भारत की संविधान-निर्माण प्रक्रिया में मुसलमानों की भूमिका
प्रस्तावना
गणतंत्र दिवस (Republic Day) किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के इतिहास का वह स्वर्णिम और गौरवपूर्ण दिन होता है, जो उसकी राजनीतिक संप्रभुता (Political Sovereignty), संवैधानिक सर्वोच्चता (Constitutional Supremacy) और जनता की सर्वोच्च सत्ता (Popular Sovereignty) की औपचारिक और व्यावहारिक घोषणा करता है।
भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और बहु-धार्मिक (multi-religious) देश में गणतंत्र दिवस का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। हमारे देश भारत में यह दिन हर वर्ष 26 जनवरी को पूरे उत्साह, गरिमा और राष्ट्रीय भावना के साथ मनाया जाता है।
यह वही ऐतिहासिक दिन है, जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान (Constitution of India) लागू हुआ और भारत एक संप्रभु (Sovereign), लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक राष्ट्र (Democratic Republic) के रूप में विश्व के मानचित्र पर स्थापित हुआ।
इस संविधान ने भारत के सभी नागरिकों को – चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, भाषा या संस्कृति से संबंधित हों – समान अधिकार (Equal Rights), धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया।
भारतीय संविधान की यह महानता किसी एक व्यक्ति, समुदाय या वर्ग की देन नहीं है, बल्कि यह विभिन्न धर्मों, विचारधाराओं और सामाजिक समूहों की सामूहिक बौद्धिक साधना (Collective Intellectual Effort) का परिणाम है। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में भारतीय मुसलमानों और विशेष रूप से उलेमा-ए-किराम (Islamic Scholars) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण, दूरदर्शी और राष्ट्रनिर्माणकारी रही है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त हुई। स्वतंत्रता के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि नव-स्वतंत्र भारत को एक ऐसे संविधान की आवश्यकता है, जो देश की विविधता (Diversity) को एकता (Unity) में बदल सके और सभी नागरिकों को न्यायपूर्ण व्यवस्था प्रदान करे।
इसी उद्देश्य से एक संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन किया गया, जिसका कार्य भारत के लिए एक व्यापक, समावेशी (Inclusive) और स्थायी संविधान तैयार करना था।
संविधान सभा ने सात सदस्यों वाली एक प्रारूप समिति (Drafting Committee) गठित की, जिसकी अध्यक्षता डॉ. बी. आर. अंबेडकर (Dr. B. R. Ambedkar) ने की।
इस समिति ने लगभग दो वर्ष, ग्यारह महीने और अठारह दिन, अर्थात लगभग तीन वर्षों की अथक मेहनत के बाद भारतीय संविधान का मसौदा (Draft) तैयार किया।
इस मसौदे को भारत की संसद (Parliament) द्वारा स्वीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया। इसी दिन से भारत को आधिकारिक रूप से “गणराज्य भारत” (Republic of India) कहा जाने लगा।
भारतीय संविधान का महत्व (Importance of the Indian Constitution)
भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान (Longest Written Constitution) है। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और दर्शन ( Soul and Philosophy of the Nation) का प्रतिबिंब (Reflection) है।
इस संविधान के मूल स्तंभ हैं –
- न्याय (Justice)
- स्वतंत्रता (Liberty)
- समानता (Equality)
- बंधुत्व (Fraternity)
संविधान ने नागरिकों को मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) प्रदान किए, साथ ही राज्य को यह निर्देश दिया कि वह सामाजिक न्याय (Social Justice), आर्थिक समानता और धार्मिक सद्भाव को सुनिश्चित करे।
संविधान निर्माण में मुसलमानों और उलेमा की बौद्धिक भूमिका
भारतीय संविधान का निर्माण केवल एक प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया नहीं था, बल्कि यह विभिन्न धर्मों, समुदायों और विचारधाराओं की साझा बौद्धिक जद्दोजहद (Collective Intellectual Struggle) का परिणाम था।
इस प्रक्रिया में मुसलमानों और विशेष रूप से उलेमा-ए-किराम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
जिस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम (Freedom Struggle) में मुसलमानों ने अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष किया, उसी प्रकार स्वतंत्र भारत की नींव रखने में भी उन्होंने विवेक, संतुलन और दूरदृष्टि का परिचय दिया।
उलेमा ने यह स्पष्ट किया कि एक बहु-धार्मिक समाज में लोकतंत्र (Democracy), सहिष्णुता (Tolerance) और पारस्परिक सम्मान (Mutual Respect) ही स्थायी शांति का आधार हो सकते हैं।
यदि संविधान बनते समय मुसलमानों और उलेमा ने समझदारी और व्यापक सोच (broad vision) का परिचय न दिया होता, तो भारत आज सांप्रदायिक टकराव, धार्मिक कट्टरता और अंदरूनी अस्थिरता का शिकार हो सकता था। आज भारत में जो धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom), अभिव्यक्ति की आज़ादी (Freedom of Expression) और शांतिपूर्ण विरोध (Peaceful Protest) का अधिकार मौजूद है, वह उसी दूरदर्शी और संतुलित सोच का परिणाम है, जिसने देश को लोकतांत्रिक और बहुलतावादी (pluralistic) रास्ते पर आगे बढ़ाया।
संविधान सभा में मुसलमानों की भागीदारी (Muslim Representation in the Constituent Assembly)
संविधान सभा में लगभग 30 से 35 मुस्लिम सदस्य शामिल थे, जिन्होंने विभिन्न समितियों और बहसों में सक्रिय भूमिका निभाई।
इन प्रमुख मुस्लिम सदस्यों में शामिल थे:
- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
- डॉ. सैयद महमूद
- डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू
- बेगम ऐज़ाज़ रसूल
- हसरत मोहानी
- मोहम्मद इस्माइल
- हुसैन इमाम
- मोहम्मद ताहिर
इन सभी नेताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom), अल्पसंख्यक अधिकार (Minority Rights), संघीय ढांचा (Federal Structure) और मौलिक अधिकारों पर गंभीर और सार्थक विचार प्रस्तुत किए।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का योगदान
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भारतीय राष्ट्रवाद (Indian Nationalism) के सबसे प्रखर विचारकों में से एक थे।
वे संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, किंतु उनके विचारों का संविधान की आत्मा पर गहरा प्रभाव पड़ा।
उन्होंने धर्मनिरपेक्षता (Secularism), संयुक्त राष्ट्रवाद (Composite Nationalism) और शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण का आधार बताया।
उनका मानना था कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
बेगम ऐज़ाज़ रसूल और लोकतांत्रिक सोच
बेगम ऐज़ाज़ रसूल संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। उन्होंने पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) का विरोध किया और समान नागरिक अधिकार (Equal Citizenship) का समर्थन किया। यह उनके लोकतांत्रिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण का प्रमाण है।
धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता (Secularism and Religious Freedom)
भारतीय संविधान में सेक्युलरिज़्म (Secularism) का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है। मुस्लिम नेताओं ने इस अवधारणा को मज़बूती प्रदान की। इसी संतुलित और दूरदर्शी सोच (vision) के कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 (Articles 25–28) के तहत हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, उस पर चलने, उसका प्रचार (practice & propagation) और प्रसार करने की पूरी धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) दी गई।
यही संवैधानिक व्यवस्था भारत को एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष (Secular) और बहुधार्मिक (Multi-religious) राष्ट्र बनाती है, जहाँ अलग-अलग आस्थाएँ समान सम्मान के साथ साथ-साथ रह सकती हैं।
मौलिक अधिकार और समानता (Fundamental Rights and Equality)
मुस्लिम सदस्यों ने संविधान में समानता और न्याय को केंद्रीय स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके परिणामस्वरूप:
- अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता (Equality Before Law)
- अनुच्छेद 15 – भेदभाव की मनाही (Prohibition of Discrimination)
- अनुच्छेद 16 – समान अवसर (Equal Opportunity)
जैसी धाराएँ संविधान में शामिल की गईं।
भाषायी और सांस्कृतिक संरक्षण (Linguistic and Cultural Preservation)
मुस्लिम प्रतिनिधियों ने उर्दू सहित सभी अल्पसंख्यक भाषाओं और संस्कृतियों की सुरक्षा (Protection of Minority Languages and Cultures) और विकास की ज़ोरदार वकालत की। उनका मानना था कि भारत की पहचान उसकी विविधता में है, न कि एकरूपता में।
इसी सोच के तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 (Articles 29–30) में अल्पसंख्यकों को यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी भाषा (language), संस्कृति (culture) की रक्षा कर सकें और अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ (Educational Institutions) स्थापित व संचालित कर सकें। ये प्रावधान भारत को एक बहुलतावादी (Pluralistic) और न्यायपूर्ण (Just) समाज बनाने की मजबूत नींव रखते हैं।
इस्लामी मूल्य और संवैधानिक आदर्श (Islamic Values and Constitutional Ideals)
इस्लाम के बुनियादी उसूल—न्याय (Justice), समानता (Equality), मानव गरिमा (Human Dignity) और परामर्श (Consultation / Shūrā – شُورَىٰ)—भारतीय संविधान (Indian Constitution) में निहित मौलिक मूल्यों (Core Values) से गहरा सामंजस्य रखते हैं। दोनों ही व्यवस्थाएँ न्यायपूर्ण समाज (Just Society), कानून के सामने समानता (Equality before Law), मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) और मानवीय सम्मान (Human Respect) की रक्षा पर ज़ोर देती हैं।
इसी वैचारिक समानता (Ideological Similarity) और नैतिक तालमेल (Ethical Harmony) के कारण मुसलमानों ने भारतीय संविधान को पूरे मन से स्वीकार किया और उसके निर्माण, संरक्षण तथा सुदृढ़ीकरण (Strengthening) में सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता (Secularism), बहुलवाद (Pluralism) और सामाजिक न्याय (Social Justice) जैसे सिद्धांतों को मज़बूत करने में सकारात्मक भूमिका अदा की, जिससे भारत एक समावेशी राष्ट्र (Inclusive Nation) के रूप में आगे बढ़ सका।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारतीय संविधान के निर्माण में मुसलमानों का योगदान केवल संख्या तक सीमित नहीं था, बल्कि वह वैचारिक, नैतिक और व्यावहारिक स्तर पर अत्यंत गहरा और प्रभावशाली रहा।
उनकी दूरदृष्टि, संतुलन और लोकतांत्रिक सोच ने भारतीय संविधान को एक समावेशी और मानवीय दस्तावेज़ बनाया।
आज गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय संविधान हम सभी की साझा विरासत (Shared Heritage) है, और मुसलमानों का योगदान इस विरासत का अविभाज्य अंग है।
यह संविधान हमें अपने वतन से बहुत प्यारा लगता है,
अंधेरी रात में जैसे कोई चमकता हुआ सितारा।
संदर्भ (References)
- Granville Austin, The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation
- Constituent Assembly Debates (CAD), 1946–1949
- Maulana Abul Kalam Azad, India Wins Freedom
- Mushirul Hasan, Legacy of a Divided Nation
- Ramiz Ahmad Taqi, Research Articles on Muslim Members of Constituent Assembly
लेखक:
इमरान अंसारी, सीनियर सेकेंडरी फाइनल ईयर, क़ुरतुबा इंस्टिट्यूट, किशनगंज, बिहार
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