औरंगज़ेब आलमगीर: एक पारंपरिक मुस्लिम नज़रिए में न्यायप्रिय, धार्मिक और प्रभावी शासक

परिचय

पारंपरिक इस्लामी विद्वानों और पुराने मुस्लिम इतिहासकारों की नज़र से देखा जाए, तो औरंगज़ेब आलमगीर (1058–1118 हिजरी / 1658–1707 ई.) को किसी “विवादित तानाशाह” के रूप में नहीं, बल्कि भारत के सबसे धार्मिक, न्यायप्रिय और काबिल शासकों में माना जाता है। मुस्लिम इतिहास लिखने वालों ने हमेशा उनकी तक़वा (अल्लाह से डर, परहेज़गार), उनके अदल (न्याय के लिए लगातार कोशिश) और इतने बड़े, कई धर्मों वाले साम्राज्य को शरीअत के सिद्धांतों के अनुसार चलाने की उनकी कोशिश की तारीफ़ की है।

आज के समय में अक्सर उन्हें गलत तरह से “कट्टर” या “तोड़फोड़ करने वाला” बताया जाता है। लेकिन पुराने मुस्लिम विद्वानों की नज़र में औरंगज़ेब 11वीं इस्लामी सदी के मुझद्दिद (दीन को नया जीव देने वाले सुधारक) और एक “न्यायप्रिय बादशाह” माने जाते हैं—जैसा कि अल-मावर्दी की अहकाम-उस-सुल्तानिया जैसी इस्लामी राजनीतिक किताबों में आदर्श शासक का वर्णन मिलता है।

 इस्लामी शासन और व्यक्तिगत धार्मिकता (Islamic Governance and Personal Piety)

उनका मशहूर नाम “आलमगीर”—जिसका मतलब है “दुनिया को फ़तह करने वाला”—दुनियावी सफलता और धार्मिक मेहनत दोनों की तरफ़ इशारा करता है। लेकिन इस्लामी स्रोत बताते हैं कि औरंगज़ेब की सबसे बड़ी पहचान उनकी गहरी धार्मिकता थी, जो उनके राज-काम में भी साफ़ दिखाई देती थी।

वह पाँचों वक़्त की नमाज़ कोशिश करके जमाअत से पढ़ते थे, सोमवार–गुरुवार के रोज़े रखते थे, और लम्बे दक्कन अभियानों के दौरान भी कई बार पूरा क़ुरआन ख़त्म कर लेते थे। दरबारी इतिहासकार मुहम्मद साक़ी ( मआसिर--आलमगीरी ) और मुहम्मद काज़िम ( आलमगीरनामा ) बार-बार लिखते हैं कि औरंगज़ेब ने फ़ौजी सफ़रों में भी कभी तहज्जुद नहीं छोड़ी। उन्होंने संगीत, नाच, शराब और शाही इशरत को दरबार में बंद किया—सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह सख़्त थे, बल्कि इसलिए कि वह इन्हें सुन्नत के ख़िलाफ़ और जनता के ख़ज़ाने का गलत इस्तेमाल मानते थे।

उनकी सबसे अनोखी बात यह थी कि उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी को राज्य के ख़ज़ाने से पूरी तरह अलग रखा।
वह अपने हाथ से क़ुरआन लिखते थे, टोपी सिलते थे, और उन्हें बाज़ार में गुमनाम बेचकर वही कमाई अपनी निजी ज़रूरतों पर खर्च करते थे। 1707 में उनके निधन के वक़्त उनके पास सिर्फ़ कुछ सौ रुपये थे, जबकि मुग़ल ख़ज़ाना 24 करोड़ रुपये से ज़्यादा का था। मुस्लिम स्रोत इसे इस बात का प्रमाण मानते हैं कि वह दुनिया के फायदे के लिए नहीं, बल्कि अल्लाह की अमानत समझकर शासन करते थे।

उनकी सबसे बड़ी धार्मिक उपलब्धि फ़तावा--आलमगीरी थी—जो 1664–1675 के बीच तैयार हुई। इसमें भारत, मध्य एशिया और हिजाज़ के हज़ारों विद्वानों ने हिस्सा लिया। यह विशाल किताब हनफ़ी फ़िक़्ह (Hanafi Jurisprudence) का सबसे बड़ा संकलन है, ताकि पूरे साम्राज्य में क़ाज़ी और मुफ़्ती शरीअत के अनुसार सही फ़ैसले कर सकें। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के इस्लामी संस्थानों में आज भी यह किताब “हिदाया” के बाद सबसे अधिक मान्य है। पारंपरिक मुस्लिम विद्वानों के अनुसार, केवल यह एक काम ही उन पर की गई कई आलोचनाओं से कहीं ज़्यादा बड़ा है।

 गैरमुसलमानों की सुरक्षा और न्याय (Protection and Justice for Non-Muslims)

इस्लामी कानून में अहल--ज़िम्मा यानी संरक्षित गैर–मुसलमानों के अधिकार बहुत स्पष्ट हैं—उनकी जान, माल और पूजा की सुरक्षा, बदले में वफ़ादारी और जज़िया। परंपरागत इतिहासकार कहते हैं कि औरंगज़ेब ने इस कानून का ईमानदारी से पालन किया।

1679 में जज़िया की पुनः शुरूआत को मुस्लिम विद्वान “धार्मिक नफ़रत” नहीं, बल्कि पुराने इस्लामी ख़िलाफ़ती नियमों की वापसी के रूप में देखते हैं। इसके नियम बहुत हल्के थे:

  • गरीब लोग पूरी तरह मुक्त
  • मध्यम वर्ग सालाना 3–4 रुपये के बराबर
  • सबसे अमीर लोग लगभग 13–14 रुपये सालाना

औरतें, बच्चे, बुज़ुर्ग, अपंग, साधु, ब्राह्मण और राज्य कर्मचारी पूरी तरह मुक्त थे। कुल मिलाकर जज़िया सिर्फ़ 2–3% ही था—यानी बहुत मामूली। हिंदू इतिहासकार भी लिखते हैं कि “यह टैक्स बहुत नरमी से वसूला जाता था, किसी को बोझ नहीं लगता था।”

और सबसे अहम बात—औरंगज़ेब के समय सबसे ऊँचे मंसबदारों में हिंदुओं की संख्या बढ़कर 33% तक पहुँच गई।

कई राजपूत और मराठा सरदार—जैसे जय सिंह, जसवंत सिंह, अनूप सिंह—उनके बहुत भरोसेमंद अधिकारी थे। इस वजह से मुस्लिम इतिहासकार कहते हैं कि औरंगज़ेब लोगों को धर्म से नहीं, बल्कि काबिलियत और वफ़ादारी से जज करते थे।

मंदिर-विनाश: राजनीतिक और क़ानूनी वजहें (Temple Destruction: Political and Juristic Context)

पारंपरिक मुस्लिम इतिहासकार मानते हैं कि कुछ मंदिर तोड़े गए, लेकिन इसका कारण धार्मिक नफ़रत नहीं था। इस्लामी कानून के अनुसार, कोई भी पूजा-स्थल तभी कार्रवाई के दायरे में आता है जब वह बग़ावत या हथियार जमा करने का केंद्र बन जाए।

औरंगजेब के राज में मंदिर तोड़ने का हर बड़ा डॉक्यूमेंटेड मामला इसी कैटेगरी में आता है:

  • मथुरा का केशव राय मंदिर (1670): जाट विद्रोह में यह इलाक़ा किला बन गया था।
  • काशी का विश्वनाथ मंदिर (1669): स्थानीय बग़ावत के बाद कार्रवाई हुई।
  • राजस्थान के कुछ मंदिर: सिर्फ़ युद्ध की स्थिति में, जब राजपूत राजाओं ने संधि तोड़ी।

इसके ठीक उलट—औरंगज़ेब ने सैकड़ों मंदिरों को फ़रमान देकर ज़मीन, पैसा, संरक्षण दिया। सिर्फ़ राजस्थान के अभिलेखागार में 200 से ज़्यादा फ़रमान आज भी मौजूद हैं, जिनमें मंदिरों को आर्थिक सहयोग दिया गया।

पारंपरिक मुस्लिम विद्वानों की नज़र में यह नीति—बग़ावत पर सख़्ती, वफ़ादारी पर इनामइस्लामी शासन का संतुलित रूप है।

 न्याय, प्रशासन और जनता की भलाई (Justice, Administration, and Welfare)

औरंगज़ेब का “दीवान-ए-मज़ालिम” यानी शिकायत दरबार बहुत प्रसिद्ध था। वह हफ़्ते में दो बार आम जनता की शिकायतें खुद सुनते थे। कई बार उन्होंने अपने ही गवर्नरों और अमीरों के फैसले गलत पाकर रद्द कर देते थे।

उन्होंने हर बड़े शहर में मुहतसिब (Market inspector) नियुक्त किए—जो सिर्फ़ शराबखानों पर रोक नहीं लगाते थे, बल्कि बाज़ार में तौल-नाप, महँगाई, जमा-खोरी (Hoarding)और धोखाधड़ी (Fraud) भी रोकते थे। शरीअत में इसे जनता की भलाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।

उन्होंने कई गैर-कानूनी कर खत्म किए, दरबार के खर्च कम किए, और ज़मीनी कर (Land tax) को हल्का रखा, ताकि किसान परेशान न हों। यूरोपीय यात्रियों—जैसे फ्रांस्वा बर्नियर—ने लिखा कि औरंगज़ेब के समय भारत का किसान यूरोप के कई देशों के किसानों से बेहतर स्थिति में था।

निष्कर्ष

क़ुरआन, सुन्नत और मुस्लिम विद्वानों की परंपरा के अनुसार औरंगज़ेब न तो कट्टर थे और न ही विफल शासक। वह पूरी ईमानदारी से अल्लाह के कानून के अनुसार शासन करना चाहते थे और सभी प्रजा को सुरक्षा, न्याय और भलाई देना उनका लक्ष्य था।

उनकी सादा ज़िंदगी, न्याय के लिए उनकी मेहनत, इस्लामी विद्या के लिए फ़तावा--आलमगीरी जैसी महान किताब तैयार करवाना, और किसानों का बोझ कम करने की कोशिशें—यह सब उन्हें “न्यायप्रिय इमाम” के आदर्श के बहुत क़रीब ले जाती हैं।

दक्कन की लम्बी लड़ाइयाँ और साम्राज्य की चुनौतियाँ अपनी जगह हैं, लेकिन पारंपरिक मुस्लिम याद में औरंगज़ेब वही हैं जो अपने तख़ल्लुस “आलमगीर”—दुनिया पर क़ाबू पाने वालाको दुनिया की शोहरत से नहीं, बल्कि अल्लाह की अमानत समझकर निभाते रहे।

References (संदर्भ)

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  12. Khuda Bakhsh Oriental Public Library, Patna — Manuscripts & Farmans.

 

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तूबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज, बिहार

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