आकस्मिकता, अनंत प्रतिगमन और आवश्यक सत्ता: क़ुरआन और इस्लामी दृष्टि में एक सरल अध्ययन

प्रस्तावना

इस्लाम अल्लाह पर विश्वास को अंधी मान्यता (blind belief) के रूप में पेश नहीं करता, बल्कि सोच-विचार (thinking), तर्क (reason) और वह्य (revelation) पर आधारित मज़बूत आस्था के रूप में समझाता है। क़ुरआन बार-बार इंसान को अस्तित्व (existence), कारण (cause) और वास्तविकता (reality) पर ग़ौर करने की दावत देता है। जैसे सवाल उठाए जाते हैं—यह ब्रह्मांड (universe) क्यों मौजूद है? क्या अस्तित्व अपने-आप क़ायम रह सकता है? क्या सृष्टि खुद को पूरी तरह समझा सकती है? मुस्लिम विद्वानों (scholars) ने इन सवालों पर गहराई से विचार किया है।

इनका एक अहम बौद्धिक उत्तर (intellectual answer) है—आकस्मिकता (contingency) (الْإِمْكَانُ الْفَلْسَفِيُّ أَوِ الْحُدُوْثُ) का सिद्धांत, यानी यह दुनिया अपने-आप ज़रूरी नहीं है; इसका होना किसी और पर निर्भर है। साथ ही अनंत प्रतिगमन (infinite regress) (التَّسَلْسُلُ )—यानी कारणों की अंतहीन कड़ी—को असंभव बताया गया है। इसलिए अंत में एक ऐसी सत्ता को मानना ज़रूरी होता है जो किसी पर निर्भर न हो—उसे आवश्यक सत्ता (وَاجِبُ الْوُجُوْدِ (Necessary Being) कहा जाता है। इस तरह इस्लाम यह सिखाता है कि सृष्टि के पीछे एक बुद्धिमान, स्वतंत्र और अनिवार्य अस्तित्व है—और वही अल्लाह है।

यह दलील इस्लामी धर्मशास्त्र (Islamic theology)—जिसे عِلْمُ الْكَلَامِ (इल्मुल्-कलाम) कहा जाता है—में बहुत अहम मानी जाती है, ख़ास तौर पर इमाम अल-ग़ज़ाली और अन्य अश्अरी विद्वानों के विचारों में।

सिर्फ़ दार्शनिक अनुमान (philosophical speculation) के बजाय, इस्लामी धर्मशास्त्र तर्क (reason) को दिव्य वह्य (revelation) के साथ जोड़कर देखता है। इसका मतलब यह है कि सोच-विचार कुरआन और सुन्नत की रहनुमाई (guidance) में किया जाता है, न कि उनसे अलग होकर।

यह दलील दार्शनिक परंपराओं (philosophical traditions) में अक्सर برهان الإمكان والوجوب (Burhān al-Imkān wa al-Wujūb)—यानी “आकस्मिकता/संभावना और आवश्यकता से प्रमाण”—के नाम से जानी जाती है। वहीं कलाम की परंपरा में इसे برهان الحدوث (Burhān al-Ḥudūth)—“उत्पत्ति से प्रमाण”—से जोड़ा जाता है।

आसान शब्दों में, यह तर्क यह दिखाता है कि बुद्धि (intellect) और धर्मग्रंथ (scripture) एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि मिलकर यह समझाने में मदद करते हैं कि इस दुनिया के पीछे एक आवश्यक और सर्वोच्च सत्ता (Necessary Being) का होना ज़रूरी है।

ब्रह्मांड की आकस्मिकता और सृजित प्रकृति (The Contingency and Created Nature of the Universe)

इस्लामी धर्मशास्त्र में ब्रह्मांड को हादिस (ḥādith) (حَادِثٌ) कहा जाता है—यानी जो गैर-मौजूदगी के बाद अस्तित्व में आया। साथ ही इसे मुमकिन अल-वुजूद (mumkin al-wujūd) (مُمْكِنُ الْوُجُوْدِ) भी माना जाता है, जिसका अर्थ है आकस्मिक सत्ता (contingent being)

आकस्मिक सत्ता  (contingent being) वह होती है जिसका होना ज़रूरी (necessary) नहीं होता और जो अपने-आप क़ायम (self-sustaining) नहीं रहती। वह मौजूद तो है, लेकिन ऐसा भी हो सकता था कि वह न होती। अपने बने रहने के लिए वह किसी दूसरी चीज़ पर निर्भर (dependent) रहती है।

ब्रह्मांड में जो कुछ हम देखते हैं, सब इसी श्रेणी में आता है—इंसान पैदा होते हैं और मर जाते हैं; तारे बनते हैं और खत्म हो जाते हैं; पहाड़ घिसते हैं; सभ्यताएँ उभरती हैं और फिर गिर जाती हैं। यानी परिवर्तन (change), समय से बंधा होना (temporality) और निर्भरता (dependence)—ये सृष्टि की आम और सार्वभौमिक (universal) विशेषताएँ हैं।

कुरआन इस दुनिया की नाजुक और निर्भर प्रकृति पर बार-बार ध्यान खींचता है, जैसा कि अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

كُلُّ مَنْ عَلَيْهَا فَانٍ وَيَبْقَىٰ وَجْهُ رَبِّكَ ذُو الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ
“जो कुछ धरती पर है, सब नश्वर है। और तुम्हारे रब का सत्ता बाक़ी रहेगा—जो जलाल और इकराम वाला है।” (सूरह अर-रहमान: 26–27)

इमाम अल-ग़ज़ाली ने आसान शब्दों में यह बात समझाई कि जो चीज़ बदलती रहती है , वह अनंत (infinite) नहीं हो सकती। और जो अनंत नहीं है, वह अपने आप में ज़रूरी (necessary) भी नहीं हो सकती। परिवर्तन का मतलब है—एक हालत से दूसरी हालत में जाना। इससे यह साफ़ होता है कि वह चीज़ किसी और पर निर्भर (dependent) है। अगर कोई चीज़ अपनी हालत, कारणों या परिस्थितियों पर निर्भर है, तो वह अपने आप क़ायम रहने वाली (self-sufficient) नहीं हो सकती।

इसी वजह से पूरा ब्रह्मांड—जो बदलने वाली चीज़ों से भरा हुआ है—अपने अस्तित्व में आवश्यक नहीं हो सकता। इस बात को यह सिद्धांत और मज़बूत करता है कि जो कुछ भी पैदा हुआ है, यानी ḥādith (حَادِث) है, वह ज़रूर आकस्मिक (contingent/ مُمْكِن) होगा। क्योंकि उत्पत्ति (origination) का मतलब ही यह है कि पहले वह मौजूद नहीं था, और जो पहले मौजूद न हो, वह अपने अस्तित्व के लिए किसी और पर निर्भर होता है।

इस्लामी धर्मशास्त्रियों ने यह भी समझाया कि आकस्मिकता (contingency) सिर्फ़ अलग-अलग चीज़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे ब्रह्मांड (universe) पर लागू होती है। ब्रह्मांड जिस खास रूप में मौजूद है—कुछ निश्चित नियमों, आकारों और सीमाओं के साथ—यह दिखाता है कि यह किसी और तरह से भी हो सकता था। यानी इसका न होना (non-existence) या किसी और रूप में होना भी संभव था।

यही संभावना बताती है कि ब्रह्मांड अपने आप को पूरी तरह समझा नहीं सकता। दार्शनिक भाषा में कहा जाए तो आकस्मिक सत्ताएँ (contingent beings) वे होती हैं जिनके स्वभाव में अस्तित्व शामिल नहीं होता। उनका होना उन्हें बाहर से दिया जाता है—वे अपने आप मौजूद नहीं होतीं।

कुरआन इंसानों को इस निर्भरता पर सोचने की चुनौती देता है, जैसा कि अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

يَا أَيُّهَا النَّاسُ أَنْتُمُ الْفُقَرَاءُ إِلَى اللَّهِ ۖ وَاللَّهُ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ
“ऐ इंसानों! तुम सब अल्लाह के मोहताज हो, और अल्लाह बेनियाज, प्रशंसनीय है।” “O mankind, you are those in need of Allah, while Allah is the Self-Sufficient, the Praiseworthy.”
(सूरह फातिर 35:15)

यह आयत एक गहरी आध्यात्मिक सच्चाई सामने रखती है कि पूरी सृष्टि अपने अस्तित्व के लिए निर्भर (dependent) فَقِيْرٌ)) है—यानी पूरी तरह मोहताज। इसके विपरीत केवल अल्लाह ही पूर्ण रूप से स्वतंत्र (independent) (غَنِيٌّ) है—यानी बेनियाज़ और स्वयं-पर्याप्त। सरल शब्दों में कहा जाए तो, हर चीज़ को सहारे की ज़रूरत है, जबकि अल्लाह को किसी सहारे की आवश्यकता नहीं है।

इस बात को और आसान ढंग से समझने के लिए सोचिए कि आकस्मिकता (contingency) अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है:

  • समयिक उत्पत्ति (temporal origination) — अरबी में ḥudūth zamānī (حُدُوثٌ زَمَانِيّ)
    यानी किसी चीज़ का एक समय पर पैदा होना। जो चीज़ किसी समय शुरू हुई हो, वह पहले मौजूद नहीं थी, इसलिए वह अपने आप ज़रूरी नहीं हो सकती।
  • आवश्यक संभावना (essential possibility) — अरबी में imkān dhātī (إِمْكَانٌ ذَاتِيّ)
    यानी किसी चीज़ का होना और न होना—दोनों संभव होना। यह बताता है कि उसका अस्तित्व अनिवार्य नहीं है।
  • निर्दिष्टकर्ता की ज़रूरत (need for a specifier) — अरबी में murajjiḥ (مُرَجِّح)
    यानी कोई कारण या शक्ति जो यह तय करे कि कोई चीज़ इस रूप में क्यों मौजूद है, किसी और रूप में क्यों नहीं।

ब्रह्मांड की बनावट परमाणुओं (atoms) और उनके गुणों (properties) से हुई है, और ये सभी लगातार बदलते रहते हैं। यही बदलाव (change) यह साफ़ करता है कि ब्रह्मांड अपने आप में स्थायी और आवश्यक नहीं है, बल्कि एक आकस्मिक अस्तित्व (contingent existence) है—जो किसी और पर निर्भर है।

अनंत प्रतिगमन (तसलसुल) की असंभवता (Impossibility of Infinite Regress)

आकस्मिकता (contingency) को मान लेने के बाद एक अहम सवाल पैदा होता है: क्या कारणों की कड़ी (chain of causes) अतीत में अनंत (infinite) तक चल सकती है? इस्लामी धर्मशास्त्रियों ने इस विचार को पूरी तरह अस्वीकार किया और इसे तसलसुल (تَسَلْسُلٌ, (infinite regress) या “अनंत प्रतिगमन”) कहा।

 इमाम अल-ग़ज़ाली और दूसरे कलाम के विद्वानों का मानना था कि आकस्मिक कारणों की ऐसी अंतहीन कड़ी न तो तर्क के लिहाज़ से संभव (logically possible) है और न ही आध्यात्मिक रूप से सही (spiritually sound)

इस बात को समझने के लिए कारणों की दो तरह की श्रृंखलाओं का फर्क समझना मददगार होता है:

1) संयोगवश क्रमबद्ध श्रृंखला (accidentally ordered)

इसे अरबी में سِلْسِلَةٌ عَرَضِيَّةٌ (सिल्सिलतुन् अरदिय्यतुन्) कहा जाता है, यानी समय के साथ चलने वाली श्रृंखला
इसमें कारण एक के बाद एक समय के अंतर से काम करते हैं।
उदाहरण: पिता बेटे को जन्म देता है, बेटा आगे पोते को जन्म देता है।
यहाँ पिता के मर जाने के बाद भी बेटा ज़िंदा रह सकता है और आगे संतान पैदा कर सकता है। यानी पहले कारण का साथ-साथ मौजूद रहना ज़रूरी नहीं

2) आवश्यक रूप से क्रमबद्ध श्रृंखला (essentially ordered)

इसे अरबी में سِلْسِلَةٌ ذَاتِيَّةٌ (सिल्सिलतुन् धातिय्यतुन्) कहा जाता है, यानी पदानुक्रमिक श्रृंखला
इसमें सभी कारण एक ही समय में एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।
उदाहरण: हाथ डंडे को हिलाता है, डंडा पत्थर को हिलाता है।
अगर हाथ रुक जाए, तो उसी पल डंडा और पत्थर भी रुक जाएंगे। डंडे की ताक़त अभी और इसी समय हाथ से आ रही होती है।

इसी तरह ट्रेन के डिब्बे इसलिए चलते हैं क्योंकि इंजन उन्हें अभी कपलिंग के ज़रिये खींच रहा होता है। अगर इंजन रुक जाए, तो सारे डिब्बे तुरंत रुक जाएंगे।

नतीजा (simple point):
पहली तरह की श्रृंखला समय में आगे बढ़ सकती है, लेकिन दूसरी तरह की श्रृंखला में अगर ऊपर का सहारा न हो, तो नीचे कुछ भी नहीं चल सकता। इसी आधार पर इस्लामी विद्वान कहते हैं कि ऐसी आवश्यक श्रृंखला अनंत तक नहीं जा सकती—कहीं न कहीं एक स्वतंत्र और अंतिम कारण होना ज़रूरी है।

अश्अरी धर्मशास्त्री (Ashʿarī theologians) यह कहते हैं कि ब्रह्मांड की निर्भरता ज़रूरी रूप से क्रमबद्ध (essentially ordered) है। इसका मतलब यह है कि आकस्मिक सत्ताओं (contingent beings) को हर पल (at every moment) किसी ऐसे सहारे की ज़रूरत होती है जो उन्हें संभाले रखे।

अगर इस श्रृंखला का हर हिस्सा आकस्मिक है और हर एक को किसी कारण (cause) की ज़रूरत है, लेकिन शुरुआत में कोई स्वतंत्र और स्वयं-पर्याप्त कारण (independent cause) न हो, तो पूरी श्रृंखला ही टिक नहीं सकती।

आसान शब्दों में, कोई प्रभाव (effect)—यानी ब्रह्मांड—तब तक मौजूद नहीं हो सकता, जब तक उसका पूरा कारण मौजूद न हो। सिर्फ़ निर्भर कड़ियों (dependent links) की अनंत श्रृंखला (infinite chain) कोई मज़बूत सहारा नहीं देती। इसलिए कहीं न कहीं एक ऐसा अंतिम सहारा होना ज़रूरी है जो स्वयं किसी पर निर्भर न हो।

इमाम अल-ग़ज़ाली ने इस बात को आसान और जीवंत उदाहरणों (examples) से समझाया है:

  • अनंत गरीब भिखारी:
    कल्पना कीजिए कि भिखारियों की एक अनंत कतार (infinite queue) है—सब गरीब हैं। चाहे उनकी संख्या कितनी भी हो, धन अपने-आप पैदा नहीं होगा। यानी सिर्फ़ संख्या बढ़ाने से कमी दूर नहीं होती। इसी तरह, निर्भर चीज़ों की अनंत श्रृंखला अपने-आप सहारा नहीं बन सकती।
  • अनंत ट्रेन डिब्बे:
    इमाम अल-ग़ज़ाली के फलसफा से ये उदहारण भी मुनासिब है: मान लीजिए ट्रेन के डिब्बे अनंत हैं, लेकिन कोई इंजन (engine) नहीं। तब ट्रेन चलेगी ही नहीं। गति (motion) तभी आएगी जब कोई बाहरी, स्वतंत्र शक्ति खींचे। यह दिखाता है कि अनंत निर्भर कड़ियाँ मिलकर भी काम नहीं कर पातीं।
  • आकाशीय गोलों का उदाहरण:
    अगर ग्रह और गोले अनंत होते, तो धीमे ग्रह उसी अनंत समय में तेज़ ग्रहों से कम चक्कर लगाते। इससे यह अजीब नतीजा (absurdity) निकलता कि एक अनंतता दूसरी से बड़ी हो—जो तर्क के ख़िलाफ़ है।

सरल परिणाम

इन उदाहरणों से इमाम अल-ग़ज़ाली यह बताते हैं कि निर्भर चीज़ों की अनंत श्रृंखला कोई वास्तविक सहारा नहीं देती। इसलिए किसी एक स्वतंत्र और आवश्यक कारण (independent, necessary cause) का होना ज़रूरी है, जो स्वयं किसी पर निर्भर न हो।

इमाम अल-गज़ाली ने इसे जीवंत उदाहरणों से समझाया। अनंत गरीब भिखारियों की श्रृंखला सोचिए: कितने भी हों—अनंत भी—समूह पूरा गरीब रहता है और धन पैदा नहीं कर सकता। इसी तरह अनंत ट्रेन डिब्बों की श्रृंखला में गति नहीं होती जब तक बाहरी इंजन न खींचे। एक और उदाहरण: अगर आकाशीय गोले अनंत होते, तो धीमे ग्रहों ने उसी अनंत समय में तेज ग्रहों से कम चक्कर लगाए होते, जो इस absurdity की ओर ले जाता कि एक अनंतता दूसरी से बड़ी हो।

अल-गज़ाली ने जोर दिया कि अनंत प्रतिगमन समस्या को सिर्फ अनिश्चित काल तक टालता है। निर्भर सत्ताओं की अनंत श्रृंखला पूरी तरह निर्भर रहती है और अस्तित्व पैदा या संभाल नहीं सकती। फख्रुद्दीन अर-राजी ने जोड़ा कि यह पर्याप्त कारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है: श्रृंखला खुद बिना व्याख्या की रह जाती है।

अल-ग़ज़ाली ने ज़ोर देकर कहा कि अनंत प्रतिगमन (infinite regress) की मान्यता समस्या का समाधान नहीं करती, बल्कि उसे सिर्फ़ अनिश्चित समय (indefinitely) तक टाल देती है। निर्भर सत्ताओं (dependent beings) की एक अनंत श्रृंखला (infinite chain) पूरी तरह निर्भर ही रहती है, इसलिए वह न तो अपने अस्तित्व (existence) को पैदा कर सकती है और न ही उसे बनाए रख सकती है।

फ़ख़रुद्दीन अर-राज़ी ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ऐसी अनंत श्रृंखला (infinite chain)  पर्याप्त कारण के सिद्धांत (principle of sufficient reason) का उल्लंघन करती है। अगर हर कड़ी किसी और पर निर्भर है, तो पूरी श्रृंखला का कोई अंतिम कारण (final explanation) नहीं मिलता। नतीजा यह होता है कि पूरी श्रृंखला बिना व्याख्या (unexplained) के रह जाती है।

आसान शब्दों में, जब तक किसी एक स्वतंत्र और आवश्यक कारण (independent, necessary cause) को न माना जाए, तब तक ब्रह्मांड के अस्तित्व की सही और पूरी व्याख्या संभव नहीं होती।

कुरआन एक तीखी तर्कसंगत चुनौती पेश करता है, जैसा कि अल्लाह तआला फरमाता हैं:

أَمْ خُلِقُوا مِنْ غَيْرِ شَيْءٍ أَمْ هُمُ الْخَالِقُونَ
“क्या वे बिना किसी चीज के पैदा हुए, या वे खुद अपने सृष्टिकर्ता हैं?” (सूरह अत-तूर 52:35)

यह साफ़ तौर पर स्वयं-सृष्टि (self-creation) की धारणा को ख़ारिज करता है, क्योंकि तर्क के अनुसार कोई भी चीज़ खुद को पैदा नहीं कर सकती। इसी तरह, “कुछ भी न होने” से अचानक सब कुछ पैदा हो जाना भी तर्कसंगत (rational) नहीं है।
इसी प्रकार अनंत प्रतिगमन (infinite regress/ تَسَلْسُل) भी कोई समाधान नहीं देता, क्योंकि इसमें न तो कोई वास्तविक कारण (real cause) मिलता है और न ही कोई अंतिम आधार (final ground)। यह सिर्फ़ सवाल को आगे-पीछे टालता रहता है, लेकिन अस्तित्व की सही व्याख्या नहीं करता। इसलिए तर्क और वह्य दोनों श्रृंखला का समापन एक स्वतंत्र, आवश्यक आधार में मांगते हैं: वाजिब अल-वुजूद।

इस्लामी धर्मशास्त्र में आवश्यक सत्ता (वाजिब अल-वुजूद) The Necessary Being (Wājib al-Wujūd) in Islamic Theology

इस्लामी धर्मशास्त्र (Islamic theology) में वाजिब अल-वुजूद उस सत्ता (being) को कहा जाता है जिसका अस्तित्व अनिवार्य (necessary) है। यानी वह कभी न होने वाली नहीं हो सकती। उसका होना किसी कारण, समय या सहारे पर निर्भर नहीं है। वह स्वयं-निर्भर (self-existing) और स्वतंत्र (independent) है।

इसके विपरीत, ब्रह्मांड और उसमें मौजूद हर चीज़ मुमकिन अल-वुजूद (مُمْكِنُ الْوُجُودِ/contingent) है—यानी ऐसी सत्ता जो हो भी सकती थी और न भी हो सकती थी, और जो अपने अस्तित्व के लिए किसी और पर निर्भर है।

इस्लामी विद्वानों के अनुसार, अगर सारी चीज़ें निर्भर और आकस्मिक हों, तो अंत में एक ऐसी सत्ता का होना ज़रूरी है जो किसी पर निर्भर न हो। वही सत्ता अल्लाह है—जो सृष्टि का कारण भी है और हर पल उसका सहारा भी।
इसीलिए कहा जाता है कि वाजिब अल-वुजूद ही हर चीज़ के अस्तित्व की अंतिम व्याख्या है।

इस्लाम इस आवश्यक सत्ता को अल्लाह मानता है। कुरआन अल्लाह की स्वयं-निर्भर प्रकृति का वर्णन कई आयतों में करता है, सबसे स्पष्ट सूरह अल-इख्लास में है:

اللَّهُ الصَّمَدُ
“अल्लाह बेनियाज है, जिस पर सब निर्भर हैं।”
(सूरह अल-इख्लास: 2)

शब्द अल-समद (al-Ṣamad):
(الصَّمَدُ, अस्-समदु) का अर्थ है पूरी तरह स्वतंत्र (fully independent) और बिल्कुल बेनियाज़ (self-sufficient) होना। इसका मतलब यह है कि हर चीज़ अल्लाह पर निर्भर (dependent) है, लेकिन अल्लाह किसी पर निर्भर नहीं है।

यही गुण अल्लाह को सृष्टि की बाकी सभी चीज़ों से अलग और विपरीत बनाता है। दुनिया की सारी चीज़ें आकस्मिक सत्ताएँ (contingent beings) हैं—उनका अस्तित्व नाज़ुक है, वे बदलती हैं और किसी न किसी सहारे पर टिकी होती हैं। जबकि अल्लाह अल-समद है: न उसे किसी सहारे की ज़रूरत है, न कोई कमी, और न कोई निर्भरता।

इमाम अल-ग़ज़ाली ने इस बात को बहुत सरल तर्क से समझाया। वे कहते हैं कि अगर सारी सत्ताएँ केवल आकस्मिक (contingent) होतीं, तो ज़रूर कोई ऐसा समय होता जब कुछ भी मौजूद नहीं होता। और यह एक तय बात है कि कुछ होने से कुछ पैदा नहीं हो सकता (nothing comes from nothing)।

इसलिए बुद्धि (reason) यह मांग करती है कि कोई ऐसी सत्ता ज़रूर हो, जिसका अस्तित्व हमेशा से हो और ज़रूरी हो (necessary and eternal)। ऐसी सत्ता किसी और की वजह से मौजूद नहीं हो सकती, क्योंकि अगर वह भी किसी कारण पर निर्भर होती, तो वह खुद आकस्मिक बन जाती।

इसीलिए इस्लामी दर्शन में कहा गया है कि एक ऐसी सत्ता है जो खुद अपने आप मौजूद है, जिसे وَاجِبُ الْوُجُوْدِ بِذَاتِه (वाजिबुल्-वुजूदि बि-धातिही) कहा जाता है— यानी ऐसी सत्ता जिसका अस्तित्व उसकी अपनी ذات से है, न कि किसी बाहरी कारण से। यही सत्ता पूरी सृष्टि का अंतिम आधार (ultimate foundation) है।

मुहम्मद ने एक मशहूर दुआ में इस आध्यात्मिक वास्तविकता की पुष्टि की:

أَنْتَ الْأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الْآخِرُ فَلَيْسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ
“तुम पहले हो; तुमसे पहले कुछ नहीं। तुम आखिरी हो; तुमसे बाद कुछ नहीं।”
(सहीह मुस्लिम)

यह हदीस स्पष्ट रूप से अनंत प्रतिगमन (infinite regress) को नकारती है और यह बताती है कि सभी अस्तित्व की अंतिम शुरुआत (ultimate beginning) अल्लाह ही है।
अल्लाह से पहले कुछ भी नहीं था, और वही हर चीज़ का पहला कारण और स्थायी आधार है।

गुण और इस्लामी एकेश्वरवाद की सुसंगतता (The compatibility of divine attributes and Islamic monotheism)

इस्लामी धर्मशास्त्र में आवश्यक सत्ता कोई अमूर्त दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवित, जानने वाला और इच्छा रखने वाला ईश्वर है। अल्लाह के पास आवश्यक सत्ता के लिए तर्कसंगत रूप से जरूरी गुण हैं: अनादिता (eternity) (qidam, قِدَمٌ), स्वयं-स्थिरता (self-subsistence) (qiyām bi-nafsihī, قِيَامٌ بِنَفْسِهِ), एकता (unity) (waḥdāniyyah, وَحْدَانِيَّةٌ), और पूर्ण शक्ति (absolute power) (qudrah, قُدْرَةٌ)।

इस्लामी धर्मशास्त्र में आवश्यक सत्ता (Necessary Being) कोई सूखा या अमूर्त दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि वह जीवित, जानने वाला और इच्छा रखने वाला ईश्वर है। यानी यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि वही अल्लाह है जिस पर इस्लाम विश्वास करता है।

अल्लाह के पास वे सभी गुण हैं जो एक आवश्यक सत्ता के लिए तर्कसंगत रूप से ज़रूरी होते हैं, जैसे—अनादिता (eternity) (qidam, قِدَمٌ), अल्लाह

कुरआन घोषणा करता है:

اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ
“अल्लाह—उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वह जीवित, सबको संभालने वाला है।”
(सूरह अल-बकराह: 255)

यहां अल-हय्य (al-Ḥayy) (الْحَيُّ, “हमेशा जीवित”) और अल-कय्यूम (al-Qayyūm) (الْقَيُّومُ, “सबको संभालने वाला”) अनंत जीवन और स्वतंत्रता की पुष्टि करते हैं।

इस्लामी धर्मशास्त्र जोर देता है कि अल्लाह की आवश्यकता उसकी इच्छा (will) को नकारती नहीं। सृष्टि स्वचालित उत्सर्जन नहीं, बल्कि दिव्य इच्छा (divine will) (irādah, إِرَادَةٌ) का जानबूझकर कार्य है। यह नैतिक जिम्मेदारी, दिव्य बुद्धिमत्ता (divine wisdom) (ḥikmah, حِكْمَةٌ), और उद्देश्यपूर्ण सृष्टि को बनाए रखता है। आवश्यक सत्ता एक, सरल और सर्वोच्च है, संरचना या साझीदारों से मुक्त।

निष्कर्ष

इस्लामी दृष्टिकोण में आकस्मिकता (contingency — हुदूस/इमकान), अनंत प्रतिगमन (infinite regress — तसलसुल) और आवश्यक सत्ता (Necessary Being — वाजिब अल-वुजूद)—ये तीनों मिलकर अल्लाह के अस्तित्व के लिए एक मजबूत और आपस में जुड़ी हुई दलील पेश करती हैं।

ब्रह्मांड की आकस्मिक प्रकृति (contingent nature) यह दिखाती है कि वह अपने आप से मौजूद नहीं है, बल्कि किसी पर निर्भर (dependent) है। अनंत प्रतिगमन (infinite regress) की असंभवता यह स्पष्ट करती है कि कारणों की कोई अंतहीन श्रृंखला वास्तविक आधार नहीं दे सकती। और अंत में, आवश्यक सत्ता की पुष्टि यह बताती है कि अस्तित्व के पीछे एक ऐसी सत्ता होनी चाहिए जो स्वयं-निर्भर (self-existent) हो और जिस पर सब कुछ टिका हो।

इस तरह, इस्लामी चिंतन में ये तीनों अवधारणाएँ मिलकर यह निष्कर्ष देती हैं कि ब्रह्मांड का अंतिम और तर्कसंगत आधार अल्लाह ही है—जो स्वयं मौजूद है और हर चीज़ को अस्तित्व प्रदान करता है। इस तरह, इस्लामी चिंतन में ये तीनों अवधारणाएँ मिलकर यह निष्कर्ष देती हैं कि ब्रह्मांड का अंतिम और तर्कसंगत आधार अल्लाह ही है—जो स्वयं मौजूद है और हर चीज़ को अस्तित्व प्रदान करता है।

इमाम अल-गज़ाली और अन्य कलाम विद्वानों ने दिखाया कि अल्लाह पर विश्वास सिर्फ विरासत में मिली परंपरा नहीं, बल्कि ठोस तर्क और दिव्य वह्य से समर्थित निष्कर्ष है। कुरआन और सुन्नत लगातार इंसानी बुद्धि को अल्लाह को अनंत, स्वतंत्र और आवश्यक स्रोत के रूप में पहचानने की ओर मार्गदर्शन करते हैं। इस प्रकार इस्लामी धर्मशास्त्र विश्वास और तर्क का सामंजस्य करता है, एक ऐसी विश्वदृष्टि पेश करता है जिसमें अस्तित्व खुद अल्लाह की वास्तविकता की गवाही देता है—एक ईश्वर, अनंत, बेनियाज, और सभी प्रशंसा का हकदार।

संदर्भ

  • सूरह फातिर (35:15)
    • सूरह अत-तूर (52:35)
    • सूरह अर-रहमान (55:26)
    • सूरह अल-बकराह (2:255)
    • सूरह अल-इख्लास (112:2)
    • सहीह अल-बुखारी
    • सहीह मुस्लिम
    • अल-गज़ाली, अल-इक्तिसाद फी अल-इतिकाद
    • अल-गज़ाली, तहाफुत अल-फलासिफा
    • अल-गज़ाली, इह्या उलूम अद-दीन
    • फख्रुद्दीन अर-राजी, अल-मतालिब अल-आलिया
    • फख्रुद्दीन अर-राजी, तफ्सीर अल-कबीर (मफातीह अल-गैब)
    • फ्रैंक, रिचर्ड एम., क्रिएशन एंड द कोस्मिक सिस्टम: अल-गज़ाली एंड अविसेन्ना
    • एडमसन, पीटर, फिलॉसफी इन द इस्लामिक वर्ल्ड
    • फखरी, मजीद, अ हिस्ट्री ऑफ इस्लामिक फिलॉसफी

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज बिहार

Disclaimer

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