अरावली पहाड़ियाँ: पर्यावरण, न्याय और मानव जीवन — एक इस्लामी दृष्टिकोण

भूमिका

अरावली पर्वतमाला भारत की आत्मा से जुड़ी हुई एक बहुत ही खास पर्वत श्रृंखला है। इसे केवल पत्थरों और चट्टानों का ढेर समझना एक बड़ी भूल होगी। यह पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर (kilometres) तक फैली हुई है और राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों से होकर गुजरती है।

भूवैज्ञानिकों (geologists) के अनुसार अरावली पर्वतमाला की उम्र लगभग 1.5 अरब वर्ष (billion years) है। इसी कारण इसे दुनिया की सबसे प्राचीन (ancient) पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है। यह पर्वतमाला न सिर्फ़ भौगोलिक महत्व रखती है, बल्कि भारत के प्राकृतिक और पर्यावरणीय इतिहास का भी एक अहम हिस्सा है।

अरावली केवल भौगोलिक संरचना (geographical structure) नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ (backbone of environmental balance) है। यह थार रेगिस्तान (Thar desert) के विस्तार को रोकती है, वर्षा जल को जमा करने में मदद करती है, भूजल स्तर (groundwater level) बनाए रखती है, वायु को शुद्ध करती है और जैव विविधता (biodiversity) को संरक्षण प्रदान करती है। दिल्ली-एनसीआर (NCR) जैसे ज़्यादा प्रदूषित क्षेत्रों के लिए अरावली एक प्राकृतिक फेफड़े (natural lungs) की तरह कार्य करती है।

इस्लाम की दृष्टि में प्रकृति अल्लाह की अमानत (Trust) है और उसकी निशानियों (Signs of Allah) में से है। मनुष्य को पृथ्वी पर खलीफा (Steward/Guardian) बनाया गया है, अर्थात उसे प्रकृति का उपयोग करने का अधिकार तो है, लेकिन उसे नष्ट करने की अनुमति नहीं है।

कुरआन स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देता है:

وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا

“धरती में सुधार के बाद फसाद (नुकसान) मत फैलाओ।”

(सूरह अल-आराफ: 56)

आज अरावली का जो तेज़ी से विनाश (destruction) हो रहा है, वह इसी ‘फ़साद’ (فَسَادٌ – corruption / बिगाड़) का साफ़ उदाहरण है, जिसका ज़िक्र इस्लामी शिक्षाओं में किया गया है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक संतुलन को बिगाड़ना है।

यह लेख अरावली पहाड़ियों के पर्यावरणीय महत्व (environmental importance), उनके विनाश से होने वाले दुष्परिणाम (bad effects), संरक्षण से मिलने वाले लाभ (benefits), न्यायिक हस्तक्षेप (judicial intervention) और इस्लाम के संतुलन के सिद्धांत (principle of balance / mīzān – مِيزَان) की रोशनी में एक समग्र (comprehensive) और प्रभावशाली विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

अरावली पहाड़ियों का पर्यावरणीय और मानवीय महत्व (The environmental and human significance of the Aravalli hills)

अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच (natural shield) की तरह है। यह थार रेगिस्तान (Thar Desert) को पूर्व दिशा में फैलने से रोकती है। अगर अरावली नष्ट हो गई, तो हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे रेगिस्तानी हालात (desert conditions) में बदल सकता है। इसलिए अरावली का संरक्षण पूरे क्षेत्र की जलवायु (climate) और जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है।

प्रकृति अल्लाह की निशानी के रूप में (Nature as the sign of Allah)

इस्लाम में प्रकृति को अल्लाह की आयत माना गया है। कुरआन में फरमाया गया:

وَجَعَلْنَا السَّمَاءَ سَقْفًا مَحْفُوظًا وَهُمْ عَنْ آيَاتِهَا مُعْرِضُونَ

"और हमने आकाश को एक सुरक्षित छत बनाया, लेकिन वे उसकी निशानियों से मुंह फेरते हैं।"

— (सूरह अल-अंबिया: 32)

यह आयत ओजोन परत जैसी प्राकृतिक सुरक्षा पर जोर देती है, जो पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। अरावली जैसी प्राकृतिक संरचनाएं अल्लाह की निशानियां हैं, जिन्हें संरक्षित रखना धार्मिक कर्तव्य है।

 जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण (Water conservation and groundwater recharge)

अरावली की चट्टानें बरसात के पानी को धीरे-धीरे अवशोषित (absorb) करती हैं और उससे भूजल (groundwater) का स्तर दोबारा भरता है। इसी वजह से अरावली क्षेत्र में कई नदियाँ, झीलें और जलस्रोत (water sources) विकसित होते हैं।

दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) की जल सुरक्षा (water security) सीधे तौर पर अरावली से जुड़ी हुई है। अगर अरावली सुरक्षित रहेगी, तो पानी की उपलब्धता भी बनी

कुरआन जल को जीवन का आधार बताता है:

وَجَعَلْنَا مِنَ الْمَاءِ كُلَّ شَيْءٍ حَيٍّ

“और हमने हर जीवित चीज़ को पानी से पैदा किया।” (सूरह अल-अंबिया: 30)

 वायु शुद्धिकरण और जलवायु संतुलन (Air purification and climate balance)

अरावली के जंगल कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) को अपने अंदर समाहित कर ऑक्सीजन (oxygen) देते हैं, जिससे हवा साफ़ रहती है। माना जाता है कि अरावली क्षेत्र में करोड़ों टन कार्बन (carbon storage) जमा है, जो जलवायु परिवर्तन (climate change) से लड़ने में मदद करता है। इसी वजह से अरावली उत्तर भारत के मौसम संतुलन (climate balance) के लिए बहुत ज़रूरी है।

 जैव विविधता का संरक्षण (Biodiversity conservation)

अरावली क्षेत्र सैकड़ों तरह के पेड़-पौधों (plants), पक्षियों (birds) और वन्यजीवों (wildlife) का प्राकृतिक घर है। यहाँ तेंदुआ, सियार, नीलगाय और सांभर जैसे कई जीव पाए जाते हैं।

इस जैव विविधता (biodiversity) का नष्ट होना केवल एक पर्यावरणीय नुकसान (environmental loss) नहीं है, बल्कि एक नैतिक अपराध (moral wrong) भी है, क्योंकि इससे प्रकृति का संतुलन और आने वाली पीढ़ियों का हक़ प्रभावित होता है।

इस्लाम में केवल इंसानों ही नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं (animals) के अधिकारों को भी पूरी मान्यता दी गई है। नबी मुहम्मद ﷺ ने जानवरों के साथ दया (kindness) और अच्छे व्यवहार (good treatment) का आदेश दिया है और उन पर किसी भी तरह के अत्याचार (cruelty) को सख़्ती से मना किया है।

इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार जानवरों को तकलीफ़ देना एक नैतिक गलती (moral wrong) है, और उनके साथ रहम करना ईमान का हिस्सा माना गया है।

इस्लामी दृष्टिकोण में प्रकृति और मानव की जिम्मेदारी (Nature and human responsibility from an Islamic perspective)

इस्लाम प्रकृति को सिर्फ़ इस्तेमाल करने की संसाधन (resource) नहीं मानता, बल्कि उसे अल्लाह की आयत (آية – sign) समझता है। क़ुरआन बार-बार इंसान को यह सोचने और समझने के लिए प्रेरित करता है कि प्रकृति में अल्लाह की क़ुदरत (power) और हिकमत (wisdom) साफ़ दिखाई देती है।

इसलिए इस्लाम में पेड़-पौधे, पहाड़, नदियाँ और जानवर —इंसान के लिए चिंतन (reflection) और ज़िम्मेदारी (responsibility) का विषय हैं, न कि अंधाधुंध शोषण का।

पैगंबर मुहम्मद ﷺ फरमाते हैं:

إِنَّ الدُّنْيَا حُلْوَةٌ خَضِرَةٌ وَإِنَّ اللَّهَ مُسْتَخْلِفُكُمْ فِيهَا فَيَنْظُرُ كَيْفَ تَعْمَلُونَ

"दुनिया मीठी और हरी-भरी है, और अल्लाह ने तुम्हें उसका खलीफा बनाया है, ताकि वह देखे कि तुम कैसे अमल करते हो।"— सहीह मुस्लिम

यह हदीस स्पष्ट करती है कि मनुष्य मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक है। अरावली को नष्ट करना इस अमानत में खयानत के समान है।

अरावली के विनाश के गंभीर दुष्परिणाम (Serious consequences of the destruction of the Aravali)

1. मरुस्थलीकरण और जल संकट (Desertification & Water Crisis)

अवैध खनन (illegal mining) और जंगलों की कटाई (deforestation) के कारण अरावली का प्राकृतिक ढांचा टूट रहा है। इससे बरसात का पानी तेज़ी से बह जाता है और भूजल (groundwater) दोबारा नहीं भर पाता। नतीजा यह होता है कि इलाके में पानी की भारी कमी (water shortage) पैदा हो जाती है और ज़मीन धीरे-धीरे रेगिस्तान जैसी बनती चली जाती है।

2. बढ़ता प्रदूषण और तापमान (Pollution & Rising Temperature)

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण (pollution) का एक बड़ा कारण अरावली का क्षरण है। ये पहाड़ियाँ धूल, गर्म हवाओं और ज़हरीली गैसों को रोकने का काम करती हैं। जब अरावली नष्ट होती है, तो हीट वेव्स (heat waves) बढ़ जाती हैं और तापमान लगातार ऊपर जाने लगता है।

3. मानव जीवन पर प्रभाव (Impact on Human Life)

अरावली के विनाश का सबसे ज़्यादा असर गरीबों, किसानों और मज़दूरों पर पड़ता है। पानी की कमी से खेती को नुकसान होता है, रोज़गार घटता है और स्वास्थ्य समस्याएँ (health problems) बढ़ जाती हैं। इस तरह अरावली का नुकसान सीधे इंसानी जीवन और आजीविका को प्रभावित करता है। यह हदीस पर्यावरणीय नुकसान को जुल्म बताती है।

अरावली पहाड़ियों को नष्ट करने के नुकसान

अरावली को नष्ट करने से गंभीर परिणाम होंगे। अवैध खनन, शहरीकरण और जंगल कटाई से पानी की कमी, बढ़ता तापमान, वायु प्रदूषण और वन्यजीवों का विस्थापन हो रहा है। हाल के अध्ययनों के अनुसार, राजस्थान में अरावली के 90% से अधिक क्षेत्रों को 100 मीटर से कम ऊंचाई वाला माना गया है, जिससे खनन बढ़ सकता है। इससे दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण और बदतर होगा, और मरुस्थलीकरण तेज होगा।

इस्लाम में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना जुल्म है। कुरआन में फरमाया:

وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِي الْأَرْضِ لِيُفْسِدَ فِيهَا وَيُهْلِكَ الْحَرْثَ وَالنَّسْلَ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الْفَسَادَ

"और जब वह (सत्ता में) आता है, तो धरती में फसाद फैलाने और फसलें और नस्लें नष्ट करने की कोशिश करता है, और अल्लाह फसाद को पसंद नहीं करता।" — (सूरह अल-बकरा: 205)

यह आयत पर्यावरणीय विनाश को फसाद मानती है। नबी ﷺ ने फरमाया:

لَا ضَرَرَ وَلَا ضِرَارَ

"न खुद नुकसान पहुंचाओ और न दूसरों को नुकसान पहुंचाओ।"

— (सुनेन इब्ने माजा)

यह हदीस पर्यावरणीय नुकसान को जुल्म बताती है।

एक अन्य हदीस में:

إِنْ قَامَتِ السَّاعَةُ وَفِي يَدِ أَحَدِكُمْ فَسِيلَةٌ فَإِنِ اسْتَطَاعَ أَلَّا تَقُومَ حَتَّى يَغْرِسَهَا فَلْيَغْرِسْهَا

"अगर कयामत आ जाए और तुम्हारे हाथ में एक पौधा हो, तो अगर संभव हो तो उसे लगा दो।"

— (मुस्नद अहमद)

यह हदीस पर्यावरण संरक्षण की तात्कालिकता पर जोर देती है, भले ही अंत समय हो। अरावली के नष्ट होने से लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होगा, जो इस्लामी न्याय के विपरीत है। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना सामूहिक नुकसान है, जो इस हदीस के सीधे विरुद्ध है।

अरावली संरक्षण: इस्लाम में सदका और सामाजिक न्याय (Aravalli Conservation: Charity and Social Justice in Islam)

इस्लाम में पर्यावरण संरक्षण को सदका जारिया माना गया है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ फरमाते हैं

مَا مِنْ مُسْلِمٍ يَغْرِسُ غَرْسًا إِلاَّ كَانَ مَا أُكِلَ مِنْهُ لَهُ صَدَقَةٌ وَمَا سُرِقَ مِنْهُ لَهُ صَدَقَةٌ وَمَا أَكَلَ السَّبُعُ مِنْهُ فَهُوَ لَهُ صَدَقَةٌ وَمَا أَكَلَتِ الطَّيْرُ فَهُوَ لَهُ صَدَقَةً وَلاَ يَرْزَؤُهُ أَحَدٌ إِلاَّ كَانَ لَهُ صَدَقَةٌ

“कोई भी मुसलमान जो कोई पौधा लगाता है, तो उससे जो कुछ भी खाया जाता है वह उसके लिए सदक़ा होता है; और जो कुछ उससे चोरी किया जाए वह भी उसके लिए सदक़ा है;

और जो कुछ उसे कोई जंगली जानवर खा जाए, वह भी उसके लिए सदक़ा है;

और जो कुछ उससे पक्षी खा लें, वह भी उसके लिए सदक़ा है;

और उससे जो कुछ भी किसी द्वारा कम किया जाए, वह भी उसके लिए सदक़ा ही होता है।”

— (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

अरावली का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा भी है। इस्लाम संसाधनों को सामूहिक धरोहर (heritage) मानता है।

पैगंबर मुहम्मद ﷺ फरमाते हैं:

الْمُسْلِمُونَ شُرَكَاءُ فِي ثَلَاثٍ: الْمَاءِ وَالْكَلَإِ وَالنَّارِ

“मुसलमान पानी, घास और आग में साझेदार हैं।”— सुनेन अबू दाऊद

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उस पर विचार (The Supreme Court's decision and reflections on it)

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली की परिभाषा तय की, जिसमें 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना गया। इससे राजस्थान में 12,081 में से केवल 1,048 पहाड़ियां संरक्षित रहेंगी, जिससे खनन बढ़ सकता है। हालांकि, 29 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने इस फैसले को स्थगित कर दिया और एक विशेषज्ञ समिति गठित की। फैसले का उद्देश्य अवैध खनन रोकना था, लेकिन इससे गरीब मजदूरों, किसानों और बसे लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है।

अरावली से जुड़े न्यायालयी निर्णय (judicial decisions) का मक़सद मुख्य रूप से पर्यावरण संरक्षण (environmental protection) है, ताकि प्रकृति को होने वाले नुकसान को रोका जा सके। लेकिन इस्लाम यह भी सिखाता है कि संरक्षण के साथ-साथ मानव गरिमा (human dignity) और लोगों की आजीविका (livelihood) की हिफ़ाज़त भी ज़रूरी है।

इस्लाम में नरमी और संतुलन महत्वपूर्ण है। नबी ﷺ ने फरमाया:

إِنَّ اللَّهَ رَفِيقٌ يُحِبُّ الرِّفْقَ فِي الْأَمْرِ كُلِّهِ

"अल्लाह नरमी को पसंद करता है और हर काम में नरमी को पसंद करता है।"

— (सहीह बुखारी)

यह हदीस बताती है कि पर्यावरण संरक्षण में मानवीय जीवन का ध्यान रखना जरूरी है। कुरआन में:

إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ

"अल्लाह न्याय और नेकी का आदेश देता है।"

— (सूरह अन-नह्ल: 90)

इसका अर्थ है कि संरक्षण नीतियाँ न्यायपूर्ण, मानवीय और संतुलित होनी चाहिए।

इस्लाम का “उम्मत-ए-वसत” का सिद्धांत (Islam's principle of "Ummah-e-Wasat" (the moderate community))

इस्लाम न अतिवाद सिखाता है और न लापरवाही। कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَاكُمْ أُمَّةً وَسَطًا

“हमने तुम्हें संतुलित उम्मत बनाया।”— सूरह अल-बकरा: 143

अरावली के संरक्षण में भी यही संतुलन (balance) ज़रूरी है—प्रकृति की रक्षा (nature protection) और मानव जीवन की गरिमा (human dignity), दोनों एक-दूसरे के साथ चलें और किसी एक की क़ीमत पर दूसरे को नुकसान न पहुँचे।

निष्कर्ष

अरावली पहाड़ियाँ सिर्फ़ एक भौगोलिक संरचना (geographical structure) नहीं हैं, बल्कि जीवन (life), पानी (water), हवा (air) और हमारे भविष्य (future) की रक्षक हैं। इनका संरक्षण केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की राष्ट्रीय (national), नैतिक (moral) और धार्मिक (religious) ज़िम्मेदारी है।

इस्लाम हमें सिखाता है कि धरती के संसाधन अमानत (amānah – أَمَانَةٌ) हैं। इंसान को उनका उपयोग विवेकपूर्ण (wise / balanced) तरीके से करना चाहिए, न कि विनाशकारी (destructive) ढंग से। प्रकृति की हिफ़ाज़त करना दरअसल आने वाली पीढ़ियों के हक़ की रक्षा करना है।

और कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

كُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا

“खाओ और पीओ, लेकिन फिजूलखर्ची मत करो।” — (सूरह अल-आराफ: 31)

अरावली की रक्षा करना असल में इंसानियत (humanity) की रक्षा करना है। अगर हम आज संतुलित (balanced), न्यायपूर्ण (just) और नैतिक (ethical) दृष्टिकोण नहीं अपनाते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।

इस्लामी दृष्टिकोण से अरावली का संरक्षण न्यायपूर्ण विकास (just development), पर्यावरणीय संतुलन (environmental balance / मीज़ान – مِيزَان) और मानव गरिमा (human dignity)—इन तीनों का सुंदर संगम है। यही वह रास्ता है जो धरती को भी सुरक्षित रखता है और इंसान को भी सम्मान के साथ जीने का हक़ देता है।

(संदर्भ)

• सूरह अल-आराफ (7:56)

• सूरह अर-रूम (30:41)

• सूरह अल-अंबिया (21:30)

• सूरह अल-अंबिया (21:32)

• सूरह अल-बकरा (2:143)

• सूरह अल-बकरा (2:205)

• सूरह अन-नह्ल (16:90)

• सूरह अल-इसरा (17:29)

• सूरह अल-आराफ (7:31)

• सहीह मुस्लिम

• सहीह बुखारी

• सुनेन इब्ने माजा

• सुनेन अबू दाऊद

• मुस्नद अहमद

लेखक:

शबाब राही, कक्षा:11 का छात्र, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज बिहार

Disclaimer

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