हमारा ईमान और सोशल मीडिया की ज़बान

प्रस्तावना (Introduction)

ईमान (Faith) एक बेहद नाज़ुक और अनमोल दौलत है। यह सिर्फ़ कुछ मान्यताओं (Beliefs) का नाम नहीं, बल्कि एक जीवित, संवेदनशील और लगातार देखभाल चाहने वाली आध्यात्मिक अवस्था (Spiritual State) है। क़ुरआन-ए-करीम और अहादीस-ए-नबवी ﷺ के अनुसार ईमान का मतलब है—दिल से सच्चा यक़ीन रखना, दिमाग़ से उसे स्वीकार करना, और ज़बान से उसका इज़हार (Confession) करना।

इस्लाम में दिल (Heart) और ज़बान (Tongue) को खास अहमियत दी गई है, क्योंकि ज़बान दिल की तर्जुमान (Spokesperson) होती है और दिल ईमान का केंद्र है। इसलिए बिना सोचे-समझे कहा गया एक वाक्य, मज़ाक में कही गई कोई बात, या लापरवाही से निकला हुआ शब्द भी ईमान को नुकसान पहुँचा सकता है। यही वजह है कि इस्लाम इंसान को बोलने में संयम (Self-control), समझदारी (Wisdom) और ज़िम्मेदारी (Responsibility) सिखाता है, ताकि ईमान सुरक्षित रहे और इंसान अपने शब्दों के अंजाम से महफूज़ रह सके।

सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की हदीस है:

عَنْ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمَا قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللّٰهِ ﷺ يَقُولُ: أَلَا وَإِنَّ فِي الْجَسَدِ مُضْغَةً، إِذَا صَلَحَتْ صَلَحَ الْجَسَدُ كُلُّهُ، وَإِذَا فَسَدَتْ فَسَدَ الْجَسَدُ كُلُّهُ، أَلَا وَهِيَ الْقَلْبُ.

हज़रत नुअमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ को यह फ़रमाते हुए सुना:

सावधान! शरीर में मांस का एक टुकड़ा है; जब वह ठीक होता है तो पूरा शरीर ठीक हो जाता है, और जब वह बिगड़ जाता है तो पूरा शरीर बिगड़ जाता है। सुन लो! वह टुकड़ा दिल (Heart) है। (सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम)

यह हदीस इस बात को स्पष्ट करती है कि ईमान (Faith), अख़लाक़ (Character) और अमल (Actions) की जड़ दिल (Qalb / Heart) है। दिल की सुधार (Reformation of Heart) के बिना ज़बान, कर्म और व्यवहार की सुधार संभव नहीं।
इसी प्रकार ज़बान की हिफ़ाज़त (Protection) भी अत्यंत आवश्यक है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا

ईमान वालो! अल्लाह से डरो (तक़वा अपनाओ) और सीधी, सच्ची और ठीक बात कहा करो। (सूरह अल-अह़ज़ाब (33), आयत: 70)

 

इस आयत में अल्लाह तआला ने तक़वा (God-consciousness) और ज़बान की सच्चाई (Truthful Speech) को ईमान की बुनियादी शर्त बताया है। यही आयत ज़बान की हिफ़ाज़त और सोशल मीडिया पर ज़िम्मेदार बोल की मज़बूत दलील है।

ईमान और ज़बान का संबंध बहुत गहरा है। नबी ﷺ फ़रमाते हैं:

عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللّٰهِ ﷺ: لَا يَسْتَقِيمُ إِيمَانُ عَبْدٍ حَتَّى يَسْتَقِيمَ قَلْبُهُ، وَلَا يَسْتَقِيمُ قَلْبُهُ حَتَّى تَسْتَقِيمَ لِسَانُهُ.

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

किसी बंदे का ईमान उस समय तक सीधा और पूर्ण नहीं हो सकताजब तक उसका दिल सीधा हो जाए,
और उसका दिल उस समय तक सीधा नहीं हो सकता जब तक उसकी ज़बान सीधी हो जाए। (मुस्नद अहमद)

यह हदीस स्पष्ट करती है कि: ईमान (Faith) दिल की सच्चाई से जुड़ा है, दिल की सच्चाई ज़बान की सच्चाई से और ज़बान की सुधार  इंसान के पूरे चरित्र की सुधार है, इसीलिए इस्लाम में ज़बान की हिफ़ाज़त को ईमान की बुनियाद कहा गया है।

दिल और ज़बान पर नियंत्रण ईमान की बुनियाद (Control over the heart and tongue – the foundation of faith)

इससे यह स्पष्ट हुआ कि दिल और ज़बान पर क़ाबू (Self-Control) रखना एक मोमिन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसलिए ज़बान से किसी के बारे में कुछ भी कहने से पहले हमें सौ बार सोचना चाहिए। जो बात कहने जा रहे हैं, उसकी तहक़ीक़ (Verification) करनी चाहिए, और यदि बोलने की वास्तविक आवश्यकता हो तभी बोलना चाहिए, अन्यथा हरगिज़ नहीं।

रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللّٰهِ ﷺ: مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيَقُلْ خَيْرًا أَوْ لِيَصْمُتْ.

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

जो व्यक्ति अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता है, उसे चाहिए कि भलाई की बात कहे,
या फिर चुप रहे (ख़ामोशी अपनाए) (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

यह हदीस इस्लाम का सुनहरा उसूल (Golden Principle) है: बोलना भी इबादत है और चुप रहना भी,
लेकिन शर्त यह है कि बोलना ख़ैर (Goodness) पर आधारित हो।

यही उसूल ज़बान की हिफ़ाज़त, सोशल मीडिया के इस्तेमाल, और ईमान की मजबूतीतीनों की बुनियाद है।

ज़बान से निकलने वाले हर अक्षर, हर शब्द और हर वाक्य के बारे में क़ुरआन ने अत्यंत कठोर और रूह कंपा देने वाले अंदाज़ में चेतावनी दी है।

सूरह तौबा में उन लोगों का उल्लेख है जो अल्लाह तआला, उसकी आयतों और उसके रसूल ﷺ के बारे में मज़ाक कर रहे थे। जब उनकी पकड़ हुई तो उन्होंने कहा: “हम तो यूँ ही हँसी-मज़ाक कर रहे थे।” लेकिन अल्लाह तआला ने इस बहाने को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट घोषणा कर दी:

قُلْ أَبِاللَّهِ وَآيَاتِهِ وَرَسُولِهِ كُنْتُمْ تَسْتَهْزِئُونَ  لَا تَعْتَذِرُوا قَدْ كَفَرْتُمْ بَعْدَ إِيمَانِكُمْ إِنْ نَعْفُ عَنْ طَائِفَةٍ مِنْكُمْ نُعَذِّبْ طَائِفَةً بِأَنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِمِينَ

( नबी !) उनसे कह दीजिए: क्या तुम अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल के साथ मज़ाक कर रहे थे?” “अब बहाने मत बनाओ, निश्चय ही तुम ईमान लाने के बाद कुफ़्र कर चुके हो। अगर हम तुममें से एक गिरोह को माफ़ भी कर दें, तो दूसरे गिरोह को अवश्य सज़ा देंगे, क्योंकि वे अपराधी थे। (सूरह अत-तौबा (9), आयत: 65–66)

यह आयत बहुत सख़्त चेतावनी (Severe Warning) है कि: अल्लाह, क़ुरआन की आयतें और रसूल ﷺ — इन में से किसी का भी मज़ाक (Mockery / Ridicule) करना ईमान के साथ संगत नहीं है, चाहे वह मज़ाक में ही क्यों न किया गया हो।

अल्लाह अल्लाह! ज़रा देखिए कि अनजाने में या मज़ाक में अल्लाह, उसके रसूल ﷺ, उसकी आयतों, इस्लामी प्रतीकों (Islamic Symbols), उलमा-ए-इस्लाम और बुज़ुर्गाने-दीन का मज़ाक उड़ाना एक मुसलमान को किस प्रकार कुफ़्र तक पहुँचा देता है और उसे ख़बर तक नहीं होती।

मज़ाक, सोशल मीडिया और ज़बान की घातक ग़लतियाँ (Jokes, social media, and fatal mistakes of the tongue)

अहादीस-ए-नबवी ﷺ इस क़ुरआनी सच्चाई को और अधिक स्पष्ट करती हैं। नबी ﷺ ने फ़रमाया:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللّٰهِ ﷺ: إِنَّ الْعَبْدَ لَيَتَكَلَّمُ بِالْكَلِمَةِ مِنْ سَخَطِ اللّٰهِ، لَا يُلْقِي لَهَا بَالًا، يَهْوِي بِهَا فِي جَهَنَّمَ بَعْدَ مَا بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ.

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

बंदा कभी अल्लाह की नाराज़गी वाली एक ऐसी बात कह देता है, जिसकी वह कोई परवाह नहीं करता, और उसी एक शब्द की वजह से वह जहन्नम में पूरब और पश्चिम की दूरी जितना नीचे जा गिरता है। (सहीह मुस्लिम)

यह हदीस बहुत स्पष्ट करती है कि: गुनाह की गंभीरता बोलने वाले की नीयत से नहीं, बल्कि बोले गए कथन (Statement) की हक़ीक़त और असर से तय होती है। बिना सोचे बोला गया एक शब्द इंसान की आख़िरत (Hereafter) को तबाह कर सकता है। यही कारण है कि इस्लाम में ज़बान की हिफ़ाज़त (Control of Tongue) को निजात (Salvation) की कुंजी कहा गया है।

आज के दौर (Modern Era) में इस चेतावनी की अहमियत कई गुना बढ़ गई है। इंटरनेट, सोशल मीडिया (Social Media), डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स और ऑनलाइन चैटिंग व पोस्टिंग ने ज़बान के प्रभाव को कुछ ही पलों में हज़ारों और लाखों लोगों तक पहुँचा दिया है। आज का युवा कई बार ग्रुप चैट्स (Group Chats), मीम्स (Memes), रील्स (Reels) या वायरल क्लिप्स (Viral Clips) के नाम पर ऐसी बातें लिख या साझा कर देता है जिनमें दीन, दीन के प्रतीक, उलमा, सूफ़िया या सादात का मज़ाक, व्यंग्य (Sarcasm) या लापरवाह टिप्पणी होती है।

अक्सर यह समझा जाता है कि चूँकि उद्देश्य हँसाना है, इसलिए बात हानिरहित है, जबकि यही वह ग़लतफ़हमी है जिसे क़ुरआन ने तुम ईमान लाने के बाद काफ़िर हो चुके कहकर खारिज कर दिया।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّنْ قَوْمٍ عَسَىٰ أَن يَكُونُوا خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِّن نِّسَاءٍ عَسَىٰ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ وَلَا تَلْمِزُوا أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُولَـٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ

ईमान वालो! कोई क़ौम दूसरी क़ौम का मज़ाक उड़ाए, संभव है कि वे उनसे बेहतर हों। और ही स्त्रियाँ दूसरी स्त्रियों का मज़ाक उड़ाएँ, संभव है कि वे उनसे बेहतर हों। और आपस में एक-दूसरे पर ताने कसो
और एक-दूसरे को बुरे उपनामों से पुकारो। ईमान लाने के बाद फ़िस्क़ (अवज्ञा) का नाम क्या ही बुरा है!
और जो तौबा करें, वही ज़ालिम हैं। (सूरह अल-हुजुरात (49), आयत: 11)

यह आयत इस्लामी सामाजिक आचार (Islamic Social Ethics) की बुनियाद है: मज़ाक (Mockery), ताना (Taunting), बुरे नाम (Name-calling) ये सब ईमान के विरुद्ध हैं। ख़ास तौर पर सोशल मीडिया के दौर में यह आयत हमें इज़्ज़त, संयम और ज़िम्मेदार भाषा अपनाने की सख़्त हिदायत देती है।

उलमा, बुज़ुर्गों का अदब और ईमान की हिफ़ाज़त (Respect for scholars and elders, and protection of faith)

यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज कुछ युवाओं में उलमा-ए-इस्लाम, मशाइख़-ए-तरीक़त और सादात-ए-किराम के बारे में ज़बान की बेबाकी बढ़ती जा रही है। मतभेद (Difference of Opinion) को मतभेद-ए-अदब (Respectful Disagreement) में बदलने के बजाय सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक (sarcastic) वाक्य, अपमानजनक उपनाम और तिरस्कारपूर्ण टिप्पणियाँ (Disrespectful remarks) आम होती जा रही हैं।

जबकि इस्लामी तहज़ीब में मतभेद हमेशा अदब के साथ रहा है। बुज़ुर्गों ने स्पष्ट किया कि आलिम या बुज़ुर्ग मासूम (Infallible) नहीं होता, लेकिन उसकी ग़लती पर चर्चा भी इल्म, ईमानदारी और शिष्टाचार के दायरे में होनी चाहिए, न कि मज़ाक और अपमान के अंदाज़ में।

इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इह्या-उलूमुद्दीन के अध्याय आफ़ात-उल-लिसान में ज़बान की बीमारियों को रूहानी ज़हर बताया है—जैसे फ़िज़ूल गोई, झूठ, ग़ीबत, तोहमत, तंज़, आत्म-प्रशंसा और दीन के मामलों में लापरवाही।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

مَا يَلْفِظُ مِنْ قَوْلٍ إِلَّا لَدَيْهِ رَقِيبٌ عَتِيدٌ

इंसान अपनी ज़बान से कोई भी शब्द नहीं निकालता, मगर उसके पास एक निगरानी करने वाला फ़रिश्ता मौजूद होता है, जो उसे (तुरंत) लिख लेता है। (सूरह क़ाफ़ (50), आयत: 18)

यह आयत साफ़ बताती है कि: हर बोला हुआ शब्द रिकॉर्ड (Recorded) होता है कोई बात बिना हिसाब (Accountability) के नहीं जाती, इसलिए ज़बान की हिफ़ाज़त केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं,
बल्कि आख़िरत की जवाबदेही (Hereafter Accountability) का सीधा सवाल है।

निष्कर्ष (Conclusion)

अंत में यही कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के इस युग में, जहाँ शब्द एक क्लिक में फैल जाते हैं, अत्यंत आवश्यक है कि हम अल्लाह, उसके रसूल ﷺ और अपने सम्मानित उलमा, हाफ़िज़-ए-क़ुरआन, सादात-ए-किराम और सूफ़िया-ए-इज़ाम के बारे में बोलने से पहले पूरी सावधानी बरतें।

मज़ाक या मनोरंजन के नाम पर किसी दीनदार व्यक्ति या धार्मिक विचारधारा का उपहास (Mockery) न केवल उनके सम्मान के ख़िलाफ़ है, बल्कि दीन की शिष्टता (Religious Etiquette) और आख़िरत की तैयारी के भी विरुद्ध है।

इसलिए बोलने से पहले जाँच करो (Verify), समझो (Understand) और फिर बोलो; और यदि ज्ञान न हो तो ख़ामोशी (Silence) ही बेहतर है। यही तक़वा है, यही हिकमत है और यही ईमान की हिफ़ाज़त का रास्ता है।

ईमान स्थिर वस्तु नहीं है; यह बढ़ता और घटता रहता है। ज़बान इसमें केंद्रीय भूमिका निभाती है। यदि ज़बान ज़िक्र, भलाई और अदब की आदी हो तो ईमान मज़बूत होता है, और यदि ज़बान तंज़, मज़ाक और बेपरवाही की आदी हो जाए तो ईमान ख़तरे में पड़ जाता है। ईमान की रक्षा ही वास्तव में हमारे भविष्य और आख़िरत की तैयारी है। अल्लाह तआला हमारे ईमान की हिफाजत फरमाए। आमीन!

संदर्भ (References)

  • सूरह अल-अह़ज़ाब (33)
  • सूरह अत-तौबा (9)
  • सूरह अल-हुजुरात (49)
  • सूरह क़ाफ़ (50)
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • मुस्नद अहमद
  • इह्या उलूमुद्दीन

 

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज

NB: यह लेख इस्लामऑनवेब उर्दू में पब्लिश हुआ था, जिसे उबैद हुदवी ने उर्दू में लिखा था और एहतेशाम हुदावी ने इसका हिंदी में अनुवाद और संपादन किया है।

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