इस्लामी शरिया के चार प्रमुख स्तंभ: कुरान, सुन्नत, इज्मा और कियास

भूमिका (Introduction):

इस्लामी शरीअत, जिसे आम तौर पर “इस्लामी क़ानून” कहा जाता है, असल में मुसलमानों के लिए अल्लाह की तरफ़ से दी गई ज़िंदगी जीने की पूरी रहनुमाई है।
शरीअत शब्द अरबी भाषा के “श-र-आ” से निकला है, जिसका मतलब है पानी तक पहुँचने का रास्ता, यानी जीवन का सीधा और साफ़ रास्ता।

शरिया केवल धार्मिक अनुष्ठानों (Rituals) या इबादतों (Acts of Worship – العبادات) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत नैतिकता (Personal Ethics – الأخلاق), पारिवारिक कानून (Family Law – الأحوال الشخصية), सामाजिक न्याय (Social Justice – العدل), आर्थिक व्यवस्था (Economic System – المعاملات), राजनीतिक शासन (Political Governance – السياسة الشرعية), आपराधिक दंड (Criminal Punishments – الحدود والتعزيرات), और अंतरराष्ट्रीय संबंधों (International Relations – المعاملات الدولية) जैसे सभी क्षेत्रों को नियंत्रित करती है।

शरीअत की बुनियाद चार मुख्य स्रोतों पर है, जिन्हें उसूल-ए-फ़िक़्ह कहा जाता है।
ये चार स्रोत हैं— क़ुरआन, सुन्नत, इज्मा और क़ियास।

क़ुरआन अल्लाह का उतारा हुआ कलाम है। सुन्नत पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का जीवन और उनका तरीका है। इज्मा इस्लामी विद्वानों की आपसी सहमति को कहा जाता है। क़ियास पुराने नियमों की मदद से नए मसलों का हल निकालने का तरीका है।

क़ुरआन (Qura’n)

शरीअत का सबसे पहला और हमेशा रहने वाला स्रोत:

क़ुरआन इस्लामी शरीअत का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसे अल्लाह का वही कलाम माना जाता है जो हज़रत मुहम्मद ﷺ पर 23 वर्षों में फ़रिश्ते जिब्रील के ज़रिये उतारा गया। क़ुरआन में 114 सूरहें और 6000 से ज़्यादा आयतें हैं। यह शरीअत का सबसे बड़ा अधिकार है और बाकी सभी स्रोतों से ऊपर है। सुन्नत, इज्मा या क़ियास से निकाला गया कोई भी फ़ैसला तब तक सही माना जाता है जब तक वह क़ुरआन के ख़िलाफ़ न हो।

क़ुरआन ज़िंदगी के बहुत से विषयों पर मार्गदर्शन देता है, जैसे— अक़ीदा यानी विश्वास, इबादत, लेन-देन और व्यापार, परिवार से जुड़े नियम, और अपराध व सज़ा से संबंधित क़ानून।

क़ुरआन में नमाज़, रोज़ा और विरासत जैसे मामलों पर साफ़ आदेश दिए गए हैं। कुछ जगहों पर सीधे नियम हैं और कुछ जगहों पर ऐसे सामान्य सिद्धांत हैं जिनसे विद्वान आगे की व्याख्या करते हैं।
इसलिए विद्वान क़ुरआन की आयतों को दो हिस्सों में बाँटते हैं— एक वे जिनका अर्थ बिल्कुल साफ़ है, और दूसरी वे जिनकी व्याख्या सोच-विचार से की जाती है।

क़ुरआन की एक खास बात यह है कि यह इंसाफ़, रहम और अच्छे आचरण पर ज़ोर देता है।
यह ज़ुल्म से मना करता है और क़ानून के मामले में सबको बराबर मानने की शिक्षा देता है।
क़ुरआन के अल्लाह की ओर से होने का एक बड़ा प्रमाण यह भी है कि नबी ﷺ पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी क़ुरआन की भाषा, सुंदरता और उसमें बताए गए वैज्ञानिक संकेत विद्वानों को हैरान करते हैं।

इतिहास में नबी ﷺ के ज़माने में क़ुरआन नए हालात के अनुसार उतरता रहा।
जैसे शराब को धीरे-धीरे हराम किया गया। पहले उसके नुक़सान बताए गए, फिर नमाज़ के समय रोका गया और अंत में पूरी तरह मना कर दिया गया।

नबी ﷺ के बाद क़ुरआन को हिफ़्ज़ यानी याद रखने और लिखित रूप में जमा किया गया।
ख़लीफ़ा अबू बक्र और फिर उस्मान رضي الله عنه के दौर में इसे एक किताब की शक्ल दी गई, और तब से आज तक यह बिना बदले सुरक्षित है।

फ़िक़्ह के सभी बड़े स्कूल—ह़नफ़ी, मालिकी, शाफ़ई और हंबली—क़ुरआन को सबसे ऊपर रखते हैं।
फ़र्क़ सिर्फ़ समझने के तरीक़े में है। कोई सामान्य अर्थ पर ज़ोर देता है, तो कोई खास शब्दों पर।

क़ुरआन इंसान को सोचने और समझने की दावत भी देता है, ताकि विद्वान नई परिस्थितियों में शरीअत के नियम निकाल सकें। यही बात आगे के स्तंभों—सुन्नत, इज्मा और क़ियास—से जुड़ती है।

सुन्नत (Sunnah)

नबी का आदर्श जीवन और शरीअत का दूसरा स्रोत:

सुन्नत शरीअत का दूसरा बड़ा स्तंभ है। सुन्नत से मतलब है— नबी मुहम्मद ﷺ के कहने के तरीके, करने के काम, और किसी काम को देखकर चुप रहकर मंज़ूरी देना।

क़ुरआन हमें मूल नियम बताता है, और सुन्नत यह सिखाती है कि उन नियमों को ज़िंदगी में कैसे अपनाया जाए।
जैसे— क़ुरआन नमाज़ का हुक्म देता है, लेकिन नमाज़ कैसे पढ़नी है, यह सुन्नत से पता चलता है। इसी तरह हज के सारे तरीक़े भी सुन्नत से ही मालूम होते हैं।

सुन्नत हमें हदीस की किताबों में मिलती है। हदीसों को जाँचने के लिए उनके बयान करने वालों की पूरी कड़ी देखी जाती है, जिसे इसनाद कहा जाता है। सबसे मशहूर हदीस की किताबें हैं— सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, और अबू दाऊद, इब्न माजा, तिर्मिज़ी और नसाई की सुन्नन, जिन्हें सिहाहे सित्ता कहा जाता है।

हदीसों को चार हिस्सों में बाँटा गया है—
सहीह यानी बिल्कुल सही (صحيح), हसन (حسن)यानी अच्छी, ज़ईफ़ (ضعيف)यानी कमज़ोर, और मौज़ू(موضوع) यानी गढ़ी हुई। इससे यह तय किया जाता है कि कौन-सी हदीस भरोसे के लायक़ है।

क़ुरआन में सुन्नत को मानने का आदेश:
وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا
जो कुछ रसूल तुम्हें दें, उसे ले लो, और जिससे वे रोकें, उससे रुक जाओ। (सूरह अल-हश्र) (59:7)

यह आयत साफ़ बताती है कि सुन्नत को मानना ज़रूरी है।

सुन्नत उन बातों को भी समझाती है जो क़ुरआन में विस्तार से नहीं आई हैं। जैसे— विरासत के बारीक हिस्से, व्यापार के उसूल, और सूद (रिबा) से जुड़े नियम।

सूद के बारे में हदीस:
لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ آكِلَ الرِّبَا وَمُؤْكِلَهُ وَكَاتِبَهُ وَشَاهِدَيْهِ وَقَالَ هُمْ سَوَاءٌ
अल्लाह के रसूल ﷺ ने सूद खाने वाले, सूद देने वाले, उसे लिखने वाले और उस पर गवाही देने वाले सब पर लानत की और फ़रमाया कि ये सब बराबर हैं। (सहीह मुस्लिम)

यह हदीस क़ुरआन में सूद की मनाही को और साफ़ कर देती है।

नबी ﷺ के ज़माने में सुन्नत ज़्यादातर याद करके लोगों तक पहुँचाई जाती थी। बाद में इसे किताबों में जमा किया गया, ताकि झूठी बातें शामिल न हो जाएँ।
कुछ लोगों ने सुन्नत की हैसियत पर सवाल उठाया, लेकिन इस्लामी विद्वानों ने इसे भी अल्लाह की तरफ़ से रहनुमाई माना, हालांकि क़ुरआन की तरह शब्दों में नहीं।

सुन्नत रोज़मर्रा की ज़िंदगी को भी रास्ता दिखाती है— जैसे सफ़ाई, अच्छे व्यवहार, और जंग के नियम तक।

क़ुरआन और सुन्नत का रिश्ता बहुत गहरा है। जहाँ क़ुरआन बात को संक्षेप में कहता है, वहीं सुन्नत उसकी पूरी व्याख्या कर देती है। जैसे चोरी की सज़ा से जुड़ी आयत की शर्तें हमें हदीस से समझ में आती हैं।

इज्मा )Scholarly Consensus(

उम्मत की सामूहिक सहमति

इज्मा की सरल परिभाषा:

जब क़ुरआन और सुन्नत में किसी मसले का स्पष्ट हुक्म मिले, और उस दौर के सभी मुज्तहिद उलेमा किसी एक राय पर सहमत हो जाएँ, तो उस सहमति को इज्मा कहा जाता है।

 

इज्मा शरीअत का तीसरा स्तंभ है। इज्मा का मतलब है— नबी ﷺ के इंतक़ाल के बाद किसी शरीअत के मसले पर इस्लामी विद्वानों (मुज्तहिदों) की आपसी सहमति।

इज्मा का उद्देश्य मुसलमानों को एकजुट रखना है, ताकि उम्मत में फूट न पड़े। यह शब्द “जमा” से निकला है, जिसका अर्थ है इकट्ठा होना।
जब किसी मसले पर सभी विद्वानों की सहमति हो जाती है, तो वह फ़ैसला मान्य माना जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि पूरी उम्मत मिलकर ग़लती पर सहमत नहीं हो सकती।

क़ुरआन में भी सलाह-मशवरे का आदेश है:
وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ
और उनके सारे काम आपस की सलाह से होते हैं। (सूरह अश-शूरा (42:38)

यह आयत बताती है कि इस्लाम में मिल-बैठकर फ़ैसला करने को महत्व दिया गया है।

इज्मा के बारे में हदीस में ये बताया गया है कि:
إِنَّ أُمَّتِي لَنْ تَجْتَمِعُ عَلَى ضَلَالَةٍ
मेरी उम्मत कभी गुमराही पर इकट्ठा नहीं होगी। (सुनन इब्न माजा)

इज्मा के दो प्रकार होते हैं—
एक वह जिसमें विद्वान साफ़ तौर पर सहमति जताते हैं,
और दूसरा वह जिसमें विद्वान चुप रहते हैं, और उनकी चुप्पी को सहमति माना जाता है।

इज्मा उन मसलों में लागू होता है जिनका साफ़ ज़िक्र क़ुरआन और सुन्नत में नहीं मिलता।
जैसे— क़ुरआन को एक किताब की शक्ल में जमा करना, जो हज़रत अबू बक्र رضي الله عنه के ज़माने में हुआ।

इज्मा के और भी  उदाहरण हैं— जैसे के ख़िलाफ़त की ज़रूरत पर सहमति, और शराब जैसी चीज़ों के आधार पर नई नशीली चीज़ों को हराम ठहराना। सुन्नी विद्वान सभी योग्य विद्वानों के इज्मा को मानते हैं, जबकि शिया विचारधारा में इसे सीमित रखा गया है।

आज के समय में भी इज्मा का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे अंगदान (organ donation), चिकित्सा से जुड़े मामले (medical issues) और नए सामाजिक सवालों पर इस्लामी फ़िक़्ह काउंसिल (Fiqh Council) मिलकर फ़ैसले करती है।
इज्मा का काम यह है कि वह ग़लत और बिगड़ी हुई रस्मों को रोकता है, लेकिन साथ ही समय की ज़रूरत के मुताबिक सही और लाभकारी बदलावों की इजाज़त भी देता है। इस तरह इज्मा इस्लाम को स्थिर भी रखता है और व्यावहारिक भी बनाता है।

क़ियास )Analogical Reasoning(

तुलना के ज़रिये शरीअत का फ़ैसला:

क़ियास की सरल परिभाषा:

जब किसी नए मुद्दे पर क़ुरआन, सुन्नत या इज्मा में सीधा हुक्म न मिले, तब
मिलते-जुलते पुराने मामले से तुलना करके शरीअत का हुक्म निकाला जाता है—इसे ही क़ियास कहते हैं।

क़ियास शरीअत का चौथा स्तंभ है। इसका मतलब है कि क़ुरआन, सुन्नत या इज्मा में जो हुक्म किसी मामले के लिए दिया गया है, उसी कारण (reason) के आधार पर उसे नए मामलों पर लागू किया जाए।

क़ियास की वजह से शरीअत में लचीलापन (flexibility) आता है और इस्लामी क़ानून हर दौर (every age) में लागू रहने योग्य बनता है।

क़ियास के चार मूल तत्व (Arkan al-Qiyās)

  1. अस्ल (Al) – मूल मामला
    जैसे: शराब (ख़मर)
  2. फ़र (Far‘) – नया मामला
    जैसे: नशीली ड्रग्स
  3. हुक्म (ukm) – मूल मामले का आदेश
    शराब हराम है
  4. इल्लत (ʿIllah) – हुक्म की वजह
    नशा पैदा करना

क्योंकि नशा दोनों में समान है, इसलिए ड्रग्स भी हराम ठहरती हैं।

उदाहरण के तौर पर— क़ुरआन में शराब हराम है क्योंकि वह नशा करती है। इसी वजह से नशीली दवाओं को भी क़ियास के आधार पर हराम माना गया। ह़नफ़ी विद्वान क़ियास का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, मालिकी विद्वान जनहित को ज़्यादा देखते हैं, जबकि ज़ाहिरी विद्वान क़ियास को नहीं मानते।

आज के समय में क़ियास का इस्तेमाल आईवीएफ (IVF), डिजिटल करेंसी (Digital Currency) और नई तकनीकों (New Technologies) जैसे आधुनिक मामलों में किया जा रहा है।
इन नए मुद्दों को क़ुरआन और सुन्नत के मूल सिद्धांतों से जोड़कर समझा जाता है, ताकि शरीअत हर दौर की ज़रूरतों के साथ चल सके।

चारों स्तंभों का आपसी संबंध:

इन चारों स्तंभों में एक क्रम है—
सबसे पहले क़ुरआन, फिर सुन्नत, फिर इज्मा, और अंत में क़ियास।

इस क्रम से शरीअत एक पूरी (complete) और संतुलित (balanced) जीवन-प्रणाली बनती है। विद्वानों के बीच मतभेद (difference of opinion) होते हैं, लेकिन इस्लाम में इन्हें रहमत (mercy) माना गया है, क्योंकि इससे आसानी और लचीलापन पैदा होता है।
आज के दौर में पर्यावरण (environment), मेडिकल साइंस (medical science) और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (artificial intelligence) जैसे नए मसलों का हल भी इन्हीं चार स्तंभों—क़ुरआन, सुन्नत, इज्मा और क़ियास—की रोशनी में निकाला जा रहा है।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस्लामी शरीअत के चार स्तंभ—क़ुरआन, सुन्नत, इज्मा और क़ियास—मिलकर एक मज़बूत और संतुलित व्यवस्था बनाते हैं। ये चारों मिलकर मुसलमानों को सही रास्ता दिखाते हैं और ज़िंदगी के हर पहलू में मार्गदर्शन देते हैं।
क़ुरआन अल्लाह का सीधा संदेश है और शरीअत की सबसे मज़बूत बुनियाद है। सुन्नत उस संदेश को अमल में लाने का तरीका सिखाती है और बताती है कि नबी ﷺ ने उसे अपनी ज़िंदगी में कैसे अपनाया। इज्मा उम्मत के विद्वानों की आपसी सहमति है, जो मुसलमानों को एकजुट रखती है। क़ियास नई परिस्थितियों में पुराने नियमों की मदद से हल निकालने का ज़रिया है।

इन चारों स्तंभों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये शरीअत को हर ज़माने के लिए उपयोगी बनाते हैं। दुनिया बदलती रहती है, नई समस्याएँ पैदा होती रहती हैं, लेकिन इन चार स्रोतों की मदद से शरीअत हर दौर में इंसाफ़, भलाई और संतुलन का रास्ता दिखाती है।
इस तरह शरीअत सिर्फ़ पुराने ज़माने का क़ानून नहीं, बल्कि आज और आने वाले समय के लिए भी एक ज़िंदा और रहनुमा व्यवस्था है, जो इंसान को अच्छे आचरण, इंसाफ़ और अल्लाह की बंदगी की ओर ले जाती है।

 

संदर्भ:

  • (सूरह अल-हश्र)
  • (सूरह अश-शूरा
  • (सहीह मुस्लिम)
  • (सुनन इब्न माजा)

 

रेहान आलम, ग्यारहवीं कक्षा, क़ुरतुबा इंस्टीट्यूटकिशनगंजबिहार

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