इस्लामी परिधान में शालीनता की अवधारणा

परिचय (Introduction)

शालीनता—जिसे अरबी में ḥayāʾ (modesty) कहा जाता है—इस्लाम के बहुत ही महत्वपूर्ण गुणों (virtues) में से एक है और अच्छे नैतिक व्यवहार (ethical conduct) की बुनियाद मानी जाती है। इस्लामी शिक्षाएँ कपड़ों (dress) को सिर्फ़ सांस्कृतिक (cultural) या व्यक्तिगत पसंद (personal choice) नहीं मानतीं, बल्कि उन्हें एक गहरा आध्यात्मिक (spiritual) और नैतिक (moral) कार्य समझती हैं।

इसका मतलब यह है कि पहनावा ईश्वर  के सामने विनम्रता, समाज में मानवीय गरिमा (human dignity) और नैतिक ज़िम्मेदारी (moral responsibility) को दिखाने का तरीका होता है। इस नज़रिये से बाहरी रूप (appearance) आस्था (faith) का प्रतीक बन जाता है, जहाँ दिल की धार्मिकता (inner piety) इंसान के व्यवहार और पहनावे में साफ़ दिखाई देती है।

इस्लाम के उदय (emergence of Islam) के समय अरब प्रायद्वीप (Arabian Peninsula) में अलग-अलग जनजातियों की अपनी-अपनी सामाजिक परंपराएँ (social practices) थीं, जिनमें पहनावे (dress) के तरीके भी शामिल थे।

किंतु क़ुरआन और पैग़म्बर मुहम्मद की सुन्नत (Prophetic Sunnah) ने परिधान (clothing) को केवल स्थानीय रिवाज़ (local tradition) तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे ऊँची नैतिकता (divine ethics) से जोड़ दिया।

इस बदलाव के ज़रिये इस्लाम ने एक सार्वभौमिक नैतिक नियम (universal moral code) पेश किया, जो समय और स्थान (time and space) की सीमाओं से ऊपर है। इसी सोच से शालीनता (modesty), गरिमा (dignity) और संयम (restraint) पर आधारित एक सुंदर नैतिक दृष्टि (ethical aesthetic) विकसित हुई, जो आज भी इंसानी जीवन को संतुलन और सम्मान सिखाती है।

यह बात भी समझना ज़रूरी है कि इस्लामी शालीनता (modesty) किसी एक लिंग (gender) पर थोपी गई पाबंदी नहीं है और न ही यह दमन (suppression) का साधन है। इसका असली उद्देश्य व्यक्ति के भीतर सुधार (inner refinement) लाना और समाज में सामूहिक नैतिक संतुलन (collective moral harmony) को मज़बूत करना है।

इस्लाम में पुरुष और महिलाएँ—दोनों—अपने व्यवहार (behaviour), बोलचाल (speech) और पहनावे (dress) में शालीनता के लिए बराबर ज़िम्मेदार हैं। क़ुरआन पहले पुरुषों को और फिर महिलाओं को संबोधित करता है, जिससे यह साफ़ हो जाता है कि शालीनता एक साझा नैतिक ज़िम्मेदारी (shared moral responsibility) है, न कि केवल महिलाओं का कर्तव्य।

हया का अर्थ और दर्शन (Meaning and philosophy of modesty)

अरबी शब्द الْحَيَاءُ (al-ḥayāʾ) की जड़ ḥayāh (life) से निकली है। इसका मतलब यह हुआ कि शालीनता (modesty) ईमान वाले इंसान की आत्मिक ज़िंदगी (spiritual vitality) को ज़िंदा और मज़बूत बनाए रखती है। जब शालीनता नहीं होती, तो इंसान की नैतिक समझ (moral awareness) धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ जाती है। लेकिन जब शालीनता मौजूद होती है, तो दिल अल्लाह की रहनुमाई (divine guidance) के प्रति सजग और जागरूक रहता है।

पैग़म्बर मुहम्मद ने इसकी महत्ता एक प्रसिद्ध हदीस में स्पष्ट की है:

الْحَيَاءُ شُعْبَةٌ مِنَ الْإِيمَانِ

“शालीनता (ḥayāʾ) ईमान (faith) की एक शाखा है।”
(Ṣaḥīḥ al-Bukhārī)

यह संक्षिप्त कथन (concise statement) साफ़ तौर पर दिखाता है कि हया (ḥayāʾ / modesty) ईमान का एक अहम और अलग न होने वाला हिस्सा है। यह सिर्फ़ कपड़ों (dress) तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक नैतिक समझ (comprehensive moral consciousness) है।

यही नैतिक समझ तय करती है कि एक आस्तिक (believer) कैसे कपड़े पहने, कैसे बोले, कैसे चले और समाज में कैसा व्यवहार (behaviour) करे। इस तरह शालीन परिधान (cloth) इंसान के भीतर की विनम्रता और सम्मान (inner humility & respect) की बाहरी झलक बन जाता है।

 

हया के आयाम (Dimensions of modesty)

पारंपरिक इस्लामी विद्वानों (classical scholars) ने शालीनता को तीन आपस में जुड़े हुए पहलुओं में समझाया है:

  1. ईश्वर के प्रति शालीनता (ḥayāʾ maʿa Allāh)
    इसका अर्थ है ऐसा पहनावा और आचरण (conduct) अपनाना जो अल्लाह को नापसंद न हो, चाहे इंसान अकेले में ही क्यों न हो। यह एहसास बना रहे कि ईश्वर (God) हर समय देख रहा है।
  2. समाज के प्रति शालीनता (ḥayāʾ maʿa al-nās)
    इसका मतलब है ऐसे कपड़ों और व्यवहार से बचना जो बेवजह आकर्षण पैदा करें या इंसान को एक वस्तु (object) बना दें। शालीनता समाज में सम्मान और संतुलन बनाए रखती है।
  3. स्वयं के प्रति शालीनता (ḥayāʾ maʿa al-nafs)
    इसका अर्थ है अकेले में भी आत्म-सम्मान (self-respect) बनाए रखना, क्योंकि इंसान हर हाल में अपने सृष्टिकर्ता (Creator) के सामने होता है।

इस तरह इस्लाम में शालीनता केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और ईश्वर—तीनों के साथ संतुलित और सम्मानजनक संबंध बनाने का तरीका है।

ये तीनों आयाम मिलकर एक नैतिक ढाँचा (moral framework) निर्मित करते हैं, जहाँ शालीन परिधान (modest clothing) नैतिक अभ्यास (ethical practice) और आध्यात्मिक अनुशासन (spiritual discipline)—दोनों बन जाता है।

हया एक नैतिक दिशासूचक (Modesty as a moral compass)

इस्लामी नैतिक दर्शन (Islamic moral philosophy) में हया (modesty) को विनम्रता (humility), आत्म-संयम (discipline) और नैतिक अखंडता (moral integrity) से जोड़ा जाता है। शालीनता इंसान को अहंकार (ego) और घमंड (arrogance) से बचाती है।

क्योंकि कपड़े व्यक्ति की सार्वजनिक पहचान (public identity) होते हैं, इसलिए वे इंसान के भीतर अच्छे गुणों को विकसित करने का माध्यम बनते हैं। इसी वजह से शालीन परिधान कोई ज़बरदस्ती (compulsion) नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि (self-purification) की एक स्वेच्छा से की गई कोशिश है, जो धार्मिक जीवन में नैतिक स्वतंत्रता (moral freedom) को दर्शाती है।

परिधान में शालीनता के क़ुरआनी आधार (The Quranic foundations of modesty in clothing)

क़ुरआन परिधान और शालीनता के विषय में मूल मार्गदर्शन (central guidance) प्रदान करता है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पहले आस्तिक पुरुषों और उसके पश्चात आस्तिक महिलाओं को संबोधित किया गया है, जिससे पारस्परिक नैतिक उत्तरदायित्व (reciprocal moral accountability) स्पष्ट होता है।

पुरुषों के लिए शालीनता: नज़र नीची रखना और पाकदामनी (Modesty for men: lowering one's gaze and maintaining chastity)


क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ
(سورۃ النور، 24:30)
“मोमिन पुरुषों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करें। यह उनके लिए ज़्यादा पाक है। निश्चय ही अल्लाह उनके कामों से पूरी तरह वाक़िफ़ है।” (सूरह अन-नूर (24:30)।

इस आयत से तीन नैतिक सिद्धांत सामने आते हैं:
• शालीनता की शुरुआत नज़र से होती है—पहनावे से पहले चेतना आती है।
• पाकीज़गी आत्म-संयम से पैदा होती है।
• अल्लाह की निगरानी छिपी नीयतों तक फैली है।

इसलिए शालीन पहनावा शालीन नज़र और व्यवहार के साथ जुड़ा होना चाहिए।

महिलाओं के लिए शालीनता: व्यवहारिक और शारीरिक संयम (Modesty for women: behavioural and physical restraint)


इसके तुरंत बाद अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَقُلْ لِلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا ۖ وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ
(سورۃ النور، 24:31)
“और मोमिन औरतों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें, अपनी पाकदामनी की हिफ़ाज़त करें, और अपनी ज़ीनत को ज़ाहिर न करें सिवाय इसके जो अपने आप ज़ाहिर हो, और अपनी ओढ़नियों को अपने गिरेबानों पर डाल लें।”  (सूरह अन-नूर (24:31)

यह आयत शालीनता का एक समग्र दृष्टिकोण देती है—व्यवहारिक (नज़र नीची रखना), नैतिक (पाकदामनी), और शारीरिक (उचित ढंग से ढकना)। इसमें ख़िमार (khimār / head-covering) को जुयूब (bosom/neckline) पर रखने का आदेश है, जो शालीनता के व्यवहारिक और सौंदर्यात्मक संतुलन (practical & aesthetic balance) को दर्शाता है।

क़ुरआन परिधान और शालीनता के बारे में मूल मार्गदर्शन (central guidance) देता है। यह एक अहम बात है कि क़ुरआन पहले ईमान वाले पुरुषों (believing men) को संबोधित करता है और उसके बाद ईमान वाली महिलाओं (believing women) को।

इससे यह साफ़ हो जाता है कि शालीनता केवल एक पक्ष की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पुरुष और महिला—दोनों—पर समान रूप से लागू होने वाला आपसी नैतिक दायित्व (reciprocal moral accountability) है।

जिलबाब और सार्वजनिक गरिमा (Jilbab and public dignity)

क़ुरआन में जिलबाब (jilbāb / outer garment) के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में पहचान (identity), सुरक्षा (protection) और सम्मान (dignity) को सुनिश्चित करने की बात कही गई है।

तक़वा का परिधान (Garment of Taqwā)

क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ (سورۃ الأعراف، 7:26)

“तक़वा (ईश्वर-चेतना/God-consciousness) का परिधान ही सबसे उत्तम है।” (सूरह अल-राफ़ (7:26)

यह आयत यह दर्शाती है कि बाहरी वस्त्रों से अधिक महत्त्व आंतरिक धार्मिक चेतना (inner piety) का है।

निष्कर्ष (Conclusion)

इस्लामी परिधान में शालीनता केवल कपड़ों के नियम (dress rules) नहीं हैं, बल्कि यह नैतिक चेतना (moral consciousness) और आध्यात्मिक उद्देश्य (spiritual purpose) से जुड़ी हुई एक सोच है। क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में शालीनता दिल के गुणों और बाहरी व्यवहार को एक साथ जोड़ती है। निगाहों पर नियंत्रण (self-control of gaze), गरिमापूर्ण कपड़े और अहंकार से दूरी—ये सब रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आध्यात्मिकता (spirituality) को ज़मीन पर उतारते हैं।

हया  (modesty) इस्लामी जीवन के शारीरिक और नैतिक—दोनों पहलुओं को सक्रिय बनाता है। यह कोई बंधन (restriction) नहीं, बल्कि उद्देश्य (purpose) और संतुलन (balance) के साथ जीने की स्वतंत्रता है। जैसा कि क़ुरआन कहता है—
तक़वा का परिधानवही सर्वोत्तम है (7:26)। यही इस्लाम की वह समग्र दृष्टि (holistic vision) है, जिसमें गरिमा, आस्था और सच्ची सुंदरता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

लेखक:

 आसिफ रज़ा, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज, बिहार

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