गवाही में दो महिलाओं की गवाही एक पुरुष के बराबर क्यों?
प्रस्तावना
जब भी इस्लामी क़ानून (शरीअत) और मानवाधिकारों की बात आती है, तो गवाही से जुड़ा यह सवाल अक्सर चर्चा में आता है। सूरह अल-बक़राह की आयत नंबर 282 को आधार बनाकर समाज में कई तरह की शंकाएँ और गलतफ़हमियाँ पैदा की जाती हैं। आम तौर पर लोग यह समझ लेते हैं कि शायद इस्लाम महिला की बुद्धि (Intelligence), क्षमता (Ability) या उसके अस्तित्व (Existence) को पुरुष की तुलना में आधा या कमतर मानता है।
लेकिन अगर हम क़ुरआन मजीद की आयतों, नबी करीम ﷺ की अहादीस, इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह Jurisprudence) और उस दौर के सामाजिक व कानूनी संदर्भ को निष्पक्षता और गहराई से समझें, तो यह सच्चाई पूरी तरह साफ़ हो जाती है कि यह नियम महिला के प्रति किसी भेदभाव या अपमान के लिए नहीं, बल्कि न्याय की सटीकता (Accuracy of Justice) और महिला की सुरक्षा (Security) के लिए बनाया गया एक व्यावहारिक इंतज़ाम (Practical & Protective Provision) है।
क़ुरआनी संदर्भ: यह नियम किस क्षेत्र से जुड़ा है?
सबसे पहले इस बुनियादी भ्रम को दूर करना ज़रूरी है कि दो महिलाओं की गवाही का नियम जीवन के हर क्षेत्र या हर तरह के मुक़दमों (जैसे आपराधिक, सामाजिक या पारिवारिक मामलों) के लिए कोई आम या सर्वव्यापी (Universal) नियम नहीं है।
क़ुरआन मजीद में यह आदेश केवल और केवल वित्तीय लेन-देन और व्यापारिक उधारी (Financial & Business Transactions) के लिखित समझौतों के संबंध में आया है।
अल्लाह सुब्हानहू व तआला क़ुरआन मजीद में साफ़ तौर पर इरशाद फ़रमाता है:
وَاسْتَشْهِدُوا شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَامْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ الشُّهَدَاءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَاهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَاهُمَا الْأُخْرَىٰ
"और अपने पुरुषों में से दो गवाह बना लो। फिर अगर दो पुरुष न हों, तो एक पुरुष और दो महिलाएँ—जिन गवाहों को तुम पसंद करते हो—ताकि अगर उनमें से एक (भूलवश) भटक जाए या भूल जाए, तो दूसरी उसे याद दिला दे।"
अगर इस आयत पर ध्यान दें, तो अल्लाह तआला ने खुद इसका कारण साफ़-साफ़ बता दिया है: "ताकि अगर एक भूल जाए, तो दूसरी उसे याद दिला दे।" यहाँ महिला की बुद्धि में किसी कमी का ज़िक्र बिल्कुल नहीं है, बल्कि व्यापारिक मामलों में भूलने की संभावना और एक-दूसरे को सहयोग (Support) देने की बात कही गई है।
ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि: व्यापारिक मामलों में अनुभव
जिस समय यह आयत नाज़िल (प्रकट) हुई, उस ज़माने के समाज की बनावट को समझना बेहद आवश्यक है।
ज़िम्मेदारियों का बंटवारा: इस्लाम ने पुरुष और महिला दोनों के कार्यक्षेत्र और प्राथमिक ज़िम्मेदारियों का बहुत ही प्राकृतिक बंटवारा किया है। पुरुष पर परिवार की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने, कमाई करने और बाज़ार से जुड़े काम संभालने की ज़िम्मेदारी डाली गई। जबकि महिला की मुख्य ज़िम्मेदारी घर का प्रबंधन, परिवार का रखरखाव और बच्चों की परवरिश थी।
व्यापारिक अनुभव की स्थिति: चूँकि उस ज़माने में महिलाएँ बाज़ार के लेन-देन, व्यापारिक अनुबंधों (Business Contracts), उधारी के पेचीदा मामलों और अदालती दांव-पेंचों में सीधे तौर पर रोज़-रोज़ शामिल नहीं होती थीं, इसलिए वित्तीय बारीकियों (Financial nuances) में उनसे भूल होने, भ्रमित होने या चूक जाने की संभावना ज़्यादा थी।
सहायता और सुरक्षा का ढाँचा: अगर किसी महिला को वित्तीय मामले में गवाह बनाया जाता, तो उसकी सहायता के लिए एक और महिला को साथ रखा गया ताकि अदालत की कड़ाई या विरोधी पक्ष के सामाजिक व मानसिक दबाव के सामने वह अकेली न पड़े। एक महिला दूसरी की ढाल बनकर उसे सही बात याद रखने में मदद कर सके।
क्या हर मामले में दो महिलाओं की गवाही ज़रूरी है? (कानूनी सच्चाई)
यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि इस्लाम हर मामले में दो महिलाओं की गवाही को एक पुरुष के बराबर रखता है। इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह) के विस्तृत (detailed) नियमों को देखने पर सच्चाई कुछ और ही सामने आती है:
(क) विशुद्ध महिला मामलों में केवल महिला की गवाही
जिन मामलों का संबंध ख़ास तौर पर महिलाओं के निजी जीवन से है—जैसे बच्चे का जन्म, स्तनपान (Lactation), महिलाओं की विशिष्ट बीमारियाँ, या ज़नानख़ाने (महिलाओं के निजी क्षेत्र) के अंदर होने वाली घटनाएँ—वहाँ केवल महिलाओं की गवाही ही स्वीकार की जाती है और पुरुषों की गवाही मान्य ही नहीं होती। ऐसे मामलों में एक अकेली महिला की गवाही पूरे मुक़दमे का फ़ैसला करने के लिए 100% काफ़ी होती है।
(ख) धार्मिक मामलों और हदीस के हस्तांतरण में
इस्लाम के मूल धर्मशास्त्र, हदीस और दीनी आदेशों को आगे पहुँचाने में महिला की गवाही या बयान अकेले ही पूरी तरह प्रामाणिक माना गया है। उम्मतुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा से 2210 अहादीस (नबी ﷺ के फ़रमान) ली गई हैं और पूरी इस्लामी उम्मत उन पर अमल करती है। वहाँ उनके साथ किसी दूसरे पुरुष या महिला गवाह की शर्त कभी नहीं लगाई गई।
(ग) सामान्य और आपराधिक मामले
कई आपराधिक (Criminal) और सामाजिक मुक़दमों में स्थिति, साक्ष्यों और परिस्थितियों (Circumstantial Evidence) के आधार पर न्यायाधीश (क़ाज़ी) फ़ैसला करता है। जहाँ भी गवाही से सच्चाई साफ़ हो जाए, वहाँ न्याय स्थापित किया जाता है।
गवाही देना अधिकार नहीं, बल्कि एक भारी कानूनी बोझ है
आधुनिक सोच में गवाही देने को अक्सर एक 'अधिकार' (Right) के रूप में देखा जाता है, जबकि हक़ीक़त में इस्लामी क़ानून के तहत गवाही देना एक बहुत ही भारी ज़िम्मेदारी, नागरिक दायित्व (duty) और मानसिक बोझ (Responsibility & Burden) है।
अदालती भागदौड़ और दुश्मनी: गवाह को बार-बार अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं, वकीलों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ता है, और झूठी गवाही से बचने का भारी नैतिक दबाव होता है। कई बार दबंग या आपराधिक मानसिकता वाले विरोधी पक्ष से दुश्मनी और ख़तरे का डर भी रहता है।
महिला को सहूलियत देना: चूँकि इस्लाम ने महिला को घर का ख़र्च चलाने और कठिन अदालती मुक़दमों की भागदौड़ से आज़ाद रखा है, इसलिए वित्तीय गवाही के इस कानूनी बोझ को उस पर हल्का करने के लिए एक दूसरी सहयोगी महिला का प्रावधान रखा गया ताकि उस पर अकेले कोई व्यक्तिगत या सामाजिक दबाव न बनाया जा सके।
उलमा और आधुनिक इस्लामी विचारकों के दृष्टिकोण
मशहूर इस्लामी विद्वान और तफ़्सीरकार लिखते हैं कि क़ुरआन की आयत (282) में "أَن تَضِلَّ" (अगर एक भटक/भूल जाए) शब्द एक व्यावहारिक परिस्थिति को दर्शाता है, न कि महिला के अस्तित्व या योग्यता की किसी कमी को।
आधुनिक दौर के महान इस्लामी विद्वान (जैसे शेख महमूद शल्तूत और अन्य फ़ुक़हा) का मानना है कि गवाही का मूल मक़सद "सच्चाई तक पहुँचना और इंसाफ़ कायम करना" है। यदि किसी समाज या युग में महिलाएँ वित्तीय व व्यापारिक मामलों में पूरी तरह शिक्षित, प्रशिक्षित और अनुभवी हों और किसी मामले में बिना दबाव के सही गवाही दे सकती हों, तो अदालत साक्ष्यों की सटीकता के आधार पर फ़ैसला कर सकती है।
निष्कर्ष
- गवाही में दो महिलाओं का नियम केवल व्यापारिक (trade-only) और वित्तीय लेन-देन (Financial Contracts) से जुड़ा एक विशेष नियम है, सामान्य जीवन का सर्वव्यापी नियम (Universal rule) नहीं है।
- इसका कारण महिला की बुद्धि में कोई कमी होना बिल्कुल नहीं है, बल्कि व्यापारिक मामलों में तत्कालीन अनुभव की कमी और अदालत के संभावित मानसिक दबाव से महिला को सुरक्षा व सहायता प्रदान करना था।
- कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ केवल एक अकेली महिला की गवाही से ही बड़े-बड़े फ़ैसले किए जाते हैं और पुरुषों की गवाही स्वीकार नहीं होती।
इस्लाम का यह नियम महिला को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की सटीकता (Accuracy of Justice) बनाए रखने और महिला की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।
संदर्भित स्रोत :
- सूरह अल-बक़राह (आयत : 282)
- तफ़्सीर इब्न कसीर (सूरह अल-बक़राह आयत 282 की विस्तृत व्याख्या)
- अल्-फ़िक़्ह अल-इस्लामी व अदिल्लतुह (डॉ. वहबा ज़ुहैली)
- अल्-मरा फ़िल-फ़िक़्ह अल-इस्लामी (विद्वानों के शोध पत्र)
लेखक: मोहम्मद रहबर इस्लाम, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, मलप्पुरम, केरल के डिग्री फर्स्ट ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं।
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