क्या ताज़िया इस्लाम का हिस्सा है ?

ताज़िया की हक़ीक़त और इस्लाम की सही शिक्षा

हर साल जब मुहर्रम का महीना आता है, तो हमारे समाज में एक सवाल बार-बार सामने आता है। कई जगहों पर ताज़िए बनाए जाते हैं, जुलूस निकाले जाते हैं और तरह-तरह की रस्में की जाती हैं। बचपन से यह सब देखते हुए बहुत से लोग यह समझ लेते हैं कि शायद ताज़िया भी इस्लाम का हिस्सा है। लेकिन जब हम कुरआन, हदीस और इस्लाम के शुरुआती इतिहास को देखते हैं, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।

इसलिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि ताज़िया क्या है? क्या यह इस्लाम का हिस्सा है? क्या रसूलुल्लाह ने इसकी शिक्षा दी थी? और अगर नहीं, तो फिर मुहर्रम में हमें क्या करना चाहिए?

ताज़िया क्या है?

ताज़िया एक ढाँचा या नक़ल होती है जिसे कुछ लोग मुहर्रम के दिनों में बनाते हैं। फिर उसे सजाया जाता है, जुलूस में निकाला जाता है और कई जगहों पर उसे विशेष धार्मिक महत्व भी दिया जाता है।

बहुत से लोग यह काम इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की याद में करते हैं। उनका इरादा बुरा नहीं होता। वे अहले बैत से मोहब्बत की वजह से ऐसा करते हैं। लेकिन इस्लाम में केवल नीयत ही नहीं देखी जाती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह काम कुरआन और सुन्नत के अनुसार है या नहीं।

क्या ताज़िया रसूलुल्लाह से साबित है?

यदि हम पूरे सीरत और हदीस के ख़ज़ाने को देखें, तो कहीं भी यह नहीं मिलता कि रसूलुल्लाह ने ताज़िया बनाया हो या बनाने का हुक्म दिया हो।

मुहर्रम का महीना आपके सामने भी आता था। आशूरा का दिन भी आता था। आपको अपने नवासों हसन और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा से बहुत मोहब्बत थी। लेकिन आपने कभी ताज़िया नहीं बनाया। न ही सहाबा को इसकी शिक्षा दी। यही सबसे बड़ी बात है जिस पर एक मुसलमान को गौर करना चाहिए।

क्या सहाबा ने ताज़िया बनाया?

करबला की घटना 61 हिजरी में हुई। उस समय बहुत से सहाबा ज़िंदा थे। अगर ताज़िया बनाना कोई नेक या धार्मिक काम होता, तो सबसे पहले वही लोग ऐसा करते जो इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से सबसे ज़्यादा मोहब्बत करते थे।

लेकिन इतिहास में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। न हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने ताज़िया बनाया। न हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने। न अहले बैत ने। न ताबेईन  ने। न शुरुआती मुसलमानों ने।

यही वजह है कि अक्सर  सुन्नी उलेमा ताज़िया को दीन का हिस्सा नहीं मानते।

दीन में नई रस्में जोड़ने से क्यों रोका गया?

इस्लाम एक मुकम्मल दीन है। अल्लाह तआला इरशाद  फ़रमाता है:

الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ

 "आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को पूरा कर दिया।" (सूरह अल-माइदा : 3)

जब दीन पूरा हो गया, तो उसके बाद कोई नई धार्मिक रस्म जोड़ने की ज़रूरत नहीं रही।

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هٰذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ

"जो व्यक्ति हमारे दीन में ऐसी बात शामिल करे जो उसमें नहीं है, वह अस्वीकार और गैर मक़बूल  है।"

(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

इसी वजह से उलेमा कहते हैं कि जिस काम का प्रमाण और सबूत  कुरआन, सुन्नत और सहाबा के अमल से न मिले, उसे दीन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए।

क्या ताज़िया का विरोध करने का मतलब इमाम हुसैन से मोहब्बत करना है?

बिलकुल नहीं। यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। हर सुन्नी मुसलमान इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से मोहब्बत करता है। वे रसूलुल्लाह के नवासे थे।

रसूलुल्लाह ने उनके बारे में फ़रमाया:

حُسَيْنٌ مِنِّي وَأَنَا مِنْ حُسَيْنٍ

"हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूँ।" (तिर्मिज़ी)

इसलिए इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से मोहब्बत करना ईमान का हिस्सा है। लेकिन मोहब्बत का सही तरीका यह है कि हम उनके जीवन से सीखें, उनके सब्र को अपनाएँ, उनके साहस को अपनाएँ और उनके दीन पर मज़बूती से चलने की कोशिश करें।

सिर्फ़ ताज़िया बनाना या जुलूस निकालना उनके मिशन को समझ लेना नहीं है।

असली सवाल

अब एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। अगर ताज़िया इस्लाम का हिस्सा नहीं है, तो फिर मुहर्रम में मुसलमान क्या करे? क्या केवल ताज़िया से बचना ही काफी है? या रसूलुल्लाह ने हमें कुछ बेहतर काम भी सिखाए हैं? वास्तव में मुहर्रम और आशूरा ऐसे दिन हैं जिनके बारे में रसूलुल्लाह ने बहुत बड़ी फ़ज़ीलत बताई है।

आशूरा का रोज़ा, अल्लाह का ज़िक्र, तौबा, दुआ, सदक़ा और इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की कुर्बानी से सीख लेना—यही वे काम हैं जिनकी शिक्षा इस्लाम देता है।

ताज़िया के बजाय इस्लाम हमें क्या सिखाता है?

हमने देखा कि ताज़िया न तो कुरआन से साबित है, न हदीस से और न ही सहाबा तथा अहले बैत के अमल से। इसी वजह से अक्सर  सुन्नी उलेमा इसे दीन का हिस्सा नहीं मानते। लेकिन यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि अगर ताज़िया नहीं, तो फिर मुहर्रम में एक मुसलमान क्या करे?

इसका जवाब बहुत आसान है।

इस्लाम हमें केवल गलत कामों से नहीं रोकता, बल्कि उनके बदले बेहतर और सही रास्ता भी दिखाता है। इसलिए मुहर्रम के महीने में हमें उन कामों की तरफ़ ध्यान देना चाहिए जो कुरआन और सुन्नत से साबित हैं।

मुहर्रम : एक बरकत वाला महीना

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि मुहर्रम केवल करबला की याद का महीना नहीं है। यह इस्लामी साल का पहला महीना है। यह उन चार महीनों में से एक है जिन्हें अल्लाह ने विशेष सम्मान दिया है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِنْدَ اللّٰهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا فِي كِتَابِ اللّٰهِ ... مِنْهَا أَرْبَعَةٌ حُرُمٌ

"अल्लाह के यहाँ महीनों की संख्या बारह है... उनमें से चार महीने सम्मान वाले हैं।" (सूरह अत-तौबा : 36)

मुहर्रम उन्हीं चार सम्मानित महीनों में से एक है। यानी यह महीना खुद अपनी जगह बहुत महान है।

आशूरा का दिन और उसका महत्व

मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को "यौम-ए-आशूरा" कहा जाता है। यह दिन इस्लाम में बहुत महत्वपूर्ण है।

जब रसूलुल्लाह मदीना पहुँचे तो आपने देखा कि यहूदी इस दिन रोज़ा रखते हैं। जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि इसी दिन अल्लाह ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम को फिरऔन से बचाया था।

तब रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

نَحْنُ أَحَقُّ بِمُوسَى مِنْكُمْ

"मूसा से हमारा संबंध तुमसे अधिक है।" (सहीह अल-बुख़ारी)

फिर आपने खुद  भी रोज़ा रखा और मुसलमानों को भी रोज़ा रखने की शिक्षा दी।

आशूरा का रोज़ा

आशूरा के दिन का सबसे बड़ा अमल रोज़ा है। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

صِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ إِنِّي أَحْتَسِبُ عَلَى اللَّهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ"  

"बेशक मुझे उम्मीद है कि आशूरा के दिन का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाएगा।"  (सुनन इब्ने माजह)

सोचिए, जिस दिन के रोज़े के बारे में इतनी बड़ी फ़ज़ीलत बताई गई हो, उस दिन एक मुसलमान को सबसे ज़्यादा किस बात की फ़िक्र होनी चाहिए?

रोज़े की। इबादत की। दुआ की। न कि उन रस्मों की जिनका प्रमाण ही नहीं मिलता।

9 और 10 मुहर्रम का रोज़ा

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

لَئِنْ بَقِيتُ إِلَى قَابِلٍ لَأَصُومَنَّ التَّاسِعَ

"यदि मैं अगले वर्ष जीवित रहा तो नौवीं तारीख़ का भी रोज़ा रखूँगा।" (सहीह मुस्लिम)

इसीलिए उलेमा कहते हैं कि 9 और 10 मुहर्रम का रोज़ा रखना बेहतर है। कुछ उलेमा 10 और 11 मुहर्रम का रोज़ा रखने की भी अनुमति देते हैं।

इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु को कैसे याद करें?

यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। अगर ताज़िया नहीं बनाएँ, तो इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु को कैसे याद करें?

इसका जवाब बहुत सुंदर है।

इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम उनके जीवन को पढ़ें।

करबला की घटना को समझें।

उनके सब्र को समझें।

उनकी बहादुरी को समझें।

उनकी सच्चाई को समझें।

उन्होंने हमें सिखाया कि मुसलमान सत्य के लिए खड़ा रहता है, चाहे उसे कितनी ही कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े। अगर हम यह सीख अपने जीवन में ले आएँ, तो यही उनके लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।

क्या केवल रोना ही करबला का संदेश है?

नहीं।

करबला केवल दुख की कहानी नहीं है। यह ईमान की कहानी है। यह सब्र की कहानी है।

यह कुर्बानी की कहानी है। यह अल्लाह पर भरोसे की कहानी है।

अगर कोई व्यक्ति करबला को समझकर अपने जीवन में सच्चाई, इंसाफ़ और दीनदारी को अपनाता है, तो उसने करबला का असली संदेश समझ लिया।

ताज़िया पर खर्च या सदक़ा?

एक मुसलमान को यह भी सोचना चाहिए कि यदि वह ताज़िया बनाने, सजाने या जुलूसों पर खर्च करने के बजाय किसी गरीब परिवार की मदद करे, किसी यतीम की सहायता करे या किसी ज़रूरतमंद को खाना खिलाए, तो यह अल्लाह के यहाँ अधिक पसंदीदा काम हो सकता है।

इस्लाम हमेशा इंसानों की भलाई और समाज की सेवा की शिक्षा देता है।

मुहर्रम और हिजरत

बहुत से लोग यह भूल जाते हैं कि मुहर्रम हिजरी साल का पहला महीना है।

हिजरी कैलेंडर की शुरुआत उस महान हिजरत की याद में हुई जिसमें रसूलुल्लाह और सहाबा ने अल्लाह की खातिर अपने घर और अपनी संपत्ति छोड़ दी थी।

इसलिए मुहर्रम हमें केवल करबला की याद नहीं दिलाता, बल्कि हिजरत, कुर्बानी, सब्र और अल्लाह पर भरोसे की भी याद दिलाता है।

निष्कर्ष

ताज़िया को बहुत से लोग मुहर्रम का सबसे बड़ा प्रतीक समझते हैं, लेकिन जब हम इस्लाम की असल शिक्षाओं को देखते हैं, तो हमें पता चलता है कि ताज़िया दीन का हिस्सा नहीं है। न रसूलुल्लाह ने इसे किया, न सहाबा ने और न ही अहले बैत ने।

दूसरी ओर, आशूरा का रोज़ा, अल्लाह का ज़िक्र, कुरआन की तिलावत, तौबा, सदक़ा और इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की कुर्बानी से सीख लेना—ये सब ऐसे काम हैं जिनकी जड़ें इस्लाम की असली शिक्षाओं में मिलती हैं।

इसलिए एक मुसलमान के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह ताज़िया और ऐसी दूसरी रस्मों में उलझने के बजाय सुन्नत को अपनाए, इबादत में बढ़े और मुहर्रम के असली संदेश को समझे।

यही मुहर्रम का सही रास्ता है। यही आशूरा का सही संदेश है। और यही इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से सच्ची मोहब्बत का सबसे सुंदर तरीका भी है।

संदर्भ (References)

  • सूरह अल-माइदा
  • सूरह अत-तौबा
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • जामिअ अत-तिर्मिज़ी (या सुनन तिर्मिज़ी)
  • सुनन इब्ने माजह

लेखक:

सुमय्या परवीन, रफीगंज, बिहार 

 

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