विविध दुनिया में समस्त मानवता का सम्मान
परिचय
आज की दुनिया अनेक तरह की विविधताओं (diversity) से भरी हुई है—धर्म, नस्ल, रंग, भाषा, संस्कृति, राष्ट्रीयता और विचारों की विविधता। एक तरफ़ यह विविधता मानव समाज की सुंदरता है, तो दूसरी तरफ़ यही कई बार टकराव, भेदभाव, नस्लवाद (racism) और घृणा (hatred) की वजह भी बन जाती है। आधुनिक समय में युद्ध, धार्मिक कट्टरता (religious extremism), नस्लीय हिंसा (racial violence) और सामाजिक बँटवारा यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या मानवता का सम्मान केवल अपने जैसे लोगों तक सीमित है, या फिर यह एक सार्वभौमिक मूल्य (universal value) है, जो हर इंसान के लिए बराबर होना चाहिए?
इस्लाम इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से देता है। इस्लाम केवल किसी एक क़ौम, नस्ल या धर्म के लोगों के लिए नहीं आया, बल्कि यह पूरी मानवता (entire mankind) के लिए मार्गदर्शन (guidance) बनकर आया है। कुरआन अल्लाह का अंतिम संदेश है और रसूल ﷺ रहमतुल-लिल-आलमीन—सभी संसारों के लिए रहमत—बनकर भेजे गए।
इस्लाम का मूल सिद्धांत यह है कि हर इंसान सम्माननीय है, चाहे उसका मज़हब कुछ भी हो, चाहे वह किसी भी रंग, भाषा या देश से ताल्लुक रखता हो। इस्लाम मानव गरिमा (human dignity), न्याय (justice), करुणा (compassion), सह-अस्तित्व (coexistence) और आपसी सम्मान (mutual respect) को समाज की बुनियाद बनाता है।
मानव गरिमा की सार्वभौमिक घोषणा: कुरआन का ऐलान (Universal Declaration of Human Dignity: The Qur’anic Proclamation)
इस्लाम में मानव सम्मान का आधार किसी धर्म-परिवर्तन या आस्था की शर्त पर नहीं है, बल्कि सिर्फ़ इंसान होने पर है। कुरआन की यह आयत इस्लामी मानव-दृष्टि की बुनियाद है:
﴿وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ﴾
“और निस्संदेह हमने आदम की संतान को सम्मान दिया।” “And We have certainly honored the children of Adam.” (सूरह अल-इसरा 17:70)
यह आयत स्पष्ट करती है कि मानव गरिमा (human dignity) किसी धर्म, नस्ल या रंग से नहीं, बल्कि इंसान होने के कारण दी गई है। यह आयत अत्यंत क्रांतिकारी (revolutionary) है। यहाँ “बनी आदम” कहा गया—
न “मुस्लिम”,
न “मोमिन”,
न “अरब”।
बल्कि संपूर्ण मानव जाति।
इसका अर्थ यह है कि इस्लाम के अनुसार हर इंसान जन्म से ही सम्मान का अधिकारी है। उसका जीवन, उसकी इज़्ज़त, उसकी आज़ादी और उसका अधिकार—सब सुरक्षित हैं। यह सम्मान किसी सरकार, समाज या संस्कृति से नहीं, बल्कि सीधे अल्लाह की ओर से दिया गया है।
मानव समानता: नस्ल और रंग से ऊपर (Human equality: beyond race and colour)
दुनिया में नस्लवाद (racism) और जातीय भेदभाव (racial discrimination) आज भी गंभीर समस्या है। परन्तु इस्लाम ने 1400 साल पहले ही इन सभी भेदों को जड़ से समाप्त कर दिया।
क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
﴿يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنثَى وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ﴾
“ऐ लोगों! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया, और तुम्हें क़ौमों और कबीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। अल्लाह के नज़दीक सबसे प्रतिष्ठित वही है जो सबसे अधिक परहेज़गार है।” (सूरह अल-हुजुरात 49:13)
यह आयत तीन बड़े सिद्धांत स्थापित करती है:
- सभी इंसान एक ही मूल से हैं
- विविधता टकराव के लिए नहीं, पहचान और सहयोग के लिए है
- श्रेष्ठता का आधार केवल नैतिकता (taqwa) है, नस्ल या धर्म नहीं
पैग़म्बर ﷺ का सार्वभौमिक मानव-संदेश (The Prophet Muhammad’s ﷺ universal message to humanity)
रसूल ﷺ का पूरा जीवन मानवता के सम्मान का व्यावहारिक उदाहरण है। उन्होंने केवल मुसलमानों के अधिकारों की बात नहीं की, बल्कि गैर-मुस्लिमों, ग़ुलामों, महिलाओं, बच्चों और दुश्मनों तक के साथ न्याय और करुणा का व्यवहार किया।
हजतुल विदा का ऐतिहासिक संदेश (The historic message of the farewell sermon)
नबी ﷺ ने अपने अंतिम ख़ुत्बे में फ़रमाया:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ، أَلَا إِنَّ رَبَّكُمْ وَاحِدٌ، وَإِنَّ أَبَاكُمْ وَاحِدٌ
“ऐ लोगो! जान लो, तुम्हारा रब एक है और तुम्हारा बाप (आदम) एक है।” (मुस्नद अहमद)
और आगे फ़रमाया:
لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَىٰ عَجَمِيٍّ، وَلَا لِأَحْمَرَ عَلَىٰ أَسْوَدَ
“किसी अरब को अजमी पर, और किसी गोरे को काले पर कोई श्रेष्ठता नहीं।”
यह मानव इतिहास का पहला मानवाधिकार घोषणा-पत्र था।
गैर-मुस्लिमों के साथ सम्मान और न्याय (Respect and justice for non-Muslims)
इस्लाम में धार्मिक विविधता को स्वीकार किया गया है। कुरआन साफ़ कहता है:
﴿لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ﴾ “धर्म में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं।” (सूरह अल-बक़रा 2:256)
इस्लाम गैर-मुस्लिमों को भी इंसान होने के नाते सम्मान देता है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
مَنْ قَتَلَ نَفْسًا مُعَاهَدًا لَمْ يَرَحْ رَائِحَةَ الْجَنَّةِ، وَإِنَّ رِيحَهَا يُوجَدُ مِنْ مَسِيرَةِ أَرْبَعِينَ عَامًا
“जिसने किसी मु‘आहद (संधि/सुरक्षा में रहने वाले ग़ैर-मुस्लिम) की जान ली, वह जन्नत की खुशबू तक नहीं पाएगा; जबकि उसकी खुशबू चालीस वर्ष की दूरी से महसूस की जाती है।” (صحيح البخاري)
यह हदीस साबित करती है कि इस्लाम में मानवता का सम्मान केवल उपदेश नहीं, बल्कि क़ानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारी है।
मानव जीवन की पवित्रता (Sanctity of Human Life)
इस्लाम में मानव जीवन की सबसे बड़ी पवित्रता है। हर इंसान का जीवन अल्लाह द्वारा दिया गया एक अमूल्य उपहार है और इसे कोई भी बिना न्याय और वैध कारण के समाप्त नहीं कर सकता। कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
﴿مَنْ قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا﴾
“जिसने एक निर्दोष इंसान की हत्या की, मानो उसने पूरी मानवता की हत्या की।” (सूरह अल-माइदा 5:32)
यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि एक भी इंसान की जान की अनदेखी करना पूरी मानवता के लिए खतरे के बराबर है। इसलिए इस्लाम में किसी भी प्रकार की हिंसा, अत्याचार या निर्दोष प्राणियों की हत्या का विरोध किया गया है।
रसूल ﷺ ने भी मानव जीवन की रक्षा (protection of human life) को सबसे ऊँचा और महत्वपूर्ण (supreme priority) दर्जा दिया। इस्लाम में किसी भी निर्दोष इंसान की जान की हिफ़ाज़त करना एक बड़ा नैतिक और धार्मिक दायित्व (moral and religious duty) माना गया है।
करुणा और दया: इस्लामी नैतिकता की आत्मा (Compassion and Mercy: The Soul of Islamic Ethics)
रसूल ﷺ के बारे में कुरआन में फरमाया गया:
﴿وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ﴾
“हमने आपको सभी संसारों के लिए रहमत बनाकर भेजा।” (सूरह अल-अंबिया 21:107)
यह “आलमीन” केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं— बल्कि पूरी मानवता, जानवर और प्रकृति तक फैला हुआ है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
اِرْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ، يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ
“जो ज़मीन वालों पर दया करेगा, आसमान वाला उस पर दया करेगा।” (तिर्मिज़ी)
विविधता के साथ सह-अस्तित्व (Coexistence with diversity)
इस्लाम मानव समाज में विविधताओं को संघर्ष का कारण नहीं बल्कि एक अवसर मानता है। कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
﴿يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا﴾
“ऐ लोगों! हमने तुम्हें पुरुष और स्त्री से पैदा किया और तुम्हें क़ौमों और कबीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।” (सूरह अल-हुजुरात 49:13)
यह आयत बताती है कि नस्ल, भाषा, और संस्कृति में अंतर अल्लाह की मर्ज़ी से है, और इसका उद्देश्य विरोध या श्रेष्ठता नहीं, बल्कि एक-दूसरे को जानना और समझना है। यही विविधता के साथ सह-अस्तित्व (co-existence) का आधार है।
रसूल ﷺ ने भी सह-अस्तित्व और मानवता की समानता पर जोर दिया। उन्होंने फ़रमाया:
لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَى عَجَمِيٍّ وَلَا لِأَحْمَرَ عَلَى أَسْوَدَ إِلَّا بِالتَّقْوَى
“किसी अरब का अजमी पर, या किसी गोरे का काले पर कोई श्रेष्ठता नहीं, सिवाय परहेज़गारी (taqwa) के।” (मुस्नद अहमद)
इस हदीस का संदेश स्पष्ट है: सह-अस्तित्व का आधार नस्ल, रंग या जाति नहीं, बल्कि ईमान और नैतिकता है। आधुनिक दुनिया में यह मूल्य सामाजिक और धार्मिक शांति बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस्लाम में गैर-मुस्लिमों के साथ भी न्याय और सम्मान का आदेश है। कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
﴿لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِيَ دِينِ﴾
“तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए, मेरा धर्म मेरे लिए।” (सूरह अल-काफ़िरून 109:6)
यह आयत साफ़ तौर पर धार्मिक सहिष्णुता (religious tolerance) और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (peaceful coexistence) के सिद्धांत को प्रस्तुत करती है। यह बताती है कि अलग-अलग आस्थाओं के बीच सम्मान, संवाद और शांति के साथ रहना इस्लामी नैतिकता का अहम हिस्सा है।
इस प्रकार, इस्लाम में विविधता के साथ सह-अस्तित्व न केवल संभव है बल्कि इसे सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारी माना गया है। विविधता का आदर, न्याय और दया का पालन—यही इस्लामी दृष्टिकोण का मूल संदेश है।
आधुनिक दुनिया और इस्लामी संदेश (The Modern World and the Islamic Message)
आज की दुनिया वैश्विक स्तर पर इतनी विविध और जटिल हो गई है कि लोग अक्सर नस्ल, धर्म, संस्कृति और भाषा के आधार पर भेदभाव और संघर्ष में फँस जाते हैं। इस्लाम इस स्थिति में मानवता और सह-अस्तित्व (coexistence) का मार्ग दिखाता है। कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
﴿وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافُ أَلْسِنَتِكُمْ وَأَلْوَانِكُمْ﴾
“और उसके निशानों में से हैं आकाश और पृथ्वी की सृष्टि तथा तुम्हारी भाषाओं और रंगों का अंतर।” (सूरह अर-रूम 30:22)
यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि विविधता अल्लाह की मर्ज़ी और निशानी है, इसे टकराव के लिए नहीं, बल्कि समझ, सहयोग और आपसी सम्मान के लिए बनाया गया है।
निष्कर्ष
इस्लाम में मानवता का सम्मान केवल मुसलमानों या किसी विशेष समूह तक सीमित नहीं है; यह पूरे मानव समाज के लिए सार्वभौमिक मूल्य है। कुरआन और हदीस स्पष्ट रूप से बताती हैं कि हर इंसान—चाहे उसका धर्म, रंग, भाषा या संस्कृति कुछ भी हो—सम्मान का हकदार है। सूरह अल-इसरा (17:70) में अल्लाह तआला ने आदम की संतान को सम्मानित बताया, जबकि सूरह अल-हुजुरात (49:13) में नस्ल और क़ौम की विविधता को परिचय और सह-अस्तित्व के लिए बनाया गया बताया।
रसूल ﷺ ने अपने जीवन और हजतुल विदा के संदेशों में मानव समानता, करुणा और न्याय का व्यवहारिक उदाहरण पेश किया। उन्होंने किसी को उसकी जाति, रंग या धर्म के आधार पर श्रेष्ठ या नीचा नहीं समझा। नबी ﷺ ने सभी इंसानों के साथ दया, न्याय और आदर का व्यवहार करना सिखाया।
आज की विविध और वैश्विक दुनिया में, जहाँ नस्लवाद, भेदभाव और सामाजिक विभाजन चुनौती हैं, इस्लामी दृष्टिकोण यह संदेश देता है कि सच्ची मानवता का सम्मान इंसानियत और नैतिकता में है, न कि धर्म या जाति में। यह सम्मान शांति, सह-अस्तित्व और सामाजिक न्याय की नींव रखता है। इस प्रकार, इस्लाम मानव समाज में गरिमा, न्याय और आध्यात्मिक मूल्यों की सर्वोच्चता स्थापित करता है।
संदर्भ
- सूरह अल-इसरा
- सूरह अल-अंबिया
- सूरह अल-बक़रा
- सूरह अल-माइदा
- सूरह अल-काफ़िरून
- सूरह अल-हुजुरात
- सहीह अल-बुख़ारी
- सहीह मुस्लिम
- सुनन अबी दाऊद
- सुनन तिर्मिज़ी
- मुस्नद अहमद
- Yaqeen Institute – Human Dignity in Islam
- Oxford Islamic Studies – Ethics and Humanity
लेखक:
साहिल रजा, कक्षा:11 का छात्र, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज बिहार
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