शब-ए-बारात: रहमत, तौबा और मगफिरत की मुकद्दस रात
प्रस्तावना: शब-ए-बारात का अर्थ और महत्व
शब-ए-बारात इस्लामी कैलेंडर के आठवें महीने 'शाबान-उल-मुअज्जम' की 15वीं रात को कहा जाता है। 'शब' फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'रात' और 'बारात' अरबी शब्द 'बरी' से बना है, जिसका अर्थ है 'नजात' (मुक्ति) या 'छुटकारा'। इस रात को 'लैलातुल मुबारका' (बरकत वाली रात), 'लैलातुल बराह' (बरी होने की रात) और 'लैलातुल रहमा' (अल्लाह की दया की रात) के नाम से भी जाना जाता है। इस रात की महानता इस बात में छिपी है कि अल्लाह तआला अपने बंदों के लिए रहमत के दरवाजे खोल देता है और अनगिनत गुनहगारों की माफी का फैसला फरमाता है। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, यह वह रात है जिसमें आने वाले साल के लिए तकदीर के फैसले लिखे जाते हैं। कुरान-ए-करीम की सूरह अद-दुखान की प्रारंभिक आयतों में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
حم وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُّبَارَكَةٍ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ (हा-मीम। गवाह है यह रोशन किताब (कुरान)। बेशक हमने इसे एक मुबारक रात में उतारा है। बेशक हम डराने वाले हैं। उसी रात में हर हिकमत वाले काम का फैसला किया जाता है। (सूरह अद-दुखान: 1-4)
महान मुफस्सिरीन (व्याख्याकारों) जैसे हजरत इकरिमा और अन्य का मानना है कि यहाँ 'मुबारक रात' से मुराद शाबान की 15वीं रात (शब-ए-बारात) है, जिसमें पूरे साल की मौत, पैदाइश और रिज़्क (आजीविका) के फैसले फरिश्तों के हवाले किए जाते हैं।
अल्लाह की आम पुकार और रहमत का नजूल
शब-ए-बारात की सबसे बड़ी फजीलत यह है कि इस रात सूर्यास्त (मगरिब) के बाद से ही अल्लाह तआला का विशेष नूर दुनिया के पहले आसमान पर आता है। यह अल्लाह की असीम दया है कि वह स्वयं अपने बंदों को पुकारता है।
हदीस-ए-मुबारका में आता है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फरमाया:
قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ:
إِذَا كَانَتْ لَيْلَةُ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، فَقُومُوا لَيْلَهَا، وَصُومُوا نَهَارَهَا، فَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى يَنْزِلُ فِيهَا لِغُرُوبِ الشَّمْسِ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا، فَيَقُولُ: أَلَا مِنْ مُسْتَغْفِرٍ فَأَغْفِرَ لَهُ؟ أَلَا مِنْ مُسْتَرْزِقٍ فَأَرْزُقَهُ؟ أَلَا مِنْ مُبْتَلًى فَأُعَافِيَهُ؟ أَلَا كَذَا؟ أَلَا كَذَا؟ حَتَّى يَطْلُعَ الْفَجْرُ
"जब शाबान की पंद्रहवीं रात आती है, तो अल्लाह तआला पहले आसमान पर नुजूल फरमाता है और ऐलान करता है: 'क्या कोई मुझसे माफी मांगने वाला है कि मैं उसे माफ कर दूँ? क्या कोई रिज़्क (रोजी) मांगने वाला है कि मैं उसे रिज़्क अता करूँ? क्या कोई मुसीबत का मारा है कि मैं उसे आफियत दूँ?' और यह पुकार सुबह (फज्र) तक जारी रहती है।" (सुनन इब्न माजह)
यह प हमें सिखाता है कि हम चाहे कितने भी गुनहगार क्यों न हों, अल्लाह की रहमत का दर हमेशा खुला है। अल्लाह की पुकार हमें यह एहसास दिलाती है कि वह अपने बंदों से कितनी मुहब्बत करता है। कुरान में इरशाद फरमाता है:
قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا (कह दो कि ऐ मेरे बंदो जिन्होंने अपनी जानों पर ज्यादती (गुनाह) की है, अल्लाह की रहमत से मायूस न हो। बेशक अल्लाह तमाम गुनाहों को माफ करने वाला है। (सूरह अज-जुमर: 53)
शब-ए-बारात इसी आयत का एक जीता-जागता प्रमाण है, जहाँ निराशा को आशा में बदला जाता है।
तौबा की रूहानी हकीकत
तौबा का अर्थ है 'पलटना'—अपने रब की तरफ वापस आना। शब-ए-बारात की इबादत का मुख्य उद्देश्य तौबा ही है। इंसान दुनिया की रंगीनियों में खोकर अक्सर अपने असल मकसद को भूल जाता है। यह रात उसे याद दिलाती है कि उसका वजूद फानी (नश्वर) है और उसे एक दिन अपने मालिक के सामने पेश होना है।
हजरत मुआज बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: "अल्लाह तआला शाबान की पंद्रहवीं रात को अपनी तमाम मखलूक की तरफ खास तवज्जो फरमाता है और सबको माफ कर देता है, सिवाय 'मुशरिक' (साझीदार बनाने वाला) और 'मुशाहिन' (दिल में कीना और नफरत रखने वाला) के।" (सही इब्न हिब्बान)
यह हदीस बहुत गहरा संदेश देती है। जहाँ अल्लाह की रहमत इतनी आम है कि वह सबको माफ कर रहा है, वहीं दिल की गंदगी (नफरत और शिर्क) वह बाधा है जो इंसान को रहमत से दूर रखती है। अतः इस रात इबादत से पहले हमें अपने दिलों को दूसरों के प्रति नफरत, जलन और ईर्ष्या से पाक करना चाहिए। यदि हमने किसी का हक मारा है या किसी का दिल दुखाया है, तो उससे माफी मांगना तौबा का हिस्सा है।
मुकद्दस रात की इबादत और सुन्नत तरीका
शब-ए-बारात में कोई खास नमाज निर्धारित नहीं है जिसे अनिवार्य (फर्ज) कहा जाए, लेकिन नफिल इबादत की बहुत बड़ी फजीलत है। हजरत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फरमाया: "जब शाबान की पंद्रहवीं रात आए तो उस रात कयाम (इबादत) करो और उसके दिन में रोजा रखो।" (इब्न माजह)
इस रात की इबादत में निम्नलिखित आमाल शामिल किए जा सकते हैं:
- सलातुल तस्बीह: यह नमाज गुनाहों की माफी के लिए बहुत ताकतवर वसीला है।
- तिलावत-ए-कुरान: अल्लाह के कलाम को पढ़ना और उसे समझना रूह को रोशन करता है।
- जिक्र और अजकार: 'सुभानअल्लाह', 'अल्हम्दुलिल्लाह' और 'ला इलाहा इल्लल्लाह' की तस्बीह पढ़ना।
- दरूद शरीफ की कसरत: नबी ﷺ पर दरूद पढ़ना दुआओं की कबूलियत की कुंजी है।
कुरान में अल्लाह फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اذْكُرُوا اللَّهَ ذِكْرًا كَثِيراً (ऐ ईमान वालों! अल्लाह का जिक्र करो, बहुत ज्यादा जिक्र करना। - (सूरह अल-अहजाब: 41)
शब-ए-बारात की लंबी रातें जिक्र-ए-इलाही के लिए बेहतरीन अवसर प्रदान करती हैं।
शाबान के रोजे और नबी ﷺ की सुन्नत
शब-ए-बारात जिस महीने में आती है, वह शाबान का महीना है। खुद अल्लाह के रसूल ﷺ इस महीने में बहुत ज्यादा रोजे रखा करते थे। हजरत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं: "मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ को रमजान के अलावा किसी और महीने में इतने ज्यादा रोजे रखते नहीं देखा जितने आप शाबान में रखते थे।" (सहीह बुखारी)
जब आप ﷺ से इसका कारण पूछा गया, तो आपने फरमाया कि यह वह महीना है जिसमें लोगों के आमाल अल्लाह के सामने पेश किए जाते हैं और मैं चाहता हूँ कि जब मेरा अमल पेश हो तो मैं रोजे से रहूँ। शब-ए-बारात के अगले दिन (15 शाबान) का रोजा रखना इसी सुन्नत की कड़ी है। यह रोजा न केवल सवाब का कारण है, बल्कि यह रमजान के आने की तैयारी का एक जरिया भी है।
मगफिरत की अधिकता: बनी कलब की बकरियों का उदाहरण
इस रात मगफिरत (क्षमा) का दायरा कितना बड़ा है, इसे नबी ﷺ ने एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया है। हजरत आयशा ह रिवायत करती हैं कि एक रात मैंने नबी ﷺ को बिस्तर पर नहीं पाया, तो मैं आपकी तलाश में निकली और देखा कि आप जन्नत-उल-बकी (कब्रिस्तान) में सर झुकाए दुआ मांग रहे हैं। आपने फरमाया: "ऐ आयशा! क्या तुम्हें डर था कि अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारे साथ ज्यादती करेंगे? बेशक अल्लाह तआला शाबान की पंद्रहवीं रात को बनी कलब कबीले की बकरियों के बालों की तादाद से भी ज्यादा लोगों की मगफिरत फरमाता है।" (तिर्मिजी, इब्न माजह)
बनी कलब अरब का वह कबीला था जिसके पास सबसे ज्यादा बकरियां थीं। उनके बालों की गिनती करना नामुमकिन है। यह हदीस हमें यह उम्मीद दिलाती है कि हमारी खताएं चाहे पहाड़ जितनी ही क्यों न हों, अल्लाह की माफी का समंदर उससे कहीं ज्यादा गहरा है।
कब्रिस्तान की जियारत और मौत की याद
नबी ﷺ का इस रात कब्रिस्तान जाना हमें यह सबक देता है कि हम उन लोगों को न भूलें जो इस दुनिया से जा चुके हैं। शब-ए-बारात वह रात है जब हमें अपनी मौत को भी याद करना चाहिए। कब्रिस्तान जाने से दिल में नरमी पैदा होती है और दुनिया की हकीकत समझ आती है।
कुरान कहता है:
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ (हर जान को मौत का मजा चखना है। - सूरह आल-इमरान: 185)
जब हम अपने मरहूमों (पूर्वजों) के लिए दुआ-ए-मगफिरत करते हैं, तो फरिश्ते हमारे लिए भी रहमत की दुआ करते हैं। इस रात जियारत-ए-कब्र का मकसद दिखावा नहीं, बल्कि इबरत (सबक) और ईसाले-सवाब होना चाहिए।
तकदीर और फैसले की रात
शब-ए-बारात को 'बजट की रात' भी कहा जाता है। हजरत अता बिन यसार रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि जब शाबान की 15वीं रात आती है, तो मौत के फरिश्ते को एक फेहरिस्त दी जाती है और कहा जाता है कि जिन लोगों के नाम इसमें हैं, उनकी रूह को अगले साल कब्ज करना है। कभी इंसान जमीन पर दरख्त लगा रहा होता है, शादी कर रहा होता है या महल बना रहा होता है, जबकि उसका नाम मरने वालों की लिस्ट में शामिल हो चुका होता है। अल्लाह तआला का इरशाद है:
وَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ (हर उम्मत के लिए एक तय वक्त है, जब वह वक्त आ जाता है तो न एक घड़ी की देरी होती है और न जल्दी। - (सूरह अल-आराफ: 34) इसलिए, इस रात दुआ करनी चाहिए कि अल्लाह हमारे आने वाले साल को आफियत, बरकत और ईमान की सलामती वाला बनाए। हमारी दुआएं तकदीर के फैसलों को बदल तो नहीं सकतीं (अल्लाह के हुक्म के बिना), लेकिन अल्लाह चाहे तो दुआ की बरकत से बलाओं को टाल देता है।
वे बदनसीब जो रहमत से महरूम रहते हैं
जहाँ इस रात रहमतों की बारिश होती है, वहीं कुछ लोग अपनी बुरी आदतों के कारण इससे महरूम रह जाते हैं। हदीस के मुताबिक, निम्नलिखित लोग अल्लाह की माफी नहीं पा सकते जब तक कि वे सच्ची तौबा न करें:
- मुशरिक: अल्लाह की जात या सिफत में किसी को शरीक करने वाला।
- काते-रहम: रिश्तों को तोड़ने वाला।
- मुशाहिन: दिल में दूसरों के लिए नफरत और जलन रखने वाला।
- माता-पिता का नाफरमान: जो अपने मां-बाप को दुख पहुंचाता है।
- शराब का आदी: नशा करने वाला।
- तकब्बुर करने वाला: जो टखनों से नीचे कपड़ा लटकाता है (घमंड के तौर पर)।
यह हमारे लिए चेतावनी है। हमें इस रात से पहले अपने रिश्तों को सुधारना चाहिए। कुरान में आता है:
وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا (अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थामे रखो और आपस में मत फटो। - (सूरह आल-इमरान: 103)
बिदअतों से बचाव
आजकल शब-ए-बारात को इबादत के बजाय पटाखों, आतिशबाजी, दिखावे की रोशनी और हलवे-पराठे की रात बना दिया गया है। आतिशबाजी न केवल फिजूलखर्ची है, बल्कि यह दूसरों को तकलीफ देने का जरिया भी है। अल्लाह तआला का फरमान है:
إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ (बेशक फिजूलखर्च करने वाले शैतान के भाई हैं। - सूरह अल-इस्रा: 27)
शैतान का भाई बनकर हम अल्लाह की रहमत कैसे पा सकते हैं? पटाखों का शोर उस इबादत के सुकून को खत्म कर देता है जो इस रात का असल मकसद है। इस रात मस्जिदों में हुड़दंग मचाना या सड़कों पर बाइक रेसिंग करना दीन का हिस्सा नहीं है। इबादत तन्हाई में, रो-रोकर और आजिजी (विनम्रता) के साथ होनी चाहिए।
रमजान के लिए एक रूहानी ट्रेनिंग
शब-ए-बारात को रमजान का 'प्रवेश द्वार' माना जाता है। शाबान का आधा महीना बीत चुका होता है और यह रात हमें सचेत करती है कि पाक महीना (रमजान) आने वाला है। यदि हम शब-ए-बारात में तौबा करके अपने दिल को साफ कर लेते हैं, तो रमजान की इबादतों में हमारा दिल ज्यादा लगता है।
नबी-ए-करीम ﷺ दुआ फरमाया करते थे:
اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِي رَجَبٍ وَشَعْبَانَ وَبَلِّغْنَا رَمَضَانَ (ऐ अल्लाह! हमारे लिए रजब और शाबान में बरकत अता फरमा और हमें रमजान तक पहुंचा दे।) शब-ए-बारात इसी तैयारी का एक अहम पड़ाव है। यह रात हमें आलस छोड़कर इबादत की आदत डालने की प्रेरणा देती है।
दुआ की अहमियत और मसनून दुआएं
दुआ इबादत का मगज (सार) है। इस रात हमें अपने लिए, अपने परिवार के लिए, उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए और पूरी इंसानियत के लिए दुआ करनी चाहिए। हजरत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा ने जब नबी ﷺ से पूछा कि मैं इस रात क्या दुआ करूँ, तो आपने सिखाया:
اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي (ऐ अल्लाह! तू बहुत माफ करने वाला है, माफी को पसंद करता है, अतः मुझे माफ कर दे।) यह छोटी सी दुआ अपने अंदर पूरी दुनिया की कामयाबी समेटे हुए है। जब अल्लाह हमें माफ कर देता है, तो हमारी तमाम मुश्किलें आसान हो जाती हैं।
एक नई शुरुआत का संकल्प
शब-ए-बारात केवल एक रात की जागृति नहीं है, बल्कि यह एक चरित्र निर्माण (Character building) का अवसर है। इस रात की सहर (सुबह) जब हो, तो हमें एक बदला हुआ इंसान होना चाहिए। हमारे दिल नफरत से पाक, हमारी जुबान जिक्र से तर और हमारी आंखें अल्लाह के डर से नम होनी चाहिए। अल्लाह तआला ने कुरान में फरमाया:
أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ (क्या ईमान वालों के लिए वह वक्त नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह के जिक्र से पिघल जाएं? – (सूरह अल-हदीद: 16)
शब-ए-बारात हमें वही वक्त फराहम करती है। आइए हम संकल्प लें कि हम अपने गुनाहों को इसी रात छोड़ देंगे, अल्लाह की नाफरमानी से बचेंगे और मानवता की सेवा करेंगे। अल्लाह तआला हमें इस मुबारक रात की सही बरकतें समेटने की तौफीक अता फरमाए। (आमीन)
संदर्भ (References)
- सूरह अद-दुख़ान
- सूरह अज़-ज़ुमर
- सूरह अल-अहज़ाब
- सूरह आल-इमरान
- सूरह अल-आराफ़
- सूरह आल-इमरान
- सूरह अल-इस्रा
- सूरह अल-हदीद
- सुनन इब्न माजह
- सहीह इब्न हिब्बान
- जामे तिर्मिज़ी
- सहीह बुख़ारी
लेखक:
मुहम्मद सनाउल्लाह, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी,मलप्पुरम, केरल के डिग्री सेकंड ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं। उनका रुझान इतिहास के क्षेत्र में है।
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