वंदे मातरम् और इस्लाम: आस्था, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक विवेक पर एक समग्र विमर्श
प्रस्तावना
"वंदे मातरम्" भारत के राष्ट्रीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध उभरे उस भावनात्मक राष्ट्रवाद (emotional nationalism) का प्रतीक है जिसने करोड़ों लोगों को आज़ादी के संघर्ष (freedom struggle) से जोड़ा। इस गीत ने बलिदान, संघर्ष (struggle) और स्वतंत्रता की चाह (desire for freedom) को आवाज़ दी। लेकिन आज़ाद भारत में यही गीत एक जटिल विचारधारात्मक (ideological) और धार्मिक (religious) बहस का विषय बन गया है, ख़ासकर मुसलमानों के संदर्भ में।
अक्सर यह सवाल (question) उठता है कि कई मुसलमान “वंदे मातरम्” के पूरे पाठ (full text) का पाठन क्यों नहीं करते। कई बार इसे संकीर्ण राजनीति (narrow politics) की नज़र से देखा जाता है और देशभक्ति (patriotism) की कसौटी बना दिया जाता है। किंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहर इससे कहीं ज़्यादा गहरी और संवेदनशील (sensitive) है। यह सवाल असल में इस्लामी आस्था (Islamic faith), धार्मिक विवेक (religious conscience) और संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता (freedom of religion) से जुड़ा हुआ है।
इस्लाम की बुनियाद: तौहीद का सिद्धांत (Foundation of Islam: The Principle of Tawheed)
इस्लाम का सबसे केंद्रीय और अटल सिद्धांत तौहीद है—अर्थात अल्लाह की पूर्ण और अद्वितीय एकता (oneness of Allah)। तौहीद केवल एक धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दृष्टि है। इसका अर्थ यह है कि इबादत (worship), सज्दा (prostration), दुआ (prayer), भय (fear), आशा (hope) और अंतिम निष्ठा (ultimate loyalty) केवल अल्लाह के लिए होनी चाहिए। किसी भी हालत में किसी इंसान, वस्तु, ज़मीन या प्रतीक (symbol) को दैवी गुण (divine status) देना इस सिद्धांत के ख़िलाफ़ है।
क़ुरआन में अल्लाह स्पष्ट रूप से फ़रमाता है:
إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ
“निश्चय ही अल्लाह यह क्षमा नहीं करता कि उसके साथ किसी को साझी ठहराया जाए।” (Surely Allah does not forgive associating partners with Him) (अन-निसा 4:48)
इसी प्रकार सूरह अल-इख़लास में अल्लाह की एकता (oneness of Allah) को बहुत साफ़ और आसान शब्दों में बताया गया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ، اللَّهُ الصَّمَدُ، لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ، وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ
(सूरह अल-इख़लास, 112:1–4)
इसका सरल अर्थ यह है कि अल्लाह एक है, वह किसी का मोहताज नहीं (self-sufficient) है, न उसने किसी को जन्म दिया और न वह पैदा किया गया, और न कोई उसके बराबर (equal) है। इन आयतों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा (worship)—चाहे वह मूर्ति (idol) हो, प्रतीक (symbol) हो या कोई सांस्कृतिक देवता (cultural deity)—की कोई जगह नहीं है। इस्लाम इंसान को सीधे एक अल्लाह की इबादत (direct worship of Allah) करने की शिक्षा देता है, बिना किसी मध्यस्थ (intermediary) के।
शिर्क: सबसे बड़ा धार्मिक अपराध (Shirk: The Greatest Religious Sin in Islam)
इस्लाम में शिर्क—अर्थात अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराना—सबसे बड़ा गुनाह माना गया है। इसे क़ुरआन ने “अज़ीम ज़ुल्म” कहा है। इसका कारण यह है कि शिर्क सृष्टि के उद्देश्य को ही नष्ट कर देता है।
अल्लाह फ़रमाता है:
وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
“मैंने जिन्न और इंसान को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।” (अज़-ज़ारियात 51:56)
इसलिए इस्लाम में केवल मूर्ति-पूजा (idol worship) ही नहीं, बल्कि वह हर कथन और कर्म निषिद्ध (forbidden) है जो किसी मख़लूक़ को दैवी स्वरूप (divine status) प्रदान करे—चाहे वह कविता, गीत या राष्ट्रवादी प्रतीक (national symbol) के रूप में ही क्यों न हो।
वंदे मातरम् के देवी-पूजात्मक पद (Devotional / Goddess-Worship Elements in “Vande Mataram”)
"वंदे मातरम्" के प्रारंभिक दो पद भारत की प्राकृतिक सुंदरता, उर्वरता और समृद्धि का काव्यात्मक वर्णन करते हैं। इन्हीं पदों को 1937 में कांग्रेस ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया। किंतु इसके बाद के पदों में मातृभूमि को स्पष्ट रूप से देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
“वंदे मातरम्” के शुरुआती दो पद भारत की प्राकृतिक सुंदरता (natural beauty), उर्वरता (fertility) और समृद्धि (prosperity) का काव्यात्मक (poetic) वर्णन करते हैं। इन्हीं दो पदों को 1937 में कांग्रेस ने सर्वसम्मति (unanimously) से स्वीकार किया था।
लेकिन इसके बाद आने वाले पदों में मातृभूमि (motherland) को साफ़ तौर पर एक देवी (goddess) के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ पूजा (worship) और दैवी भाव (divine imagery) दिखाई देता है। यही हिस्सा धार्मिक (religious) दृष्टि से विवाद (controversy) का कारण बनता है।
उदाहरण के लिए:
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी
इन पंक्तियों में मातृभूमि को दुर्गा और लक्ष्मी जैसी देवियों के रूप में दिखाया गया है। यानी देश को देवी का रूप (goddess imagery) दिया गया है। इस्लामी दृष्टि (Islamic perspective) से यह सिर्फ़ एक साहित्यिक रूपक (literary metaphor) नहीं रह जाती, बल्कि इसमें दैवी गुण (divine attributes) किसी और के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
इसी वजह से किसी मुसलमान के लिए ऐसे शब्दों का उच्चारण करना शिर्क (associating partners with Allah) में शामिल होने जैसा माना जाता है, जो इस्लाम में साफ़ तौर पर हराम (forbidden) है।
‘वंदे’ शब्द और नमन की सीमा (The Word “Vande” and the Limits of Salutation)
‘वंदे’ शब्द का अर्थ होता है—नमन करना (salutation), झुकना (bowing) या वंदना करना (reverence)। धार्मिक परंपराओं (religious traditions) में यह शब्द आमतौर पर उपासना (worship) और भक्ति (devotion) से जुड़ा रहता है।
इस्लाम में नमन (salutation) और सज्दा (prostration) केवल अल्लाह (Allah) के लिए तय (reserved) है। किसी और के सामने इस तरह का झुकाव करना इस्लामी आस्था (Islamic faith) के अनुरूप नहीं माना जाता।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ، قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: لَوْ كُنْتُ آمِرًا أَحَدًا أَنْ يَسْجُدَ لِأَحَدٍ، لَأَمَرْتُ الْمَرْأَةَ أَنْ تَسْجُدَ لِزَوْجِهَا، لِعِظَمِ حَقِّهِ عَلَيْهَا (سُنَنُ ابْنِ مَاجَه)
“अगर मैं किसी को किसी के सामने सज्दा करने का आदेश देता, तो पत्नी को पति के सामने सज्दा करने का आदेश देता, क्योंकि पति का अधिकार उस पर बहुत बड़ा है” ।(सुनन इब्न माजा)
और इस हदीस का उद्देश्य सज्दे की अनुमति देना नहीं बल्कि यह स्पष्ट करना है कि सज्दा और दैवी नमन केवल अल्लाह के लिए है, क्योंकि नबी ﷺ ने वास्तव में किसी को भी किसी के सामने सज्दा करने का आदेश नहीं दिया। यह हदीस इस बात को स्पष्ट करती है कि किसी भी सूरत में अल्लाह के अलावा किसी के सामने सज्दा या दैवी नमन जायज़ नहीं है।
सम्मान और इबादत का अंतर (Difference Between Respect and Worship)
इस्लाम सम्मान (respect)और इबादत (worship) के बीच स्पष्ट अंतर करता है। माता-पिता, शिक्षक, नबी और देश—इन सभी का सम्मान किया जाता है, लेकिन उनकी पूजा नहीं होती। क़ुरआन में माता-पिता के साथ भलाई का आदेश है, पर उनकी इबादत की अनुमति नहीं दी गई। इसी प्रकार देश से प्रेम होना स्वाभाविक (natural)है, लेकिन उसे देवी बनाकर पूजना इस्लामी आस्था के विरुद्ध है।
भारत माता की अवधारणा और इस्लामी दृष्टिकोण (The Concept of “Bharat Mata” and the Islamic Perspective)
हिंदू सांस्कृतिक परंपरा (Hindu cultural tradition) में ‘भारत माता’ (Bharat Mata) की अवधारणा एक देवी (goddess) के रूप में विकसित हुई है। देश के अलग-अलग हिस्सों में भारत माता के मंदिर (temples) बनाए गए हैं, जहाँ उसकी पूजा (worship) की जाती है। यह परंपरा हिंदू आस्था (Hindu belief) के भीतर स्वाभाविक मानी जा सकती है, लेकिन इस्लाम (Islam) में किसी भी भूमि (land) या प्रतीक (symbol) को देवी का रूप देना स्वीकार्य (acceptable) नहीं है।
इस्लाम में भूमि पवित्र (sacred) हो सकती है—जैसे मक्का (Makkah) और मदीना (Madinah)—लेकिन वे भी पूज्य (worship-worthy) नहीं हैं। उनकी पवित्रता अल्लाह (Allah) के आदेश और नबियों (prophets) की उपस्थिति की वजह से है, न कि इसलिए कि वे स्वयं दैवी (divine) हैं। इसी कारण जब भारत माता को देवी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और वंदे मातरम् के ज़रिये उसकी वंदना (devotional salutation) की जाती है, तो यह इस्लामी आस्था (Islamic faith) से सीधा टकराव (direct conflict) पैदा करता है।
ऐतिहासिक मुस्लिम योगदान और देशभक्ति का प्रमाण
यह तथ्य ऐतिहासिक रूप से स्थापित है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम (freedom struggle) में मुसलमानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान, हसरत मोहानी, मौलवी बरकतुल्लाह और अनगिनत गुमनाम मुसलमान (unsung Muslims) ने इस देश की आज़ादी के लिए बलिदान (sacrifices) दिए।
इन सभी ने अपने देश से प्रेम किया, उसके लिए संघर्ष किया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी धार्मिक आस्था (religious faith) का सौदा नहीं किया। यह तथ्य अपने-आप में इस बात का प्रमाण (proof) है कि देशभक्ति (patriotism) किसी विशेष गीत या नारे (song or slogan) पर निर्भर नहीं करती।
सच्ची देशभक्ति कर्म, त्याग (sacrifice) और निष्ठा (commitment) से सिद्ध होती है—न कि किसी प्रतीकात्मक पाठ (symbolic recitation) से।
इस्लाम में देशप्रेम (Patriotism in Islam)
इस्लाम देशप्रेम से नहीं रोकता। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को मक्का से अत्यंत प्रेम था। उन्होंने कहा:
وَاللَّهِ إِنَّكِ لَأَخْيَرُ أَرْضِ اللَّهِ، وَأَحَبُّ أَرْضِ اللَّهِ إِلَى اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ، وَلَوْلَا أَنِّي أُخْرِجْتُ مِنْكِ مَا خَرَجْتُ
अल्लाह की क़सम! तू अल्लाह की धरती में सबसे उत्तम भूमि है और अल्लाह के पास सबसे अधिक प्रिय भूमि है। अगर मुझे तुझसे निकाला न गया होता, तो मैं कभी तुझे छोड़कर न जाता। (तिर्मिज़ी)
फिर भी उन्होंने मक्का की पूजा नहीं की। इससे स्पष्ट होता है कि प्रेम और इबादत दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।
ऐतिहासिक मुस्लिम योगदान और देशभक्ति का प्रमाण (Historical Muslim Contribution and Proof of Patriotism)
यह बात इतिहास (history) से साफ़ साबित है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम (freedom struggle) में मुसलमानों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान, हसरत मोहानी, मौलवी बरकतुल्लाह और ऐसे ही अनगिनत गुमनाम लोग (unsung heroes) ने देश की आज़ादी के लिए बड़े बलिदान (sacrifices) दिए।
इन सभी ने अपने देश से सच्चा प्रेम किया, उसके लिए संघर्ष (struggle) किया, लेकिन कभी भी अपनी धार्मिक आस्था (religious faith) से समझौता नहीं किया।
यह अपने-आप में इस बात का प्रमाण है कि देशभक्ति (patriotism) किसी एक गीत या नारे (slogan) पर निर्भर नहीं होती। सच्ची देशभक्ति कर्म (actions), त्याग (sacrifice) और निष्ठा (commitment) से साबित होती है—न कि किसी प्रतीकात्मक पाठ (symbolic recitation) से।
ऐतिहासिक और संवैधानिक संतुलन (Historical and Constitutional Balance)
1937 में कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee) ने स्वीकार किया कि वंदे मातरम् के देवी-पूजात्मक पद (goddess-worship verses) सभी धर्मों के लोगों के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। इसलिए रवींद्रनाथ टैगोर, मौलाना आज़ाद और अन्य नेताओं ने सलाह दी कि केवल पहले दो पद (first two stanzas) ही अपनाए जाएँ।
भारतीय संविधान (Indian Constitution) का अनुच्छेद 25 (Article 25) हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (freedom of religion) की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने भी साफ़ कहा है कि किसी भी नागरिक को किसी गीत के लिए बाध्य (force) नहीं किया जा सकता।
आस्था और राष्ट्र के बीच संतुलन (Difference Between Respect and Worship)
अंततः यह समझना आवश्यक है कि "वंदे मातरम्" पर मुस्लिम आपत्ति (objection) न तो भारत की एकता के विरुद्ध है और न ही देशप्रेम (patriotism) के विरुद्ध। यह आपत्ति केवल और केवल इस्लामी आस्था (Islamic faith) की रक्षा से जुड़ी हुई है। इस्लाम मुसलमानों को अपने देश से प्रेम करने, उसके लिए बलिदान देने और उसकी भलाई के लिए कार्य करने की अनुमति देता है—लेकिन पूजा केवल अल्लाह की करने का आदेश देता है।
अंत में यह बात समझना बहुत ज़रूरी है कि “वंदे मातरम्” पर मुस्लिम आपत्ति (objection) न तो भारत की एकता (national unity) के ख़िलाफ़ है और न ही देशप्रेम (patriotism) के विरुद्ध। यह आपत्ति केवल इस्लामी आस्था (Islamic faith) की रक्षा से जुड़ी हुई है।
इस्लाम मुसलमानों को अपने देश से प्रेम (love for country) करने, उसके लिए बलिदान (sacrifice) देने और उसकी भलाई (welfare) के लिए काम करने की पूरी अनुमति देता है—लेकिन पूजा (worship) करने का हक़ केवल अल्लाह (Allah) के लिए रखता है।
निष्कर्ष
वंदे मातरम् के पूरे पाठ को लेकर मुसलमानों की आपत्ति न तो राष्ट्रविरोध है और न ही देशप्रेम की कमी। यह आपत्ति इस्लाम के मूल सिद्धांत—तौहीद—की रक्षा से जुड़ी हुई है। इस्लाम प्रेम, त्याग और देशसेवा की अनुमति देता है, लेकिन पूजा केवल अल्लाह की।
क मज़बूत लोकतंत्र (strong democracy) वही होता है, जो आस्था (faith), विवेक (conscience) और विविधता (diversity) का सम्मान करे। अगर राष्ट्रवाद (nationalism) आस्था को दबाने लगे, तो वह एकता (unity) नहीं, बल्कि विभाजन (division) पैदा करता है।
भारत की असली आत्मा (soul of India) उसकी बहुलता (pluralism) में है—और उसी बहुलता में उसकी वास्तविक शक्ति (real strength) छिपी हुई है।
References
- सूरह अन-निसा
- सूरह अल-इख़लास
- सूरह अज़-ज़ारियात
- Sunan Ibn Mājah
- Jāmiʿ al-Tirmidhī
- Iḥyāʾ ʿUlūm al-Dīn
- Ānandamaṭh
- The Constitution of India
- Islam and Secularism
लेखक:
मोहम्मद शेख, झारखंड, विद्यार्थी दारुल हुदा, बंगाल
एवं
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज, बिहार।
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