हज की फर्जियत और फ़ज़ीलत

परिचय

हज इस्लाम का पाँचवाँ फर्ज है। यह उन पाँच स्तंभों में से एक है जिन पर इस्लाम की इमारत खड़ी है। हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों मुसलमान मक्का शहर में इकट्ठा होते हैं। सब एक जैसे सफेद कपड़े पहनते हैं। सब एक ही आवाज में कहते हैं:"لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ" – ऐ अल्लाह, मैं हाजिर हूँ, मैं हाजिर हूँ। यह नज़ारा देखने लायक होता है – अमीर हो या गरीब, राजा हो या मजदूर, सब अल्लाह के सामने एक समान खड़े होते हैं। हज सिर्फ एक यात्रा नहीं है। यह जिंदगी का एक ऐसा सबक है जो इंसान को सब्र, बराबरी, मोहब्बत और अल्लाह के सामने पूरी तरह झुकने की तालीम देता है। यह हर उस मुसलमान पर जिंदगी में एक बार फर्ज है जो शरीर से स्वस्थ हो और पैसे से सक्षम हो।

हज क्यों फर्ज है

وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا 

और अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर (काबा) का हज करना जरूरी है – जो उस तक रास्ता पाने की ताकत रखता हो।

इस आयत में “ताकत” का मतलब दो चीजें हैं। पहली – शरीर इतना स्वस्थ हो कि सफर के थकान को सह सके और हज की सारी रस्में अदा कर सके। दूसरी – पैसा इतना हो कि जाने-आने का खर्च उठा सके और पीछे घरवालों के खाने-पीने का भी इंतजाम छोड़ सके। जिसके पास ये दोनों चीजें हों, उस पर जिंदगी में एक बार हज करना फर्ज है। अगर किसी ने इसे छोड़ा, तो वह बड़े गुनाह का मुजरिम होगा।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी इस्लाम के पाँच स्तंभ गिनाते हुए हज को पाँचवाँ स्तंभ बताया। हदीस में है:

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: بُنِيَ الْإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ الْبَيْتِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ

इस्लाम की इमारत पाँच चीजों पर खड़ी है: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं, नमाज कायम करना, जकात देना, रमजान के रोजे रखना और काबा का हज करना।

यह हदीस साफ कर देती है कि हज कोई नफ्ली इबादत नहीं है, बल्कि वह उतनी ही जरूरी है जितनी नमाज और रोजा। जिस तरह नमाज छोड़ना बड़ा गुनाह है, उसी तरह बिना किसी उज़्र के हज छोड़ना भी बड़ा गुनाह है। एक और हदीस में आप ने बहुत सख्त चेतावनी दी है:

مَنْ مَاتَ وَلَمْ يَحُجَّ حَجَّةَ الْإِسْلَامِ وَلَيْسَ لَهُ عُذْرٌ، فَلْيَمُتْ إِنْ شَاءَ يَهُودِيًّا وَإِنْ شَاءَ نَصْرَانِيًّا

जो इंतकाल हो गया और उसने इस्लाम का हज नहीं किया और उसके पास कोई उज़्र (बीमारी या गरीबी) नहीं था, तो अगर वह चाहे तो यहूदी बनकर मरे, अगर चाहे तो नसरानी बनकर मरे।

यहाँ मतलब यह नहीं है कि वह इनकार करने वाला हो जाता है, बल्कि यह कि उसने एक बड़े फर्ज को छोड़कर अपनी मौत को काफिरों की मौत जैसा बना लिया। इसलिए हर उस मुसलमान को चाहिए जिसके पास ताकत हो, वह देर न करे और जल्द से जल्द हज कर ले।

हज की फजीलत गुनाहों की सफाई और जन्नत की खुशखबरी

हज की फजीलत बयान से बाहर है। अल्लाह ने अपने रसूल के जरिए हज करने वालों के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी दी है। सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि एक मकबूल हज इंसान को बिल्कुल नए जन्म की तरह साफ कर देता है। हदीस में है:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: سَمِعْتُ النَّبِيَّ ﷺ يَقُولُ: مَنْ حَجَّ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ، رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ

जिसने हज किया और उसने (हज के दौरान) कोई बुरी या अश्लील बात नहीं की और कोई गुनाह नहीं किया, तो वह (गुनाहों से) इस तरह लौटता है जैसे उसके माँ ने उसे जन्म दिया था।

यानी उसके सारे पिछले गुनाह पूरी तरह माफ हो जाते हैं। वह इस तरह पाक साफ हो जाता है जैसे अभी-अभी पैदा हुआ बच्चा होता है। यह अल्लाह का बहुत बड़ा करम है।

एक और हदीस में जन्नत की सीधी गारंटी दी गई है:

الْحَجُّ الْمَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلَّا الْجَنَّةُ

मकबूल हज का कोई बदला नहीं, सिवाय जन्नत के।

“मकबूल हज” वह है जिसमें इंसान ने अल्लाह की नाराजगी वाला कोई काम नहीं किया, न झूठ बोला, न गाली दी, न किसी को तकलीफ पहुँचाई, और हर रस्म को सही तरीके से अदा किया। ऐसे हज का इनाम सिर्फ जन्नत है।

आप ने यह भी फरमाया कि हज और उमरा करते रहने से गरीबी और गुनाह दूर होते हैं:

تَابِعُوا بَيْنَ الْحَجِّ وَالْعُمْرَةِ، فَإِنَّهُمَا يَنْفِيَانِ الْفَقْرَ وَالذُّنُوبَ كَمَا يَنْفِي الْكِيرُ خَبَثَ الْحَدِيدِ

लगातार हज और उमरह करते रहो, क्योंकि ये गरीबी और गुनाहों को इस तरह दूर करते हैं जैसे भट्टी लोहे के मैल को दूर कर देती है।

यानी जैसे लोहे को आग में तपाने से उसका सारा मैल निकल जाता है और वह चमकने लगता है, वैसे ही हज-उमरा करने से इंसान का दिल गुनाहों की गंदगी से साफ हो जाता है और अल्लाह उसे दुनिया और आखिरत में कामयाबी देता है।

औरतों के लिए तो हज को सबसे बेहतरीन जिहाद बताया गया है। हजरत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने पूछा:

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ، هَلْ عَلَى النِّسَاءِ جِهَادٌ؟ قَالَ: نَعَمْ، عَلَيْهِنَّ جِهَادٌ لَا قِتَالَ فِيهِ: الْحَجُّ وَالْعُمْرَةُ

ऐ अल्लाह के रसूल, क्या औरतों पर भी जिहाद है? आपने फरमाया: हाँ, उन पर ऐसा जिहाद है जिसमें लड़ाई नहीं है – हज और उमरह।

इससे पता चलता है कि हर कोई – चाहे वह मर्द हो या औरत, बूढ़ा हो या जवान – अपनी ताकत के हिसाब से हज के जरिए अल्लाह के करीब पहुँच सकता है और बड़ा सवाब कमा सकता है।

 

हज के फायदे दुनिया की भलाई और आखिरत की सफलता

अल्लाह ने कुरान में हज के फायदों की तरफ इशारा किया है। फरमान है:

لِيَشْهَدُوا مَنَافِعَ لَهُم

ताकि वे (हाजी) अपने लिए फायदे हासिल करें।

ये फायदे दो तरह के हैं – आखिरत (दीन) के फायदे और दुनिया के फायदे।

आखिरत के फायदे यह हैं के  हज करने वाला अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी पाता है, उसके नाम से जहन्नम की आग से बचने की रक्षा होती है, और उसे जन्नत का वादा मिलता है। इसके अलावा, मस्जिद-ए-हराम में नमाज पढ़ने का सवाब बेहद ज्यादा है। हदीस में है:

صَلَاةٌ فِي مَسْجِدِي هَذَا أَفْضَلُ مِنْ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ إِلَّا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ، وَصَلَاةٌ فِي الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ أَفْضَلُ مِنْ مِائَةِ أَلْفِ صَلَاةٍ فِيمَا سِوَاهُ

मेरी इस मस्जिद (मदीना) में एक नमाज, दूसरी मस्जिदों के एक हज़ार नमाज से बेहतर है – सिवाय मस्जिद-ए-हराम के। और मस्जिद-ए-हराम में एक नमाज, दूसरी मस्जिदों के एक लाख नमाज से बेहतर है।

तो हाजी को हर नमाज के साथ लाखों गुना सवाब मिलता है। ज़मज़म का पानी पीना, काबा को अपनी आँखों से देखना, हजर-ए-असवद को छूना, अरफात के मैदान में दुआ करना – यह सब ऐसी इबादतें हैं जिनका कोई मोल नहीं।

दुनिया के फायदे यह हैं के  हज इंसान को सब्र और तकलीफ सहना सिखाता है। भीड़-भाड़, गर्मी, लंबी चलाई, थकान, नींद की कमी – यह सब अल्लाह की रजा के लिए सहना पड़ता है। इससे इंसान के अंदर एक अजीब ताकत पैदा होती है। वह जिंदगी की मुश्किलों को आसानी से झेलना सीख जाता है।

हज सिखाता है कि इस्लाम में किसी को किसी पर कोई फजीलत नहीं। अरबपति और गरीब मजदूर दोनों एक जैसे सफेद कपड़े में होते हैं। कोई किसी से ऊँचा नहीं। इससे दिल से घमंड और अहंकार निकल जाता है। इंसान समझ जाता है कि असली बड़ाई सिर्फ अल्लाह को है।

हज में दुनिया के अलग-अलग मुल्कों के मुसलमानों से मिलने, दोस्ती करने, भाईचारा बढ़ाने का भी मौका मिलता है। कई लोग हज के दौरान नए कारोबारी साझेदार बनाते हैं, नई नौकरियों के बारे में जानकारी लेते हैं। यह सब जायज़ है, बशर्ते हज की रस्मों में कोई कमी न आए।

हज के बाद इंसान जिंदगी में एक नया मोड़ पाता है। वह गुनाहों से बचने लगता है, नमाज और कुरान की पाबंदी करने लगता है, और अल्लाह की तरफ रुख करने लगता है। यही असली कामयाबी है।

हज की रस्में

हज की रस्में जिल-हिज्जा महीने के 8 से 13 तारीख तक अदा की जाती हैं।

मुख्य रस्में ये हैं:

सबसे पहले हाजी इहराम बांधता है – मर्द दो सफेद चादरें पहनते हैं, औरतें अपने साधारण कपड़ों में रहती हैं। इहराम के बाद कुछ चीजें हराम हो जाती हैं – जैसे नाखून काटना, बाल बनाना, खुशबू लगाना, शिकार करना, जिमा करना और औरतों के लिए नकाब पहनना।

फिर हाजी मक्का पहुँचता है और काबा का तवाफ करता है – यानी काबा के सात चक्कर लगाता है। इसके बाद सफा और मरवा पहाड़ियों के बीच सई करता है – यानी सात चक्कर लगाता है। यह हजरत हाजिरा रज़ियल्लाहु अन्हा  के पानी की तलाश की याद है।

8 जिल-हिज्जा को हुज्जाज किराम मीणा जाते हैं और रात वहाँ गुज़ारते हैं । 9 जिल-हिज्जा को सबसे अहम दिन होता है – वुकूफ-ए-अरफा यानी अरफात के मैदान में खड़ा होना। रसूलुल्लाह ने फरमाया:

الْحَجُّ عَرَفَةُ,   हज अरफात (के मैदान में खड़ा होना) है।

यानी अगर कोई अरफात में नहीं गया, तो उसका हज अधूरा है। इस दिन हुज्जाज किराम दुआ करते हैं, गिड़गिड़ाते हैं और अल्लाह से रो-रोकर अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं। शाम को वे अरफ़ात से मुज़दलिफ़ा की ओर रवाना होते हैं। रात मुज़दलिफ़ा में गुज़ारते हैं और वहाँ कंकरियाँ इकट्ठा करते हैं।

10 ज़िल-हिज्जा को हुज्जाज किराम मीना लौटकर शैतान को कंकरियाँ मारते हैं (रमी जमरात) । फिर वे कुर्बानी करते हैं — बकरा, भेड़, ऊंट या गाय की। इसके बाद वे सिर मुंडवाते हैं या बाल छोटे करवाते हैं (हलक या तकसीर) । फिर एहराम खुल जाता है।

इसके बाद हुज्जाज किराम मक्का जाकर तवाफ़-ए-ज़ियारत करते हैं और सफ़ा-मरवा की सई दोबारा करते हैं। 11, 12 और 13 ज़िल-हिज्जा को वे मीना में रहते हैं और शैतान को दोबारा कंकरियाँ मारते हैं। आखिर में मक्का छोड़ने से पहले वे तवाफ़-ए-विदा करते हैं — यानी काबा का आखिरी बार तवाफ़ करके अलविदा कहते हैं।

हर रस्म के पीछे कोई न कोई इबादत और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम तथा उनके परिवार की कुर्बानी की याद छिपी हुई है। हज सिर्फ शरीर की यात्रा नहीं, बल्कि दिल का भी सफर है।

 

 

समापन

हज इस्लाम का वह बड़ा फर्ज है जिसे अल्लाह ने अपने घर की यात्रा के रूप में बनाया है। यह हर उस मुसलमान पर जरूरी है जो ताकत रखता हो। एक मकबूल हज सारे पिछले गुनाह माफ करवा देता है, जन्नत की गारंटी देता है, और इंसान को नए सिरे से जिंदगी शुरू करने का मौका देता है। हज सिखाता है कि इस्लाम में किसी को किसी पर बड़ाई नहीं – सब अल्लाह के बंदे हैं। यह सब्र, मोहब्बत, भाईचारा और अल्लाह पर भरोसा सिखाता है। जिसके पास पैसा और सेहत है, उसे चाहिए कि वह देर न करे और जल्द से जल्द इस फर्ज को पूरा करे। क्योंकि पता नहीं कल क्या हो। अल्लाह हम सबको अपने घर की यात्रा करने का मौका दे, हमारे हज को कबूल करे, और हमें जन्नत में जगह दे। आमीन।

 

लेखक: आज़म रज़ा, कुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज, बिहार में इंटरमीडिएट के छात्र हैं

Disclaimer

The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.

Leave A Comment

Related Posts

अपने सवाल और फ़तवे पूछें।

Recommended Posts

Voting Poll

Get Newsletter