फिलिस्तीन का राजनीतिक सफर: स्वतंत्रता संग्राम के पाँच प्रमुख स्तंभ

प्रस्तावना

फिलिस्तीन की आज़ादी की लड़ाई बीसवीं सदी से लेकर आज तक दुनिया के सबसे लम्बे, कठिन और संवेदनशील संघर्षों में गिनी जाती है। यह संघर्ष केवल एक भूभाग (territory) या सीमाओं का नहीं, बल्कि पहचान, न्याय और आत्मनिर्णय (self-determination) के अधिकार का है। फिलिस्तीनी जनता ने दशकों से अपने वजूद को बनाए रखने और न्यायपूर्ण राज्य की स्थापना के लिए जो बलिदान दिए हैं, वह इतिहास में अद्वितीय (unique) हैं।

इस आंदोलन के केंद्र में कुछ ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने अपने दर्शन, कर्म और त्याग से इस संघर्ष को दिशा दी। यासिर अराफात ने आधुनिक फिलिस्तीनी राजनीति की नींव रखी, महमूद अब्बास ने कूटनीति का रास्ता अपनाया, इस्माइल हानियाह और यहीया सिनवार ने प्रतिरोध की राजनीति को परिभाषित किया, जबकि खालिद मेशाल ने इस संघर्ष को वैश्विक मंच तक पहुँचाया। और अंत में मरवान बरघौती जैसे नेताओं ने जेल की सलाखों के पीछे से भी एक नई आशा का स्वर दिया।

इस आंदोलन के केंद्र में कुछ ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने अपने विचार, कर्म और त्याग से इस संघर्ष को सही दिशा दी। यासिर अराफात ने आधुनिक फ़िलिस्तीनी राजनीति (modern Palestinian politics) की नींव रखी। महमूद अब्बास ने संघर्ष में कूटनीति (diplomacy) का रास्ता अपनाया। इस्माइल हानियाह और यहीया सिनवार ने प्रतिरोध की राजनीति (resistance politics) को नई पहचान दी, जबकि खालिद मेशाल ने इस संघर्ष को वैश्विक मंच (global platform) तक पहुँचाया। अंत में, मरवान बरघौती जैसे नेताओं ने जेल की सलाखों के पीछे रहते हुए भी लोगों के दिलों में नई आशा की आवाज़ पैदा की।

यह लेख फ़िलिस्तीनी आंदोलन (Palestinian movement) के इन प्रमुख स्तंभों—यासिर अराफात, महमूद अब्बास, इस्माइल हानियाह, यहीया सिनवार, खालिद मेशाल और मरवान बरघौतीके जीवन (life), विचारों (ideas) और योगदानों (contributions) पर केंद्रित है। ये सभी नेता मिलकर फ़िलिस्तीनी स्वतंत्रता संघर्ष (Palestinian freedom struggle) की एक साझा पहचान (collective identity) को आकार देते हैं।

  1. यासिर अराफात: आधुनिक फिलिस्तीन के जनक

यासिर अराफात (1929–2004) फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन (Palestinian National Movement) के सबसे प्रमुख और सम्मानित नेताओं में माने जाते हैं। उन्हें आधुनिक फ़िलिस्तीन का जनक कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने न सिर्फ़ संघर्ष की राजनीति (politics of struggle) को संगठित किया, बल्कि एक एकजुट राष्ट्र (united nation) की कल्पना को भी ज़िंदा रखा।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा:

अराफात का जन्म काहिरा (Cairo) में हुआ, जहाँ उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग (civil engineering) की पढ़ाई की। लेकिन देशभक्ति (patriotism) की भावना उन्हें छात्र राजनीति (student politics) की ओर ले गई। जल्द ही उन्होंने फतह (Fatah) आंदोलन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सशस्त्र प्रतिरोध (armed resistance) के ज़रिए फ़िलिस्तीन की आज़ादी (freedom) हासिल करना था।

मुख्य योगदान:

  • PLO की स्थापना: 1960 के दशक में उन्होंने Palestine Liberation Organization (PLO) को संगठित किया और उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता (international recognition) दिलाई।
  • संयुक्त राष्ट्र में संबोधन (1974): उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) में एक ऐतिहासिक भाषण दिया और कहा—
    आज मैं एक जैतून की डाली (olive’s branch) और बंदूक (gun) लेकर आया हूँ, इसे गिरने मत देना।”
    यह वाक्य फ़िलिस्तीन के संघर्ष (struggle) का प्रतीक (symbol) बन गया।
  • ऑस्लो समझौता (Oslo Accords, 1993): इस शांति प्रक्रिया (peace process) के तहत यासिर अराफात ने इज़राइल के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे फिलिस्तीनी प्राधिकरण (Palestinian Authority) की नींव पड़ी।
  • नोबेल पुरस्कार (1994): शांति के प्रयासों (peace efforts) के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) से सम्मानित किया गया।

व्यक्तित्व और विरासत:

अराफात एक करिश्माई (charismatic), विनम्र (humble) और जनता से गहरा जुड़ाव (mass connect) रखने वाले नेता थे। उन्होंने यह दिखाया कि क्रांति (revolution) और कूटनीति (diplomacy) साथ-साथ चल सकती हैं। 2004 में उनके निधन (death) के बाद भी उनका नाम प्रतिरोध (resistance) और शांति (peace)दोनों का प्रतीक (symbol) बना हुआ है।

  1. महमूद अब्बास: कूटनीति के शांति दूत (The Envoy of Peace through Diplomacy)

महमूद अब्बास, जिन्हें अबू माजेन (Abu Mazen) के नाम से भी जाना जाता है, फ़िलिस्तीन की राजनीति (Palestinian politics) के ऐसे नेता हैं जिन्होंने हिंसा (violence) के बजाय बातचीत (dialogue) और कूटनीति (diplomacy) को अपना मुख्य रास्ता बनाया।

जीवन और शिक्षा:

1935 में सफ़द (Safed) में जन्मे महमूद अब्बास को 1948 के नक़बा (Nakba) के बाद अपने परिवार के साथ पलायन (migration) करना पड़ा। उन्होंने दमिश्क विश्वविद्यालय (Damascus University) से क़ानून (Law) की पढ़ाई की और बाद में मॉस्को (Moscow) से पीएचडी (PhD) हासिल की। उनका शोध (research) सोवियत संघ (Soviet Union) और फ़िलिस्तीनी आंदोलन (Palestinian movement) के आपसी संबंधों पर केंद्रित था।

राजनीतिक सफर:
अब्बास ने 1960 के दशक में फतह (Fatah) में शामिल होकर राजनीतिक कार्य शुरू किया और बाद में PLO के शीर्ष पदों तक पहुंचे। 1993 के ऑस्लो समझौते में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। 2005 में यासिर अराफात के निधन के बाद उन्हें फिलिस्तीन का राष्ट्रपति चुना गया।

मुख्य योगदान:

  • शांति प्रक्रिया (Peace Process): अब्बास ने अमेरिका (USA) और यूरोपीय देशों (Europe) के साथ मिलकर फ़िलिस्तीन की कूटनीतिक छवि (diplomatic image) को मज़बूत किया।
  • संस्थागत सुधार (Institutional Reforms): उन्होंने फ़िलिस्तीनी प्रशासन (Palestinian administration) को अधिक पारदर्शी (transparent) और लोकतांत्रिक (democratic) बनाने के प्रयास किए।
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिनिधित्व (International Representation): उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फ़िलिस्तीन के राज्य-स्वरूप (statehood) को मान्यता दिलाने के लिए लगातार प्रयास (advocacy) किए।

विचार और मूल दर्शन:
महमूद अब्बास का यह विश्वास रहा है कि “कलम और बातचीत की शक्ति बंदूक से बड़ी होती है।” वे शिक्षा, धैर्य और तर्क पर आधारित राजनीति के प्रतीक हैं।

  1. इस्माइल हानियाह: गाजा के प्रतिरोध का प्रतीक (Symbol of Gaza’s Resistance)

इस्माइल हानियाह (Ismail Haniyeh) हमास (Hamas) के सबसे प्रमुख नेता और गाजा पट्टी के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं। वे फिलिस्तीनी प्रतिरोध और सामाजिक न्याय की आवाज़ माने जाते हैं।

प्रारंभिक जीवन:

29 जनवरी 1962 को गाज़ा के अल-शाति शरणार्थी शिविर (Al-Shati Refugee Camp) में जन्मे इस्माइल हानियाह ने इस्लामी विश्वविद्यालय, गाज़ा (Islamic University of Gaza) से अरबी साहित्य (Arabic Literature) में स्नातक (graduation) किया।

युवावस्था (youth) में उन्हें इज़राइली जेलों (Israeli prisons) में कई वर्षों तक रहना पड़ा, जहाँ उन्होंने इस्लामी राजनीति (Islamic politics) और रणनीति (strategy) की गहरी समझ विकसित की।

राजनीतिक योगदान:

  • हमास का उदय (Rise of Hamas): 1980 के दशक में वे हमास (Hamas) से जुड़े और संगठन में तेज़ी से उभरकर एक प्रमुख नेता बने।
  • 2006 का चुनाव (2006 Elections): उनकी नेतृत्व (leadership) में हमास ने पहली बार फ़िलिस्तीनी चुनाव (Palestinian elections) में जीत हासिल की।
  • ग़ाज़ा शासन की स्थापना (2007) – Gaza Administration: हमास के नियंत्रण में ग़ाज़ा (Gaza) के प्रशासन को संगठित किया गया और कई सामाजिक कल्याण योजनाओं (social welfare programmes) की शुरुआत की गई।
  • संघर्ष और बातचीत दोनों (Resistance and Dialogue): हानियाह ने प्रतिरोध (resistance) को धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य बताया, लेकिन साथ ही शांति (peace) और बातचीत (dialogue) की संभावनाओं को पूरी तरह नकारा नहीं।

व्यक्तित्व और निधन:

सादा जीवन (simple life), प्रभावशाली भाषण-कौशल (oratory skills) और मज़बूत जन-संपर्क (mass connect) उनकी पहचान थे। उन्हें “ग़ाज़ा का शेर” (Lion of Gaza) कहा जाता था।

31 जुलाई 2024 को तेहरान (Tehran) में मोसाद (Mossad) द्वारा की गई हत्या में उनकी मृत्यु (death) हो गई, जिसने पूरे अरब जगत (Arab world) को शोकाकुल (mourning) कर दिया। वे आज भी ग़ाज़ा की आत्मा (soul of Gaza) माने जाते हैं।

  1. यहीया सिनवार: गाजा प्रतिरोध के लौह पुरुष (The Iron Man of Gaza Resistance)

यहीया सिनवार हमास के एक अत्यंत प्रभावशाली और रणनीतिक नेता थे, जिन्हें “गाजा का लौह पुरुष” (Iron Man of Gaza) कहा जाता है।

जीवन और शिक्षा:

29 अक्टूबर 1962 को खान यूनिस शरणार्थी शिविर (Khan Younis Refugee Camp) में जन्मे यहीया सिनवार ने इस्लामिक विश्वविद्यालय, ग़ाज़ा (Islamic University of Gaza) से अरबी साहित्य (Arabic Literature) की पढ़ाई की।

छात्र जीवन (student life) से ही वे इस्लामी राजनीति (Islamic politics) में सक्रिय (active) रहे। उनकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा इज़राइल की जेलों (Israeli prisons) में बीता—करीब 22 सालजहाँ उन्होंने हिब्रू भाषा (Hebrew language) और सुरक्षा ढांचे (security structure) का गहन अध्ययन (in-depth study) किया।

योगदान और रणनीति:

  • मजद संगठन की स्थापना (Majd Organization): उन्होंने हमास की आंतरिक सुरक्षा शाखा (internal security wing) के रूप में ‘मजद’ की स्थापना की, जिससे संगठन में अनुशासन और सुरक्ष मज़बूत हुई।
  • अल-क़स्साम ब्रिगेड (Al-Qassam Brigades): उन्होंने हमास की सैन्य शाखा (military wing) को अधिक पेशेवर (professional) और संगठित (organized) रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • कैदियों की रिहाई (Prisoners’ Release): 2011 में गिलाद शालित समझौते (Gilad Shalit deal) के तहत कई फ़िलिस्तीनी कैदियों (Palestinian prisoners) की रिहाई कराई गई।
  • लेखन का योगदान (Literary Contribution): जेल में लिखे गए उनके उपन्यास The Thorn and the Carnation ने प्रतिरोध (resistance) की गहराई को साहित्यिक (literary) रूप में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

इज़राइली बस्तियों के विस्तार का विरोध (Opposition to Israeli Settlements): ग़ाज़ा में इज़राइली बस्तियों (Israeli settlements) के विस्तार के विरुद्ध हमास की नीति और प्रतिरोधी रुख को आकार देने में वे एक प्रभावशाली वैचारिक चेहरा माने जाते हैं।

  • तूफ़ान अल-अक्सा संघर्ष (Toofan al-Aqsa): 2023 में हुए ‘तूफ़ान अल-अक्सा’ नामक संघर्ष के दौरान हमास की रणनीतिक योजना और समन्वय में उनकी भूमिका का उल्लेख कई विश्लेषणों और रिपोर्टों में किया गया है।
  • रणनीतिक प्रभाव (Strategic Influence): इज़राइल–हमास संघर्ष के संदर्भ में उन्हें एक प्रमुख रणनीतिक विचारक (key strategic figure) के रूप में देखा जाता था, जिनका प्रभाव संगठन की दीर्घकालिक नीति और दिशा पर पड़ा।

निधन और विरासत:

16 अक्टूबर 2024 को दक्षिणी ग़ाज़ा (southern Gaza) में  इज़राइल के साथ एक सैन्य अभियान (military operation) के दौरान उनका निधन (death) हुआ। उन्हें शहीद (martyr) के रूप में याद किया जाता है। सिनवार का मानना था कि दुश्मन (enemy) को हराने के लिए पहले उसके मन (mindset) को समझना ज़रूरी है।” उनका जीवन दृढ़ता (steadfastness) और विवेक (wisdom) का प्रतीक बना रहेगा।

  1. खालिद मेशाल: निर्वासन से वैश्विक नेतृत्व तक

खालिद मेशाल (Khaled Mashal) हमास के पूर्व राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख हैं जिन्होंने संगठन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। वे राजनीति में कूटनीति और रणनीति के प्रतीक माने जाते हैं।

जीवन और शिक्षा:

1956 में जेरूसलम (Jerusalem) के पास सिलवान गाँव (Silwan village) में जन्मे खालिद मेशाल ने 1967 के युद्ध (1967 war) के बाद अपने परिवार के साथ जॉर्डन (Jordan) में शरण (refuge) ली।

उन्होंने कुवैत विश्वविद्यालय (Kuwait University) से भौतिकी (Physics) में स्नातक (graduation) की डिग्री प्राप्त की और छात्र राजनीति (student politics) में सक्रिय (active) रहे।

मुख्य योगदान:

  • हमास का अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चेहरा (International Diplomatic Face of Hamas): उन्होंने संगठन को अरब (Arab world) और इस्लामी दुनिया (Islamic world) में व्यापक समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
  • हत्या के प्रयास से जीवित रहना (1997) – Survival of Assassination Attempt: अम्मान (Amman) में मोसाद (Mossad) के असफल हमले के बाद वे प्रतिरोध (resistance) के एक मज़बूत प्रतीक (symbol) बन गए।
  • हमास का नया घोषणापत्र (2017) – New Hamas Charter: उन्होंने बदलते वैश्विक हालात (global situation) के अनुसार संगठन के राजनीतिक दृष्टिकोण (political outlook) को अद्यतन (updated) करने में नेतृत्व किया।

व्यक्तित्व और वर्तमान भूमिका:

खालिद मेशाल का व्यक्तित्व प्रभावशाली (influential), सूझबूझ वाला और संवादशील (dialogue-oriented) है। वे वर्तमान में क़तर (Qatar) में रहते हुए फ़िलिस्तीनी एकता (Palestinian unity) और अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं (international talks) में सक्रिय (active) भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने यह साबित किया कि निर्वासन (exile) में रहकर भी नेतृत्व (leadership) को ज़िंदा और प्रभावी (effective) रखा जा सकता है।

  1. मरवान बरघौती: जेल के भीतर से क्रांति का स्वर (Marwan Barghouti: The Voice of Revolution from Prison)

मरवान बरघौती (Marwan Barghouti) को आज “फिलिस्तीन का नेल्सन मंडेला” कहा जाता है। वे फतह आंदोलन के वरिष्ठ नेता और युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं।

जीवन और शिक्षा:

1959 में वेस्ट बैंक (West Bank) के कुबैया गाँव (Kobbieya village) में जन्मे मरवान बरघौती ने बिरज़ेट विश्वविद्यालय (Birzeit University) से राजनीति विज्ञान (Political Science) की पढ़ाई की।

इज़राइली जेलों (Israeli prisons) में रहते हुए भी उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा (higher education) जारी रखी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों (International Relations) में पीएचडी (PhD) हासिल की।

मुख्य योगदान:

  • इंतिफ़ादा में नेतृत्व (Leadership in Intifada): उन्होंने 1987 और 2000 के दोनों इंतिफ़ादा में युवाओं (youth) को संगठित (mobilise) करने में अहम भूमिका निभाई।
  • क़ैद में भी संघर्ष (Struggle from Prison): 2002 में गिरफ़्तारी (arrest) के बाद से वे जेल (prison) में हैं, लेकिन वहाँ से भी फ़िलिस्तीनी एकता (unity) और संयम (restraint) का संदेश देते रहे।
  • प्रिज़नर्स डॉक्यूमेंट (2006) – Prisoners’ Document: इस दस्तावेज़ ने फतह (Fatah) और हमास (Hamas) के बीच सुलह (reconciliation) का रास्ता खोला और साझा लक्ष्य (common goals) तय करने में मदद की।

व्यक्तित्व और प्रतीकात्मक महत्व (Personality and Symbolic Importance):

बरघौती लोगों के बीच अपनी ईमानदारी (honesty), सरलता (simplicity) और निडरता (fearlessness) के लिए जाने जाते हैं। वे कहते हैं,
जेलें शरीर को कैद (imprison) कर सकती हैं, आत्मा (spirit) को नहीं।”

वे फ़िलिस्तीन की आने वाली पीढ़ी (next generation) के लिए आशा (hope) का एक मज़बूत दीपक (symbol of hope) माने जाते हैं।

निष्कर्ष

फ़िलिस्तीन का राजनीतिक सफ़र कई दशकों की एक ऐसी महागाथा (epic journey) है, जिसमें खून (blood), आँसू (tears) और उम्मीद (hope) का इतिहास आपस में गुँथा हुआ है। यासिर अराफात ने राष्ट्र (nation) का सपना जगाया, महमूद अब्बास ने बातचीत (dialogue) और कूटनीति (diplomacy) की राह दिखाई। इस्माइल हानियाह और यहीया सिनवार ने प्रतिरोध (resistance) को ज़िंदा रखा, खालिद मेशाल ने उसे वैश्विक मंच (global platform) तक पहुँचाया, और मरवान बरघौती ने इस कहानी को मानवता के संघर्ष (human struggle) में बदल दिया।

ये पाँचों स्तंभ केवल नेता (leaders) नहीं, बल्कि विचारधारा (ideology), साहस (courage) और जनता की आकांक्षाओं (people’s aspirations) के प्रतीक हैं। फ़िलिस्तीन की आज़ादी  की राह अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन इन नेताओं की विरासत (legacy) यह साबित करती है कि यह संघर्ष सिर्फ़ ज़मीन (territory) का नहीं—बल्कि आत्मसम्मान (self-respect), एकता (unity) और न्याय (justice) की लड़ाई है।

उनकी ज़िंदगियाँ हमें यह सिखाती हैं कि स्वतंत्रता का रास्ता लंबा (long journey) ज़रूर होता है, लेकिन जो क़ौमें अपनी पहचान (identity) के लिए डट जाती हैं, इतिहास (history) में उन्हें कोई मिटा नहीं सकता।

संदर्भ (References)

  • Abbas, M. (1994). Through Secret Channels: The Road to Oslo.​
  • Sayigh, Y. (1997). Armed Struggle and the Search for State: The Palestinian National Movement, 1949-1993.​
  • Rubin, B. (2003). Yasir Arafat: A Political Biography.​
  • Gorenberg, D., & Levy, E. (2017). The Last Palestinian: The Rise and Reign of Mahmoud Abbas.​
  • Hroub, K. (2010). Hamas: Political Thought and Practice.​
  • Tamimi, A. (2007). Hamas: A History from Within.​
  • McGeough, P. (2009). Kill Khalid: The Failed Mossad Assassination of Khalid Mishal and the Rise of Hamas.​
  • Barghouti, M. (2009). La Promesse: Écrits de Prison 2002-2009(French edition of prison writings).​
  • Sinwar, Y. (2004). The Thorn and the Carnation(novel on resistance).​

 

लेखक:

मुहम्मद शामिल. वी

मालियेक्कल, केरल

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