में पेश नहीं करता, बल्कि सोच-विचार (thinking), तर्क (reason) और वह्य (revelation) पर आधारित मज़बूत आस्था के रूप में समझाता है।
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हिजाब—जो अरबी मूल ḥ-j-b से निकला शब्द है—का मूल अर्थ है “ढकना (to cover), रोकना (to shield), या अलग करना (to separate)”। लेकिन इस सरल अर्थ के भीतर एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक दर्शन छुपा हुआ है। हिजाब केवल सिर पर ओढ़ी जाने वाली चादर नहीं; यह एक ऐसी जीवन-शैली (lifestyle) है जो
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पारंपरिक इस्लामी विद्वानों और पुराने मुस्लिम इतिहासकारों की नज़र से देखा जाए, तो औरंगज़ेब आलमगीर (1058–1118 हिजरी / 1658–1707 ई.) को किसी “विवादित तानाशाह” के रूप में नहीं, बल्कि भारत के सबसे धार्मिक, न्यायप्रिय और काबिल शासकों में माना जाता है।
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दुनिया में बहुत सारे धर्म और मज़हब हैं, और हर दिन नए-नए विचार और समूह बनते रहते हैं। हर धर्म में अलग-अलग सोच और मानने वाले लोग मिलते हैं। लेकिन इन सबके बीच, इस्लाम एक ऐसा शांत और सभ्य धर्म है जिसने ज्ञान और विद्वानों की अहमियत लोगों के दिलों में गहराई से बैठा दी है।
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