विश्व अरबी भाषा दिवस 2025: इस्लामी विरासत, ज्ञान-परंपरा और आधुनिक वैश्विक संदर्भ में इसका महत्व
भूमिका
18 दिसंबर को दुनिया सिर्फ़ एक “भाषा दिवस” नहीं मनाती, बल्कि उस भाषा का सम्मान करती है जिसने सदियों तक इंसान की सोच, समझ और संस्कृति को दिशा दी है। यह दिन विश्व अरबी भाषा दिवस (World Arabic Language Day) के रूप में मनाया जाता है।
इस अवसर पर अरबी भाषा की ताज़गी, सुंदरता और उसके ज्ञानपूर्ण व आध्यात्मिक योगदान को याद किया जाता है। अरबी वह भाषा है जिसने क़ुरआन के संदेश को दुनिया तक पहुँचाया और विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, भूगोल, साहित्य और इस्लामी क़ानून जैसे क्षेत्रों में मानवता को नई रोशनी दी।
इस तरह 18 दिसंबर अरबी भाषा की उस महान विरासत का प्रतीक है, जिसने अलग-अलग सभ्यताओं को जोड़ा और ज्ञान के रास्ते खोले। 1973 में संयुक्त राष्ट्र (United Nations / UN) ने अरबी भाषा को अपनी आधिकारिक भाषाओं (official languages) में शामिल किया। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की अन्य मान्यता प्राप्त भाषाएँ हैं—अंग्रेज़ी (English), फ़्रेंच (French), स्पेनिश (Spanish), रूसी (Russian) और चीनी (Chinese)।
इसी ऐतिहासिक निर्णय की याद में UNESCO हर साल 18 दिसंबर को विश्व अरबी भाषा दिवस (World Arabic Language Day) मनाता है। इस दिन अरबी भाषा के ज्ञानात्मक (academic), सांस्कृतिक (cultural) और सभ्यतागत (civilizational) योगदान को विशेष रूप से सामने लाया जाता है, ताकि दुनिया इसके महत्व को बेहतर ढंग से समझ सके।
इस वर्ष World Arabic Language Day 2025 का थीम है:“Innovative Pathways for Arabic: Policies and Practices for a More Inclusive Linguistic Future” “अरबी भाषा के लिए नए रास्ते: एक ऐसे भाषाई भविष्य के लिए नीतियाँ और तरीके, जिसमें सबको शामिल किया जाए।”
यानी अरबी भाषा अब सिर्फ़ एक धार्मिक या क्षेत्रीय भाषा नहीं रही, बल्कि आज वह डिजिटल दुनिया, आधुनिक शिक्षा, वैश्विक संचार (global communication) और ज्ञान निर्माण (knowledge production) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
अरबी भाषा: इस्लामी पहचान और वह्य की ज़बान
इस्लाम की पूरी शैक्षिक (educational) और आध्यात्मिक (spiritual) परंपरा अरबी भाषा पर आधारित है। क़ुरआन जिस भाषा में उतरा, नबी ﷺ ने जिस भाषा में उम्मत को दीन (religion) की शिक्षा दी, और इस्लामी सभ्यता (Islamic civilization) के सभी महत्वपूर्ण ग्रंथ और दस्तावेज़ (texts and documents) जिस भाषा में लिखे गए—वह अरबी ही है।अल्लाह तआला फ़रमाता है:
إِنَّا أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (सूरह यूसुफ़ 12:2)
“हमने इसे अरबी कुरआन के रूप में उतारा ताकि तुम समझ सको।”
यह आयत साफ़ तौर पर बताती है कि अरबी सिर्फ़ एक भाषा (language) नहीं, बल्कि दीन (religion) को समझने की एक कुंजी (key) है। क़ुरआन की स्पष्टता (clarity), उसकी सुंदर अभिव्यक्ति (eloquence) और उसकी रचना-व्यवस्था (structure)—ये सब उसी अरबी भाषा में हैं, जिसने पूरी दुनिया की बुद्धि (intellect) और सोच (thinking) को चुनौती दी है।
नबी ﷺ की पूरी सुन्नत (Sunnah) और उनकी हिकमतें (wisdom) अरबी भाषा में सुरक्षित हैं। क़ुतुब-ए-सित्ताह (Six Major Hadith Books)—सह़ीह बुख़ारी, सह़ीह मुस्लिम, सुनन अबी दाऊद, सुनन तिर्मिज़ी, सुनन नसाई और सुनन इब्न माजा—इन सभी की मूल भाषा (original language) अरबी ही है।
यही कारण है कि आज भी दुनिया भर के मदरसे (madrasas) में नह्व (syntax), सरफ़ (morphology), अदब (literature) और बलाग़त (rhetoric) की शिक्षा दी जाती है, ताकि दीन को सही और गहराई से समझा जा सके।
रसूल ﷺ का एक मशहूर बयान इस ज़बान की रूहानी अहमियत को और स्पष्ट कर देता है:
أَحِبُّوا الْعَرَبَ لِثَلَاثٍ: لِأَنِّي عَرَبِيٌّ، وَالْقُرْآنُ عَرَبِيٌّ، وَكَلَامُ أَهْلِ الْجَنَّةِ عَرَبِيٌّ
“अरबों से प्रेम करो (love the Arabs) तीन कारणों से: क्योंकि मैं अरबी हूँ (I am Arab), क़ुरआन अरबी में है (the Qur’an is in Arabic), और जन्नत वालों की भाषा अरबी होगी (the language of the people of Paradise is Arabic)।”
— (शुअब अल-ईमान, अल-बैहक़ी)
यह साबित करता है कि अरबी केवल इल्म की भाषा नहीं, बल्कि मुसलमानों की इबादत, पहचान और रूहानी विरासत का हिस्सा है—एक ऐसी ज़बान जिसे समझे बिना इस्लामी तहज़ीब को पूरी तरह समझना नामुमकिन है।
अरबी भाषा और ज्ञान-परंपरा में प्रमुख योगदान
व्याकरण (Grammar)
अरबी भाषा की वैज्ञानिक संरचना को व्यवस्थित करने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान इमाम सीबवेह (मृत्यु: 180 हिजरी / 796 CE) का रहा। उनकी कृति “كَتَابُ سِيبوَيْهِ (Kitab Sibawayh)” अरबी व्याकरण की पहली पूर्ण और विश्लेषणात्मक पुस्तक मानी जाती है। आधुनिक समय में अली जरीम और मुस्तफा अमीन की “اَلنَحْوُ الْوَاضِحُ (An-Nahw Al Wazeh)” ने व्याकरण को सरल और शिक्षण योग्य रूप में प्रस्तुत किया, जिससे आज भी छात्र और विद्वान इसका अध्ययन करते हैं।
साहित्य और अदब (Literature / Adab)
अल-जहिज़ (776–868 CE) की रचनाएँ “كِتَابُ الْحَيَوَانِ” और “كِتَابُ الْبُخَلَاءِ” समाज, विज्ञान और साहित्य की गहरी समझ देती हैं। उनकी किताबों में इंसानी स्वभाव, सामाजिक आदतें और ज्ञान के कई पहलू आसान और रोचक ढंग से सामने आते हैं।
आधुनिक अरबी साहित्य में नागिब महफूज़ की रचना “The Cairo Trilogy” ने मिस्र के समाज, राजनीति और पारिवारिक जीवन को बहुत सच्चे और वास्तविक रूप में पेश किया। इस कृति ने विश्व साहित्य में अरबी उपन्यास को एक नई पहचान और नई दिशा दी।
दर्शन और तर्कशास्त्र (Philosophy & Logic)
अरबी और इस्लामी दर्शन में अबू नसर अल-फ़ाराबी की रचना “آرَاءُ أَهْلِ الْمَدِينَةِ الْفَاضِلَةِ” (The Virtuous City) राजनीतिक दर्शन में एक आदर्श समाज की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। इसमें बताया गया है कि एक अच्छा और न्यायपूर्ण समाज कैसे बनाया जा सकता है।
इब्न सीना (Avicenna) की प्रसिद्ध कृतियाँ “كِتَابُ الشِّفَاءِ” (Book of Healing) और “الْقَانُونُ فِي الطِّبِّ” चिकित्सा (medicine) और दर्शन (metaphysics) के क्षेत्र में बहुत ही मूल्यवान योगदान मानी जाती हैं। इन पुस्तकों ने सदियों तक पूर्व और पश्चिम, दोनों जगहों पर ज्ञान को दिशा दी।
इसी तरह अल-ग़ज़ाली की कृति “تَهَافُتُ الْفَلَاسِفَةِ” (The Incoherence of the Philosophers) दार्शनिक विचारों की गहरी समीक्षा करती है और सोच में संतुलन (balance) और विवेक (reasoning) पैदा करती है।
समाजशास्त्र और इतिहास (Sociology & History)
इब्न खल्दून (1332–1406 CE) की प्रसिद्ध कृति “Muqaddimah — كِتَابُ الْعِبَرِ وَدِيوَانُ الْمُبْتَدَأِ وَالْخَبَرِ فِي أَيَّامِ الْعَرَبِ وَالْعَجَمِ وَالْبَرْبَرِ وَمَنْ عَاصَرَهُمْ مِنْ ذَوِي السُّلْطَانِ الْأَكْبَرِ” समाज, अर्थशास्त्र और इतिहास के अध्ययन के लिए एक मूल और अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।
इस ग्रंथ में उन्होंने समाज की संरचनाओं (social structures) के विकास और पतन का गहराई से विश्लेषण किया और इतिहास लेखन (historiography) में एक वैज्ञानिक (scientific) और व्यवस्थित (systematic) दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो आज भी आधुनिक सामाजिक विज्ञान के लिए मार्गदर्शक है।
विज्ञान (Science)
विज्ञान के क्षेत्र में अरबी विद्वानों का योगदान पूरी दुनिया में बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इब्न हायथम (Alhazen) की प्रसिद्ध किताब “كِتَابُ الْمَنَاظِرِ” ने प्रकाश (light) और देखने के विज्ञान (optics) की नींव रखी। उनके प्रयोगों से आधुनिक विज्ञान को आगे बढ़ने का रास्ता मिला।
रसायनशास्त्र (chemistry) में इब्न हय्यान (Jabir ibn Hayyan) का योगदान बहुत बड़ा और मूल्यवान है। उन्होंने प्रयोगों पर ज़ोर दिया और विज्ञान को व्यावहारिक बनाया।
गणित (mathematics) में अल-ख्वारिज़्मी (Abu Abdullah Muhammad ibn Musa al-Khwarizmi) की पुस्तक “الْجَبْرُ وَالْمُقَابَلَةُ” ने बीजगणित (algebra) की शुरुआत की और गणित को आसान और व्यवस्थित बनाया।
चिकित्सा (medicine) और दर्शन (philosophy) के क्षेत्र में इब्न सीना (Avicenna) की कृति “الْقَانُونُ فِي الطِّبِّ” लंबे समय तक दुनिया भर में पढ़ाई जाती रही और आज भी उसे मार्गदर्शक माना जाता है।
अहमद शौक़ी (1868–1932)
अहमद शौक़ी का जन्म मिस्र में हुआ। उन्होंने काहिरा (Cairo) और पेरिस (Paris) में शिक्षा प्राप्त की। उन्हें “अमीर-उश-शु‘अरा” यानी शायरों का सरदार कहा जाता है। वे मिस्र के शाही दरबार के कवि भी रहे।
उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में الشوقيات (कविताओं का बड़ा संग्रह) और مجموعة المسرحيات الشعرية (काव्य नाटक) शामिल हैं। अहमद शौक़ी ने अरबी कविता को नया रूप दिया और नहज़ा (Arab Renaissance) आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी शायरी में इतिहास, समाज और मानव अनुभव की गहरी झलक मिलती है।
नगीब महफ़ूज़ (1911–2006)
नगीब महफ़ूज़ का जन्म काहिरा में हुआ और उन्होंने वहीं से दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। वे अरबी भाषा के पहले लेखक थे जिन्हें 1988 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) मिला।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना الثلاثية (बैन अल-क़सरैन, क़सर अश-शौक़, अस-सुक्करिया) है, जिसमें मिस्र के समाज की तीन पीढ़ियों की कहानी दिखाई गई है।
उनकी एक और महत्वपूर्ण किताब أولاد حارتنا समाज, धर्म और नैतिक मूल्यों पर गहरी सोच को सामने लाती है। महफ़ूज़ की लेखनी शहर की ज़िंदगी, राजनीति और पारिवारिक रिश्तों को बहुत सच्चाई से दिखाती है।
ख़लील जिब्रान (1883–1931)
ख़लील जिब्रान का जन्म लेबनान में हुआ, लेकिन वे बचपन में ही अमरीका चले गए। वे कवि, चित्रकार और दार्शनिक थे।
उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब The Prophet (1923) दुनिया की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली आध्यात्मिक पुस्तकों में से एक है। इसका अनुवाद 50 से अधिक भाषाओं में हो चुका है।
उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ Sand and Foam और The Broken Wings हैं। जिब्रान की लेखनी प्रेम, स्वतंत्रता, आध्यात्मिकता और मनुष्य की आंतरिक भावनाओं को बहुत सरल और भावुक भाषा में व्यक्त करती है।
ताहा हुसैन (1889–1973)
ताहा हुसैन ने मिस्र के अल-अज़हर और बाद में फ्रांस की सोरबोन यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की। बचपन में उनकी आँखों की रोशनी चली गई, लेकिन फिर भी उन्होंने अरबी साहित्य और शिक्षा को नई दिशा दी।
उन्हें “عميد الأدب العربي” यानी आधुनिक अरबी साहित्य का नेता कहा जाता है।
उनकी प्रसिद्ध आत्मकथा الأيام है। दूसरी महत्वपूर्ण किताब في الشعر الجاهلي ने अरबी साहित्यिक आलोचना और शोध में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया। उन्होंने मिस्र की शिक्षा प्रणाली को आधुनिक और तर्क-आधारित बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
इब्न खलक़ान (1211–1282)
इब्न खलक़ान का जन्म इर्बिल (इराक) में हुआ था। वे दमिश्क में क़ाज़ी रहे और हदीस के बड़े विद्वान भी थे। उन्हें मध्यकालीन इस्लामी इतिहास के सबसे भरोसेमंद जीवनी-लेखकों में माना जाता है।
उनकी प्रसिद्ध किताब وفيات الأعيان وأنباء أبناء الزمان में सैकड़ों मशहूर कवियों, विद्वानों, सूफ़ियों, शासकों और धार्मिक विद्वानों की विस्तार से जीवनियाँ दी गई हैं।
उनकी लिखावट की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वे हर बात को मज़बूत और भरोसेमंद स्रोतों के साथ लिखते हैं। इसी वजह से यह किताब आज भी शोध और पढ़ाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
अरबी भाषा का भू-राजनीतिक महत्व:
ऊर्जा और वैश्विक राजनीति
मध्य-पूर्व वह क्षेत्र है जहाँ दुनिया के लगभग 48% प्रमाणित तेल भंडार (proven oil reserves) और करीब 43% प्राकृतिक गैस भंडार (natural gas reserves) मौजूद हैं।
इस क्षेत्र के छह प्रमुख देश—सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), क़तर, कुवैत, ओमान और बहरीन—अपनी आर्थिक नीतियाँ (economic policies), ऊर्जा व्यापार (energy trade), राजनयिक बातचीत (diplomatic talks) और सरकारी प्रशासन (government administration) मुख्य रूप से अरबी भाषा में चलाते हैं।
सऊदी अरब की “अरामको (Aramco)”, क़तर की “क़तर एनर्जी (Qatar Energy)”, यूएई की “ADNOC” और कुवैत की “KPC”—ये सभी विश्व-स्तरीय ऊर्जा कंपनियाँ (global energy companies) हैं और इनकी आधिकारिक भाषा (official language) अरबी ही है।
इसी कारण ऊर्जा बाज़ार (energy market) की रणनीतियों, तेल की क़ीमतों के फैसलों (oil price decisions)—जैसे OPEC+ की बैठकें (meetings)—और क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ताओं (regional security talks) में अरबी भाषा का सीधा असर पड़ता है।
इस तरह अरबी भाषा केवल एक सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि ऊर्जा राजनीति (energy politics) में एक वास्तविक और व्यावहारिक शक्ति (practical power) बनकर सामने आती है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ
कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठनों की आधिकारिक भाषा अरबी है, जो इसकी वैश्विक भूमिका को और मजबूत बनाती है:
- Arab League (1945) — 22 अरबी देशों का समूह, जिसका उद्देश्य राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाना है।
- GCC – Gulf Cooperation Council (1981) — छह खाड़ी देशों का संगठन, जहाँ सुरक्षा, व्यापार, रोजगार और आर्थिक नीतियों से जुड़े फैसले लिए जाते हैं।
- OIC – Organisation of Islamic Cooperation (1969) — 57 मुस्लिम देशों का संगठन, जिसकी आधिकारिक भाषा अरबी है, और जिसका मुख्यालय जेद्दाह में है।
इन संस्थाओं में अरबी भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि राजनयिक निर्णयों, आधिकारिक दस्तावेज़ों, और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की मुख्य भाषा भी है।
इससे स्पष्ट होता है कि अरबी भाषा आज भी विश्व राजनीति में एक केंद्रिय और निर्णायक भूमिका निभाती है।
भारत में अरबी भाषा का विशेष महत्व
भारत में अरबी भाषा केवल धार्मिक मक़सद के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा, इतिहास, अनुवाद, अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और आधुनिक शोध में भी एक अहम भूमिका निभाती है। भारत में पश्चिम एशिया के देशों से आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध मजबूत हैं, इसलिए अरबी सीखने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई प्रमुख विश्वविद्यालय और दीनदार शिक्षण संस्थान अरबी को अपने उच्च स्तर के कोर्सों का हिस्सा बनाते हैं।
भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों में अरबी शिक्षा
जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली)
यहाँ का Department of Arabic & Translation Studies भारत में आधुनिक और क्लासिकल अरबी पढ़ाने के लिए बहुत प्रसिद्ध है। विभाग में अरबी अनुवाद, मीडिया अरबी, टेक्स्ट एडिटिंग, और क्लासिकल नह्व-सर्फ पर विशेष रिसर्च होती है। जामिया के कई ग्रेजुएट विदेशों में दुभाषिए और शोधकर्ता के रूप में काम करते हैं।
(2) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU)
AMU का Department of Arabic भारत में अरबी भाषा के सबसे पुराने और सक्रिय विभागों में से है। यहाँ के कोर्स में प्राचीन अरबी कविता, अब्बासी दौर का साहित्य, दार्शनिक ग्रंथ, आणि आधुनिक अरब लेखन शामिल हैं। यह विभाग भारत में अरबी शोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
(3) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU)
JNU का Centre for Arabic & African Studies अरब दुनिया की राजनीति, समाज, इतिहास, और भाषा पर विस्तृत अकादमिक अध्ययन करता है। यहाँ पश्चिम एशिया स्टडीज़ और राजनीतिक अनुवाद का भी काम होता है।
(5) Darul Huda Islamic University (DHIU), Kerala — भारत में आधुनिक अरबी शिक्षा का मजबूत मॉडल
Darul Huda Islamic University (DHIU) भारत में अरबी और इस्लामी स्टडीज़ का एक संगठित और आधुनिक विश्वविद्यालय है। इसकी खासियत यह है कि यहाँ क्लासिकल इस्लामी विषयों को आधुनिक अकादमिक पद्धति के साथ पढ़ाया जाता है। इसके मुख्य विभाग:
निष्कर्ष
World Arabic Language Day 2025 हमें यह समझाता है कि अरबी सिर्फ़ एक भाषा नहीं है, बल्कि पूरी इस्लामी सभ्यता और ज्ञान की विरासत का मज़बूत आधार है। क़ुरआन अरबी भाषा में उतरा, हदीस भी इसी भाषा में सुरक्षित हैं, और इमाम ग़ज़ाली, इब्न खलदून और इब्न सीना जैसे महान विद्वानों की महत्वपूर्ण किताबें भी अरबी में ही लिखी गईं। यही कारण है कि अरबी आज भी ज्ञान, शिक्षा और आध्यात्मिकता की एक भरोसेमंद भाषा मानी जाती है।
UNESCO का 2025 का विषय (theme) “Innovative Pathways for Arabic” यह बताता है कि अरबी का भविष्य अब केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), तकनीक (technology) और डिजिटल दुनिया (digital world) में भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। Google, Microsoft, QCRI जैसे बड़े संस्थान अरबी मशीन अनुवाद (machine translation), भाषा मॉडल (language models) और डिजिटल लाइब्रेरी (digital libraries) पर लगातार काम कर रहे हैं। OpenAI जैसी परियोजनाएँ हज़ारों प्राचीन अरबी पुस्तकों को डिजिटल रूप दे रही हैं, जिससे अरबी ज्ञान को नई पहचान और नई ज़िंदगी मिल रही है।
भारत में भी अरबी की अहमियत साफ़ दिखती है। कई विश्वविद्यालय और मदरसे अरबी की तालीम दे रहे हैं, और अरब मुल्कों में रोज़गार व कारोबार के लिए यह भाषा बहुत काम आती है। इससे साबित होता है कि अरबी का दायरा दीन से आगे बढ़कर शिक्षा, समाज और वैश्विक बातचीत तक फैल चुका है।
आख़िर में, यह दिन हमें याद दिलाता है कि अरबी ज़बान ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक संतुलन की ज़बान है, और आने वाले वक़्त में भी यह दुनिया को नई दिशा देती रहेगी।
संदर्भ (References)
- कुरआन — सूरह यूसुफ़,
- हदीस — शुअब अल-ईमान, अल-बैहक़ी:
- Ibn Khaldun
- Imam Al-Ghazali. Tahafut al-Falasifah
- Ibn Sina (Avicenna). Kitab al-Qanun fi al-Tibb और Kitab al-Shifa
- Imam Sibawayh. Kitab Sibawayh
- Ali Jarim & Mustafa Amin. An-Nahwul Wazih
- Al-Jahiz. Kitab al-Hayawan और Kitab al-Bukhala
- Naguib Mahfouz. The Cairo Trilogy
लेखक
मुहम्मद कामरान
सेकेंडरी फाइनल ईयर, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल
Disclaimer
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