क़ुर्बानी का तरीक़ा और कुछ अहम मसाइल
क़ुर्बानी किस पर वाजिब है?
क़ुर्बानी उस मुसलमान पर वाजिब (Obligatory) है जो मालिक-ए-निसाब (Owner of Nisab) हो। मालिक-ए-निसाब वह व्यक्ति है जिसके पास ईदुल-अज़हा के दिन अपनी ज़रूरी ज़रूरतों (Basic Needs) के अलावा साढ़े बावन तोला चाँदी या साढ़े सात तोला सोना, या उसकी कीमत के बराबर माल मौजूद हो। भारत में चाँदी के निसाब का सटीक मूल्य ₹1,74,460 (लगभग ₹1.74 लाख) है।
अगर किसी व्यक्ति के पास ज़रूरत से ज़्यादा मकान (Extra Property) या खेती की ज़मीन (Agricultural Land) हो और उसकी कीमत निसाब तक पहुँच जाए, तो उस पर क़ुर्बानी वाजिब होगी। भले ही उस पर ज़कात (Zakat) वाजिब न हो। यदि उसके पास नकद (Cash) न हो तो कर्ज़ (Loan) लेकर या संपत्ति बेचकर भी क़ुर्बानी करनी चाहिए।
नोट:
- सोने का निसाब (Gold Nisab): लगभग 312 ग्राम
- चाँदी का निसाब (Silver Nisab): लगभग 184 ग्राम
हाँ, नाबालिग (Minor) पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं, चाहे वह मालिक-ए-निसाब ही क्यों न हो। इसी तरह जिस व्यक्ति का पैसा दूसरों के पास कर्ज़ (Debt) के रूप में फँसा हुआ हो, उस पर भी क़ुर्बानी वाजिब (Obligatory) नहीं होती।
शहर और गाँव वालों पर क़ुर्बानी का हुक्म
क़ुर्बानी शहरी (Urban) और गाँव (Rural) दोनों पर वाजिब होती है, यदि उसमें वाजिब होने की शर्तें मौजूद हों। लेकिन मुसाफ़िर (Traveller) पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं होती। हाँ, अगर मुसाफ़िर क़ुर्बानी करे तो वह नफ़्ल (Voluntary) होगी और उसे सवाब (Reward) मिलेगा।
فِي الدُّرِّ الْمُخْتَارِ تَجِبُ التَّضْحِيَةُ عَلٰى حُرٍّ مُسْلِمٍ مُقِيْمٍ بِمِصْرٍ أَوْ قَرْيَةٍ أَوْ بَادِيَةٍ ، فَلاَ تَجِبُ عَلٰى مُسَافِرٍ
“क़ुर्बानी हर आज़ाद, मुसलमान और मुक़ीम (स्थायी रूप से रहने वाले) व्यक्ति पर वाजिब है, चाहे वह शहर, गाँव या जंगल में रहता हो। “इसलिए मुसाफ़िर (Traveller) पर क़ुर्बानी वाजिब (Obligatory) नहीं है।”
क़ुर्बानी का समय (Time of Qurbani)
चाहे क़ुर्बानी करने वाला शहरी (Urban) हो या गाँव का रहने वाला (Rural), अगर क़ुर्बानी शहर (City) में की जा रही है, तो वह नमाज़-ए-ईद (Eid Prayer) के बाद ही जायज़ होगी। और अगर गाँव (Village) में की जा रही है, तो सुबह से ही क़ुर्बानी करना जायज़ है।
इस मामले में यह नहीं देखा जाएगा कि क़ुर्बानी करने वाला कौन है, बल्कि यह देखा जाएगा कि क़ुर्बानी कहाँ की जा रही है (Place of Qurbani)।
हाँ, गाँव वालों के लिए क़ुर्बानी का मुस्तहब (Recommended) समय सूर्योदय (Sunrise) के बाद है, और शहर वालों के लिए बेहतर समय ईद के ख़ुत्बे (Eid Sermon) के पूरा होने के बाद है।
फ़तावा आलमगीरी में है:
وَالْوَقْتُ الْمُسْتَحَبُّ لِلتَّضْحِيَةِ فِيْ حَقِّ أَهْلِ السَّوَادِ بَعْدَ طُلُوْعِ الشَّمْسِ وَفِيْ حَقِّ أَهْلِ الْمِصْرِ بَعْدَ الْخُطْبَةِ
“गाँव वालों के लिए क़ुर्बानी का बेहतर समय सूर्योदय के बाद है, और शहर वालों के लिए ख़ुत्बे के बाद।”
शहर में ईद की नमाज़ से पहले क़ुर्बानी करना बिल्कुल सही (Valid) नहीं है। (बहार-ए-शरीअत जिल्द 3)
क़ुर्बानी के बदले दूसरी चीज़ देना काफ़ी नहीं
क़ुर्बानी के दिनों (10, 11, 12 ज़िलहिज्जा) में सिर्फ़ क़ुर्बानी ही करनी होगी। इसकी जगह बकरी की कीमत या कोई दूसरी चीज़ सदक़ा (Charity) कर देने से क़ुर्बानी पूरी नहीं होगी।
हाँ, कोई दूसरा व्यक्ति आपकी तरफ़ से नुमाइंदगी (Representation) करते हुए क़ुर्बानी कर सकता है।
क़ुर्बानी के जानवर (Animals for Qurbani)
क़ुर्बानी के जानवर तीन प्रकार (Three Categories) के होते हैं:
(1) ऊँट (Camel)
(2) गाय (Cow)
(3) बकरी (Goat)
इन तीनों की जितनी भी नस्लें (Breeds/Types) हैं, वे सभी इसमें शामिल हैं। चाहे वह:
- नर (Male) हो या मादा (Female)
- ख़सी (Castrated) हो या ग़ैर-ख़सी (Non-Castrated)
सभी का एक ही हुक्म है, अर्थात इन सभी की क़ुर्बानी की जा सकती है।
भैंस (Buffalo) गाय की श्रेणी में आती है, इसलिए उसकी भी क़ुर्बानी की जा सकती है। इसी प्रकार भेड़ (Sheep) और दुम्बा (Ram) बकरी की श्रेणी में शामिल हैं, इसलिए उनकी भी क़ुर्बानी जायज़ है। (बहार-ए-शरीअत, जिल्द 3)
क़ुर्बानी के जानवर की उम्र (Required Age of Animal)
क़ुर्बानी के जानवर की कम से कम उम्र (Minimum Age) यह होनी चाहिए:
- ऊँट (Camel): 5 साल
- गाय / भैंस (Cow/Buffalo): 2 साल
- बकरी (Goat): 1 साल
अगर जानवर की उम्र इससे कम हो, तो उसकी क़ुर्बानी जायज़ (Valid) नहीं होगी। और अगर उम्र इससे ज़्यादा हो, तो क़ुर्बानी अफ़ज़ल (Better/Preferred) भी है।
हाँ, दुम्बा (Ram) या भेड़ (Sheep) का छह महीने का बच्चा अगर इतना बड़ा और स्वस्थ (Healthy) हो कि दूर से देखने पर वह एक साल के जानवर जैसा दिखाई दे, तो उसकी क़ुर्बानी करना भी जायज़ है। (बहार-ए-शरीअत, जिल्द 3)
छह महीने के दुम्बे और भेड़ का मसला
“यदि छह महीने का दुम्बा (Ram) इतना मोटा-ताज़ा (Healthy & Well-built) हो कि एक साल के जानवरों के साथ खड़े होने पर दूर से अलग पहचान में न आए, तो उसकी क़ुर्बानी जायज़ है, चाहे वह ख़सी (Castrated) न भी हो।
लेकिन बकरा (Goat) यदि एक साल से कम उम्र का हो, तो उसकी क़ुर्बानी जायज़ नहीं होगी, चाहे वह ख़सी ही क्यों न हो।”
इसी तरह फ़तावा रज़विया में आगे लिखा है:
“छह महीने की भेड़ (Sheep) की क़ुर्बानी बिना किसी संदेह के जायज़ है, बशर्ते कि वह एक साल की भेड़ों के साथ दूर से अलग पहचान में न आए।”
यह वही शर्त दुम्बे (Ram) पर भी लागू होती है, क्योंकि दुम्बा और भेड़ एक ही प्रकार (Same Category) के जानवर हैं और दोनों का एक ही हुक्म है। यह बात सही अहादीस (Authentic Hadiths) और फ़िक़्ह की किताबों (Books of Islamic Jurisprudence) से साबित है।
टूटे सींग वाले जानवर की क़ुर्बानी
अगर किसी जानवर का सींग (Horn) टूटा हुआ हो, तो उसकी क़ुर्बानी करना जायज़ है। लेकिन यदि सींग उस जगह तक टूट गया हो जहाँ से वह उगता है, यानी जड़ (Root/Base) तक टूट गया हो, तो उसकी क़ुर्बानी जायज़ नहीं होगी।
फ़तावा रज़विया में है:
“सींग का टूटना उस समय क़ुर्बानी में बाधा बनता है जब वह सिर के अंदर जड़ तक टूट जाए। लेकिन यदि केवल ऊपर का हिस्सा टूटा हो, तो इससे क़ुर्बानी पर कोई असर नहीं पड़ता।” لِأَنَّ المَانِعَ قَدْ زَالَ “क्योंकि रुकावट (Defect) समाप्त हो चुकी है।”
अर्थात यदि पहले घाव था लेकिन बाद में ठीक हो गया और दोष समाप्त हो गया, तो फिर उसकी क़ुर्बानी में कोई समस्या नहीं होगी।
क़ुर्बानी करने का तरीका (Method of Performing Qurbani)
सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि क़ुर्बानी केवल जानवर ज़बह करने का नाम नहीं, बल्कि यह रहमत, शिष्टाचार और सुन्नत के अनुसार अदा की जाने वाली इबादत है।
- क़ुर्बानी से पहले जानवर को चारा और पानी (Food & Water) दे देना चाहिए, यानी उसे भूखा-प्यासा हालत में ज़बह नहीं करना चाहिए।
- एक जानवर के सामने दूसरे जानवर को ज़बह नहीं करना चाहिए।
- छुरी (Knife) पहले से तेज़ कर लेनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जानवर को लिटाने के बाद उसके सामने छुरी तेज़ की जाए।
क़ुर्बानी के जानवर को उसके बाएँ पहलू (Left Side) पर इस तरह लिटाएँ कि उसका मुँह क़िब्ला (Qiblah) की ओर हो, और अपना दाहिना पैर उसके पहलू पर रखें। ज़बह करने से पहले यह दुआ पढ़ें:
اِنِّیْ وَجَّهْتُ وَجْهِیَ لِلَّذِیْ فَطَرَ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضَ حَنِیْفًا وَّمَاۤ اَنَا مِنَ الْمُشْرِكِیْنَ، اِنَّ صَلَاتِیْ وَنُسُكِیْ وَمَحْیَایَ وَمَمَاتِیْ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِیْنَ، لَا شَرِیْكَ لَهٗ وَبِذٰلِكَ اُمِرْتُ وَاَنَا مِنَ الْمُسْلِمِیْنَ
फिर यह पढ़ें:
اَللّٰهُمَّ لَكَ وَمِنْكَ بِسْمِ اللّٰهِ اَللّٰهُ أَكْبَرُ
फिर तेज़ छुरी से जल्दी ज़बह करें।
अगर अपनी तरफ़ से क़ुर्बानी हो, तो ज़बह के बाद यह दुआ पढ़ें:
اَللّٰهُمَّ تَقَبَّلْ مِنِّي كَمَا تَقَبَّلْتَ مِنْ خَلِيلِكَ إِبْرَاهِيمَ عَلَيْهِ السَّلَامُ وَحَبِيبِكَ مُحَمَّدٍ ﷺ
अनुवाद:
“ऐ अल्लाह! मेरी इस क़ुर्बानी को उसी तरह स्वीकार फ़रमा, जैसे तूने अपने ख़लील हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और अपने हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ की क़ुर्बानी को स्वीकार किया।”
अगर किसी दूसरे की तरफ़ से क़ुर्बानी कर रहे हों, तो "مِنِّي" की जगह "مِنْ" के बाद उसका नाम लें।
(बहार-ए-शरीअत, जिल्द 3)
क़ुर्बानी का गोश्त ग़ैर-मुस्लिम (Non-Muslim) को देना जायज़ नहीं बताया गया है।
(बहार-ए-शरीअत, जिल्द 3)
क़ुर्बानी की खाल (Hide/Skin of Qurbani Animal) का हुक्म
क़ुर्बानी की खाल (Hide/Skin) सादात-ए-किराम (Descendants of the Prophet ﷺ) को देना जायज़ है। इंसान अपने माता-पिता (Parents), औलाद (Children), पति (Husband) और पत्नी (Wife) को भी दे सकता है। अगर यह सवाब (Reward) की नीयत से दी जाए, तो यह सदक़ा-ए-नफ़्ल (Voluntary Charity) होगी, और अगर केवल भेंट के रूप में दी जाए तो यह हदिया (Gift) कहलाएगी।
इसके अलावा क़ुर्बानी की खाल को:
- अपने उपयोग (Personal Use) में ला सकते हैं
- मस्जिद (Mosque) को दे सकते हैं
- दीनी मदरसा (Islamic School) को दे सकते हैं
- किसी गरीब (Poor Person) को दे सकते हैं
और खाल बेचकर उसकी कीमत मस्जिद या मदरसे को देना भी जायज़ है।
लेकिन खाल को बेचकर उसकी रकम अपनी निजी ज़रूरत (Personal Benefit) या अपने बच्चों और परिवार पर खर्च करना सही नहीं है। यदि ऐसा करे, तो उसकी कीमत सदक़ा करना ज़रूरी होगा।
फ़तावा आलमगीरी में है:
لاَ يَبِيْعُهُ (الْجِلْدَ) بِالدَّرَاهِمِ لِيُنْفِقَ الدَّرَاهِمَ عَلٰى نَفْسِهٖ وَعِيَالِهٖ، وَلَوْ بَاعَهَا بِالدَّرَاهِمِ لِيَتَصَدَّقَ بِهَا جَازَ
“खाल को इस उद्देश्य से बेचना कि उसकी रकम अपने ऊपर या अपने परिवार पर खर्च करे, सही नहीं है। लेकिन अगर उसे बेचकर उसकी रकम सदक़ा करने की नीयत हो, तो यह जायज़ है।”
(फ़तावा आलमगीरी, खंड 5, पृष्ठ 371)
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
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