शब-ए-बारात की फज़ीलत और नेक आमाल

प्रस्तावना

इस्लाम एक ऐसा दीन है जो इंसान को सिर्फ़ दुनिया की ज़िंदगी नहीं, बल्कि आखिरत की सफलता का पूरा रास्ता भी सिखाता है। इस दीन में कुछ रातें ऐसी हैं जो अल्लाह की विशेष रहमत और मग़फिरत का सिलसिला लेकर आती हैं। इन रातों में इबादत का अज्र कई गुना बढ़ जाता है, गुनाह माफ़ हो जाते हैं और दुआएं क़बूल होने की बहुत बड़ी उम्मीद रहती है।

इन खास रातों में शब--बारात यानी 15 शाबान की रात को बहुत ऊँचा दर्जा हासिल है। इसे उर्दू में शब--बारात, अरबी में लैला तुन निस्फ़ मिन शाबान (لَيلَةُ النِّصف مِن شَعْبان) और कुछ इलाकों में लैला तुल बराअत कहा जाता है। इस रात अल्लाह तआला अपनी रहमत की बरसात करता है, फरिश्तों की जमातें ज़मीन पर उतरती हैं और बंदों के नामों में बदलाव, मग़फिरत और रिज़्क़ का इंतेज़ाम होता है।

शब--बारात का नाम और उसकी वजह

शब-ए-बारात नाम दो अरबी शब्दों से मिलकर बना है:

  • शब = रात
  • बारात / बराअत = बरी होना, आज़ादी मिलना, छुटकारा पाना

इस रात अल्लाह की रहमत से बहुत से गुनहगार बंदे जहन्नम की सज़ा से बरी कर दिए जाते हैं। यही वजह है कि इसे छुटकारे की रात या मग़फिरत की रात कहा जाता है।

कई उलेमा ने लिखा है कि यह नाम इसलिए भी मुनासिब है क्योंकि इस रात में अल्लाह तआला अपने बंदों के गुनाहों से बरी होने का ऐलान फरमाता है और बहुत से लोगों का नाम दोज़ख़ से निकालकर जन्नत की तरफ़ लिख दिया जाता है।

शब--बारात की फज़ीलत अहम हदीसें और उनकी व्याख्या

शब-ए-बरात बहुत ज़्यादा बरकतों और रहमतों वाली रात है, इसलिए इसके बारे में कुछ हदीसें पेश की जा रही हैं।

हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से मरवी है:

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: فَقَدْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ لَيْلَةً، فَخَرَجْتُ فَإِذَا هُوَ بِالْبَقِيعِ، فَقَالَ: أَكُنْتِ تَخَافِينَ أَنْ يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْكِ وَرَسُولُهُ؟ قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنِّي ظَنَنْتُ أَنَّكَ أَتَيْتَ بَعْضَ نِسَائِكَ، فَقَالَ: إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى يَنْزِلُ لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا، فَيَغْفِرُ لِأَكْثَرَ مِنْ عَدَدِ شَعْرِ غَنَمِ بَنِي كَلْبٍ.

हज़रत आयशा सिद्दीका (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) फ़रमाती हैं कि एक रात मैंने रसूल-ए-करीम ﷺ को अपने पास नहीं पाया। बहुत तलाश करने के बाद आप जन्नतुल-बक़ी में मिले। मैंने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! मुझे लगा शायद आप किसी दूसरी बीवी के पास तशरीफ़ ले गए होंगे।

इस पर आप ﷺ ने फ़रमाया: बेशक अल्लाह तआला शाबान की पंद्रहवीं रात आसमान-ए-दुनिया पर ख़ास तवज्जो फ़रमाता है और बनी क़लब की बकरियों के बालों की संख्या से भी ज़्यादा गुनाहगारों को माफ़ कर देता है। (मिश्कात शरीफ़)

यह हदीस इस रात की मग़फिरत की विशालता को सबसे साफ तरीके से बयान करती है। बनू कल्ब के इलाके में बहुत बड़ी तादाद में बकरियाँ पाली जाती थीं – इसका मतलब है कि मग़फिरत की तादाद बेहद ज़्यादा है।

हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:

إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى لَيَطَّلِعُ فِي لَيْلَةِ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، فَيَغْفِرُ لِجَمِيعِ خَلْقِهِ، إِلَّا لِمُشْرِكٍ أَوْ مُشَاحِنٍ.

हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया:

निस्संदेह अल्लाह तआला शाबान की पंद्रहवीं रात अपनी विशेष रहमत के साथ तवज्जो फ़रमाता है और मुशरिक (अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराने वाले) और दिल में दुश्मनी व बैर रखने वाले व्यक्ति के अलावा पूरी मख़लूक़ को माफ़ कर देता है।(मिश्कात शरीफ़)

यह हदीस बताती है कि इस रात की रहमत बहुत व्यापक है, लेकिन शिर्क और आपसी दुश्मनी जैसे बड़े गुनाहों से बचना ज़रूरी है।

हज़रत अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है:

إِذَا كَانَتْ لَيْلَةُ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، فَقُومُوا لَيْلَهَا، وَصُومُوا نَهَارَهَا، فَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى يَنْزِلُ فِيهَا لِغُرُوبِ الشَّمْسِ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا، فَيَقُولُ: أَلَا مِنْ مُسْتَغْفِرٍ فَأَغْفِرَ لَهُ؟ أَلَا مِنْ مُسْتَرْزِقٍ فَأَرْزُقَهُ؟ أَلَا مِنْ مُبْتَلًى فَأُعَافِيَهُ؟ أَلَا كَذَا؟ أَلَا كَذَا؟ حَتَّى يَطْلُعَ الْفَجْرُ.

यह हदीस भी हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-पाक ﷺ ने फ़रमाया:

जब शाबान की पंद्रहवीं रात आए, तो उस रात इबादत करो और उसके दिन रोज़ा रखो। क्योंकि इस रात की खास बात यह है कि सूरज डूबते ही अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर ख़ास तवज्जो फ़रमाता है और शाम से सुबह तक यह एलान किया जाता है: क्या कोई है जो मग़फ़िरत (माफ़ी) माँगे, ताकि मैं उसे माफ़ कर दूँ? क्या कोई है जो रोज़ी माँगे, ताकि मैं उसे रोज़ी दूँ? क्या कोई बीमार है जो सेहत माँगे, ताकि मैं उसे सेहत दूँ?
क्या कोई है… क्या कोई है…?” फज्र तक इसी तरह पुकार लगाई जाती रहती है। (इब्न माजा, भाग)

यह हदीस शब-ए-बारात की सबसे बड़ी ख़ासियत बयान करती है – अल्लाह खुद अपनी रहमत का ऐलान करता है।

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ تَعَالَى عَنْهَا قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: أَتَدْرِينَ مَا هَذِهِ اللَّيْلَةُ؟ قُلْتُ: اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ. قَالَ: فَإِنَّهَا لَيْلَةُ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، فِيهَا يُكْتَبُ كُلُّ مَوْلُودٍ مِنْ بَنِي آدَمَ فِي هَذِهِ السَّنَةِ، وَفِيهَا يُكْتَبُ كُلُّ هَالِكٍ مِنْهُمْ، وَفِيهَا تُرْفَعُ أَعْمَالُهُمْ، وَفِيهَا تُقْسَمُ أَرْزَاقُهُمْ.

हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु तआला अन्हा फ़रमाती हैं कि एक दिन हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: क्या तुम जानती हो कि यह कौन-सी रात है?   

मैंने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! इस रात में क्या ख़ास बात है?

 आप ﷺ ने फ़रमाया:
इस रात में हर उस इंसान का नाम लिख दिया जाता है जो इस साल पैदा होने वाला है, और हर उस व्यक्ति का भी जो मरने वाला है। इसी रात लोगों की रोज़ी तय की जाती है और इसी रात उनके आमाल (कर्म) पेश किए जाते हैं। (ग़ुन्यतुत-तालिबीन)

शब--बरात की इबादतें और वज़ीफ़े

शब-ए-बरात की इबादतों और अच्छे कामों में यह शामिल है कि अल्लाह पाक की तस्बीह की जाए और वज़ीफ़े पढ़े जाएँ। जिन लोगों पर क़ज़ा नमाज़ें बाक़ी हों, उन्हें चाहिए कि पहले अपनी क़ज़ा नमाज़ें अदा करें, क्योंकि जब तक क़ज़ा नमाज़ें ज़िम्मे रहती हैं, नफ़्ल नमाज़ क़बूल नहीं होतीं। इस रात क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत भी करनी चाहिए।

इस रात खुद भी ज़्यादा से ज़्यादा नेक काम करें और अपने गाँव-मोहल्ले के बड़े, बच्चे, बूढ़े और जवान सभी को समझाएँ कि वे तस्बीह और तहलील में रात बिताएँ। ख़ास तौर पर अपने घरवालों, बीवी-बच्चों और परिवार के लोगों को इस रात इबादत के ज़रिए जागकर गुज़ारने की ताकीद करें।

इस रात फ़ातिहा और ईसाल-ए-सवाब करें और अपने गुनाहों से सच्चे दिल से तौबा करके, शर्मिंदगी और पछतावे के साथ अल्लाह की बारगाह में रो-रोकर अपने लिए और सबके लिए माफ़ी की दुआ करें। अगर किसी के हक़ (हक़ूक़-उल-इबाद) ज़िम्मे हों, तो जहाँ तक हो सके उन्हें अदा करने की कोशिश करें। अगर किसी का दिल दुखाया हो या किसी पर ज़ुल्म किया हो, तो उससे माफ़ी ज़रूर माँगें।

शब--बारात की रात और दिन के मुस्तहब अमाल

शब-ए-बारात रहमत, मग़फिरत और निजात की मुक़द्दस रात है, जिसमें बंदे को अल्लाह तआला की तरफ़ खास तौर पर रुजू करने का मौक़ा मिलता है। इस रात जागकर क़यामुल-लैल करना, नफ्ल और तहज्जुद की नमाज़ अदा करना बेहद अफ़ज़ल माना गया है। कुरआन मजीद की तिलावत—ख़ासकर सूरह यासीन, सूरह मुल्क, सूरह इख़्लास और सूरह फातिहा—के साथ दुरूद शरीफ़ की कसरत दिल को सुकून देती है। इस मुक़द्दस घड़ी में सच्चे दिल से तौबा-इस्तिग़फार करना, अपने गुनाहों पर नदामत ज़ाहिर करना और अल्लाह से मग़फिरत की दुआ करना इंसान की रूहानी ज़िंदगी को पाक कर देता है।

इस रात के साथ-साथ उसके अगले दिन के अमाल भी बड़ी अहमियत रखते हैं। हदीस की रौशनी में 15 शाबान का रोज़ा रखना फज़ीलत से खाली नहीं। इसके अलावा सदक़ा-खैरात करना—ग़रीबों को खाना, कपड़े या माल देना—अल्लाह की रज़ा का ज़रिया बनता है। क़ब्रिस्तान जाकर फातिहा पढ़ना, मरहूमीन के लिए दुआ करना और ईसाले-सवाब पहुँचाना आख़िरत की याद दिलाता है। सबसे अहम अमल हक़ूक़ुल इबाद की अदायगी है; 14 शाबान की शाम से पहले आपसी रंजिशें ख़त्म कर लेना, एक-दूसरे से माफ़ी मांगना और दिल साफ़ करना शब-ए-बारात की रूह को पूरा करता है।

भलाई और बरकतों वाली रात

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: يُنْزِلُ اللَّهُ تَعَالَى فِي أَرْبَعِ لَيَالٍ إِلَى أَذَانِ الْفَجْرِ بَرَكَاتٍ وَرَحْمَاتٍ لَا تُعَدُّ وَلَا تُحْصَى: لَيْلَةَ الْأَضْحَى، وَلَيْلَةَ الْفِطْرِ، وَلَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، وَلَيْلَةَ عَرَفَةَ.

हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फ़रमाती हैं कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया:

अल्लाह तआला चार रातों में फ़ज्र की अज़ान तक बहुत ज़्यादा बरकतें और रहमतें नाज़िल फ़रमाता है—
ईद-उल-अज़हा की रात, ईद-उल-फ़ित्र की रात, शाबान की पंद्रहवीं रात (शब-ए-बरात),और अरफ़ा की रात।(ग़ुन्यतुत-तालिबीन)

फ़रिश्तों की ईदें

जिस तरह ज़मीन पर मुसलमानों की दो ईदें होती हैं, उसी तरह आसमान में फ़रिश्तों की भी दो ईदें होती हैं। मुसलमानों की ईदें ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा के दिन होती हैं, जबकि फ़रिश्तों की ईदें शब-ए-बरात और शब-ए-क़द्र की रातों में होती हैं।

फ़रिश्तों की ईदें रात में इसलिए होती हैं क्योंकि वे सोते नहीं हैं, और मुसलमान चूँकि सोते हैं, इसलिए उनकी ईदें दिन में होती हैं। (ग़ुन्यतुत-तालिबीन, पृष्ठ 449)

रोज़ा रखना

नबी-ए-करीम ﷺ ने शाबान की पंद्रहवीं तारीख़ का रोज़ा रखने की ताकीद फ़रमाई है। इससे इस दिन के रोज़े की फ़ज़ीलत और अहमियत साफ़ तौर पर ज़ाहिर होती है। इस बारे में हदीस-ए-मुबारक नीचे देखिए।

 

عَنْ عِمْرَانَ بْنِ حُصَيْنٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ النَّبِيَّ ﷺ قَالَ لَهُ أَوْ لِغَيْرِهِ: أَصُمْتَ مِنْ سَرَرِ هَذَا الشَّهْرِ شَيْئًا؟ قَالَ: لَا .قَالَ: فَإِذَا أَفْطَرْتَ فَصُمْ يَوْمَيْنِ.

हज़रत इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने उनसे (या किसी और से) फ़रमाया: क्या तुमने शाबान के बीच का रोज़ा रखा है?

उन्होंने अर्ज़ किया: नहीं। तो आप ﷺ ने फ़रमाया: ईद के बाद रख लेना। (सहीह मुस्लिम)

शब--बरात और ग़रीबों की मदद

ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को सदक़ा और ख़ैरात देना हर महीने, हर दिन बल्कि हर पल सवाब (पुण्य) का काम है। लेकिन कुछ ख़ास मौकों पर उनकी मदद करना और भी ज़्यादा फ़ज़ीलत (महत्त्व) रखता है। हमारे यहाँ शब-ए-बरात को एक त्योहार की तरह मनाया जाता है। तरह-तरह के खाने बनाए जाते हैं, हलवा पकाया जाता है, घरों की सफ़ाई और रौशनी का इंतज़ाम किया जाता है।

ऐसे मौक़े पर हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने समाज के ग़रीब मुसलमानों की ज़रूरतों का भी ख़याल रखें। अपनी हैसियत के मुताबिक़ उनके लिए भी अच्छे खाने का इंतज़ाम करने की कोशिश करें। तोहफ़ों के रूप में उनकी आर्थिक मदद करें। समाज के कुछ ग़रीब लोगों को दावत देकर अपने घर बुलाएँ और उन्हें अच्छा खाना खिलाएँ। उनके बच्चों के लिए मिठाइयाँ, हलवा और खाने-पीने का दूसरा सामान ज़रूर भेजें।

अपनी कमाई का कुछ हिस्सा ग़रीब और बीमार लोगों के इलाज के लिए दें। अस्पताल जाकर ग़रीब मरीज़ों को फल वग़ैरह दें और उनका हाल-चाल पूछें। यक़ीनन इन कामों से हमें अल्लाह तआला बहुत ज़्यादा सवाब देगा और साथ ही एक अच्छा और मज़बूत समाज भी तैयार होगा।

शब--बरात, क़ब्रों की ज़ियारत और ईसाल--सवाब

हदीसों और बुज़ुर्गों (सलफ़) के कथनों से यह बात साबित होती है कि मुसलमानों की रूहें हर जुमे की रात और दिन अपने-अपने घरों में आती हैं। वे दरवाज़े के पास खड़ी होकर दर्द भरी आवाज़ में पुकारती हैं: “ऐ हमारे घर वालों! ऐ हमारे बच्चों! हम पर सदक़े के ज़रिए मेहरबानी करो, हमें याद करो, हमारी ग़रीबी और बेबसी पर रहम खाओ।”

हज़रत इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत में साफ़ तौर पर बताया गया है कि 15 शाबान की रात में भी रूहें अपने घरों में आती हैं और घर वालों को ईसाल-ए-सवाब करने के लिए पुकारती हैं।

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ تَعَالَى عَنْهُمَا: إِذَا كَانَ يَوْمُ عِيدٍ، أَوْ يَوْمُ جُمُعَةٍ، أَوْ عَاشُورَاءُ، أَوْ لَيْلَةُ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، تَأْتِي أَرْوَاحُ الْأَمْوَاتِ، وَيَقُومُونَ عَلَى أَبْوَابِ بُيُوتِهِمْ، فَيَقُولُونَ: هَلْ مِنْ أَحَدٍ يَذْكُرُنَا؟ هَلْ مِنْ أَحَدٍ يَذْكُرُ غُرْبَتَنَا؟)خِزَانَةُ الرِّوَايَاتِ(

ख़ज़ानतुर-रिवायात में हज़रत इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा) से रिवायत है कि जब ईद का दिन होता है, या जुमे का दिन, या आशूरा का दिन, या शब-ए-बरात की रात आती है, तो मरहूम लोगों की रूहें अपने-अपने घरों के दरवाज़ों पर खड़ी हो जाती हैं और कहती हैं: “क्या कोई है जो हमें याद करे? क्या कोई है जो हम पर रहम करे? क्या कोई है जो हमारी ग़रीबी और बेबसी को याद करे?”

इसलिए शब-ए-बरात के मौके पर अपने मरहूम (गुज़र चुके) लोगों के लिए ईसाल-ए-सवाब का ख़ास इंतज़ाम करना चाहिए। उनकी क़ब्रों की ज़ियारत के लिए जाना और फ़ातिहा पढ़ना भी चाहिए। इससे मरहूम लोग खुश होते हैं और उन्हें अपनापन व सुकून मिलता है।

क़ब्रों की ज़ियारत करना हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ की सुन्नत भी है। सरकार-ए-दो-आलम ﷺ ने ख़ुद क़ब्रों की ज़ियारत की है, इसका हुक्म भी दिया है और इसके फ़ायदे व बरकतें भी बयान फ़रमाई हैं।

हदीस शरीफ़ में आता है कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया है:

كُنْتُ نَهَيْتُكُمْ عَنْ زِيَارَةِ الْقُبُورِ، فَزُورُوهَا؛ فَإِنَّهَا تُزَهِّدُ فِي الدُّنْيَا، وَتُذَكِّرُ الْآخِرَةَ۔ )سُنَنُ ابْنِ مَاجَه(

मैंने तुम्हें क़ब्रों की ज़ियारत से मना किया था, अब क़ब्रों की ज़ियारत किया करो, क्योंकि यह दुनिया की मोहब्बत कम करती है और आख़िरत की याद दिलाती है।

शब-ए-बरात के ग़ैर-शरई (गलत) काम

शब-ए-बरात का मतलब है नजात (छुटकारे) की रात। इसलिए इस रात को गुनाहों से दूर रहकर ज़िक्र और तस्बीह में गुज़ारना चाहिए। लेकिन आजकल यह रिवाज बन गया है कि इस रात हमारे नौजवान आतिशबाज़ी करते हैं, फुलझड़ी और पटाखे छोड़ते हैं, बाइक स्टंट की प्रतियोगिताएँ करते हैं। हमारे समाज के कई युवा इस मुबारक रात की क़द्र नहीं करते, जबकि यही वह रात है जिसमें अल्लाह तआला ख़ास तौर पर दुआएँ क़बूल फ़रमाता है। इस रात को लोग सोने, खाने-पीने और गलत हरकतों में गुज़ार देते हैं।

ज़रा इस बात पर सोचिए कि शोर-शराबा और पटाखों की तेज़ आवाज़ से इस मुबारक रात में क़ुरआन की तिलावत करने वालों, अल्लाह का ज़िक्र करने वालों और नमाज़ पढ़ने वालों की इबादत में कितनी रुकावट पैदा होती है। खुद तो ज़िक्र और इबादत से दूर रहते ही हैं, साथ ही अल्लाह के उन बंदों को भी परेशान करते हैं जो इबादत में लगे होते हैं।

फिर हर साल होने वाले सैकड़ों हादसे एक अलग ही मुसीबत हैं। कितने घर जल जाते हैं, कितनी दुकानें आग में खाक हो जाती हैं, कितना माल का नुकसान होता है और कितने बच्चे व नौजवान जलकर अपनी जान गँवा देते हैं। यह सब माल की बर्बादी है, जबकि हमें अपने माल की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।

जो नौजवान गलत रास्ते पर चल रहे हैं, उन्हें चाहिए कि अल्लाह से डरें। शब-ए-बरात जैसी मुबारक रात में फ़िज़ूलख़र्ची और बेकार कामों के ज़रिए अपनी आख़िरत को बर्बाद न करें। अल्लाह तआला हमें सही रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

 

लेखक:

शबाब राही, ग्यारहवीं कक्षा, क़ुरतुबा इंस्टीट्यूटकिशनगंजबिहार 

एवं

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज

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