यौम-ए-आशूरा की  फ़ज़ीलत और मुसलमानों के लिए उसका संदेश

आशूरा क्या है और यह दिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

इस्लामी साल में कुछ दिन ऐसे हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने विशेष महत्व दिया है। उन्हीं महत्वपूर्ण दिनों में से एक है यौम--आशूरा, यानी मुहर्रम की दसवीं तारीख़। यह केवल एक ऐतिहासिक दिन नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की मदद, नबियों की मुक्ति, सब्र, शुक्र और ईमान की जीत की याद दिलाने वाला दिन है।

आज बहुत से लोग आशूरा को केवल करबला की घटना से जोड़कर देखते हैं। निस्संदेह करबला इस्लामी इतिहास की एक महान और दुखद घटना है, लेकिन आशूरा का महत्व केवल उसी तक सीमित नहीं है। इसकी महत्ता करबला से पहले भी थी और रसूलुल्लाह ने भी इसकी फ़ज़ीलत बयान की थी।

आशूरा का अर्थ क्या है?

"आशूरा" अरबी शब्द "अशरह" (दस) से बना है। इसलिए मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को "यौम-ए-आशूरा" कहा जाता है।

मुहर्रम स्वयं इस्लाम के चार सम्मानित महीनों में से एक है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِنْدَ اللَّهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا فِي كِتَابِ اللَّهِ يَوْمَ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ مِنْهَا أَرْبَعَةٌ حُرُمٌ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ...

(سورة التوبة: 36)

"बेशक अल्लाह के यहाँ महीनों की गिनती बारह है, जैसा कि अल्लाह की किताब में उस दिन से लिख दिया गया था जब उसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया। उनमें से चार महीने हराम (सम्मानित) हैं। यही सीधा और सही दीन है..."  (सूरह अत-तौबा, आयत 36)

मुहर्रम उन्हीं चार सम्मानित महीनों में से एक है।

आशूरा का रोज़ा: हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की याद और उम्मत--मुहम्मदिया की सुन्नत

आशूरा (10 मुहर्रम) का रोज़ा एक महान सुन्नत है। इसका संबंध उस ऐतिहासिक घटना से है जब अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम बनी इस्राईल को फ़िरऔन के ज़ुल्म से निजात दी थी। इस बड़ी नेमत के शुक्राने में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने रोज़ा रखा।

जब नबी करीम मदीना आए और आपने यहूदियों को इस दिन रोज़ा रखते देखा, तो आपने फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से हमारा संबंध अधिक है, क्योंकि मुसलमान सभी नबियों पर ईमान रखते हैं। इसलिए आपने भी आशूरा का रोज़ा रखा और अपनी उम्मत को इसकी शिक्षा दी।

फिर उम्मत को यहूदियों से अलग पहचान देने के लिए आपने यह इरादा ज़ाहिर फ़रमाया कि यदि अगले वर्ष तक जीवित रहे तो 9 मुहर्रम का रोज़ा भी रखेंगे। इसी आधार पर उलमा ने फ़रमाया कि केवल 10 मुहर्रम के बजाय उसके साथ एक और दिन का रोज़ा रखना बेहतर है।

बुखारी शरीफ में मरवी है:

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: قَدِمَ النَّبِيُّ ﷺ الْمَدِينَةَ، فَرَأَى الْيَهُودَ تَصُومُ يَوْمَ عَاشُورَاءَ، فَقَالَ: مَا هَذَا؟

قَالُوا: هَذَا يَوْمٌ صَالِحٌ، هَذَا يَوْمٌ نَجَّى اللَّهُ بَنِي إِسْرَائِيلَ مِنْ عَدُوِّهِمْ، فَصَامَهُ مُوسَى.

فَقَالَ النَّبِيُّ ﷺ: فَأَنَا أَحَقُّ بِمُوسَى مِنْكُمْ.

فَصَامَهُ وَأَمَرَ بِصِيَامِهِ. (صحيح البخاري)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाते हैं कि जब रसूलुल्लाह मदीना तशरीफ़ लाए तो आपने यहूदियों को आशूरा के दिन रोज़ा रखते हुए देखा। आपने पूछा:

"यह क्या है?"

उन्होंने जवाब दिया:

"यह बहुत बरकत वाला दिन है। इसी दिन अल्लाह तआला ने बनी इस्राईल को उनके दुश्मन फ़िरऔन से निजात दी थी, इसलिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इस दिन रोज़ा रखा था।"

यह सुनकर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

فَأَنَا أَحَقُّ بِمُوسَى مِنْكُمْ

"मूसा अलैहिस्सलाम से हमारा संबंध तुमसे अधिक है।"

‏ فَصَامَهُ وَأَمَرَ بِصِيَامِهِ‏.

फिर आपने स्वयं आशूरा का रोज़ा रखा और मुसलमानों को भी इसका रोज़ा रखने का हुक्म दिया।

बाद में जब रसूलुल्लाह ने आशूरा के रोज़े को जारी रखा और सहाबा को भी इसकी तरगीब दी, तो सहाबा ने अर्ज़ किया:

قَالُوا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنَّهُ يَوْمٌ تُعَظِّمُهُ الْيَهُودُ وَالنَّصَارَى:

" अल्लाह के रसूल! यह वह दिन है जिसकी यहूदी और ईसाई भी ताज़ीम करते हैं।"

इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

لَئِنْ بَقِيتُ إِلَى قَابِلٍ لَأَصُومَنَّ التَّاسِعَ

"अगर मैं अगले साल तक ज़िन्दा रहा तो नौवीं मुहर्रम का रोज़ा भी रखूँगा।"

(صحيح مسلم)

قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: فَلَمْ يَأْتِ الْعَامُ الْمُقْبِلُ حَتَّى تُوُفِّيَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ.

लेकिन अगला साल आने से पहले ही रसूलुल्लाह का विसाल हो गया।

 

आशूरा के रोज़े का तरीका

सबसे अफ़ज़ल

9 और 10 मुहर्रम का रोज़ा रखना।

दूसरा दर्जा

10 और 11 मुहर्रम का रोज़ा रखना।

तीसरा दर्जा

केवल 10 मुहर्रम का रोज़ा रखना भी जायज़ और सवाब का काम है।

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम  की नजात

आशूरा के दिन से जुड़ी सबसे प्रमाणित और प्रसिद्ध घटना यही है कि अल्लाह ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम को फिरऔन के अत्याचार से बचाया।

फिरऔन स्वयं को ईश्वर कहता था। वह लोगों पर अत्याचार करता था। बनी इस्राईल को गुलाम बनाकर रखता था।

लेकिन जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम  अल्लाह के आदेश से अपनी क़ौम को लेकर निकले, तो फिरऔन अपनी सेना के साथ उनका पीछा करने लगा।

एक तरफ़ समुद्र था और दूसरी तरफ़ दुश्मन की सेना। लोग घबरा गए।

लेकिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा:

كَلَّا ۖ إِنَّ مَعِيَ رَبِّي سَيَهْدِينِ

"हरगिज़ नहीं! मेरा रब मेरे साथ है, वह अवश्य मुझे रास्ता दिखाएगा।" (सूरह अश-शुअरा : 62)

फिर अल्लाह ने समुद्र को चीर दिया। मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम सुरक्षित निकल गई।

और फिरऔन अपनी सेना सहित समुद्र में डूब गया।

इसलिए आशूरा का दिन अल्लाह की मदद और अत्याचार पर सत्य की विजय की याद दिलाता है।

क्या अन्य नबियों की घटनाएँ भी आशूरा से जुड़ी हैं?

इस्लामी किताबों में कई ऐसी रिवायतें मिलती हैं कि आशूरा के दिन अल्लाह तआला ने अपने कई नबियों पर ख़ास इनाम और रहमत फ़रमाई।

इसी दिन

  • हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा क़बूल हुई।
  • हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती जूदी पहाड़ पर आकर ठहरी।
  • हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग से निजात मिली।
  • हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से बाहर निकाले गए।
  • और हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को उनकी लंबी बीमारी से शिफ़ा अता की गई।

हालांकि इन घटनाओं के आशूरा के दिन होने के बारे में आने वाली अधिकांश रिवायतों की सनद मज़बूत नहीं है, इसलिए इन्हें निश्चित तौर पर साबित नहीं कहा जा सकता। फिर भी ये बातें अल्लाह की रहमत, अपने नबियों की मदद और कठिनाइयों के बाद राहत मिलने की याद दिलाती हैं।

और सही हदीसों से सबसे स्पष्ट रूप से जो घटना साबित है, वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इस्राईल की मुक्ति है।

आशूरा के रोज़े की फ़ज़ीलत

आशूरा के दिन का सबसे महत्वपूर्ण अमल रोज़ा है।

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

صِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ أَحْتَسِبُ عَلَى اللّٰهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ

"मुझे उम्मीद है कि आशूरा के दिन का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाएगा।"

(सहीह मुस्लिम)

सोचिए, केवल एक दिन का रोज़ा और अल्लाह की ओर से पूरे पिछले वर्ष के छोटे गुनाहों की माफी की उम्मीद।

यह आशूरा के दिन की कितनी बड़ी फ़ज़ीलत है।

कर्बला का वाक़िआ

इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु  कौन थे?

हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु  रसूलुल्लाह के नवासे थे। वे हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा  के बेटे थे।

 रसूलुल्लाह उन्हें बहुत प्यार करते थे। एक हदीस में आता है:

حُسَيْنٌ مِنِّي وَأَنَا مِنْ حُسَيْنٍ، أَحَبَّ اللّٰهُ مَنْ أَحَبَّ حُسَيْنًا

"हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह उस व्यक्ति से प्रेम करता है जो हुसैन से प्रेम करता है।"

(तिर्मिज़ी)

इसलिए इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रेम करना हर मुसलमान के दिल का हिस्सा है।

करबला की दुखद घटना

61 हिजरी में करबला के मैदान में एक अत्यंत दुखद घटना घटी।

इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु अपने परिवार और कुछ साथियों के साथ थे। परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उन्हें करबला में घेर लिया गया। पानी तक की पहुँच रोक दी गई। इसके बावजूद उन्होंने अन्याय के सामने झुकने के बजाय सत्य और सिद्धांतों का रास्ता चुना।

10 मुहर्रम, यानी आशूरा के दिन, इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके अनेक साथियों को शहीद कर दिया गया।

यह इस्लामी इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है। हर मुसलमान इस घटना से दुखी होता है और इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु तथा उनके साथियों के लिए दुआ करता है।

करबला से हमें क्या सीख मिलती है?

करबला केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि पूरी उम्मत के लिए एक महान संदेश और सबक है। यह हमें सिखाती है कि इंसान को हमेशा सत्य और न्याय के साथ खड़ा रहना चाहिए, अत्याचार और अन्याय का समर्थन नहीं करना चाहिए, और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने ईमान और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। करबला यह भी बताती है कि एक मोमिन को हर हाल में अल्लाह पर भरोसा बनाए रखना चाहिए और दुनिया के अस्थायी लाभ, पद या सत्ता के लिए अपने दीन और उसूलों का सौदा नहीं करना चाहिए। यही कारण है कि हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत आज भी मुसलमानों के लिए साहस, सब्र, त्याग, सत्यनिष्ठा और अल्लाह की राह में डटे रहने की प्रेरणा का एक महान स्रोत है।

आशूरा के दिन क्या-क्या करना चाहिए?

आशूरा के दिन मुसलमान को:

  • रोज़ा रखना चाहिए।
  • कुरआन की तिलावत करनी चाहिए।
  • अल्लाह का ज़िक्र करना चाहिए।
  • दुरूद शरीफ़ पढ़ना चाहिए।
  • तौबा और इस्तिग़फ़ार करना चाहिए।
  • गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
  • इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु और अन्य शहीदों के लिए दुआ करनी चाहिए।
  • अपने परिवार को आशूरा की सही शिक्षा बतानी चाहिए।

यही वे काम हैं जो कुरआन और सुन्नत के अधिक निकट हैं।

आशूरा के बारे में कुछ गलत धारणाएँ

समय के साथ कुछ समाजों में आशूरा के बारे में अनेक ऐसी बातें भी फैल गईं जिनका प्रमाण बहुत कमज़ोर है या बिल्कुल नहीं है।

इसलिए मुसलमान को चाहिए कि वह हर बात को कुरआन और सही हदीस की कसौटी पर परखे।

आशूरा का सबसे बड़ा और प्रमाणित अमल रोज़ा है। यही वह काम है जिसे स्वयं रसूलुल्लाह ने किया और जिसकी बड़ी फ़ज़ीलत बयान की।

यदि हम सही हदीसों को देखें, तो आशूरा केवल ग़म का दिन नहीं है। यह अल्लाह का शुक्र अदा करने का भी दिन है। साथ ही करबला की घटना हमें सब्र, हिम्मत और सत्य पर डटे रहने की शिक्षा देती है। इस प्रकार आशूरा में शुक्र भी है और सबक भी।

निष्कर्ष

यौम-ए-आशूरा इस्लाम के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। यह दिन हमें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की नजात, अल्लाह की मदद, रोज़े की फ़ज़ीलत और इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हू  की महान कुर्बानी की याद दिलाता है।

इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण अमल रोज़ा है, जिसकी फ़ज़ीलत स्वयं रसूलुल्लाह ने बयान की है। साथ ही यह दिन हमें सत्य, सब्र, शुक्र, ईमान और अल्लाह पर भरोसे की शिक्षा देता है।

इसलिए एक मुसलमान को चाहिए कि वह आशूरा को ज्ञान, इबादत, रोज़ा, दुआ और आत्म-सुधार का अवसर बनाए। यही रसूलुल्लाह की सुन्नत है, यही सहाबा का रास्ता है और यही आशूरा का वास्तविक संदेश है। यही वह संदेश है जो हर साल मुहर्रम की दसवीं तारीख़ हमें फिर से याद दिलाती है।

संदर्भ (References):

  • सूरह अत-तौबा
  • सूरह अश-शुअरा
  • सहीह अल-बुखारी
  • सहीह मुस्लिम
  • जामिअ अत-तिर्मिज़ी
  • अल-कुरआन: सूरह अत-तौबा, सूरह अश-शुअरा
  • सहीह अल-बुखारी
  • सहीह मुस्लिम
  • जामिअ अत-तिर्मिज़ी (सुनन तिर्मिज़ी)

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, कुर्तुबा इंस्टिट्यूट, बिहार

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