क़ुरआन और सही हदीस की रोशनी में ईमान के छह अरकान

प्रस्तावना

इस्लाम केवल कुछ इबादतों का नाम नहीं है, बल्कि यह एक मुकम्मल जीवन-व्यवस्था (Complete Way of Life) है। इस्लाम की इमारत दो मज़बूत बुनियादों पर खड़ी है—ईमान और अमल। अगर ईमान सही होगा, तो इंसान के अमल भी सही होंगे। लेकिन अगर ईमान कमज़ोर हो जाए, तो अच्छे अमल भी धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।

इसीलिए क़ुरआन में बार-बार "الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ" (जो ईमान लाए और नेक अमल किए) का ज़िक्र आता है। इससे पता चलता है कि इस्लाम में सबसे पहले ईमान की सही समझ होना ज़रूरी है।

हर मुसलमान के लिए यह जानना फ़र्ज़ है कि उसका ईमान किन बुनियादों पर खड़ा है। इन्हीं बुनियादों को "ईमान के छह अरकान" कहा जाता है। जो व्यक्ति इन छह बातों पर सच्चे दिल से ईमान रखता है, वही सच्चा मोमिन (ईमान वाला) कहलाता है।

ईमान क्या है?

الإِيمَانُ: اعْتِقَادٌ بِالْقَلْبِ، وَقَوْلٌ بِاللِّسَانِ، وَعَمَلٌ بِالْجَوَارِحِ، يَزِيدُ بِالطَّاعَةِ وَيَنْقُصُ بِالْمَعْصِيَةِ.

"ईमान का मतलब हैदिल से यक़ीन करना, ज़ुबान से उसका इकरार करना और अपने अमल से उसे साबित करना। ईमान नेक कामों से बढ़ता है और गुनाहों से कम हो जाता है।"

यानी केवल यह कह देना कि "मैं मुसलमान हूँ" काफ़ी नहीं है। सच्चा ईमान इंसान के व्यवहार, चरित्र और जीवन में दिखाई देना चाहिए।

ईमान इंसान के दिल में अल्लाह तआला का डर, उसकी मुहब्बत, आख़िरत की तैयारी और नेक अमल का जज़्बा पैदा करता है।

इसीलिए जब किसी सहाबी ने रसूलुल्लाह से ईमान के बारे में पूछा, तो आपने बहुत स्पष्ट उत्तर दिया।

हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि एक दिन हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम इंसानी रूप में आए और रसूलुल्लाह से पूछा:

"मुझे ईमान के बारे में बताइए।"

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

«أَنْ تُؤْمِنَ بِاللّٰهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَالْيَوْمِ الْآخِرِ، وَتُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ»

"ईमान यह है कि तुम अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर, उसके रसूलों पर, आख़िरत के दिन पर और अच्छी-बुरी तक़दीर पर ईमान लाओ।" (सहीह मुस्लिम)

यही हदीस ईमान के छह अरकान की सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रमाणिक हदीस है।

पहला रुक्न अल्लाह तआला पर ईमान

ईमान का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण रुक्न है—अल्लाह तआला पर ईमान।

इसका अर्थ केवल यह मान लेना नहीं कि अल्लाह तआला मौजूद है, बल्कि यह विश्वास रखना कि—

  • वही अकेला पैदा करने वाला है।
  • वही रोज़ी देने वाला है।
  • वही पूरी दुनिया का मालिक है।
  • वही इबादत के योग्य है।
  • उसके अलावा कोई भी इबादत के लायक़ नहीं।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿قُلْ هُوَ اللّٰهُ أَحَدٌ ۝ اَللّٰهُ الصَّمَدُ ۝ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ۝ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ﴾

"कह दीजिए, अल्लाह एक है। अल्लाह सब से बेनियाज़ है। वह किसी का बाप है और किसी की औलाद। और उसका कोई भी बराबर नहीं।" (सूरह अल-इख़लास)

यही इस्लाम का सबसे बड़ा संदेश है—तौहीद, अर्थात केवल एक अल्लाह तआला की इबादत।

जब इंसान का यह ईमान मज़बूत हो जाता है, तो वह किसी से नहीं डरता, किसी के सामने झुकता नहीं और हर हाल में केवल अल्लाह तआला पर भरोसा करता है।

अल्लाह तआला पर ईमान का असर

यदि किसी व्यक्ति का ईमान सही हो, तो उसके जीवन में कई अच्छे परिवर्तन आते हैं।

  • वह हर काम ईमानदारी से करता है।
  • वह गुनाह से बचने की कोशिश करता है।
  • मुश्किल समय में निराश नहीं होता।
  • नेमत मिलने पर घमंड नहीं करता।
  • हर हाल में अल्लाह तआला का शुक्र अदा करता है।

यही सच्चे ईमान की पहचान है।

दूसरा रुक्न फ़रिश्तों पर ईमान

ईमान का दूसरा महत्वपूर्ण रुक्न है—फ़रिश्तों पर ईमान।

फ़रिश्ते अल्लाह तआला की एक ऐसी मख़लूक़ हैं जिन्हें उसने नूर (प्रकाश) से पैदा किया है। वे कभी अल्लाह तआला की नाफ़रमानी नहीं करते।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿لَا يَعْصُونَ اللّٰهَ مَا أَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ﴾

"वे अल्लाह के किसी आदेश की नाफरमानी नहीं करते और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है।"

(सूरह अत-तहरीम : 6)

फ़रिश्ते खाते-पीते नहीं, न थकते हैं और न ही गुनाह करते हैं। उनका काम केवल अल्लाह तआला के आदेशों का पालन करना है।

कुछ प्रमुख फ़रिश्ते और उनकी ज़िम्मेदारियाँ

हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम

वे अल्लाह तआला की वह्य (प्रकाशना/Revelation) नबियों तक पहुँचाते थे। पूरे क़ुरआन को हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ही रसूलुल्लाह के पास लेकर आए।

हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम

अल्लाह तआला के हुक्म से वर्षा, रोज़ी और प्राकृतिक व्यवस्थाओं से संबंधित कार्यों पर नियुक्त हैं।

हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम

उन्हें सूर (नरसिंगा) फूँकने की ज़िम्मेदारी दी गई है। पहली बार सूर फूँका जाएगा तो दुनिया समाप्त हो जाएगी और दूसरी बार फूँका जाएगा तो सभी इंसान दोबारा ज़िंदा कर दिए जाएँगे।

इजराइल अलैहिस्सलाम (मलकुल-मौत)

अल्लाह तआला के आदेश से इंसानों की रूह क़ब्ज़ करने का कार्य करते हैं।

किरामन कातिबीन (रक़ीब और अतिद)

अल्लाह तआला ने हर इंसान के साथ दो फ़रिश्ते नियुक्त किए हैं जो उसके अच्छे और बुरे कर्म लिखते रहते हैं।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَإِنَّ عَلَيْكُمْ لَحَافِظِينَ ۝ كِرَامًا كَاتِبِينَ ۝ يَعْلَمُونَ مَا تَفْعَلُونَ﴾

"निश्चय ही तुम पर निगरानी करने वाले फ़रिश्ते नियुक्त हैं। वे सम्मानित लेखक हैं। तुम जो कुछ करते हो, उसे अच्छी तरह जानते हैं।" (सूरह अल-इनफ़ितार : 10–12)

जब इंसान को यह एहसास होता है कि उसके हर शब्द और हर काम को फ़रिश्ते लिख रहे हैं, तो वह अपने व्यवहार और कर्मों के प्रति अधिक सजग हो जाता है।

फ़रिश्तों पर ईमान का हमारी ज़िंदगी पर असर

फ़रिश्तों पर ईमान केवल एक अक़ीदा नहीं, बल्कि यह हमारे जीवन को भी बदलता है।

जब हमें पता होता है कि हमारे हर काम को लिखा जा रहा है—

  • हम झूठ बोलने से बचते हैं।
  • गुनाह करने से पहले सोचते हैं।
  • अच्छे काम करने की कोशिश करते हैं।
  • लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं।
  • अपने अकेलेपन में भी अल्लाह तआला से डरते हैं।

यही ईमान की असली पहचान है।

ईमान के पहले दो अरकान—अल्लाह तआला पर ईमान और फ़रिश्तों पर ईमान—पूरे इस्लामी अक़ीदे की मज़बूत नींव हैं। जब इंसान यह विश्वास कर लेता है कि उसका रब एक है, वही सब कुछ देखने और जानने वाला है, और उसके हर कर्म को फ़रिश्ते लिख रहे हैं, तो उसकी पूरी ज़िंदगी बदलने लगती है।

लेकिन ईमान केवल इन्हीं दो बातों तक सीमित नहीं है। अल्लाह तआला ने अपनी हिदायत के लिए किताबें भेजीं, मानवता के मार्गदर्शन के लिए रसूल भेजे, आख़िरत का दिन निश्चित किया और हर चीज़ को अपनी हिकमत के अनुसार तक़दीर में लिखा।

 तीसरा रुक्न अल्लाह की किताबों पर ईमान

अल्लाह तआला ने इंसानों को सही रास्ता दिखाने के लिए हर दौर में अपने नबियों पर किताबें और वही (प्रकाशना) नाज़िल कीं। इन किताबों का उद्देश्य इंसानों को तौहीद, अच्छे चरित्र और नेक जीवन की शिक्षा देना था।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللّٰهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ﴾

"लोग एक ही समुदाय थे। फिर अल्लाह ने शुभ सूचना देने वाले और चेतावनी देने वाले नबी भेजे तथा उनके साथ सत्य पर आधारित किताबें उतारीं।" (सूरह अल-बक़रह : 213)

अल्लाह तआला की प्रमुख किताबें

  • तौरात — हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर।
  • ज़बूर — हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर।
  • इंजील — हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर।
  • क़ुरआन मजीद — हज़रत मुहम्मद पर।

एक मुसलमान का ईमान है कि ये सभी किताबें मूल रूप में अल्लाह तआला की ओर से थीं। लेकिन आज केवल क़ुरआन मजीद अपनी मूल अवस्था में सुरक्षित है। पिछली अन्य किताबों को लोगों ने बदल दिया है, लेकिन क़ुरआन कभी नहीं बदलेगा क्योंकि अल्लाह ने हमेशा इसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ﴾

"निस्संदेह हमने ही इस क़ुरआन को उतारा है और हम ही इसकी रक्षा करने वाले हैं।" (सूरह अल-हिज्र : 9)

क़ुरआन पर ईमान का असर

जब कोई व्यक्ति क़ुरआन को अल्लाह तआला का कलाम मानता है, तो वह केवल उसकी तिलावत ही नहीं करता, बल्कि उसके अर्थ समझने, उस पर अमल करने और उसे अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाने की कोशिश भी करता है।

चौथा रुक्न सभी रसूलों पर ईमान

अल्लाह तआला ने हर क़ौम की हिदायत के लिए रसूल और नबी भेजे। सभी नबियों का संदेश एक ही था—सिर्फ़ एक अल्लाह तआला की इबादत करो और नेक जीवन बिताओ।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ﴾

"हमने हर समुदाय में एक रसूल भेजा कि केवल अल्लाह की इबादत करो और झूठे पूज्यों से बचो।"

(सूरह अन-नहल : 36)

एक मुसलमान हज़रत आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, दाऊद, सुलेमान, ईसा और सभी नबियों अलैहिमुस्सलाम पर ईमान रखता है। वह किसी नबी का अपमान नहीं करता और न ही उनमें भेदभाव करता है।

लेकिन यह भी ईमान का हिस्सा है कि हज़रत मुहम्मद अल्लाह तआला के अंतिम नबी और रसूल हैं। आपके बाद कोई नया नबी नहीं आएगा।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿مَا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَدٍ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَٰكِن رَّسُولَ اللّٰهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَ﴾

"मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों की श्रृंखला के अंतिम नबी हैं।" (सूरह अल-अहज़ाब : 40)

रसूलों पर ईमान का असर

रसूलों पर ईमान रखने वाला व्यक्ति उनके जीवन को अपना आदर्श बनाता है। वह उनके बताए हुए रास्ते पर चलने की कोशिश करता है और विशेष रूप से रसूलुल्लाह की सुन्नत को अपने जीवन में अपनाता है।

पाँचवाँ रुक्न आख़िरत के दिन पर ईमान

ईमान का पाँचवाँ रुक्न है आख़िरत (परलोक) पर ईमान।

इस दुनिया की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली नहीं है। एक दिन हर इंसान को मरना है, फिर क़ियामत के दिन दोबारा ज़िंदा किया जाएगा और अल्लाह तआला के सामने अपने कर्मों का हिसाब देना होगा।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ ۝ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ﴾

"जो व्यक्ति रत्ती भर भी भलाई करेगा, वह उसे देख लेगा। और जो रत्ती भर भी बुराई करेगा, वह भी उसे देख लेगा।" (सूरह अज़-ज़लज़लह : 7–8)

आख़िरत पर ईमान इंसान को यह एहसास दिलाता है कि उसके हर छोटे-बड़े काम का हिसाब होगा। यही विश्वास उसे अत्याचार, रिश्वत, धोखा, झूठ और गुनाह से बचाने में मदद करता है।

जो व्यक्ति आख़िरत पर सच्चा ईमान रखता है, वह दुनिया की अस्थायी सफलता के लिए अपने दीन और चरित्र का सौदा नहीं करता।

छठा रुक्न अच्छी और बुरी तक़दीर पर ईमान

ईमान का छठा और अंतिम रुक्न तक़दीर (क़द्र) पर ईमान है

इसका अर्थ यह है कि अल्लाह तआला के इल्म और हिकमत से हर चीज़ निर्धारित है। दुनिया में जो कुछ होता है, वह उसके ज्ञान से बाहर नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान मेहनत को छोड़ दे। इस्लाम हमें मेहनत करने, दुआ करने और सही साधन अपनाने का आदेश देता है, फिर परिणाम को अल्लाह तआला पर छोड़ देने की शिक्षा देता है।

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

«احْرِصْ عَلَىٰ مَا يَنْفَعُكَ، وَاسْتَعِنْ بِاللّٰهِ وَلَا تَعْجِزْ»

"जो चीज़ तुम्हें लाभ पहुँचाए, उसके लिए पूरी कोशिश करो, अल्लाह से मदद माँगो और हिम्मत मत हारो।"

(सहीह मुस्लिम)

यदि सफलता मिले, तो अल्लाह तआला का शुक्र अदा करो। यदि असफलता मिले, तो सब्र करो और दोबारा कोशिश करो। यही तक़दीर पर सही ईमान है।

ईमान का हमारी ज़िंदगी पर प्रभाव

जब किसी मुसलमान का ईमान इन छह अरकानों पर मज़बूत हो जाता है, तो उसका पूरा जीवन बदल जाता है।

  • वह केवल अल्लाह तआला से डरता और उसी से उम्मीद रखता है।
  • वह क़ुरआन को अपना मार्गदर्शक बनाता है।
  • रसूलुल्लाह की सुन्नत पर चलने की कोशिश करता है।
  • हर काम में ईमानदारी अपनाता है।
  • गुनाह से बचने का प्रयास करता है।
  • माता-पिता, रिश्तेदारों और समाज के लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करता है।
  • कठिनाइयों में सब्र और नेमतों में शुक्र करता है।
  • आख़िरत की तैयारी को अपनी सबसे बड़ी सफलता समझता है।

ऐसा ईमान केवल इंसान की सोच ही नहीं बदलता, बल्कि उसके व्यवहार, परिवार, समाज और पूरी ज़िंदगी को बेहतर बना देता है।

निष्कर्ष

ईमान के छह अरकान इस्लाम की बुनियादी शिक्षाएँ हैं। अल्लाह तआला पर ईमान, फ़रिश्तों पर ईमान, अल्लाह की किताबों पर ईमान, सभी रसूलों पर ईमान, आख़िरत पर ईमान और तक़दीर पर ईमान—ये छहों मिलकर एक मुसलमान के अक़ीदे की मज़बूत नींव बनाते हैं।

आज के दौर में, जब नौजवान तरह-तरह के विचारों, शंकाओं और भौतिक आकर्षणों से घिरे हुए हैं, तब इन अरकानों की सही समझ पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। यदि हम इन्हें केवल याद न रखें, बल्कि दिल से स्वीकार करें और अपनी ज़िंदगी में उतारें, तो हमारा ईमान मज़बूत होगा, हमारा चरित्र निखरेगा और हमारा समाज भी बेहतर बनेगा।

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें सही ईमान, नेक अमल और आख़िर तक ईमान पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

सन्दर्भ

  • सूरह अल-इख़लास
  • सूरह अत-तहरीम
  • सूरह अल-इनफ़ितार
  • सूरह अल-बक़रह
  • सूरह अल-हिज्र
  • सूरह अन-नहल
  • सूरह अल-अहज़ाब
  • सूरह अज़-ज़लज़लह
  • सहीह मुस्लिम

 

सुमय्या परवीन, रफीगंज, बिहार 

Disclaimer

The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.

Leave A Comment

Related Posts