शरिया के स्रोत: कुरआन, सुन्नत, इज्मा और कियास

परिचय

शरिया इस्लाम का वह कानून है जो मुसलमानों की जिंदगी को अल्लाह की मरजी के मुताबिक चलाने का रास्ता दिखाता है। यह न केवल इबादत, बल्कि रोजमर्रा के कामों, जैसे परिवार, व्यापार और समाज के नियमों को भी तय करता है। शरिया के चार मुख्य स्रोत हैं: कुरआन, सुन्नत, इज्मा (सहमति), और कियास (अनुमान)। ये स्रोत इस्लाम की शिक्षाओं को समझने और लागू करने में मदद करते हैं। कुरआन अल्लाह का कलाम है, जो शरिया की बुनियाद है। सुन्नत पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाएं हैं, जो कुरआन की व्याख्या करती हैं। इज्मा विद्वानों की सहमति है, और कियास नए मसलों का हल निकालता है। इन स्रोतों से मुसलमानों को हर मसले का जवाब मिलता है, चाहे वह पुराना हो या नया। आज के दौर में, जब दुनिया तेजी से बदल रही है, ये स्रोत हमें इंसाफ, शांति और नेकी की राह दिखाते हैं।

1) कुरआन: शरिया का पहला स्रोत

कुरआन अल्लाह का कलाम है, जो पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर वही के जरिए नाजिल हुआ। यह शरिया का सबसे अहम और बुनियादी स्रोत है। कुरआन में इबादत, अखलाक (नैतिकता), और सामाजिक नियमों के बारे में साफ हिदायतें हैं। कुरआन में कुल 6236 आयतें हैं, जिनमें से लगभग 500 आयतें शरिया के नियमों से जुड़ी हैं। यह किताब न केवल नियम बताती है, बल्कि उनकी वजह भी समझाती है, ताकि मुसलमानों को अल्लाह की मरजी पता चले। कुरआन को शरिया का प्राइमरी स्रोत माना जाता है, क्योंकि यह अल्लाह का सीधा हुक्म है।

अल्लाह तआला कुरान में इरशाद फरमाता है: الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا "आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन (धर्म) पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी, और मैंने तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन के तौर पर पसंद किया।" [1]

यह आयत बताती है कि कुरआन से इस्लाम पूरा हुआ। मुहम्मद हाशिम कमाली अपनी किताब "Principles of Islamic Jurisprudence" में लिखते हैं। "The Quran is the first and most authentic source of Shariah, containing divine revelations that form the basis of all Islamic laws." "कुरआन शरिया का पहला और सबसे प्रामाणिक स्रोत है, जिसमें दैवीय प्रकाशनाएं हैं जो सभी इस्लामी कानूनों की बुनियाद बनाती हैं।" [2]

कुरआन और जकात का नियम: कुरआन में जकात को अनिवार्य किया गया है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है: وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ "नमाज कायम करो और जकात दो।" [3]

 

पैगंबर की वफात के बाद कुछ कबीले जकात देने से इंकार करने लगे। हजरत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपनी खिलाफत में रिद्दा युद्ध छेड़ा, क्योंकि यह कुरआन के हुक्म के खिलाफ था। यह दिखाता है कि कुरआन का हुक्म शरिया का आधार है। इमाम तबरि अपनी किताब "तारीख अल-उमम वल-मुलूक" में लिखते हैं। "كان أبو بكر يدافع عن الزكاة بناءً على القرآن، فشن الحروب ضد المرتدين." "हजरत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुरआन के आधार पर जकात की हिफाजत की, और मुर्तदों के खिलाफ युद्ध छेड़ा।" [4]

हदीस में फरमाया गया:

عَنْ ابْنِ عُمَرَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "بُنِيَ الْإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ الْبَيْتِ، وَصَوْمِ रَمَضَانَ"

"इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है के रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: इस्लाम की बुनियाद पांच चीजों पर है: गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज कायम करना, जकात देना, हज करना, और रमजान के रोजे रखना।" [5]

यह हदीस कुरआन के नियमों को मजबूत करती है। कुरआन में परिवार के नियम, जैसे निकाह और तलाक, भी बताए गए हैं, जैसे सूरह अन-निसा में। इब्ने हिशाम अपनी "सीरत रसूलल्लाह" में लिखते हैं कि कुरआन पैगंबर की जिंदगी में नियम बनाता था। मूल अरबी में: "القرآن أساس الشريعة ودليل الحياة." "कुरआन शरिया की बुनियाद और जिंदगी का मार्गदर्शक है।" [6] कुरआन शरिया का प्राइमरी स्रोत है, जो बाकी स्रोतों की बुनियाद है।

2) सुन्नत: पैगंबर की शिक्षाएं

सुन्नत पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातों, कामों और उनकी सहमति (तकरीर) का नाम है। यह शरिया का दूसरा सबसे अहम स्रोत है। जब कुरआन में कोई मसला साफ नहीं होता, तो सुन्नत उसकी व्याख्या करती है। सुन्नत कुरआन को व्यावहारिक रूप देती है और मुसलमानों को पैगंबर की जिंदगी से सीखने का मौका देती है।

अल्लाह तआला कुरान में इरशाद फरमाता है:

وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا "जो कुछ रसूल तुम्हें दे, उसे ले लो, और जिससे वह तुम्हें मना करे, उससे रुक जाओ।" [7]

 

यह आयत सुन्नत की इताअत का हुक्म देती है। मुहम्मद हाशिम कमाली "Principles of Islamic Jurisprudence" में लिखते हैं। मूल अंग्रेजी में: "Sunnah is the second source of Shariah, explaining and supplementing the Quran in practical terms." "सुन्नत शरिया का दूसरा स्रोत है, जो कुरआन की व्याख्या करती है और व्यावहारिक रूप से उसे पूरा करती है।" [8]

नमाज की प्रथा:

 कुरआन में नमाज का जिक्र कई बार आता है, लेकिन नमाज का तरीका सुन्नत से मिलता है। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, "मेरे जैसे नमाज पढ़ो।" हजरत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु ने बताया कि पैगंबर ने नमाज का तरीका सिखाया, जिसमें रुकू, सजदा और दुआएं शामिल थीं। यह सुन्नत की अहमियत को दिखाता है। अल-वाकिदी अपनी "किताब अल-मगाजी" में लिखते हैं।: "كان النبي يعلم الصحابة الصلاة عملياً، فأصبحت السنة دليلاً للعبادة." "पैगंबर सहाबा को नमाज व्यावहारिक रूप से सिखाते थे, तो सुन्नत इबादत का मार्गदर्शक बनी।" [9]

हदीस में फरमाया गया:

عَنْ مَالِكِ بْنِ الْحُوَيْرِثِ، قَالَ: قَالَ رسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ َعليه و سلم: صَلُّوا كما رأيتموني أُصَلِّي"

"मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: मेरे जैसे नमाज पढ़ो, जैसा तुमने मुझे नमाज पढ़ते देखा।" [10]

यह हदीस सुन्नत की पाबंदी सिखाती है। सुन्नत में व्यापार के नियम, जैसे ब्याज की मनाही, भी बताए गए हैं, जो कुरआन को पूरा करते हैं। इब्ने साद अपनी "तबकात अल-कुब्रा" में लिखते हैं कि पैगंबर की सुन्नत शरिया को व्यावहारिक बनाती है। "السنة تفسر القرآن وتطبقه في الحياة." "सुन्न कुरआन की व्याख्या करती है और जिंदगी में लागू करती है।" [11]

सुन्नत शरिया का दूसरा पिलर है, जो कुरआन को समझाने मद करती है।

3) इज्मा: विद्वानों की सहमति

इज्मा का मतलब है मुस्लिम विद्वानों की एक राय। जब कुरआन और सुन्नत में कोई मसला साफ नहीं होता, तो विद्वान मिलकर उस पर सहमति बनाते हैं। यह शरिया का तीसरा स्रोत है और इस्लाम की एकता को बनाए रखता है। इज्मा सहाबा के समय से चला आ रहा है, और यह उम्मत की सहमति पर आधारित है।

अल्लाह तआला कुरान में इरशाद फरमाता है: يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह की इताअत करो, रसूल की इताअत करो, और तुम में से जो जिम्मेदार लोग हैं, उनकी इताअत करो।" [12]

यह आयत उलेमा की इताअत सिखाती है। कमालुद्दीन इमाम अपनी "उसूल अल-फिक्ह" में लिखते हैं।: "الإجماع مصدر ثالث للشريعة، يجمع آراء العلماء على حكم شرعي." "इज्मा शरिया का तीसरा स्रोत है, जो उलेमा की राय को शरई हुक्म पर जमा करता है।" [13]

हजरत उमर और शराब की सजा:

कुरआन में शराब निषिद्ध है, लेकिन सजा का जिक्र नहीं है। हजरत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने सहाबा से मशवरा किया और इज्मा हुआ कि शराब पीने की सजा 80 कोड़े होंगे, क्योंकि यह गलत बयानी (कजफ) के गुनाह के करीब है। यह इज्मा की मिसाल है। अल-वाकिदी "किताब अल-मगाजी" में लिखते हैं।"عمر رضي الله عنه استشار الصحابة في حد الخمر، فأجمعوا على ثمانين جلدة." "हजरत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने शराब की सजा में सहाबा से मशवरा किया, तो उन्होंने 80 कोड़ों पर इज्मा किया।" [14]

हदीस में फरमाया गया:

عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ، قَالَ: "إِنَّ اللَّهَ جَعَلَ الْحَقَّ عَلَى أَلْسِنَةِ الْعُلَمَاءِ وَقُلُوبِهِمْ"

उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: अल्लाह ने हक को उलेमा की जबानों और दिलों पर रखा है।" [15]

यह हदीस इज्मा की अहमियत बताती है। इज्मा ने इस्लाम को एकजुट रखा है, जैसे कुरआन के संकलन में।

  1. कियास: अनुमान और तर्क

कियास का मतलब है कुरआन और सुन्नत के आधार पर किसी नए मसले का हल निकालना। यह शरिया का चौथा स्रोत है और तब इस्तेमाल होता है जब कुरआन, सुन्नत या इज्मा में साफ जवाब न मिले। कियास में तर्क और अनुमान का सहारा लिया जाता है। यह स्रोत नए मसलों, जैसे टेक्नोलॉजी या मेडिकल मुद्दों, का हल देता है।

अल्लाह तआला कुरान में इरशाद फरमाता है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْأَنْصَابُ وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُ

"ऐ ईमान वालो! शराब, जुआ, मूर्तियां और तीरों से भाग्य आजमाना शैतान का काम है, इससे बचो।" [16]

 

यह आयत शराब की मनाही है, और कियास से नशे की चीजों पर लागू होती है। मुहम्मद हाशिम कमाली "Principles of Islamic Jurisprudence" में लिखते हैं। मूल अंग्रेजी में: "Qiyas is the extension of a Shariah ruling from an original case to a new matter that has the same illah (effective cause)."

"कियास शरिया के एक हुक्म को मूल मामले से नए मामले पर फैलाना है जो उसी इल्लत (प्रभावी कारण) पर आधारित हो।" [17]

हजरत उमर और शराब की सजा:

 कुरआन में शराब पीने की मनाही है, लेकिन सजा का जिक्र नहीं है। हजरत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने सहाबा से मशवरा किया और कियास के जरिए फैसला किया कि शराब पीने की सजा 80 कोड़े होंगे, क्योंकि यह गलत बयानी (कजफ) के गुनाह के करीब है। यह कियास की मिसाल है। अल-वाकिदी "किताब अल-मगाजी" में लिखते हैं।: "عمر استخدم القياس في حد الخمر، مقارنة بالقذف." "हजरत उमर ने शराब की सजा में कियास इस्तेमाल किया, कजफ से तुलना करके।" [18]

हदीस में आता है:

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ: سَمِعْتُ َرسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عليه و سلم يقول: "إِذَا اجْتَهَدَ الْحَاكِمُ َفأصابَ فَلَهُ أَجْرَانِ، وَإِذَا اجْتَهَدَ فَأَخْطَأَ فَلَهُ أَجْرٌ"

"अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: मैंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कहते सुना: जब कोई हाकिम (फैसला करने वाला) मेहनत से फैसला करता है और सही होता है, तो उसें दोहरा सवाब मिलता है। और अगर वह मेहनत करता है और गलती करता है, तो उसे एक सवाब मिलता है।" [19]

यह हदीस कियास (इज्तिहाद) के सवाब बताती है। कियास ने इस्लाम को नए समय के मुताबिक बनाया है, जैसे डिजिटल लेन-देन में ब्याज की मनाही। अब स्रोतों के आपसी रिश्ते पर।

शरिया स्रोतों का आपसी रिश्ता

कुरआन, सुन्नत, इज्मा और कियास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कुरआन सबसे ऊपर है, सुन्नत उसकी व्याख्या करती है, इज्मा विद्वानों की सहमति देता है, और कियास नए मसलों का हल निकालता है। ये चारों स्रोत मिलकर शरिया को पूरा करते हैं। अगर कुरआन में हुक्म हो, तो सुन्नत उसे समझाती है, और इज्मा व कियास उसे लागू करते हैं।

अल्लाह तआला कुरान में इरशाद फरमाता है:

إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا َ له حَافِظُونَ

"बेशक, हमने ही इस जिक्र (कुरान) को उतारा और हम ही इसकी हिफाजत करेंगे।" [20]

हजरत उस्मान और कुरआन का संकलन:

हजरत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुरआन को एक मानक रूप में संकलित किया। जब अलग-अलग इलाकों में कुरआन के उच्चारण में फर्क होने लगा, तो हजरत उस्मान ने इज्मा के जरिए फैसला किया और हजरत जायद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु को कुरआन की मानक प्रति तैयार करने की जिम्मेदारी दी। यह कुरआन और इज्मा की एकता की मिसाल है। इब्ने साद "तबकात अल-कुब्रा" में लिखते हैं। " جمع عثمان القرآن بالإجماع لحفظه من الاختلاف" "हजरत उस्मान ने इज्मा से कुरआन को जमा किया ताकि असहमति से हिफाजत हो।" [21]

पैगंबर की वफात के बाद हजरत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने रिद्दा युद्ध में कुरआन (जकात का हुक्म) और सुन्नत के आधार पर इज्मा किया। ये स्रोत मिलकर शरिया को मजबूत रखते हैं। कमालुद्दीन इमाम "उसूल अल-फिक्ह" में लिखते हैं। "المصادر الأربعة مترابطة، يبدأ بالقرآن ثم السنة ثم الإجماع والقياس." "चार स्रोत आपस में जुड़े हैं, कुरआन से शुरू होते हैं फिर सुन्नत, इज्मा और कियास।" [22]

शरिया स्रोतों का आज के समय में महत्व

आज के दौर में भी शरिया के ये चार स्रोत मुसलमानों की जिंदगी को राह दिखाते हैं। चाहे वह इबादत हो, परिवार के नियम हों, या सामाजिक मसले, ये स्रोत हर मसले का हल देते हैं। आधुनिक मुद्दों, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या क्लोनिंग, में कियास इस्तेमाल होता है।

अल्लाह तआला कुरान में इरशाद फरमाता है:

وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنْفِرُوا كَافَّةً ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِنْهُمْ طَائِفَةٌ لِيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ

"और मोमिनों को नहीं चाहिए कि सब के सब निकल पड़ें। तो क्यों न निकले हर गिरोह में से कुछ लोग ताकि दीन में समझ हासिल करें।" [23]

आधुनिक मसलों में कियास:

आधुनिक समय में, जैसे डिजिटल लेन-देन या मेडिकल तकनीक के मसले, कुरआन और सुन्नत में साफ जवाब नहीं मिलते। विद्वान कियास का इस्तेमाल करके इनका हल निकालते हैं। मिसाल के तौर पर, इस्लाम में ब्याज हराम है, और इस आधार पर विद्वान डिजिटल ब्याज को भी हराम मानते हैं। अल-वाकिदी "किताब अल-मगाजी" में पुराने उदाहरण देते हैं, लेकिन आधुनिक में मुहम्मद हाशिम कमाली लिखते हैं। "Qiyas applies to modern issues like online transactions by analogizing to traditional usury prohibitions." "कियास आधुनिक मुद्दों जैसे ऑनलाइन लेन-देन पर लागू होता है, पारंपरिक ब्याज की मनाही से तुलना करके।" [24] यह उद्धरण आज के महत्व बताता है।

हदीस में फरमाया गया:

 

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وسلم: "إِنَّ الْحَلَالَ بَيِّنٌ وَإِنَّ الْحَرَامَ بَيِّنٌ، وَبَيْنَهُمَا أُمُورٌ مشتبهات "

"अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: हलाल साफ है और हराम साफ है, और इनके बीच कुछ शक वाली चीजें हैं।" [25]

यह हदीस नए मसलों में कियास की जरूरत बताती है। आज के समय में ये स्रोत मुसलमानों को चुनौतियों से निपटने में मदद करते हैं, जैसे पर्यावरण या टेक्नोलॉजी के मुद्दों में। इब्ने हिशाम "सीरत रसूलल्लाह" में लिखते हैं कि पैगंबर के समय से स्रोत जिंदगी को राह दिखाते हैं। "المصادر الشرعية دليل للأمة في كل عصر." "शरिया के स्रोत हर दौर में उम्मत के लिए मार्गदर्शक हैं।" [26] ये स्रोत आज भी प्रासंगिक हैं।

निष्कर्ष

शरिया के चार स्रोत—कुरआन, सुन्नत, इज्मा और कियास—मुसलमानों की जिंदगी को अल्लाह की मरजी के मुताबिक चलाने का रास्ता दिखाते हैं। कुरआन अल्लाह का कलाम है, जो शरिया की बुनियाद है। सुन्नत पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं के जरिए कुरआन की व्याख्या करती है। इज्मा विद्वानों की सहमति से एकता बनाए रखता है, और कियास नए मसलों का हल निकालता है। हजरत अबू बक्र, उमर, उस्मान और अन्य सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम की मिसालें दिखाती हैं कि कैसे इन स्रोतों ने इस्लाम को मजबूत किया। आज के दौर में भी ये स्रोत हमें इंसाफ, शांति और नेकी का रास्ता दिखाते हैं। हमें चाहिए कि हम इन स्रोतों को समझें और अपनी जिंदगी में लागू करें ताकि अल्लाह की रहमत हासिल हो। अल्लाह हमें शरिया पर अमल की तौफीक दे। (

फुटनोट्स और संदर्भ

  1. सूरह अल-माइदा: 3
  2. Principles of Islamic Jurisprudence, मुहम्मद हाशिम कमाली
  3. सूरह अल-बकरा: 43
  4. तारीख अल-उमम वल-मुलूक, तबरि
  5. सही बुखारी
  6. सीरत रसूलल्लाह, इब्ने हिशाम
  7. सूरह अल-हश्र: 7
  8. Principles of Islamic Jurisprudence, मुहम्मद हाशिम कमाली
  9. किताब अल-मगाजी, अल-वाकिदी
  10. सही बुखारी
  11. तबकात अल-कुब्रा, इब्ने साद
  12. सूरह अन-निसा: 59
  13. उसूल अल-फिक्ह, कमालुद्दीन इमाम
  14. किताब अल-मगाजी, अल-वाकिदी
  15. सुनन इब्ने माजा,
  16. सूरह अल-माइदा: 90
  17. Principles of Islamic Jurisprudence, मुहम्मद हाशिम कमाली
  18. किताब अल-मगाजी, अल-वाकिदी
  19. सही बुखारी
  20. सूरह अल-हिज्र: 9
  21. तबकात अल-कुब्रा, इब्ने साद
  22. उसूल अल-फिक्ह, कमालुद्दीन इमाम
  23. सूरह अत-तौबा: 122
  24. Principles of Islamic Jurisprudence, मुहम्मद हाशिम कमाली
  25. सही बुखारी
  26. सीरत रसूलल्लाह, इब्ने हिशाम

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