ईद मिलादुन्नबी मनाना कैसा है?

क़ुरआन, हदीस और उलमा--किराम की रोशनी में मिलादुन्नबी की हक़ीक़त

परिचय

नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद ﷺ की ज़ात पूरी इंसानियत के लिए अल्लाह तआला की सबसे बड़ी नेमतों में से एक है। आप ﷺ की आमद से इंसानियत को ईमान की रोशनी मिली, कुफ़्र और शिर्क के अंधेरे से निजात का रास्ता मिला और इंसान को उसके रब से जोड़ने वाली हिदायत मिली। इसी वजह से एक मुसलमान के दिल में रसूलुल्लाह ﷺ की मोहब्बत, अदब और ताज़ीम ईमान का हिस्सा है।

आज मुसलमानों के बीच एक सवाल अक्सर सामने आता है: क्या नबी की पैदाइश की याद में मिलाद की महफ़िल करना जायज़ है? क्या इसे मनाना शरीअत में साबित है? क्या यह बिदअत है या जायज़ और मुस्तहब अमल?

इस मसले पर उलमा के बीच अलग-अलग राय पाई जाती है। कुछ विद्वान इसे जायज़ और मुस्तहब मानते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे धार्मिक त्योहार के रूप में मनाने को सही नहीं मानते। इसलिए इस विषय पर बात करते समय ज़रूरी है कि दलीलों को ईमानदारी से समझा जाए, किसी मुसलमान की नीयत पर शक किया जाए और मसले को क़ुरआन, सुन्नत और बड़े बड़े उलमा की व्याख्या की रोशनी में देखा जाए।

इस लेख में मुख्य रूप से उस राय को समझाया जा रहा है जिसके अनुसार मिलादुन्नबी की ऐसी महफ़िल जिसमें क़ुरआन की तिलावत, नबी की सीरत का बयान, दुरूद--सलाम, नात, ज़िक्र और सदक़ा-ख़ैरात जैसे जायज़ काम हों, और उसमें कोई शरीअत-विरोधी चीज़ शामिल हो, जायज़ और मुस्तहब है। मिस्र के दारुल-इफ़्ता ने भी इसी आधार पर इसे जायज़ और सवाब का काम माना है।

क़ुरआन की रोशनी में नबी की आमद : अल्लाह की बड़ी नेमत

मिलाद के बारे में सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि इस्लाम में अल्लाह की नेमत मिलने पर खुशी मनाना और उसका शुक्र अदा करना कोई गलत बात नहीं है। बल्कि क़ुरआन हमें अल्लाह की फ़ज़्ल और रहमत पर खुशी मनाने की शिक्षा देता है।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता फ़रमाता है:

قُلْ بِفَضْلِ اللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِ فَبِذَٰلِكَ فَلْيَفْرَحُوا ۚ هُوَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ

कह दीजिए: अल्लाह के फ़ज़्ल और उसकी रहमत ही से, तो उन्हें चाहिए कि इसी पर खुशी मनाएँ। यह उस चीज़ से बेहतर है जिसे वे जमा करते हैं।सूरह यूनुस, 10:58

यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रहमत क्या है? क़ुरआन दूसरे स्थान पर नबी ﷺ के बारे में फ़रमाता है:

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ

और हमने आपको सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर ही भेजा है।सूरह अल-अंबिया, 21:107

नबी ﷺ की पैदाइश और आपकी बिअसत के माध्यम से इंसानियत को वह महान रहमत मिली जिसके ज़रिए लोगों को अल्लाह की पहचान, ईमान, तौहीद और सही जीवन-पद्धति (way of life) मिली। इसलिए नबी ﷺ की आमद पर अल्लाह का शुक्र अदा करना और उस नेमत पर खुशी व्यक्त करना अपने आप में कोई अनुचित बात नहीं है।

इसी तरह अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْ أَنْفُسِهِمْ

बेशक अल्लाह ने ईमान वालों पर बड़ा एहसान किया कि उनमें उन्हीं में से एक रसूल भेजा।सूरह आल-इमरान, 3:164

इस आयत में रसूल ﷺ की बिअसत (arrival) को अल्लाह का एहसान और नेमत बताया गया है। जब किसी बड़ी नेमत पर खुशी और शुक्र की शरीअत में गुंजाइश है, तो नबी ﷺ जैसी महान नेमत की याद में क़ुरआन पढ़ना, दुरूद भेजना, सीरत सुनना और सदक़ा करना क्योंकर अपने आप में नाजायज़ होगा?

हाँ, यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना ज़रूरी है: इन आयतों में सीधे तौर पर "मिलाद की महफ़िल" का आदेश नहीं दिया गया। मिलाद के जायज़ होने की दलील यह है कि उसमें किए जाने वाले बहुत-से काम—क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र, दुरूद, सदक़ा, सीरत का बयान और नबी की मोहब्बत का इज़हार—अपने-अपने तौर पर शरीअत में जायज़ और नेक काम हैं। यही वह उसूली आधार है जिसे मिलाद को जायज़ मानने वाले उलमा पेश करते हैं। दारुल-इफ़्ता मिस्र (Egypt) ने भी इसी तरह क़ुरआन और सुन्नत के आम दलीलों से मिलाद की मजलिस को जायज़ बताया है।

नबी ﷺ स्वयं अपनी पैदाइश के दिन को याद करते थे। यह इस मसले की सबसे महत्वपूर्ण हदीसों में से एक है।

हज़रत अबू क़तादा अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी ﷺ से सोमवार के रोज़े के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया:

فِيهِ وُلِدْتُ وَفِيهِ أُنْزِلَ عَلَيَّ

इसी दिन मेरी पैदाइश हुई और इसी दिन मुझ पर (वही) नाज़िल की गई।सहीह मुस्लिम

यह हदीस इस विषय में बहुत महत्वपूर्ण है। नबी ﷺ ने सोमवार के दिन रोज़ा रखने की वजहों में अपनी पैदाइश के दिन का उल्लेख स्वयं किया। यानी अपनी विलादत की नेमत को याद करना और उसके सिलसिले में इबादत करना सुन्नत से साबित है।

बेशक नबी ﷺ ने हर साल "मिलाद की महफ़िल" उसी रूप में आयोजित नहीं की जिस रूप में बाद के दौर में विभिन्न स्थानों पर होती है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि आज की हर मिलाद की रस्म बिल्कुल उसी रूप में नबी ﷺ से साबित है। लेकिन यह कहना भी सही नहीं कि नबी की पैदाइश को याद करने का कोई आधार ही नहीं है। सोमवार के रोज़े वाली हदीस इसका स्पष्ट आधार प्रदान करती है।

मोहब्बत--रसूल : ईमान का हिस्सा

मिलाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल एक तारीख़ या महफ़िल नहीं, बल्कि मोहब्बत--रसूल है। मुसलमान के लिए नबी ﷺ से मोहब्बत ईमान का आवश्यक हिस्सा है।

नबी ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:

لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ

तुम में से कोई व्यक्ति उस समय तक (कामिल) ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक मैं उसके लिए उसके पिता, उसकी संतान और तमाम लोगों से अधिक महबूब हो जाऊँ।सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम

एक प्रसिद्ध घटना में हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी ﷺ से अपनी मोहब्बत का इज़हार किया। आपने पूछा कि क्या मैं तुम्हें तुम्हारी जान से भी अधिक महबूब हूँ? पहले हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि आप उन्हें हर चीज़ से अधिक महबूब हैं सिवाय उनकी अपनी जान के। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जब तक मैं तुम्हें तुम्हारी जान से भी अधिक महबूब न हो जाऊँ। तब हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि अब आप मुझे मेरी जान से भी अधिक महबूब हैं। तब आपने फ़रमाया:

الْآنَ يَا عُمَرُ

अब, उमर!”

यह हदीस हमें बताती है कि नबी ﷺ की मोहब्बत ईमान का मामूली हिस्सा नहीं है। वह ईमान की गहराई से जुड़ी हुई है। दारुल-इफ़्ता मिस्र ने भी इमाम इब्न रजब के हवाले से इसी हदीस के आधार पर मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ को उसूल-ए-ईमान में शामिल बताया है।

इसलिए अगर कोई व्यक्ति मिलाद की महफ़िल में बैठकर नबी ﷺ की सीरत सुनता है, आपकी सुन्नतों को याद करता है, दुरूद पढ़ता है, नात सुनता है और अपने दिल में आपकी मोहब्बत को बढ़ाता है, तो इन कामों की बुनियाद शरीअत में मौजूद है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا

बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं। ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद और खूब सलाम भेजो।सूरह अल-अहज़ाब, 33:56

इस आयत की रोशनी में नबी ﷺ पर दुरूद भेजना एक महान इबादत है। इसलिए मिलाद की किसी महफ़िल में दुरूद-ओ-सलाम पढ़ना अपने आप में कोई नई इबादत नहीं, बल्कि क़ुरआन से साबित अमल है।

इसी तरह नबी ﷺ की सीरत सुनना भी अपने आप में नेक काम है। जब हम नबी ﷺ की मक्की ज़िंदगी, आपकी मदीनी ज़िंदगी, आपकी रहमत, आपका सब्र, आपका इंसाफ़, आपकी इबादत, आपकी उम्मत से मोहब्बत और आपकी सुन्नतों को याद करते हैं, तो हमारा ईमान मजबूत होता है।

इसलिए मिलाद का असल मक़सद सजावट, रोशनी, जुलूस या केवल एक दिन की खुशी नहीं होना चाहिए। असल मक़सद यह होना चाहिए कि मुसलमान नबी ﷺ की ज़िंदगी को जानें, आपकी सुन्नतों को अपनायें और अपने अंदर आपकी मोहब्बत पैदा करें।

उलमा--किराम की राय और मिलाद की महफ़िल का सही तरीका

मिलादुन्नबी के बारे में मुस्लिम विद्वानों के बीच ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग राय रही है। कुछ उलमा ने इसे बाद में पैदा हुआ ऐसा अमल माना जिसे धार्मिक त्योहार के रूप में अपनाना उचित नहीं है, जबकि दूसरे अनेक विद्वानों ने इसे जायज़ और मुस्तहब माना, बशर्ते इसमें शरीअत-विरोधी काम शामिल न हों।

मिलाद को जायज़ मानने वाले विद्वानों में इमाम अबू बक्र इब्नुल-अरबी, इमाम इब्न हजर अल-असक़लानी, इमाम जलालुद्दीन सुयूती, इमाम इब्न हजर अल-हैतमी, इमाम क़स्तलानी, इमाम जलालुद्दीन महल्ली और दूसरे विद्वानों के नाम मिलते हैं। दारुल-इफ़्ता मिस्र ने भी इब्नुल-जौज़ी, इब्न दिह्या, इब्न कसीर, इब्न हजर और इमाम सुयूती जैसे विद्वानों के हवाले से मिलाद के आयोजन की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख किया है।

विशेष रूप से इमाम जलालुद्दीन सुयूती ने حُسْنُ الْمَقْصِدِ فِي عَمَلِ الْمَوْلِدِ नाम से स्वतंत्र रिसाला लिखा, जिसमें उन्होंने मिलाद के आयोजन के बारे में अपनी दलीलें पेश कीं। इसी तरह इमाम इब्न हजर अल-असक़लानी से भी मिलाद के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण का उल्लेख मिलता है। दारुल-इफ़्ता मिस्र के अनुसार बाद के अनेक विद्वानों ने मिलाद में क़ुरआन, ज़िक्र, सदक़ा, खाना खिलाने और नबी ﷺ की प्रशंसा जैसी नेकियों को जायज़ माना।

हाफ़िज़ इब्न हजर ने मिलाद के बारे में यह उसूल बताया कि अगर इसमें केवल जायज़ और नेक काम हों और हराम चीज़ों से बचा जाए तो इसे नेक अमल के रूप में देखा जा सकता है। उनके हवाले से यह भी कहा गया कि इस तरह के आयोजन में क़ुरआन, सदक़ा, नबी ﷺ की सीरत और लोगों को खिलाना जैसी चीज़ें शामिल की जा सकती हैं।

इमाम सुयूती ने भी मिलाद की महफ़िल में लोगों के जमा होने, क़ुरआन पढ़ने, नबी ﷺ की विलादत के बारे में वर्णन सुनने और भोजन कराने जैसी चीज़ों को जायज़ बताया। दारुल-इफ़्ता के अनुसार हाफ़िज़ सख़ावी ने भी अपने समय में मुस्लिम शहरों में मिलाद की महफ़िलों और उनमें सदक़ा तथा खुशी के इज़हार का उल्लेख किया है।

इससे हमें मिलाद के सही तरीके का भी पता चलता है।

मिलाद की महफ़िल में क़ुरआन की तिलावत हो। सीरत--रसूल बयान की जाए। दुरूद--सलाम पढ़ा जाए। नबी ﷺ की मोहब्बत और सुन्नतों की शिक्षा दी जाए। सदक़ा और खाना खिलाना हो।
गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। लोगों को नमाज़, अख़लाक़, सच्चाई, अमानत और सुन्नत की तरफ़ बुलाया जाए।

और सबसे महत्वपूर्ण—ऐसे आयोजन में कोई हराम या शरीअत-विरोधी काम नहीं होना चाहिए।

मसलन, फ़र्ज़ नमाज़ छोड़कर मिलाद की महफ़िल करना, पुरुषों और महिलाओं का अनुचित मिश्रण, फ़िज़ूलखर्ची, दिखावा, झूठी या मनगढ़ंत रिवायतें, नबी ﷺ के बारे में अतिशयोक्ति, किसी दूसरे मुसलमान को गाली देना या किसी हराम काम को मिलाद का हिस्सा बना देना सही नहीं हो सकता।

क्योंकि किसी अच्छे मक़सद के नाम पर हराम काम जायज़ नहीं हो जाता।

इसी तरह नबी ﷺ की ताज़ीम करते हुए ऐसी बातें कहना भी सही नहीं जो इस्लामी अक़ीदे की सीमाओं से बाहर हों। मुसलमान नबी ﷺ से सबसे अधिक मोहब्बत करता है, लेकिन साथ ही यह भी मानता है कि अल्लाह तआला ही ख़ालिक़ और इबादत के लायक़ है और मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं।

इस संतुलन को हमेशा कायम रखना चाहिए।

 मिलाद बिदअत है? — एक संतुलित समझ

मिलाद के विरोध में सबसे प्रसिद्ध दलील यह पेश की जाती है कि नबी ﷺ, सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम और पहली सदियों के मुसलमानों ने इस रूप में कोई वार्षिक मिलाद आयोजित नहीं किया। इस दलील को गंभीरता से समझना ज़रूरी है।

नबी ﷺ ने फ़रमाया:

مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ فِيهِ فَهُوَ رَدٌّ

जिसने हमारे इस दीन में ऐसी चीज़ निकाली जो इसमें से नहीं है, वह अस्वीकार है।सहीह अल-बुख़ारी

इस हदीस का मतलब यह है कि दीन में ऐसी चीज़ को शरीअत का हिस्सा बनाना जो शरीअत में आधार नहीं रखती, स्वीकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन मिलाद को जायज़ मानने वाले उलमा कहते हैं कि मिलाद को नई स्वतंत्र इबादत या नई शरीअत नहीं माना जा रहा, बल्कि पहले से जायज़ और नेक कामों—क़ुरआन, ज़िक्र, दुरूद, सीरत, सदक़ा और खाना खिलाने—को नबी ﷺ की पैदाइश की याद में एक जगह जमा किया जा रहा है।

यही वह बुनियादी अंतर है जिसे समझना ज़रूरी है।

अगर कोई व्यक्ति यह मानता है कि 12 रबीउल-अव्वल की एक खास नमाज़ शरीअत ने अनिवार्य की है, जबकि उसका कोई प्रमाण नहीं, तो यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती।

अगर कोई यह कहे कि मिलाद मनाना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है, तो उसके लिए भी स्पष्ट शरीअती प्रमाण चाहिए।

लेकिन अगर लोग एक दिन नबी ﷺ की सीरत पढ़ने के लिए इकट्ठा हों, क़ुरआन पढ़ें, दुरूद पढ़ें, नात पढ़ें, सदक़ा करें, खाना खिलाएँ और नबी ﷺ की सुन्नतों पर अमल करने का संकल्प लें, तो इसे जायज़ मानने वाले उलमा इन सभी कामों को अलग-अलग शरीअती आधारों के तहत रखते हैं। दारुल-इफ़्ता मिस्र ने भी इसी दृष्टिकोण से मिलाद को मुस्तहब और सवाब का काम माना है।

इसलिए इस मसले में मुसलमानों को एक-दूसरे पर कठोर हुक्म लगाने के बजाय इल्मी और अदब वाला रवैया अपनाना चाहिए।

जो व्यक्ति मिलाद करता है, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका आयोजन क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ हो। और जो व्यक्ति मिलाद नहीं करता, उसे भी दूसरे मुसलमान की नीयत पर हमला करने या उसे दीन से बाहर समझने से बचना चाहिए, जब तक कि वह स्पष्ट रूप से कोई कुफ़्र या शरीअत-विरोधी अक़ीदा न अपना रहा हो।

असल मक़सद यह होना चाहिए कि उम्मत नबी की मोहब्बत में बढ़े, आपकी सुन्नत को अपनाए और आपकी सीरत को अपनी ज़िंदगी का नमूना बनाए।

निष्कर्ष

मिलादुन्नबी के बारे में यह कहना अधिक संतुलित है कि नबी की विलादत को याद करना, उस पर अल्लाह का शुक्र अदा करना, नबी की सीरत बयान करना, दुरूद पढ़ना, क़ुरआन की तिलावत करना, सदक़ा करना और लोगों को खाना खिलानाये सभी अपने-अपने तौर पर शरीअत में जायज़ और नेक काम हैं। सोमवार के रोज़े वाली हदीस यह भी बताती है कि नबी ﷺ ने अपनी पैदाइश के दिन को एक इबादत के साथ याद किया।

हाँ, मिलाद को दीन का फ़र्ज़ या वाजिब त्योहार समझना अलग बात है और ऐसी चीज़ के लिए विशेष दलील चाहिए। इसी तरह मिलाद के नाम पर हराम काम, फ़िज़ूलखर्ची, झूठी रिवायतें, ग़ुलू और शरीअत की सीमाओं को पार करना किसी भी हालत में सही नहीं।

मिलाद की सबसे खूबसूरत तस्वीर वही होगी जिसमें एक मुसलमान नबी ﷺ की विलादत को याद करके अपने दिल में यह सवाल पैदा करे:

क्या मैं अपने नबी से सच में मोहब्बत करता हूँ?

अगर करता हूँ तो क्या मैं उनकी सुन्नत पर चलता हूँ?

क्या मेरी नमाज़ सही है?

क्या मेरी ज़बान झूठ से बचती है?

क्या मेरे माता-पिता मुझसे खुश हैं?

क्या मेरे पड़ोसी मेरे व्यवहार से सुरक्षित हैं?

क्या मेरे कारोबार में ईमानदारी है?

क्या मेरे दिल में गरीबों और कमज़ोरों के लिए रहम है?

यही वह मिलाद है जिसका असर पूरे साल दिखाई देता है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ

यक़ीनन तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल की ज़िंदगी में बेहतरीन नमूना है, उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और आख़िरत के दिन की उम्मीद रखता है।सूरह अल-अहज़ाब, 33:21

इसलिए नबी ﷺ की विलादत की खुशी मनाने का सबसे अच्छा परिणाम यह होना चाहिए कि हम आपकी सीरत को पढ़ें, आपकी मोहब्बत को अपने दिल में बढ़ाएँ, आप पर अधिक से अधिक दुरूद भेजें और आपकी सुन्नत को अपनी ज़िंदगी में उतारें।

मिलाद केवल एक महफ़िल न हो—मिलाद हमारे किरदार में दिखाई दे।

मिलाद केवल रोशनी और सजावट न हो—मिलाद हमारे दिल को रोशन करे।

मिलाद केवल नात और तक़रीर न हो—मिलाद हमें सुन्नत पर चलने वाला इंसान बनाए।

और अगर नबी ﷺ की पैदाइश की याद हमें आपकी सुन्नत, आपकी रहमत, आपके अख़लाक़ और आपके पैग़ाम से जोड़ देती है, तो यही उस खुशी का सबसे खूबसूरत और सबसे सार्थक रूप है।

संदर्भ ग्रंथ एवं स्रोत

  • क़ुरआन--करीम: सूरह यूनुस: 58; सूरह अल-अंबिया: 107; सूरह आल-इमरान: 164; सूरह अल-अहज़ाब: 21, 56; सूरह अत-तौबा: 24
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • हुस्नुल-मक़्सिद फ़ी अमलिल-मौलिदइमाम जलालुद्दीन अस-सुयूती।
  • अल-मौलिदइमाम इब्नुल-जौज़ी।
  • अत-तनवीर फ़ी मौलिदिल-बशीरिन-नज़ीर हाफ़िज़ इब्न दिह्या अल-अंदलुसी।
  • मौरिदुस-सादी फ़ी मौलिदिल-हादी हाफ़िज़ इब्न नासिरुद्दीन अद-दिमश्क़ी।
  • अल-अज्विबतुल-मरदिय्याहाफ़िज़ अस-सख़ावी।
  • अल-बाइस अला इंकारिल-बिदअ वल-हवादिसइमाम अबू शामा अल-मक़्दिसी।
  • मफ़ातिहुल-ग़ैब (तफ़्सीर अल-कबीर) — इमाम फ़ख़रुद्दीन अर-राज़ी।
  • हुस्नुल-मक़्सिद फ़ी अमलिल-मौलिद / अल-हावी लिल-फ़तावाइमाम जलालुद्दीन अस-सुयूती।
  • दारुल-इफ़्ता अल-मिस्रियामिलादुन्नबी से संबंधित फ़तावे और शोध।

लेखक: एहतेशाम हुदवी

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