हिजाब का उद्देश्य: पहचान, शालीनता और सुरक्षा
परिचय
हिजाब—जो अरबी मूल ḥ-j-b से निकला शब्द है—का मूल अर्थ है “ढकना (to cover), रोकना (to shield), या अलग करना (to separate)”। लेकिन इस सरल अर्थ के भीतर एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक दर्शन छुपा हुआ है। हिजाब केवल सिर पर ओढ़ी जाने वाली चादर नहीं; यह एक ऐसी जीवन-शैली (lifestyle) है जो ईमान, नैतिकता, आत्मसम्मान, सामाजिक गरिमा और आध्यात्मिक सुरक्षा (spiritual protection)—इन सभी को एक सूत्र में पिरोती है। मुसलमान महिलाओं की पहचान का यह सबसे बड़ा प्रतीक है, जो उन्हें भीड़ में अलग करता है और उनके चरित्र को दृश्य रूप देता है।
आज की दुनिया, जहाँ सोशल मीडिया संस्कृति, फ़ैशन इंडस्ट्री और उपभोक्तावाद (consumerism) महिलाओं के शरीर को एक ‘उत्पाद’ (product) के रूप में प्रस्तुत करने का दबाव बनाते हैं, वहाँ हिजाब महिलाओं को यह अधिकार देता है कि वे तय करें—उन्हें कैसे देखा जाए। क्या दुनिया उनके शरीर को पहले देखे या उनके चरित्र, ज्ञान और व्यक्तित्व को? इस तरह हिजाब महिलाओं के लिए मजबूरी नहीं, बल्कि चुनाव (choice), सम्मान (dignity) और स्वतंत्र पहचान (independent identity) का प्रतीक बन जाता है।
हिजाब महिलाओं के वस्तुकरण (objectification) का साफ़ विरोध है। यह उस वैश्विक सोच (global mindset) को चुनौती देता है, जो महिलाओं की क़ीमत (value) को उनकी सुंदरता (beauty) और कपड़ों से आँकता है। इसके उलट, हिजाब महिलाओं को यह आज़ादी (freedom) देता है कि वे खुद तय करें कि उनकी पहचान (identity) क्या हो। इसी वजह से दुनिया की करोड़ों मुस्लिम महिलाएँ हिजाब को दमन (oppression) नहीं, बल्कि सशक्तिकरण (empowerment) और आत्मसम्मान (self-respect) का प्रतीक मानती हैं।
हिजाब का धार्मिक आधार: कुरआन और सुन्नत की मज़बूत नींव
इस्लाम में हिजाब कोई सांस्कृतिक प्रथा (cultural custom) नहीं बल्कि सीधी वह्य (revelation) पर आधारित एक दिव्य आदेश है। इसकी जड़ें कुरआन और हदीस में इतनी स्पष्ट हैं कि किसी भी इस्लामी विद्वान ने इसके अनिवार्य स्वरूप (obligatory nature) पर मतभेद नहीं किया।
पहला आदेश—पुरुषों की निगाहें
इस्लाम ने पहले पुरुषों को संबोधित किया। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ ... (अन-नूर, 24:30)
“ईमान वाले मर्दों से कहो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें…”
यह आयत बताती है कि हिजाब कोई एकतरफ़ा ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक पारस्परिक नैतिक व्यवस्था (mutual moral system) है। इसमें महिलाओं के हिजाब से पहले पुरुषों की नज़र का हिजाब (lowering the gaze) ज़रूरी ठहराया गया है।
इसका मतलब यह है कि इस्लाम में शालीनता (modesty) की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ महिलाओं पर नहीं, बल्कि पुरुषों और महिलाओं—दोनों पर समान रूप से लागू होती है।
दूसरा आदेश—महिलाओं का कवरेज
इसके बाद महिलाओं को संबोधित किया। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ ... (अन-नूर, 24:31)
“…और वे अपनी ख़ुमार (head-cover) को अपनी ज्यूब (chest) पर डाल लें।”
यह आयत स्पष्ट रूप से सिर और छाती दोनों को ढकने का निर्देश देती है।
तीसरा आदेश—जिलबाब (outer garment)
अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَابِيبِهِنَّ ... (अहज़ाब, 33:59)
“अपनी जिलबाब (outer cloak) को अपने ऊपर लपेट लें।”
यह हिजाब को सामाजिक पहचान और सुरक्षा से जोड़ता है—
ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَنْ يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ
“ताकि वे पहचानी जाएँ और उन्हें हानि न पहुँचाई जाए।”
हदीस से प्रमाण
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है:
عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: يَرْحَمُ اللَّهُ نِسَاءَ الْمُهَاجِرَاتِ الْأُوَلَ، لَمَّا أَنْزَلَ اللَّهُ: ﴿وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ﴾
شَقَقْنَ مُرُوطَهُنَّ فَاخْتَمَرْنَ بِهَا)صحيح أبي داود)
“अल्लाह पहली मुहाजिर औरतों पर रहमत फ़रमाए। जब यह आयत नाज़िल हुई: ‘और वे अपनी ओढ़नियाँ अपने सीने पर डाल लें’, तो उन्होंने अपनी चादरों को फाड़ा और उनसे अपने सिर ढक लिए।”
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की यह हदीस पर्दे (हिजाब) के हुक्म के नाज़िल होने के तुरंत बाद के हालात को बयान करती है। यह हदीस सूरह नूर (24:31) की उस आयत से जुड़ी है, जिसमें ईमान वाली औरतों को अपनी ओढ़नी (ख़िमार) को सीने पर डालने का आदेश दिया गया। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ
“और चाहिए कि वे अपनी ओढ़नियाँ अपने सीने पर डाल लें।” (सूरह नूर 24:31)
इस आयत के उतरते ही मदीना की सहाबियात ने बिना किसी देरी या सवाल के अल्लाह के हुक्म को स्वीकार किया। उन्होंने अपने कपड़ों के किनारों से अपने सिर और सीने को ढक लिया, जिसे हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इन शब्दों में बयान किया: فَاخْتَمَرْنَ بِهَا
और उनसे अपने सिर ढक लिए।
यह हदीस सहाबियात की सच्ची इताअत और ईमान की गहराई को साफ़ तौर पर दिखाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिजाब इस्लाम में कोई बाद की रस्म या सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि क़ुरआन और सुन्नत पर आधारित एक स्पष्ट आदेश है। सहाबियात का यह रवैया इस बात की मिसाल है कि मोमिन अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हुक्म के सामने बिना हिचक और टाल-मटोल के झुक जाता है। हिजाब का मूल उद्देश्य औरत की इज़्ज़त, हया और समाज की नैतिक पवित्रता की रक्षा करना है, न कि उस पर कोई बोझ डालना।
रसूल ﷺ ने हया को ईमान का हिस्सा बताया:
الْحَيَاءُ شُعْبَةٌ مِنَ الْإِيمَانِ (मुस्लिम,बुख़ारी)
इन सभी नसीहतों से यह सिद्ध होता है कि हिजाब इबादत (worship) है—अल्लाह के आदेश की तामील और ईमान का प्रदर्शन।
शालीनता: हिजाब का दिल और आत्मा (Modesty: The Heart and Soul of Hijab)
इस्लाम में शालीनता—الحَيَاء (ḥayāʼ)—को ईमान की शाखा बताया गया है। हदीस में नबी ﷺ ने फरमाया: «الْحَيَاءُ شُعْبَةٌ مِنَ الْإِيمَانِ» — “हया ईमान की एक शाखा है।” (सहीह मुस्लिम)
यही कारण है कि हिजाब केवल बाहरी वस्त्र नहीं बल्कि शालीनता का व्यावहारिक रूप (practical form) है, जो भीतर के पवित्र चरित्र को बाहर तक विस्तारित करता है। कुरआन में भी शालीनता को आध्यात्मिक पवित्रता (spiritual purity) का आधार बताया गया है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
﴿وَالَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَ﴾
“और वे लोग जो अपनी शर्मगाहों की रक्षा करते हैं।” (सूरह अल-मुअमिनून, 23:5)
यह आयत सूरह अल-मुअमिनून की शुरुआती आयतों में से है, जिनमें अल्लाह तआला सच्चे मोमिनों (true believers) की पहचान बताता है। यहाँ “शर्मगाहों की हिफ़ाज़त” का मतलब सिर्फ़ ज़िना से बचना (avoiding adultery) ही नहीं है, बल्कि हर उस नज़र (gaze), सोच (thought) और व्यवहार (behaviour) से दूर रहना भी है जो इंसान को नैतिक गिरावट (moral decline) की ओर ले जाए।
इस्लाम में पवित्रता (chastity) को ईमान का बहुत अहम हिस्सा माना गया है। इसी कारण क़ुरआन ने इसे सीधे मोमिनों की पहचान से जोड़ा है।
इस आयत का व्यापक अर्थ यह भी है कि इंसान अपने शरीर (body), नज़र (vision) और इच्छाओं (desires) पर नियंत्रण रखे और अल्लाह द्वारा तय की गई सीमाओं (ḥudūd / limits) का सम्मान करे। पर्दा, निगाह की हिफ़ाज़त, शालीन व्यवहार (decent conduct) और वैवाहिक व्यवस्था (marital system)—ये सभी उसी नैतिक ढांचे का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य व्यक्ति और समाज दोनों को फ़हाशी, अव्यवस्था और शोषण से बचाता है।
इस तरह यह आयत एक पवित्र (pure), संतुलित (balanced) और ज़िम्मेदार (responsible) सामाजिक जीवन की मज़बूत बुनियाद रखती है। इस्लाम में शालीनता का दायरा बहुत व्यापक है—यह केवल शरीर ढँकने तक सीमित नहीं; बल्कि बोलचाल, नज़र, व्यवहार और नीयत तक फैलता है।
हिजाब पहनने वाली महिला दुनिया को यह संदेश देती है कि उसकी पहचान उसके शरीर से नहीं, बल्कि उसके चरित्र (character), बुद्धि (intellect) और ईमान (faith) से होगी। आधुनिक युग में, जहाँ सोशल मीडिया और सौंदर्य उद्योग (beauty industry) लगातार महिला को उसके रूप से परिभाषित करने का दबाव बनाते हैं, वहाँ हिजाब एक मानसिक और आध्यात्मिक मुक्ति (liberation) का साधन बन जाता है।
कई शोध (research) यह बताते हैं कि हिजाब अपनाने वाली महिलाओं में शरीर-छवि (body image) को लेकर ज़्यादा संतुलन, कम चिंता (less anxiety) और आत्मविश्वास (self-confidence) की अपेक्षाकृत अधिक स्थिरता (stability) पाई जाती है। इस तरह हिजाब बाहरी ध्यान (external attention) को हटाकर महिला की आंतरिक योग्यता (inner abilities) और मूल्य (values) पर केंद्रित करता है।
दूसरी ओर, पुरुषों (men) को भी अपनी निगाहों (gaze) को नियंत्रित करने का आदेश दिया गया है। नबी ﷺ ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से फ़रमाया:
يَا عَلِيُّ لَا تُتْبِعِ النَّظْرَةَ النَّظْرَةَ
“ऐ अली! एक नज़र के पीछे दूसरी नज़र मत डालो।” (तिर्मिज़ी)
इससे साफ़ होता है कि हिजाब केवल महिलाओं पर ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक पूरी नैतिक व्यवस्था (moral system) है, जिसमें पुरुष और महिलाएँ—दोनों—शामिल हैं।
इसी तरह शालीनता (modesty) हिजाब का दिल है— यह एक ऐसी अंदरूनी रोशनी (inner light) जो एक साधारण कपड़े) को आध्यात्मिक पहचान (spiritual identity) में बदल देती है।
पहचान और सुरक्षा: हिजाब की दो मजबूत दीवारें
हिजाब को इस्लाम केवल वस्त्र नहीं बल्कि पहचान—هُوِيَّة (identity)—का प्रतीक बनाता है। कुरआन में अल्लाह फ़रमाता है:
﴿يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَابِيبِهِنَّۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَنْ يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ﴾ (33:59)
“अपनी चादरों को अपने ऊपर लपेट लें; यह अधिक उपयुक्त है ताकि वे पहचानी जाएँ और उन्हें कष्ट न दिया जाए।” (सूरह अल-अह़ज़ाब 33:59)
यह आयत हिजाब और सामाजिक सुरक्षा के आदेश को साफ़ करती है। यहाँ ‘जिलबाब’ (jilbab) से मतलब वह बाहरी चादर या ढीला वस्त्र (outer loose garment) है, जिसे महिला अपने कपड़ों के ऊपर पहनती है। “अपने ऊपर ढीली कर लेने” का अर्थ है शरीर को शालीन (modest) तरीके से ढकना, ताकि पहचान एक सम्मानित और पाक-दामन (dignified and modest) महिला के रूप में हो। इस आयत का उद्देश्य यह बताना है कि पर्दा और शालीनता महिलाओं की इज़्ज़त (dignity), पहचान (identity) और सुरक्षा (protection) का साधन हैं—कोई बोझ नहीं।
इस आयत से यह भी स्पष्ट होता है कि इस्लाम समाज में उत्पीड़न और दुर्व्यवहार (misconduct) को रोकना चाहता है। जब समाज में पहचान, मर्यादा (respect) और नैतिकता (ethics) का माहौल बनता है, तो महिलाओं को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्तियाँ कम होती हैं। इस तरह यह आयत एक संतुलित (balanced) सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद रखती है, जहाँ सम्मान (respect), हया (modesty) और सुरक्षा (safety)—तीनों को साथ-साथ महत्व दिया गया है।
इससे स्पष्ट होता है कि हिजाब स्त्री को एक सम्मानित और संरक्षित पहचान प्रदान करता है, जो उसे भीड़ में गरिमा के साथ अलग दिखाती है। दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में हिजाब की शैलियाँ भिन्न हो सकती हैं—अबाया, चादोर, दुपट्टा, बुर्क़ा, ख़िमार—लेकिन उद्देश्य समान रहता है: शालीनता और प्रतिष्ठा। पहचान के साथ-साथ हिजाब सुरक्षा का भी स्रोत है।
क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
: “فَلَا يُؤْذَيْنَ” — यानी “ताकि उन्हें हानि न पहुँचाई जाए।”
यह बताता है कि हिजाब का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा (protection) और सम्मान (dignity) है। आज के समाज में, जहाँ महिलाओं को वस्तुकरण (objectification), अनुचित टिप्पणियों (inappropriate comments) और सौंदर्य प्रतिस्पर्धा (beauty pressure) का सामना करना पड़ता है, वहाँ हिजाब इन सबके ख़िलाफ़ एक मज़बूत सहारा बनकर सामने आता है।
ऐतिहासिक विकास और आधुनिक चुनौतियाँ
हिजाब का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन इस्लाम ने इसे पहली बार समान गरिमा (universal dignity) और एक स्पष्ट आध्यात्मिक उद्देश्य (spiritual purpose) दिया। इस्लाम से पहले अरब समाज में ढकना ज़्यादातर ऊँचे वर्ग की महिलाओं तक सीमित था, जबकि इस्लाम ने इसे हर महिला के सम्मान (dignity) और सामुदायिक पहचान (community identity) का हिस्सा बना दिया।
मदीना के शुरुआती इस्लामी समाज से लेकर अब्बासी ख़िलाफ़त (Abbasid Caliphate) और उस्मानी सल्तनत (Ottoman Empire) तक, हिजाब केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक पहचान (social identity) का प्रतीक रहा। औपनिवेशिक दौर (colonial period) में पश्चिमी शक्तियों ने हिजाब को पिछड़ेपन (backwardness) से जोड़ने की कोशिश की, ताकि मुस्लिम समाज की सांस्कृतिक जड़ों (cultural roots) को कमज़ोर किया जा सके। लेकिन यह कोशिश उलटी साबित हुई—हिजाब प्रतिरोध (resistance) और मुक्ति (liberation) का चिन्ह बनकर उभरा।
1970 के दशक के बाद इस्लामी बौद्धिक जागरण (Islamic intellectual revival) ने हिजाब को नए आत्मविश्वास (confidence) और सामाजिक सम्मान (social respect) के साथ फिर से जीवित किया। आज मॉडेस्ट फ़ैशन (modest fashion) एक वैश्विक उद्योग बन चुका है, स्पोर्ट्स हिजाब (sports hijab) अंतरराष्ट्रीय खेलों में दिखता है, और इल्हान उमर (Ilhan Omar) तथा इब्तिहाज़ मुहम्मद (Ibtihaj Muhammad) जैसी हस्तियाँ हिजाब को नेतृत्व (leadership) और सफलता (success) से जोड़ रही हैं।
दूसरी ओर, फ़्रांस (France) में हिजाब पर प्रतिबंध, भारत के कुछ राज्यों में इसके विवाद, और ईरान (Iran) में हिजाब की अनिवार्यता के ख़िलाफ़ विरोध—ये सब दिखाते हैं कि हिजाब आज भी राजनीतिक (political), सांस्कृतिक (cultural) और धार्मिक (religious) बहस का केंद्र है।
निष्कर्ष (Conclusion with Arabic References)
अंततः, हिजाब एक साधारण कपड़ा नहीं बल्कि एक संपूर्ण आध्यात्मिक दर्शन, एक नैतिक अनुशासन और एक सशक्त पहचान है। यह शालीनता—الحَيَاء—को व्यवहार में बदलता है, पहचान को गरिमा देता है और सुरक्षा को नैतिक आधार प्रदान करता है।
नबी ﷺ ने फरमाया: إِنَّ لِكُلِّ دِينٍ خُلُقًا، وَ إنَّ خُلُقَ الإسلامِ الْحَيَاءُ
“हर धर्म का एक चरित्र होता है और बेशक इस्लाम का चरित्र हया है।” (इब्न माजा)
हिजाब उसी अच्छे चरित्र का दिखाई देने वाला रूप है। आज की दुनिया में, जहाँ सुंदर दिखने का लगातार दबाव (beauty pressure) रहता है, हिजाब महिलाओं के लिए एक रोशनी की तरह है। यह उन्हें आत्मसम्मान (self-respect), अंदरूनी ताक़त (inner strength) और सच्ची आज़ादी (true freedom) देता है।
हिजाब पहनने वाली महिलाएँ केवल अपना सिर (head) नहीं ढकतीं, बल्कि अपने ईमान और मूल्यों को सम्मान के साथ अपनाती हैं। इसलिए हिजाब का महत्व कभी कम नहीं होता। यह समय और समाज से ऊपर उठकर एक स्थायी आध्यात्मिक मूल्य बन जाता है। यही हिजाब की असली सुंदरता और असली ताक़त है।
निष्कर्ष
हिजाब एक कपड़ा नहीं है; यह एक विचार (idea) है, एक इबादत (devotion) है, एक पहचान (identity) है, और एक सुरक्षा (protection) है। यह शालीनता को चरित्र में बसाता है, ईमान को मज़बूत करता है और आत्मसम्मान को बढ़ाता है। आज की दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए— हिजाब की विशिष्टता, गरिमा और आध्यात्मिक रोशनी कभी कम नहीं होती।
हिजाब पहनने वाली महिलाएँ केवल अपना सर नहीं ढकतीं— वे अपनी आस्था, गरिमा और स्वतंत्रता को ढाल की तरह ओढ़ती हैं।यही हिजाब का असल उद्देश्य और असल सौंदर्य है।
संदर्भ (हिंदी में)
- सूरह अन-नूर और सूरह अल-अहज़ाब।
- सहीह अल-बुख़ारी
- सुनन अबी दाऊद
- सहीह मुस्लिम
- सुनन इब्न माजा
- सुनन तिर्मिज़ी
- अल-हाकिम
- NPR Study (2014) — हिजाब और बॉडी इमेज।
- Yaqeen Institute — हिजाब: धार्मिक या सांस्कृतिक?
- फ़दवा एल-गुइन्दी, Veiling Resistance।
- Harvard Magazine, “The Veil’s Revival” (2011)।
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज बिहार
Disclaimer
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