जिहाद की संकल्पना: इस्लाम की एक सही समझ
परिचय
जिहाद शब्द क़ुरआन (Qur’an) और पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की शिक्षाओं से आया है। मुस्लिम उलेमा के अनुसार जिहाद हर मुसलमान का एक महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य है। कुछ विद्वान इसे प्रतीक रूप में “इस्लाम का छठा स्तंभ” (sixth pillar of Islam) भी कहते हैं। इस्लाम में जिहाद का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति (peace), नैतिकता (morality) और न्याय (justice) को बनाए रखना है।
लेकिन पश्चिमी देशों (Western countries) में जिहाद को अक्सर आतंकवाद (terrorism) से जोड़कर देखा जाता है और इसे दुनिया की सुरक्षा (global security) के लिए ख़तरा माना जाता है। यह गलत समझ इसलिए फैली क्योंकि कुछ लोगों और समूहों ने इस्लाम के नाम पर हिंसा (violence) की, जबकि उनके काम इस्लाम की असली शिक्षाओं (true teachings of Islam) के ख़िलाफ़ थे। इसी वजह से जिहाद का सही अर्थ आम लोगों तक नहीं पहुँच सका।
जिहाद का अर्थ
अधिकतर लोग जिहाद को मात्र लड़ाई या हिंसा (violence) समझ लेते हैं, जबकि असल में जिहाद का अर्थ बहुत व्यापक (broader) और शांतिपूर्ण (peaceful) है। इस्लाम में जिहाद का मतलब है अच्छाई के लिए लगातार प्रयास (struggle/effort) करना और बुराई (evil) से लड़ना।
एक नज़रिए से जिहाद का अर्थ इस्लाम की रक्षा (defence of Islam) करना और समाज में सुधार (social reform) लाना है। दूसरी नज़रिए से जिहाद अपने भीतर सुधार (self-reform) लाने का नाम है—यानी अपने बुरे विचारों, गलत आदतों और गलत कामों से संघर्ष (inner struggle) करना। इसलिए जिहाद केवल युद्ध (war) नहीं है, बल्कि आत्म-सुधार (self-improvement) और समाज सुधार की लगातार कोशिश है।
जिहाद की भाषा और धार्मिक आधार
“जिहाद” शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘जहदा’ से बना है, जिसका अर्थ है, पूरी कोशिश करना या पूरी मेहनत करना। “जिहाद” शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘जहदा’ (جَهَدَ) से बना है, जिसका मतलब है पूरी कोशिश या पूरी मेहनत करना।
इस्लाम में जिहाद का अर्थ सिर्फ़ युद्ध (war) नहीं है। सबसे पहला और सबसे अहम जिहाद है अपने नफ़्स (self/desires) यानी अपनी बुरी इच्छाओं (bad desires) के ख़िलाफ़ संघर्ष करना। इसे जिहाद-अल-नफ़्स (Jihad al-Nafs / inner struggle) कहा जाता है।
इसके अलावा, जब किसी समुदाय पर ज़ुल्म होता है या उस पर हमला किया जाता है, तब अपनी रक्षा (self-defence) करना भी जिहाद के दायरे में आता है।
इस्लाम साफ़ तौर पर कहता है कि सशस्त्र जिहाद (armed jihad) कभी भी बिना वजह हिंसा नहीं हो सकता। इसमें निर्दोष लोगों (innocent people), महिलाओं, बच्चों और आम नागरिकों (civilians) की सुरक्षा ज़रूरी है। साथ ही अच्छाई फैलाना, बुराई रोकना और पीड़ितों (victims) की मददकरना भी जिहाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जिहाद के प्रकार
इस्लाम में जिहाद एक बहुत व्यापक (broad) और बहुआयामी (multi-dimensional) विचार (concept) है। इसे केवल युद्ध (war) या हिंसा (violence) तक सीमित कर देना इस्लामी शिक्षाओं की अधूरी और ग़लत समझ है। जिहाद का मूल उद्देश्य (basic purpose) इंसान और समाज को नैतिक (moral), आध्यात्मिक (spiritual) और सामाजिक (social) रूप से बेहतर बनाना है।
इस्लामी उलेमा ने जिहाद को मुख्य रूप से दो बड़ी श्रेणियों (categories) में बाँटा है: महान जिहाद (Greater Jihad) और लघु जिहाद (Lesser Jihad)। इस विभाजन (classification) का मकसद यह साफ़ करना है कि इस्लाम में जिहाद का केंद्र (focus) युद्ध नहीं, बल्कि नैतिक संघर्ष (moral struggle) है।
महान जिहाद (Greater Jihad)
महान जिहाद (जिहाद-ए-अकबर / Greater Jihad) इस्लाम में जिहाद का सबसे ऊँचा और सबसे महत्वपूर्ण रूप माना जाता है। इसका संबंध किसी बाहरी दुश्मन (external enemy) से नहीं, बल्कि इंसान के अपने भीतर चलने वाले संघर्ष (inner struggle) से है।
यह वह जिहाद है जिसमें इंसान अपने नफ़्स (self / inner desires)—जैसे लालच (greed), घमंड (ego/pride), क्रोध (anger), ईर्ष्या (jealousy) और गलत इच्छाओं (wrong desires)—पर काबू पाने की कोशिश करता है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ से जुड़ी परंपराओं में यह बात साफ़ तौर पर बताई गई है कि अपने नफ़्स के ख़िलाफ़ संघर्ष करना ही सबसे बड़ा जिहाद (greatest jihad) है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने जिहाद के इस पक्ष पर विशेष ज़ोर दिया है। फ़दाला बिन उबैद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
الْمُجَاهِدُ مَنْ جَاهَدَ نَفْسَه
“वास्तविक मुजाहिद वही है, जो अपने ही नफ़्स (आत्मा/इच्छाओं) के विरुद्ध संघर्ष करता है।” (मिश्कात अल मसाबीह)
इसका मतलब यह है कि व्यक्ति अपने चरित्र को बेहतर बनाए, अपने व्यवहार (behaviour) को नैतिक (moral) बनाए और अपने जीवन को न्यायपूर्ण (just) तरीके से जीने की लगातार (continuous) कोशिश करे।
महान जिहाद (Greater Jihad) का स्वरूप शांतिपूर्ण (peaceful), निरंतर (ongoing) और पूरे जीवन (lifelong) चलने वाला होता है।
इसी प्रकार, इब्न रजब़ (Ibn Rajab) ने इब्राहीम बिन अबी अल्क़मा का एक कथन बयान किया है। जब वे एक सैन्य अभियान (military expedition) से लौटे, तो उन्होंने अपने साथियों से कहा:
وِ قَدْ جِئْتُمْ مِنَ الْجِهَادِ الْأَصْغَرِ فَمَا فَعَلْتُمْ فِي الْجِهَادِ الْأَكْبَرِ
“तुम लोग छोटे जिहाद से लौट आए हो, तो बड़े जिहाद के बारे में तुमने क्या किया?”
साथियों ने पूछा, “बड़ा जिहाद क्या है?”
उन्होंने उत्तर दिया:
جِهَادُ الْقَلْبِ
“यह दिल का जिहाद है।”
अर्थात, मन और हृदय की बुराइयों के विरुद्ध किया गया आंतरिक संघर्ष (inner struggle) ही सबसे महान जिहाद है। यही जिहाद व्यक्ति को एक अच्छा इंसान और समाज को एक बेहतर स्थान बनाता है।
लघु जिहाद/ जिहाद-ए-असगर (Lesser Jihad)
लघु जिहाद (जिहाद-ए-असगर / Lesser Jihad) का संबंध बाहरी परिस्थितियों (external situations) से होता है और यह केवल कुछ विशेष और सीमित हालात (specific and limited situations) में ही लागू होता है। आम तौर पर इसे सशस्त्र संघर्ष (armed struggle) से जोड़ा जाता है, लेकिन इस्लाम में इसे कभी भी पहला विकल्प (first option) नहीं माना गया है।
लघु जिहाद का उद्देश्य युद्ध (war) करना नहीं, बल्कि आत्मरक्षा (self-defence) करना, अत्याचार (oppression) और ज़ुल्म (injustice) को रोकना, और निर्दोष लोगों की रक्षा करना है।
इस्लाम साफ़ तौर पर यह बताता है कि युद्ध अपने आप में कोई आदर्श (ideal) नहीं है, बल्कि एक अंतिम उपाय (last resort) है—जब शांति (peace) के सभी रास्ते बंद हो जाएँ।
लघु जिहाद व्यक्तिगत इच्छा से नहीं, बल्कि वैध नेतृत्व और सामूहिक निर्णय के अंतर्गत ही किया जा सकता है। इसमें अराजकता, आतंक या निजी हिंसा की कोई अनुमति नहीं है।
सशस्त्र जिहाद की शर्तें
इस्लाम में सशस्त्र जिहाद (armed jihad) को बहुत सख़्त नैतिक और क़ानूनी शर्तों के साथ जोड़ा गया है। इसे बिना कारण, बिना नियम और बिना ज़िम्मेदारी के कभी भी वैध नहीं ठहराया गया है।
सशस्त्र जिहाद केवल उन्हीं परिस्थितियों में जायज़ माना गया है, जब:
- किसी समुदाय पर सीधा और अन्यायपूर्ण हमला हो
क़ुरआन इस संदर्भ में अनुमति देते हुए यह आदेश देता है:
أُذِنَ لِلَّذِينَ يُقَاتَلُونَ بِأَنَّهُمْ ظُلِمُوا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ نَصْرِهِمْ لَقَدِيرٌ
“जिन लोगों के विरुद्ध युद्ध किया जा रहा है, उन्हें आत्म-रक्षा (self-defence) की अनुमति दी जाती है, क्योंकि उन पर अत्याचार (oppression) किया गया है। और निस्संदेह अल्लाह उनकी सहायता करने पर पूर्ण रूप से समर्थ है।” (सूरह अल-हज्ज, आयत 39)
इस आयत से साफ़ होता है कि युद्ध की अनुमति अन्याय (injustice) और उत्पीड़न (oppression) के प्रतिकार (response) के रूप में दी गई है, न कि आक्रमण (aggression) या अत्याचार (violence) के लिए।
- लोगों को अपने धर्म और जीवन की स्वतंत्रता से वंचित किया जा रहा हो
क़ुरआन इस संदर्भ में अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक ज़िम्मेदारी को स्पष्ट करता है:
وَمَا لَكُمْ لَا تُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ الَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْ هَذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ أَهْلُهَا وَاجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ وَلِيًّا وَاجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ نَصِيرًا
तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह के मार्ग में और उन दबे-कुचले पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के लिए संघर्ष नहीं करते, जो पुकार कर कहते हैं ‘ऐ हमारे रब! हमें इस बस्ती से निकाल ले, जिसके रहने वाले ज़ालिम हैं; और अपनी ओर से हमारे लिए कोई संरक्षक नियुक्त कर दे, और अपनी ओर से हमारे लिए कोई सहायक प्रदान कर। (सूरह अन-निसा, आयत 75)
- निर्दोष लोगों पर निरंतर अत्याचार हो रहा हो
इन परिस्थितियों में भी इस्लाम ने युद्ध के लिए स्पष्ट नैतिक सीमाएँ तय की हैं:
- महिलाओं, बच्चों, बुज़ुर्गों और आम नागरिकों को नुकसान न पहुँचाया जाए
- केवल हमलावरों से ही संघर्ष किया जाए
- यदि शत्रु शांति की पहल करे, तो शांति को स्वीकार किया जाए
- युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए
ये शर्तें इस बात को साफ़ तौर पर साबित करती हैं कि इस्लाम में युद्ध भी नैतिक अनुशासन (moral discipline) और नियमों के अधीन है।
आधुनिक संदर्भ में जिहाद (Jihad in the Modern Context)
जिहाद का शास्त्रीय (classical) अर्थ अल्लाह के रास्ते में लगातार कोशिश और संघर्ष करना है। आधुनिक दौर (modern era) में इसके अर्थ और प्रयोग में साफ़ तौर पर विकास और विस्तार देखने को मिलता है।
पारंपरिक इस्लामी आस्था (traditional Islamic belief) के अनुसार जिहाद एक व्यापक (broad) धार्मिक दायित्व (religious duty) है, जिसमें आत्मिक शुद्धि (spiritual purification), सामाजिक सुधार (social reform) और नैतिक ज़िम्मेदारी (moral responsibility) शामिल होती है। वहीं सशस्त्र संघर्ष (armed struggle) को इस्लाम ने सख़्त नियमों (strict rules) के तहत केवल आत्मरक्षा (self-defence) की परिस्थितियों तक सीमित रखा है, और वह भी वैध क़ानूनी (legal) तथा धार्मिक अधिकार (religious authority) के अधीन ही स्वीकार्य माना गया है।
आज के समय में मुसलमानों के सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि वे आधुनिक राष्ट्र-व्यवस्था (modern nation-state system), अंतरराष्ट्रीय क़ानून (international law) और उग्रवादी विचारधाराओं (extremist ideologies) के फैलाव के बीच जिहाद की सही व्याख्या (correct interpretation) करें और उसे नैतिक (ethical), संतुलित (balanced) और ज़िम्मेदार (responsible) रूप में अपनाएँ।
आज के समय में जिहाद का पालन
- आध्यात्मिक और नैतिक जिहाद (Spiritual and Moral Jihad)
आधुनिक इस्लामी विद्वानों (modern Islamic scholars) का बड़ा वर्ग (majority) “महान जिहाद” (Greater Jihad) पर विशेष ज़ोर देता है। इसका अर्थ है इंसान का अपने नफ़्स (self / inner desires)—यानी अपनी नीची इच्छाओं (low desires) और बुरी प्रवृत्तियों (negative tendencies)—के ख़िलाफ़ संघर्ष (inner struggle) करना, और नैतिक उत्कृष्टता (moral excellence) तथा सामाजिक न्याय (social justice) की दिशा में लगातार (continuous) प्रयास करना।
यह जिहाद शांतिपूर्ण (peaceful) तरीक़ों से सामने आता है, जैसे—शिक्षा का प्रसार (spread of education), दान और सेवा (charity and service), सामुदायिक कार्य (community work) और नैतिक आचरण (ethical conduct) को बढ़ावा देना।
इसमें आत्म-संयम (self-control), धैर्य (patience) और रोज़मर्रा के जीवन (daily life) में इस्लामी सिद्धांतों (Islamic principles) के पालन पर विशेष ध्यान (emphasis) दिया जाता है।
- सामाजिक और वाचिक जिहाद (Social and Verbal Jihad)
आज के दौर में जिहाद का एक अहम रूप सामाजिक न्याय (social justice) और मानवाधिकारों (human rights) के लिए आवाज़ उठाना, बौद्धिक सहभागिता (intellectual engagement) करना, और संवाद (dialogue) व शिक्षा (education) के ज़रिए धर्म की शांतिपूर्ण (peaceful) प्रस्तुति (presentation) करना है।
मुसलमानों को यह सिखाया गया है कि वे सामाजिक बुराइयों को चुनौती दें और शोषित (oppressed) व पीड़ित वर्गों का समर्थन करें, लेकिन यह सब क़ानूनी (legal) और अहिंसक (non-violent) तरीक़ों से होना चाहिए। यह दृष्टिकोण इस्लामी क़ानून की उस शास्त्रीय सीमा (classical framework) के अनुरूप है, जिसमें आत्मरक्षा (self-defence) के अलावा किसी भी तरह की आक्रामकता (aggression) और हिंसा (violence) को साफ़ तौर पर निषिद्ध (prohibited) बताया गया है।
निष्कर्ष
इस्लाम में जिहाद हर मुसलमान पर एक अनिवार्य धार्मिक दायित्व (religious duty) है। इसे मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है।
पहला है महान जिहाद (Greater Jihad), जिसमें व्यक्ति अपने नफ़्स (self / inner desires) की शुद्धि करता है, अपने चरित्र (character) को बेहतर बनाता है और अल्लाह की इबादत (worship) व आज्ञापालन (obedience) में जीवन गुज़ारता है। दूसरा है लघु जिहाद (Lesser Jihad), जो केवल अत्याचार और आक्रमण के ख़िलाफ़ आख़िरी उपाय के रूप में, बहुत सख़्त शर्तों और नियमों के तहत ही स्वीकार्य है।जब युद्ध अनिवार्य हो जाता है, तो इस्लाम उसमें भी साफ़ नैतिक नियम तय करता है, ताकि न्याय बना रहे और निर्दोष लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
जिहाद का आतंकवाद (terrorism) से कोई संबंध नहीं है, बल्कि जिहाद आतंकवाद के बिल्कुल विपरीत (opposite) है। इस्लाम हर तरह की आतंकी हिंसा (terrorist violence) की साफ़ और सख़्त निंदा करता है। दुर्भाग्यवश कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों (personal interests) को पूरा करने के लिए जिहाद के नाम का दुरुपयोग करते हैं, जिससे इसके असली अर्थ को लेकर समाज में कई ग़लतफ़हमियाँ फैल गई हैं।
REFERENCE
- Jihad in Islam Context, Meaning, and Peaceful Struggle
- Jihad Holy or Unholy War
- The Concept of Jihad in Islam Its True Meaning
- The Concept of Jihad In Islam, Ramlan TengkuErwinsyahbana Nurul Hakim
- BBC - Religions - Islam_ Jihad
लेखक:
गुल मुहम्मद वर्तमान में क़ुर्तुबा लीडर्स अकादमी में कक्षा 11 के छात्र हैं।
Disclaimer
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