अरबी दिवस की महत्त्व: कब, क्यों और कैसे

परिचय

अरबी भाषा (Arabic Language) दुनिया की सबसे प्राचीन (Ancient) और प्रभावशाली (Influential) भाषाओं में से एक है। यह भाषा केवल संवाद (Communication) का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान (Knowledge), संस्कृति (Culture) और धार्मिक विरासत (Religious Heritage) की पहचान है। इस्लाम का पवित्र ग्रंथ (Holy Book) क़ुरआन मजीद अरबी भाषा में नाज़िल हुआ, जिससे इस भाषा को एक विशेष और सम्मानजनक स्थान प्राप्त हुआ। अरबी भाषा के माध्यम से ही इस्लामी शिक्षाओं, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक संदेशों को सही रूप में समझा जा सकता है। इतिहास गवाह है कि अरबी भाषा ने शिक्षा (Education), साहित्य (Literature), विज्ञान (Science) और दर्शन (Philosophy) के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी यह भाषा करोड़ों लोगों के दिलों और ज़िंदगियों से जुड़ी हुई है।
अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है:
﴿كِتَابٌ فُصِّلَتْ آيَاتُهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ﴾
यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें स्पष्ट की गई हैं, अरबी क़ुरआन के रूप में, उन लोगों के लिए जो ज्ञान रखते हैं। (सूरह फ़ुस्सिलत, 41:3)

यह आयत साफ़ बताती है कि अरबी भाषा स्पष्टता (Clarity) और समझ (Understanding) की भाषा है। इसी कारण अरबी दिवस (Arabic Language Day) मनाया जाता है, ताकि लोग इस भाषा की धार्मिक, शैक्षिक और वैश्विक (Global) अहमियत को पहचानें और इसे सीखने-समझने की ओर क़दम बढ़ाएँ।

 

अरबी भाषा क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

अरबी भाषा (Arabic Language) दुनिया की सबसे पुरानी, समृद्ध (Rich) और प्रभावशाली भाषाओं में से एक मानी जाती है। यह केवल बातचीत या लिखने-पढ़ने का साधन नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता (Civilization), संस्कृति और ज्ञान की पहचान है। इतिहास के अलग-अलग दौरों में अरबी भाषा ने ज्ञान को सँजोने और आगे पहुँचाने में बहुत अहम भूमिका निभाई है। साहित्य (Literature), दर्शन (Philosophy), विज्ञान (Science) और इतिहास (History) से जुड़ी कई महत्वपूर्ण किताबें अरबी में लिखी गईं, जिनका असर आज भी पूरी दुनिया में देखा जा सकता है। इसी वजह से अरबी भाषा को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि इल्म और तहज़ीब (Knowledge and Culture) की ज़िंदा विरासत कहा जाता है।
इस्लाम के संदर्भ में अरबी भाषा का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस्लामी शिक्षा (Islamic Education), विचार (Thought) और परंपराएँ इसी भाषा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे पहुँची हैं। अरबी भाषा को समझने से इस्लामी विचारों की गहराई, शब्दों की बारीकी और भावों की सच्चाई बेहतर तरीके से सामने आती है। केवल अनुवाद (Translation) पढ़ने से पूरी बात समझ में आ जाए, यह ज़रूरी नहीं होता, क्योंकि मूल भाषा (Original Text) में ही भाव और अर्थ पूरी तरह स्पष्ट होते हैं।

आज के समय में भी अरबी भाषा की अहमियत कम नहीं हुई है। यह भाषा शिक्षा, संस्कृति और रोज़गार (Employment Opportunities) के नए अवसर खोलती है। अरबी जानने वाले लोगों के लिए अध्ययन (Research), शोध और अंतरराष्ट्रीय संपर्क (International Communication) के रास्ते आसान हो जाते हैं। इसलिए अरबी भाषा को सीखना, समझना और आगे बढ़ाना न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि शैक्षिक और सामाजिक दृष्टि से भी बहुत आवश्यक है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने भी क़ुरआन और उसके ज्ञान को सीखने की बहुत अहमियत बताई है। आपने फ़रमाया:
«خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ»
तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और दूसरों को सिखाए। (Sahih al-Bukhari)

यह हदीस बताती है कि क़ुरआन सीखना और सिखाना सबसे बेहतरीन कामों में से है। चूँकि क़ुरआन अरबी भाषा में है, इसलिए अरबी को समझना इस नेक काम का अहम हिस्सा बन जाता है। इसी कारण अरबी भाषा को सीखना, उसका सम्मान करना और उसे आगे बढ़ाना बहुत ज़रूरी है।

अरबी दिवस कब मनाया जाता है? और इसका इतिहास (History of Arabic Language Day)

अरबी दिवस हर साल 18 दिसंबर (18 December) को मनाया जाता है। यह तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि 18 दिसंबर 1973 को संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations Organization – UNO) ने अरबी भाषा को अपनी आधिकारिक भाषा (Official Language) में शामिल किया। उसके बाद, यूनेस्को (UNESCO) ने इसे “विश्व अरबी भाषा दिवस” (World Arabic Language Day) घोषित किया।
इस फैसले से पता चलता है कि अरबी केवल एक स्थानीय भाषा नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर में संवाद (Communication), शिक्षा और संस्कृति का अहम हिस्सा है। अरबी भाषा का इतिहास बहुत पुराना और समृद्ध है। यह भाषा ज्ञान, साहित्य, विज्ञान और धार्मिक शिक्षा में बड़ी भूमिका निभाती रही है।
अरबी दिवस मनाने का मुख्य मकसद लोगों को यह याद दिलाना है कि अरबी भाषा की महत्ता, सांस्कृतिक (Cultural) और ऐतिहासिक (Historical) महत्व बहुत बड़ी है। यह दिन लोगों को अरबी सीखने और इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

 

क़ुरआन की रोशनी में अरबी भाषा की अहमियत (Importance of Arabic in the Quran)

अरबी भाषा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अल्लाह तआला ने अपना आख़िरी कलाम (Divine Revelation) क़ुरआन मजीद इसी भाषा में नाज़िल किया। अरबी भाषा का चुनाव सिर्फ़ भाषा के लिए नहीं, बल्कि संदेश की स्पष्टता  और समझ के लिए किया गया।
क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है:
﴿إِنَّا أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ﴾
निश्चय ही हमने इस क़ुरआन को अरबी भाषा में उतारा, ताकि तुम समझ सको। (Surah Yusuf, 12:2)

इस आयत से साफ़ पता चलता है कि क़ुरआन को समझने का सबसे अच्छा तरीका अरबी भाषा सीखना है। अरबी भाषा न केवल शब्दों का समूह है, बल्कि यह स्पष्ट, समृद्ध और गहरे अर्थों वाली भाषा है। अनुवाद सहायक हो सकते हैं, लेकिन उनका अर्थ कभी-कभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता।
अल्लाह तआला एक और जगह फ़रमाता है:
﴿بِلِسَانٍ عَرَبِيٍّ مُّبِينٍ﴾ — स्पष्ट अरबी भाषा में। (सूरह अश-शुअरा, 26:195)
यह आयत दिखाती है कि अरबी भाषा संदेश को पूरी तरह स्पष्ट रूप से पहुँचाने की क्षमता रखती है।

हदीसों की रोशनी में अरबी और इल्म की अहमियत (Hadiths on Arabic and Knowledge)

नबी करीम ﷺ ने ज्ञान (Knowledge) को बहुत ऊँचा दर्जा दिया है। आपने फरमाया:
«خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرآنَ وَعَلَّمَهُ»
तुममें सबसे अच्छा वह है जो क़ुरआन सीखे और दूसरों को सिखाए। (सहीह अल-बुख़ारी)
एक और हदीस में फरमाया:
«طَلَبُ الْعِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ»
ज्ञान हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है। (Sunan Ibn Majah)

यह हदीस बताती है कि ज्ञान और शिक्षा (Education) से दूर रहना इस्लाम में स्वीकार्य नहीं है। अरबी भाषा इस जिम्मेदारी को पूरा करने का एक मुख्य माध्यम (Medium) है, क्योंकि इस्लामी ज्ञान के मूल स्रोत—क़ुरआन, हदीस और तफ़सीर—अरबी में ही मौजूद हैं।

अरबी भाषा का धार्मिक और शैक्षिक महत्व (Religious and Educational Importance of Arabic)

अरबी भाषा इस्लामी शिक्षा (Islamic Education) की रीढ़ (Foundation) मानी जाती है। क़ुरआन, हदीस, तफ़सीर, फ़िक़्ह (Jurisprudence) और इस्लामी दर्शन (Islamic Philosophy) की हज़ारों किताबें अरबी में लिखी गई हैं।
जो छात्र अरबी जानते हैं, वे सीधे इन स्रोतों से ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसी कारण अरबी भाषा को दुनिया भर के मदरसों (Islamic Seminaries) और विश्वविद्यालयों (Universities) में अनिवार्य विषय (Core Subject) के रूप में पढ़ाया जाता है।

अरबी दिवस कैसे मनाया जाना चाहिए? (How to Celebrate Arabic Day)

अरबी दिवस केवल एक रस्मी दिन (Formal Day) नहीं होना चाहिए, बल्कि सीखने (Learning) और ज्ञान बढ़ाने (Knowledge Sharing) का अवसर बनना चाहिए।
कार्यक्रमों के उदाहरण:
· अरबी भाषण (Speech) और वाद-विवाद (Debate)
· क़ुरआन तिलावत (Recitation) और तफ़सीर सत्र
· अरबी निबंध प्रतियोगिता (Essay Competition)
· अरबी कैलिग्राफी प्रदर्शनी (Arabic Calligraphy Exhibition)
· अरबी भाषा पर संगोष्ठी (Seminar) और चर्चा (Discussion)

आधुनिक दौर में अरबी भाषा की उपयोगिता (Modern Relevance of Arabic Language)

आज अरबी भाषा एक International Language बन चुकी है। शिक्षा (Education), व्यापार (Trade), पत्रकारिता (Journalism), अनुवाद (Translation), और कूटनीति (Diplomacy) में इसका प्रभाव बढ़ रहा है।
सऊदी अरब के King Saud University और King Abdulaziz University, मिस्र के Al-Azhar University, तथा भारत के Aligarh Muslim University (AMU) और Jamia Millia Islamia (JMI) जैसे संस्थान अरबी शिक्षा का केंद्र हैं। अरबी सीखने वाले युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार (Career Opportunities) दोनों के नए रास्ते खुलते हैं।

अरबी भाषा और सामाजिक एकता (Arabic Language and Muslim Unity)

अरबी भाषा मुसलमानों को एक सूत्र (Bond) में बाँधती है। नमाज़, क़ुरआन की तिलावत और दुआ—ये सभी अरबी में होती हैं। यह साझा भाषा (Common Language) भावनात्मक और आध्यात्मिक एकता (Spiritual Unity) का माध्यम है।

निष्कर्ष (Conclusion)

अरबी दिवस केवल एक तारीख़ नहीं, बल्कि ज्ञान (Knowledge), पहचान (Identity) और एकता (Unity) का प्रतीक है।
क़ुरआन की शिक्षा और इस्लामी संस्कृति से जुड़ने के लिए अरबी का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
नबी करीम ﷺ ने फरमाया:
«طَلَبُ الْعِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ» — “Knowledge seeking is obligatory on every Muslim.”
अरबी भाषा सीखना इस फ़र्ज़ (Obligation) को निभाने का सशक्त माध्यम है।

संदर्भ:

  • सूरह यूसुफ,
  • सूरह ज़ुमर
  • सूरह ता-हा
  • सूरह अल-अलक़
  • इब्न कासीर, तफ़सीर अल-क़ुरआन – अरबी व्याख्या
  • सही बुख़ारी
  • सही मुस्लिम
  • अल-अज़हर विश्वविद्यालय, मिस्र
  • किंग सऊद विश्वविद्यालय, सऊदी अरब
  • किंग अब्दुलअज़ीज़ विश्वविद्यालय, सऊदी अरब
  • अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, भारत
  • जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली

लेखक:

रेहान आलम, ग्यारहवीं कक्षा, क़ुरतुबाकिशनगंजबिहार

 

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