तरावीह की नमाज़: रकअतों की तादाद, रूहानी हिकमत, और आज के समाज पर इसका असर
रमज़ान और रात की इबादत का अहमियत
रमज़ान-उल-मुबारक का महीना केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपनी रूह (आत्मा) को अल्लाह की याद से ताज़ा करने का महीना है। इस महीने में दो इबादतें सबसे प्रमुख हैं: दिन का रोज़ा और रात का कयाम। रात के इसी विशेष कयाम को हम 'तरावीह' कहते हैं। तरावीह का लफ़्ज़ी मायना 'आराम' है। चूंकि हर चार रकअत के बाद नमाज़ी बैठते हैं और ज़िक्र-ओ-अज़कार के ज़रिए आराम करते हैं, इसलिए इसे तरावीह कहा जाता है।
शरीयत की नज़र में तरावीह की नमाज़ 'सुन्नत-ए-मुअक्कदा' है, जिसका अर्थ है वह सुन्नत जिसे अल्लाह के रसूल सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनके सहाबा ने ताकीद (ज़ोर) के साथ निभाया।
अल्लाह तआला ने रात में इबादत करने वालों की खास तौर पर तारीफ़ फरमाई है।अल्लाह ताला कुरान-ए-करीम में इरशाद फरमाता है:
وَالَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَامًا
(और जो लोग अपने रब के सामने सजदे में और खड़े रहकर रातें गुज़ारते हैं — सूरा अल-फुरकान: 64)।
यह आयत स्पष्ट करती है कि रातों को जागकर अल्लाह की इबादत करना मुत्तक़ी (परहेज़गार) लोगों की पहचान है।
तरावीह की शुरुआत और रसूलुल्लाह का तरीका
तरावीह की नमाज़ का सिलसिला स्वयं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने शुरू किया था। आपने रमज़ान की कुछ रातें मस्जिद में जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ाई। लोग आपके पीछे जमा होने लगे। तीसरी या चौथी रात आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ नहीं लाए। सुबह होने पर आपने फरमाया कि मुझे तुम्हारे शौक का इल्म था, लेकिन मैं इसलिए नहीं आया कि कहीं यह नमाज़ तुम पर फर्ज़ न कर दी जाए और फिर तुम्हारे लिए इसे निभाना मुश्किल हो जाए।
बुखारी शरीफ में है:
عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ صَلَّى ذَاتَ لَيْلَةٍ فِي الْمَسْجِدِ، فَصَلَّى بِصَلَاتِهِ نَاسٌ، ثُمَّ صَلَّى مِنَ الْقَابِلَةِ فَكَثُرَ النَّاسُ، ثُمَّ اجْتَمَعُوا مِنَ اللَّيْلَةِ الثَّالِثَةِ أَوِ الرَّابِعَةِ، فَلَمْ يَخْرُجْ إِلَيْهِمْ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ، فَلَمَّا أَصْبَحَ قَالَ: "قَدْ رَأَيْتُ الَّذِي صَنَعْتُمْ، فَلَمْ يَمْنَعْنِي مِنَ الْخُرُوجِ إِلَيْكُمْ إِلَّا أَنِّي خَشِيتُ أَنْ تُفْرَضَ عَلَيْكُمْ" وَذَاكَ فِي رَمَضَانَ.
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने एक रात मस्जिद में नमाज़ पढ़ी और लोगों ने आपके साथ नमाज़ पढ़ी। दूसरी रात और ज़्यादा लोग आ गए। तीसरी या चौथी रात लोग फिर जमा हुए, लेकिन आप ﷺ बाहर नहीं आए। सुबह आपने फरमाया:
“मैंने देखा जो तुमने किया, लेकिन मुझे बाहर आने से इस बात ने रोका कि मुझे डर हुआ कहीं यह तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए।” और ये रमजान में हुआ।
रसूल का ये फरमान:
خَشِيتُ أَنْ يُكْتَبَ عَلَيْكُمْ
“मुझे डर हुआ कि कहीं यह तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए।”
यही वह कारण था कि नबी ﷺ ने तरावीह को लगातार जमाअत से पढ़ाना बंद कर दिया।
خَشِيتُ أَنْ يُكْتَبَ عَلَيْكُمْका मतलब क्या है?
- नबी ﷺ अपनी उम्मत पर आसानी चाहते थे।
- अगर आप ﷺ लगातार जमाअत से तरावीह पढ़ाते रहते, तो अल्लाह उसे फ़र्ज़ कर सकता था।
- इसलिए आपने इसे नियमित जमाअत से बंद कर दिया।
- लेकिन रमज़ान के क़ियाम की फ़ज़ीलत बयान की।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तरावीह की बहुत बड़ी फज़ीलत बयान की है। नबी-ए-करीम सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम का इर्शाद है:
مَنْ قَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِه
ِ (जिस व्यक्ति ने रमज़ान की रातों में ईमान के साथ और सवाब की नियत से नमाज़ पढ़ी, उसके पिछले तमाम गुनाह माफ कर दिए जाएंगे — सहीह बुखारी
इस हदीस से हमें यह समझ में आता है कि तरावीह की नमाज़ पिछले एक साल के गुनाहों की माफ़ी का अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ा तोहफ़ा है।
रकअतों की तादाद का ऐतिहासिक सबूत: 20 रकअत ही क्यों?
आज के ज़माने में कुछ लोग तरावीह की रकअतों की गिनती को लेकर कन्फ्यूज़ रहते हैं। लेकिन जब हम इस्लामी इतिहास और सहाबा के अमल को देखते हैं, तो बात बिलकुल साफ हो जाती है।
नबी ﷺ के बाद क्या हुआ?
नबी ﷺ की वफ़ात के बाद वही (वही) का सिलसिला बंद हो गया। इसलिए:
- अब यह डर नहीं रहा कि तरावीह फ़र्ज़ कर दी जाएगी।
- लोग अलग-अलग या छोटे समूहों में नमाज़ पढ़ते रहे।
- यह सिलसिला हज़रत अबू बकर रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर में भी जारी रहा।
हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर में व्यवस्था
जब हज़रत उमर इब्न अल-खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने लोगों को मस्जिद में अलग-अलग जमाअतों में नमाज़ पढ़ते देखा, तो उन्होंने सोचा कि सबको एक इमाम के पीछे जमा कर देना बेहतर होगा। उन्होंने सहाबी उबैय इब्न का'ब रज़ियल्लाहु अन्हु को इमाम मुक़र्रर किया।
बुखारी शरीफ में है:
وَعَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدٍ الْقَارِيِّ، أَنَّهُ قَالَ خَرَجْتُ مَعَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ ـ رضى الله عنه ـ لَيْلَةً فِي رَمَضَانَ، إِلَى الْمَسْجِدِ، فَإِذَا النَّاسُ أَوْزَاعٌ مُتَفَرِّقُونَ يُصَلِّي الرَّجُلُ لِنَفْسِهِ، وَيُصَلِّي الرَّجُلُ فَيُصَلِّي بِصَلاَتِهِ الرَّهْطُ
فَقَالَ عُمَرُ: إِنِّي أَرَى لَوْ جَمَعْتُ هَؤُلاَءِ عَلَى قَارِئٍ وَاحِدٍ لَكَانَ أَمْثَلَ، ثُمَّ عَزَمَ فَجَمَعَهُمْ عَلَى أُبَىِّ بْنِ كَعْبٍ، ثُمَّ خَرَجْتُ مَعَهُ لَيْلَةً أُخْرَى، وَالنَّاسُ يُصَلُّونَ بِصَلاَةِ قَارِئِهِمْ، قَالَ عُمَرُ: نِعْمَ الْبِدْعَةُ هَذِهِ،
وَالَّتِي يَنَامُونَ عَنْهَا أَفْضَلُ مِنَ الَّتِي يَقُومُونَ، يُرِيدُ آخِرَ اللَّيْلِ، وَكَانَ النَّاسُ يَقُومُونَ أَوَّلَهُ
इब्न शिहाब, उरवा बिन जुबैर और अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल क़ारी बयान करते हैं कि वे एक रात रमज़ान में हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ मस्जिद गए। वहाँ लोगों को अलग-अलग समूहों में नमाज़ पढ़ते देखा। कोई अकेले नमाज़ पढ़ रहा था और कुछ लोग छोटे-छोटे गिरोह में किसी के पीछे नमाज़ पढ़ रहे थे।
हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा:
“मेरा विचार है कि अगर मैं इन सबको एक ही क़ारी (इमाम) के पीछे जमा कर दूँ तो यह ज़्यादा बेहतर होगा।”
फिर उन्होंने सबको हज़रत उबय्य बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु के पीछे जमा कर दिया।
कुछ दिन बाद वे फिर मस्जिद गए तो देखा कि सब लोग एक ही इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ रहे हैं। यह देखकर हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: نِعْمَ الْبِدْعَةُ هَذِهِ،
“यह कितनी अच्छी नई व्यवस्था है!”
“निअमतुल बिदअह” का अर्थ
“निअमतुल बिदअह” का आसान मतलब यह है कि यह कोई नई नमाज़ या नई इबादत नहीं थी। तरावीह पहले से ही नबी ﷺ की सुन्नत थी। हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने बस लोगों को एक इमाम के पीछे इकट्ठा कर दिया, ताकि सब मिलकर आसानी से नमाज़ पढ़ सकें।
यही वह अमल है जिसे चारों बड़े इमामों (इमाम अबु हनीफा, इमाम शाफई, इमाम मलिक, इमाम अहमद बिन हंबल) ने अपनाया। यहाँ तक कि मक्का और मदीना के हरम में भी सदियों से 20 रकअत ही पढ़ी जा रही है।
तो चांद रात से ही ऐशा फर्ज नमाज के बाद 20 रेकात तरावीह पढ़ना हर औरत व मर्द के लिए सुन्नत-ए-मुअक्कदा है और जमात से अदा करना सुन्नते किफाया है। यानि अगर मोहल्ले की मस्जिद में कुछ लोग बा-जमाअत तरावीह पढ़ लें, तो बाकी लोगों से भी इसकी ज़िम्मेदारी उतर जाती है। लेकिन अगर मोहल्ले में कोई भी जमाअत के साथ तरावीह न पढ़े, तो सभी लोग गुनाहगार होंगे, क्योंकि उन्होंने एक ज़रूरी सुन्नत को मिलकर छोड़ दिया।
कुरान के सुनने की हिकमत और तरतील का नियम
तरावीह की नमाज़ का सबसे बड़ा मक़सद पूरा कुरान सुनना है। चूंकि कुरान अल्लाह की किताब है, इसलिए इसे पढ़ने और सुनने के कुछ नियम हैं। अल्लाह तआला का हुक्म है:
وَرَتِّلِ الْقُرْآنَ تَرْتِيلًا
(और कुरान को ठहर-ठहर कर और साफ़-साफ़ पढ़ो — सूरा अल-मुज़म्मिल: 4)।
आजकल देखा जाता है कि कुछ जगहों पर 'शब्बीना' या बहुत तेज़ तरावीह पढ़ी जाती है, जिससे शब्दों का गला घोंट दिया जाता है। 20 रकअत होने की हिकमत यही है कि इमाम साहब को काफी समय मिले ताकि वे इत्मीनान से हर हर्फ (अक्षर) को स्पष्ट पढ़ें। जब कुरान सुकून से पढ़ा जाता है, तभी सुनने वाले के दिल पर उसका असर होता है। जल्द खत्म करने के चक्कर में कुरान को तेज़ पढ़ना शरीयत के खिलाफ है।
तरावीह के सामाजिक और रूहानी लाभ
तरावीह सिर्फ़ एक व्यक्तिगत इबादत नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक असर भी बहुत गहरे होते हैं:
सामूहिक एकता: जब पूरा मोहल्ला एक ही इमाम के पीछे खड़ा होता है, तो भेदभाव मिट जाते हैं। अल्लाह तआला फरमाता है:
وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا
(और अल्लाह की रस्सी को सब मिलकर मज़बूती से थाम लो और अलग-अलग फ़िरकों में मत बंटो — सुरह आल इमरान: 103)।
देखा जाए तो बेशक तरावीह इसी एकता और इत्तेहाद की अच्छी मिसाल है।
नफ्स (अहंकार) का इलाज: दिन भर भूख सहने के बाद रात को डेढ़ घंटा खड़ा रहना इंसान के घमंड को तोड़ता है और उसे आज़िजी (विनम्रता) सिखाता है।
अनुशासन: 30 दिनों तक रोज़ समय पर नमाज़ पढ़ना इंसान की ज़िंदगी में पाबंदी और अनुशासन पैदा करता है।
सेहत के लिहाज़ से तरावीह के फायदे
आज का विज्ञान भी यह मानता है कि नमाज़ की हरकतों से जिस्म को कई तरह के फायदे मिलते हैं:
पाचन (Digestion): इफ्तार में खाना खाने के बाद जब इंसान नमाज़ में खड़ा होता है, रुकू और सजदा करता है, तो ये हरकतें पाचन तंत्र को बेहतर ढंग से काम करने में मदद करती हैं।
जोड़ों की सेहत: बार-बार रुकू और सजदा करने से घुटनों, कूल्हों और रीढ़ की हड्डी की हल्की कसरत हो जाती है, जिससे जोड़ों में लचीलापन और मजबूती आती है।
मानसिक सुकून: अल्लाह की याद और कुरआन की तिलावत सुनने से दिल को सुकून मिलता है। इससे शरीर में ऐसे हार्मोन निकलते हैं जो तनाव और उदासी को कम करने में मदद करते हैं।
महिलाओं की तरावीह और घर की बरकत
महिलाओं के लिए तरावीह घर पर पढ़ना अफज़ल है। नबी सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि औरतों की घर के अंदरूनी हिस्सों की नमाज़ बेहतर है। जब घर की महिलाएं तरावीह पढ़ती हैं, तो पूरे घर में बरकत और नूर आता है। घर के बच्चे उन्हें देखकर इबादत के आदी बनते हैं।
तरावीह की दुआ और ज़िक्र का महत्व
हर चार रकअत के बाद जो वक़्फ़ा (गैप) लिया जाता है, वह अल्लाह की बड़ाई बयान करने का समय है। प्रचलित दुआ سُبْحَانَ ذِي الْعِزَّةِ وَالْعَظَمَةِ وَالْكِبْرِيَاءِ وَالْجَبَرُوتِ، سُبْحَانَ الْمَلِكِ الْحَيِّ الَّذِي لَا يَنَامُ وَلَا يَمُوتُ، سُبُّوحٌ قُدُّوسٌ، رَبُّنَا وَرَبُّ الْمَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ، اَللَّهُمَّ أَجِرْنَا مِنَ النَّارِ، يَا مُجِيرُ، يَا مُجِيرُ، يَا مُجِيرُ.
अल्लाह की पाकी बयान करने का एक बहुत खूबसूरत तरीका है। यह समय दुआओं की कुबूलियत का होता है।
आधुनिक चुनौतियां और सावधानियाँ
आज सोशल मीडिया की वजह से हमारी तवज्जो (ध्यान) नमाज़ में कम हो जाती है। तरावीह के दौरान मोबाइल को बंद कर देना या दूर रख देना बहुत ज़रूरी है, ताकि हमारा दिल पूरी तरह अल्लाह की तरफ़ लग सके।
इसके अलावा, जब हम तरावीह में खड़े हों तो इमाम साहब की तिलावत को ध्यान से सुनना चाहिए। इधर-उधर की बातें करना या ध्यान भटकाना ठीक नहीं है। नमाज़ का असली मकसद दिल की हाज़िरी और अल्लाह से जुड़ाव है, इसलिए हमें पूरी एकाग्रता के साथ इबादत करनी चाहिए।
निष्कर्ष
तरावीह की नमाज़ अल्लाह ताला का वह उपहार है जो हमारे दिलों को रोशन करता है। 20 रकअत तरावीह सहाबा का तरीका है और इसी में पूरी उम्मत की भलाई है। हमें रकअतों की बहस में पड़कर अपनी इबादत और भाईचारे को खराब नहीं करना चाहिए। रमज़ान का असली मक़सद कुरान से रिश्ता जोड़ना है, और तरावीह वह पुल है जो हमें कुरान के करीब ले जाती है।
अल्लाह से दुआ है कि वह हमें इस रमज़ान में मुकम्मल 20 रकअत तरावीह पूरे खुशू-ओ-खुज़ू के साथ पढ़ने की तौफीक अता फरमाए और हमारी इस टूटी-फूटी इबादत को अपनी बारगाह में कुबूल फरमाए। आमीन।
संदर्भ
सूरा अल-फुरकान (Surah Al-Furqan) – आयत 64
सूरा अल-मुज़म्मिल (Surah Al-Muzzammil) – आयत 4
सूरह आल-इमरान (Surah Aal-e-Imran) – आयत 103
सहीह अल-बुखारी (Sahih al-Bukhari)
लेखक:
मुहम्मद सनाउल्लाह, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी,मलप्पुरम, केरल के डिग्री सेकंड ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं।
एंव
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
Disclaimer
The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.
Leave A Comment