इस्लाम में स्वच्छता का महत्व

परिचय

स्वच्छता हमारी जिंदगी का एक बहुत आवश्यक भाग है। यह न सिर्फ हमारे शरीर को स्वस्थ रखती है, बल्कि हमारे मन और रूह को भी शांति देती है। कल्पना कीजिए, जब पेड़-पौधे हवा में उड़ने वाली धूल-मिट्टी से गंदे और प्रदूषित हो जाते हैं, तो आसमान से गिरने वाली बारिश की बूंदें उनकी टहनियों और पत्तियों पर पड़ती हैं। ये बूंदें गंदगी को ऐसे बहा ले जाती हैं, जैसे कभी वहां गंदगी लगी ही न हो। उसके बाद, सूरज की रोशनी में पत्तियां चमकने लगती हैं, फूल मुस्कुराते हुए खिलते हैं, और हवा के साथ बहने वाली मीठी और ताजा खुशबू हमें एक अलग ही आनंद देती है। यह दृश्य खुद-ब-खुद स्वच्छता (cleanliness) के महत्व को बताता है, बिना किसी शब्द या व्याख्या के। यह सब अल्लाह तआला की ओर से एक बड़ा उपहार है, एक नेमत (blessing) जो हमें याद दिलाती है कि अच्छी और पाक चीजें अल्लाह की रिज्क (provision) में से हैं। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है: اَلطَّيِّبَاتُ مِنَ الرِّزْقِ (अच्छी चीजें अल्लाह की नेमतों में से हैं) ( المائدہ: 88)।

इसलिए, हमें अपने आस-पास, घर, मोहल्ले और पर्यावरण की सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। यह मात्र हमारी ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि एक फर्ज है। पेड़-पौधों की हिफाजत करने से न सिर्फ हमारा पर्यावरण बेहतर और हरा-भरा होता है, बल्कि इससे हमें सेहत, खुशी और शांति मिलती है। हमारे प्यारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

مَا مِنْ مُسْلِمٍ يَغْرِسُ غَرْسًا أَوْ يَزْرَعُ زَرْعًا فَيَأْكُلُ مِنْهُ طَيْرٌ أَوْ إِنْسَانٌ إِلَّا كَانَ لَهُ صَدَقَةٌ

(जब कोई मुसलमान एक पेड़ लगाता है या बीज बोता है, और उससे कोई पक्षी, जानवर या इंसान खाता है, तो उसे सदका का सवाब मिलता है) (صحیح مسلم)।

इस हदीस से साफ स्पष्ट होता है कि पेड़-पौधों की देखभाल न मात्र हमें दुनिया में लाभ पहुंचाती है, बल्कि आखिरत में भी नेकी का कारण बनती है। इससे वातावरण साफ-सुथरा रहता है, हवा शुद्ध होती है, और हमारी जिंदगी में खुशहाली आती है।

आज के दौर में, जब प्रदूषण और गंदगी के कारण से बीमारियां फैल रही हैं, स्वच्छता का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस्लाम हमें सिखाता है कि स्वच्छता मात्र बाहर की नहीं, बल्कि अंदर की भी होनी चाहिए।

इस्लाम में स्वच्छता

इस्लाम एक पूरा और पवित्र धर्म है, जो मात्र रूहानी इबादतों या उपासनाओं तक सीमित नहीं है। यह हमारी जिंदगी के हर पहलू – चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या सामाजिक – को राह दिखाता है।

स्वच्छता इस्लाम का एक अभिन्न अंग है, जिसकी अहमियत इतनी ज्यादा है कि इसे सिर्फ शरीर की सफाई तक नहीं रखा गया। यह तन, मन, आत्मा, हृदय, वस्त्र, घर-परिवार और यहां तक कि समाज और पर्यावरण की सफाई तक फैली हुई है।

अल्लाह तआला ईरशाद फरमाता है:

وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِينَ

(और अल्लाह पाक लोगों को पसंद करता है) (  سورۃ التوبہ: ١٠٨)।

एक और जगह अल्लाह तआला फरमाता है:

إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ التَّوَّابِينَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِينَ

(अल्लाह तौबा करने वालों और सफाई रखने वालों को पसंद करता है) ( سورۃ البقرہ: ٢٢٢)।

इन आयतों से साफ है कि हमें गुनाहों से तौबा (repentance) के साथ-साथ शारीरिक और रूहानी सफाई भी करनी चाहिए।

इस्लाम की हर इबादत स्वच्छता से जुड़ी हुई है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी। बिना सफाई के कोई इबादत कबूल नहीं होती। उदाहरण के लिए, नमाज, रोजा, हज, जकात – सब में पाकी जरूरी है। अगर हम गंदे रहकर इबादत करें, तो वह व्यर्थ जाती है। इस्लाम हमें सिखाता है कि सफाई से हमारी सेहत अच्छी रहती है, बीमारियां दूर रहती हैं, और समाज में शांति बनी रहती है। आज के वैज्ञानिक दौर में भी, डॉक्टर और विशेषज्ञ सफाई को बीमारियों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका बताते हैं। इस्लाम ने 1400 साल पहले ही यह सब सिखा दिया, जो इसकी पूर्णता का सबूत है।

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

إِنَّ اللَّهَ طَيِّبٌ يُحِبُّ الطَّيِّبَ نَظِيفٌ يُحِبُّ النَّظَافَةَ كَرِيمٌ يُحِبُّ الْكَرَمَ

(निश्चय ही अल्लाह तआला पाक (शुद्ध) है और पाकीज़गी को पसंद करता है। वह साफ़-सुथरा है और सफ़ाई को पसंद करता है। वह करीम (दयालु/उदार) है और उदारता को पसंद करता है) (سنن ترمذي)।

इस हदीस से पता चलता है कि अल्लाह खुद पाकी का प्रेमी है, इसलिए उसके बंदों को भी पाक रहना चाहिए। स्वच्छता सिर्फ व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। हमारे चारों तरफ के वातावरण – जैसे नालियां, तालाब, झीलें, पोखर, बाग-बगीचे और पार्क – की सफाई भी एक बड़ी इबादत मानी जाती है। इस्लाम ने इसे इतना महत्व दिया है कि इसे धर्म का महान योगदान कहा जाता है।

गंदगी सिर्फ बाहर की नहीं होती, बल्कि दिल के अंदर की भी – जैसे हसद (envy), ईर्ष्या, जलन, लालच और नफरत। इनसे दिल को पाक करना जरूरी है।

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

الْبِرُّ حُسْنُ الْخُلُقِ وَالْإِثْمُ مَا حَاكَ فِي نَفْسِكَ وَكَرِهْتَ أَنْ يَطَّلِعَ عَلَيْهِ النَّاسُ

(नेकी अच्छे अखलाक (morals) का नाम है, और गुनाह वह है जो दिल में खटके और लोगों के सामने जाहिर न करना चाहो) (صحیح مسلم )।

एक और हदीस में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

أَكْمَلُ الْمُؤْمِنِينَ إِيمَانًا أَحْسَنُهُمْ خُلُقًا

(सबसे परिपूर्ण मोमिन वह है जिसका अखलाक सबसे अच्छा हो) (صحیح بخاري )।

और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

الطَّهُورُ شَطْرُ الْإِيمَانِ

(सफाई ईमान का आधा हिस्सा है) (صحیح مسلم)।

इन हदीसों से पता चलता है कि सफाई न सिर्फ शरीर की, बल्कि व्यवहार और नैतिकता की भी है। जो व्यक्ति पाक रहता है, वह अल्लाह का प्रिय बंदा बनता है।

कुरआन मजीद और हदीस शरीफ में सफाई को नेकी का सबब बताया गया है। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति रास्ते से कचरा हटाता है, तो उसे सदका का सवाब मिलता है।

हदीस में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: الإِيمَانُ بِضْعٌ وَسِتُّونَ ـ أَوْ بِضْعٌ وَسَبْعُونَ ـ شُعْبَةً، فَأَفْضَلُهَا قَوْلُ: لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَدْنَاهَا إِمَاطَةُ الأَذَى عَنِ الطَّرِيقِ، وَالْحَيَاءُ شُعْبَةٌ مِنَ الإِيمَانِ

(हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “ईमान की साठ से ज़्यादा (या सत्तर से ज़्यादा) शाखाएँ हैं। उनमें सबसे ऊँची शाखा ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहना है, और सबसे निचली शाखा रास्ते से तकलीफ़ देने वाली चीज़ को हटाना है। और हया (लज्जा/संकोच) भी ईमान की एक शाखा है”) (صحیح  بخاري)।

ईमान सिर्फ़ दिल की बात नहीं बल्कि:

  • ईमान में अक़ीदा, इबादत, अख़लाक़ और सामाजिक व्यवहार सब शामिल हैं।
  • छोटी नेकी भी ईमान का हिस्सा है।
  • रास्ते से काँटा हटाना कोई छोटी बात नहीं, बल्कि यह भी ईमान की पहचान है।
  • यह हदीस सिखाती है कि मुसलमान समाज की भलाई और लोगों की सुरक्षा का ज़िम्मेदार है।
  • सार्वजनिक जगहों की सफ़ाई रखना भी सुन्नत और सवाब का काम है।

स्वच्छता और इबादतों का संबंध

इस्लाम की सबसे बड़ी इबादत नमाज है, और इसे पढ़ने से पहले हर तरह की गंदगी से पाक होना जरूरी है।

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

مِفْتَاحُ الْجَنَّةِ الصَّلَاةَ وَمِفْتَاحُ الصَّلَاةِ الطَّهُورُ

(जन्नत की चाबी नमाज है, और नमाज की चाबी सफाई है) (سنن ابن ماجہ)।

अगर किसी को बड़ी गंदगी (जनाबत) लगी हो, तो गुसल करना वाजिब है, और छोटी गंदगी में वुजू काफी है।

अल्लाह तआला ईरशाद फरमाता है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قُمْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ فَاغْسِلُوا وُجُوهَكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ إِلَى الْمَرَافِقِ وَامْسَحُوا بِرُءُوسِكُمْ وَأَرْجُلَكَمْ إِلَى الْكَعْبَيْنِ

(ऐ ईमान वालों, नमाज के लिए उठो तो चेहरे धोओ, हाथ कोहनी तक, सिर का मसह करो और पैर टखनों तक धोओ) ( سورۃ المائدہ: ٦)।

और इसी तरह यदि पानी न मिले, तो तयम्मुम का हुक्म है। अल्लाह ताला फरमाता है:

وَإِنْ كُنْتُمْ مَرْضَىٰ أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوْ جَاءَ أَحَدٌ مِنْكُمْ مِنَ الْغَائِطِ أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا

(अगर बीमार हो, सफर में हो या गंदगी लगी हो और पानी न मिले, तो साफ मिट्टी से तयम्मुम करो) (سورۃ المائدہ: ٦)।

यह दिखाता है कि इस्लाम में इबादत के लिए सफाई का कितना ख्याल रखा गया है। बिना पाकी के नमाज नहीं होती, और यह नियम रोजा, हज जैसी अन्य इबादतों पर भी लागू होता है। सफाई से हमारी इबादतें अल्लाह के करीब पहुंचती हैं।

गुसल: क्यों और कैसे

गुसल बड़ी गंदगियों से पाक होने का तरीका है, जैसे इहतलाम (wet dream), हमबिस्तरी (intercourse), हैज (menstruation) या निफास (postpartum bleeding)। बिना गुसल के इबादत कबूल नहीं होती, और यह बड़ा पाप है।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

وَلَا تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّىٰ يَطْهُرْنَ فَإِذَا تَطَهَّرْنَ فَأْتُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَمَرَكُمُ اللَّهُ

(महिलाओं से दूर रहो जब तक पाक न हों, फिर जैसे अल्लाह ने हुक्म दिया, उनके पास जाओ) ( سورۃ البقرہ: ٢٢٢)।

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

لَا تَقْرَأُ الْحَائِضُ وَلَا الْجُنُبُ شَيْئًا مِنَ الْقُرْآنِ

(हैज वाली या नापाक व्यक्ति कुरान नहीं पढ़ सकता) (سنن ترمذي)।

दुसरे जगह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

إِذَا الْتَقَى الْخِتَانَانِ وَغَابَ الْحَشَفَةُ وَجَبَ الْغُسْلُ

(“जब (पति-पत्नी के बीच) दोनों ख़ितान (गुप्त अंग) मिल जाएँ और हशफ़ा (पुरुष अंग का अग्र भाग) अंदर चला जाए, तो ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो जाता है”) (صحیح مسلم)।

नबी ﷺ ईद, जुमा और अरफा के दिन गुसल करते थे, क्योंकि इससे सवाब मिलता है।

गुसल का तरीका:

बिस्मिल्लाह पढ़कर हाथ धोना, कुल्ली करना, नाक में पानी डालना, गंदगी हटाना, फिर पूरे बदन पर पानी बहाना।

औरतों का गुस्ल

عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، قَالَتْ: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنِّي امْرَأَةٌ أَشُدُّ ضَفْرَ رَأْسِي، أَفَأَنْقُضُهُ لِغُسْلِ الْجَنَابَةِ؟ فَقَالَ ﷺ: «إِنَّمَا يَكْفِيكِ أَنْ تَحْثِيَ عَلَيْهِ ثَلَاثَ حَثَيَاتٍ مِنْ مَاءٍ، ثُمَّ تُفِيضِي عَلَيْكِ مِنَ الْمَاءِ فَتَطْهُرِينَ».أَوْ قَالَ: «فَإِذَا أَنْتِ قَدْ طَهُرْتِ».

(हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है: मैंने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपने सिर के बाल कसकर गूँथती (चोटी बाँधती) हूँ। क्या मुझे जनाबत (अपवित्रता) के ग़ुस्ल के लिए बाल खोलना पड़ेगा?” तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “आपके लिए इतना ही काफ़ी है कि आप अपने सिर पर तीन बार पानी डाल लो, यानी (“जब पानी तुम्हारे बालों की जड़ों तक पहुँच जाए, तो यही काफ़ी है।” फिर अपने पूरे शरीर पर पानी बहा लो, तो आप पाक (पवित्र) हो जाओगी।” या आपने यह फ़रमाया: “फिर आप पाक हो जाओगी”) (صحیح مسلم)।

पानी के बारे में अल्लाह ताला फरमाता है:

يُنَزِّلُ عَلَيْكُمْ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً طَهُورًا

(वह (अल्लाह तआला) पाक पानी उतारता है) (سورۃ النحل: ٦٥)।

तालाब, कुआं, समुद्र का पानी पाक है। गुसल से हम पाक होकर इबादत करते हैं, और यह सेहत के लिए भी अच्छा है।

वुजू: महत्व और फायदे

वुजू छोटी गंदगियों से पाक होने का आसान तरीका है। इस्लाम में बिना वुजू के इबादत नहीं होती। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

لَا يَقْبَلُ اللَّهَ صَلَاةَ أَحَدِكُمْ إِذَا أَحْدَثَ حَتَّى يَتَوَضَّأَ

(अल्लाह नमाज कबूल नहीं करता अगर छोटी गंदगी लगी हो) (صحیح بخاري)।

वुजू के फायदे बहुत हैं। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

إِنَّ أُمَّتِي يُدْعَوْنَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ غُرًّا مُحَجَّلِينَ مِنْ أَثَرِ الْوُضُوءِ فَمَنِ اسْتَطَاعَ مِنْكُمْ أَنْ يُطِيلَ غُرَّتَهُ فَلْيَفْعَلْ

(“निश्चय ही मेरी उम्मत को क़यामत के दिन वुज़ू के असर की वजह से चमकते हुए चेहरे और चमकते हुए हाथ-पाँव के साथ बुलाया जाएगा। तो तुममें से जो कोई अपनी इस चमक (नूर) को बढ़ा सके, वह ऐसा करे”) (صحیح مسلم)।

एक और हदीस में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ قَالَ: أَلَا أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ مَا يَمْحُو اللَّهُ بِهِ الْخَطَايَا وَيَرْفَعُ بِهِ الدَّرَجَاتِ؟ قَالُوا: بَلَىٰ يَا رَسُولَ اللَّهِ. قَالَ: إِسْبَاغُ الْوُضُوءِ عَلَى الْمَكَارِهِ، وَكَثْرَةُ الْخُطَا إِلَى الْمَسَاجِدِ، وَانْتِظَارُ الصَّلَاةِ بَعْدَ الصَّلَاةِ، فَذَلِكُمُ الرِّبَاطُ

(हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “क्या मैं तुम्हें ऐसा अमल न बताऊँ, जिसके ज़रिये अल्लाह गुनाहों को मिटा देता है और दर्ज़ों को बुलंद कर देता है?” सहाबा ने कहा: “ज़रूर, ऐ अल्लाह के रसूल!” आप ﷺ ने फ़रमाया: “तकलीफ़ के बावजूद पूरा वुज़ू करना, मस्जिदों की ओर ज़्यादा क़दम बढ़ाना, और एक नमाज़ के बाद दूसरी नमाज़ का इंतज़ार करना— यही (अल्लाह की राह में) रिबात है।” कठिनाई में अच्छा वुजू, मस्जिद जाना और इंतजार पाप मिटाता है) (صحیح مسلم)।

एक और जगह पर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ تَوَضَّأَ نَحْوَ وُضُوئِي هَذَا ثُمَّ صَلَّى رَكْعَتَيْنِ لاَ يُحَدِّثُ فِيهِمَا نَفْسَهُ غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ‏"‏ ‏.‏

(“जो व्यक्ति मेरे इस वुज़ू की तरह वुज़ू करे, फिर दो रकअत नमाज़ अदा करे और उन दोनों में अपने दिल में (दुनियावी) बातें न लाए— तो उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।” अच्छा वुजू कर दो रकात नमाज पढ़ो तो जन्नत वाजिब) (صحیح مسلم)।

एक और जगह पर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

وَعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ قَالَ: «إِذَا تَوَضَّأَ الْعَبْدُ الْمُسْلِمُ – أَوِ الْمُؤْمِنُ – فَغَسَلَ وَجْهَهُ، خَرَجَ مِنْ وَجْهِهِ كُلُّ خَطِيئَةٍ نَظَرَ إِلَيْهَا بِعَيْنَيْهِ مَعَ الْمَاءِ، أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ. فَإِذَا غَسَلَ يَدَيْهِ، خَرَجَ مِنْ يَدَيْهِ كُلُّ خَطِيئَةٍ كَانَتْ بَطَشَتْهَا يَدَاهُ مَعَ الْمَاءِ، أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ. فَإِذَا غَسَلَ رِجْلَيْهِ، خَرَجَتْ كُلُّ خَطِيئَةٍ مَشَتْهَا رِجْلَاهُ مَعَ الْمَاءِ، أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ، حَتَّى يَخْرُجَ نَقِيًّا مِنَ الذُّنُوبِ».

(हज़रत अबू हुरैराह रज़ियअल्लाहु अनहु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जब कोई मुसलमान (या मोमिन) वुज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वे सारे गुनाह निकल जाते हैं, जो उसकी आँखों ने देखे थे—पानी के साथ या पानी की आख़िरी बूँद के साथ। फिर जब वह अपने हाथ धोता है, तो उसके हाथों से वे सारे गुनाह निकल जाते हैं, जो उसके हाथों ने किए थे—पानी के साथ या आख़िरी बूँद के साथ। फिर जब वह अपने पाँव धोता है, तो उसके पाँवों से वे सारे गुनाह निकल जाते हैं, जिनकी तरफ़ उसके पाँव चले थे—पानी के साथ या आख़िरी बूँद के साथ। यहाँ तक कि वह इंसान गुनाहों से बिल्कुल पाक होकर निकल आता है”) (صحیح مسلم)।

तयम्मुम का हुक्म

जब पानी न मिले या इस्तेमाल से नुकसान हो, तो तयम्मुम करें। यह मिट्टी से पाकी का तरीका है: नियत के साथ चेहरा और हाथ मसह करना। अल्लाह ताला फरमाता है:

وَإِنْ كُنْتُمْ مَرْضَىٰ أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوْ جَاءَ أَحَدٌ مِنْكُمْ مِنَ الْغَائِطِ أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا

(“और यदि तुम बीमार हो, या सफ़र में हो, या तुम में से कोई शौच से आया हो, या तुमने स्त्रियों से संबंध किया हो और तुम्हें पानी न मिले, तो पाक मिट्टी से तयम्मुम कर लो”) ( سورۃ المائدہ: ٦)।

अल्लाह ताला फरमाता है:

لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا

(“अल्लाह किसी भी व्यक्ति पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता”) ( البقرہ: ٢٨٦)।

शर्तें: नियत, मजबूरी, जमीन की चीज (मिट्टी, पत्थर), और बड़ी गंदगी न हो। यह इस्लाम की आसानी दिखाता है – इबादत कभी न रुके। रेगिस्तान में रहने वालों के लिए यह बड़ा फायदा है।

आत्मिक स्वच्छता की हिफाजत

यह केवल शारीरिक सफ़ाई ही नहीं, बल्कि रूहानी (आंतरिक) सफ़ाई भी है जो इंसान के संपूर्ण जीवन को सुंदर और संतुलित बनाती है। मनुष्य की फ़ितरत है कि वह कभी-कभी दूसरों की तरक़्क़ी देखकर हसद और जलन में पड़ जाता है, और यही भावनाएँ दिल को गंदा कर देती हैं। क़ुरआन इस बुराई की सख़्त निंदा करता है:

“وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ بِغَيْرِ مَا اكْتَسَبُوا فَقَدِ احْتَمَلُوا بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُبِينًا”

(“जो लोग बिना किसी कारण ईमान वाले पुरुषों और स्त्रियों को सताते हैं, वे अपने ऊपर झूठ और खुले गुनाह का बोझ उठा लेते हैं”) (  الاحزاب: ٥٨)।

इसी तरह नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया:

“إياكم و الحسد د فإِنَّ الْحَسَدَ يَأْكُلُ الْحَسَنَاتِ كَمَا تَأْكُلُ النَّارُ الْحَطَبَ”

“हसद (ईर्ष्या) से बचो, क्योंकि हसद नेकियों को इस तरह खा जाती है, जैसे आग लकड़ी को खा जाती है।” (سنن ابو داؤد )।

जब दिल हसद और जलन से भर जाता है, तो समाज में प्रेम की जगह दुश्मनी और नफ़रत पनपने लगती है।

इस रूहानी गंदगी से बचने के लिए इस्लाम हमें साफ़ और प्रभावी रास्ते दिखाता है। सबसे पहला रास्ता अल्लाह की याद है, क्योंकि क़ुरआन में फ़रमाया गया:

“أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ”

(सुन लो! अल्लाह की याद से ही दिलों को सुकून मिलता है) ( سورۃ الرعد: ٢٨)।

दूसरा महत्वपूर्ण उपाय अच्छी संगत है, जैसा कि अल्लाह तआला का आदेश है:

“يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ”

(ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो और सच्चों के साथ रहो) (قرآن کریم، سورۃ التوبہ: ١١٩)।

तीसरा और सबसे प्रभावी ज़रिया तौबा है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“إِنَّ اللَّهَ يَقْبَلُ تَوْبَةَ عَبْدِهِ مَا لَمْ يُغَرْغِرْ”

(“जब तक इंसान की जान गले तक नहीं पहुँचती, अल्लाह उसकी तौबा क़बूल करता रहता है”) (سنن ترمذي)।

तौबा दिल की बुराइयों को धो देती है, रूह को शांति देती है और आज के तनावपूर्ण जीवन में इंसान को आंतरिक सुकून प्रदान करती है।

शारीरिक स्वच्छता की आवश्यकता

इस्लाम शरीर की सफ़ाई और बाहरी पाकीज़गी पर विशेष ज़ोर देता है, क्योंकि शारीरिक स्वच्छता न केवल सेहत से जुड़ी है बल्कि इबादत की क़बूलियत से भी संबंध रखती है। नबी-ए-करीम ﷺ ने स्पष्ट रूप से फ़रमाया:

“تَنَظَّفُوا فَإِنَّ الْإِسْلَامَ نَظِيفٌ”

(“सफ़ाई रखो, क्योंकि इस्लाम पाकीज़ा है”) (سنن ابن ماجہ )।

इसी तरह आप ﷺ का इरशाद है:

“إِنَّ اللَّهَ جَمِيلٌ يُحِبُّ الْجَمَالَ”

(“अल्लाह सुंदर है और सुंदरता को पसंद करता है”) (صحیح مسلم)।

इस्लाम ने फ़ितरत की पाँच बातों को अनिवार्य बताया:

“الْفِطْرَةَ خَمْسٌ: الْخِتَانُ وَالِاسْتِحْدَادُ وَقَصُّ الشَّارِبِ وَتَقْلِيمُ الْأَظْفَارِ وَنَتْفُ الْإِبْطِ”

(“यानी ख़तना करना, गुप्त अंगों के बाल साफ़ करना, मूँछें छोटी करना, नाखून काटना और बगल के बाल हटाना”) (صحیح بخاري )।

इसके साथ ही नबी ﷺ ने निर्देश दिया:

“قَصُّوا الشَّوَارِبَ وَأَرْخُوا اللِّحَى”

(“मूँछें छोटी रखो और दाढ़ी बढ़ाओ”) (صحیح بخاري)।

सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम बयान करते हैं कि नबी ने इन कार्यों के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की:أَلَّا نَتْرُكَ أَكْثَرَ مِنْ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً” (“चालीस दिनों से अधिक इन्हें न छोड़ा जाए”) (صحیح بخاري)सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम बयान करते हैं कि नबी ﷺ ने इन कार्यों के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की: “أَلَّا نَتْرُكَ أَكْثَرَ مِنْ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً” (“चालीस दिनों से अधिक इन्हें न छोड़ा जाए”) (صحیح بخاري)।

इस्लाम में स्वच्छता का दायरा व्यक्तिगत सफ़ाई से आगे बढ़कर सामाजिक शिष्टाचार तक फैला हुआ है। इसी कारण नबी ﷺ ने फ़रमाया:

“مَنْ أَكَلَ مِنْ هَذِهِ الشَّجَرَةِ فَلَا يَقْرَبَنَّ مَسْجِدَنَا”

(“जिसने प्याज़ या लहसुन खाया हो, वह हमारी मस्जिद के क़रीब न आए, ताकि दूसरों को तकलीफ़ न पहुँचे”) (صحیح بخاري )।

दाँतों की सफ़ाई के लिए मिसवाक की इतनी अहमियत बताई गई कि आप ﷺ ने फ़रमाया:

“لَوْلَا أَنْ أَشُقَّ عَلَى أُمَّتِي لَأَمَرْتُهُمْ بِالسِّوَاكِ عِنْدَ كُلِّ صَلَاةٍ”

(“अगर उम्मत पर बोझ न होता तो मैं हर नमाज़ से पहले मिसवाक का हुक्म दे देता”) (صحیح بخاري )।

दैनिक स्वच्छता

हमारा समाज और पर्यावरण हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है, और उसकी स्वच्छता सीधे हमारे स्वास्थ्य और जीवन-गुणवत्ता से जुड़ी हुई है। साफ़-सुथरा वातावरण न केवल शरीर को तंदुरुस्त रखता है बल्कि बीमारियों को भी दूर करता है। इसी व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी की ओर इशारा करते हुए नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया:

“إِمَاطَةُ الْأَذَى عَنِ الطَّرِيقِ صَدَقَةٌ”

(“रास्ते से तकलीफ़देह चीज़ हटाना भी सदक़ा है”)(صحیح بخاري)

यह हदीस बताती है कि इस्लाम में सफ़ाई केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि समाज के प्रति इबादत का रूप है। जब हर व्यक्ति अपने आसपास की गंदगी हटाने की ज़िम्मेदारी समझता है, तो पूरा समाज स्वस्थ और सुरक्षित बनता है।

इस्लाम दैनिक स्वच्छता के साथ-साथ पर्यावरण और जीव-जंतुओं की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देता है। नबी ﷺ ने जानवरों के साथ निर्दयता से मना करते हुए फ़रमाया:

“نَهَى رَسُولُ اللَّهِ ﷺ أَنْ تُصْبَرَ الْبَهَائِمُ”

( जानवरों को बाँधकर मारने से रसूल ने मना फरमाया है। ) (صحیح مسلم)।

आज जब प्रदूषण और गंदगी के कारण महामारियाँ (epidemics) फैल रही हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम ने सदियों पहले ही सफ़ाई और करुणा का पूर्ण जीवन-सिद्धांत दिया था। आधुनिक दौर में भारत जैसे देशों में स्वच्छ भारत अभियान जैसी योजनाएँ इसी सोच की पुष्टि करती हैं, जबकि नबी ﷺ ने यह मार्गदर्शन लगभग 1400 वर्ष पहले प्रदान कर दिया था। स्वच्छता से हरियाली बढ़ती है, पशु-पक्षी सुरक्षित रहते हैं और मानव जीवन अधिक सरल, स्वस्थ और संतुलित बनता है।

 

निष्कर्ष

समग्र रूप से देखा जाए तो इस्लाम में स्वच्छता केवल एक बाहरी आदत नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण व्यवस्था है, जो शरीर, मन, रूह, समाज और पर्यावरण—सबको अपने दायरे में समेटे हुए है। क़ुरआन और हदीसें स्पष्ट रूप से बताती हैं कि पाकीज़गी इबादत की बुनियाद है और ईमान का अभिन्न हिस्सा है। ग़ुस्ल, वुज़ू और तयम्मुम जैसे नियम यह सिखाते हैं कि अल्लाह अपने बंदों से सफ़ाई चाहता है, लेकिन उनके लिए आसानी भी पैदा करता है। इसी तरह दिल की सफ़ाई—हसद, नफ़रत और बुरे अख़लाक़ से बचना—भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी शारीरिक सफ़ाई। रास्तों से गंदगी हटाना, पेड़-पौधों और जानवरों की हिफ़ाज़त करना, तथा पर्यावरण को स्वच्छ रखना—ये सभी कार्य इस्लाम में सदक़ा और नेकी माने गए हैं। आज के दौर में जब बीमारियाँ, प्रदूषण और मानसिक तनाव तेज़ी से बढ़ रहे हैं, इस्लामी शिक्षाएँ हमें एक संतुलित, स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन का रास्ता दिखाती हैं। इसलिए यदि हम इस्लाम के बताए हुए स्वच्छता के उसूलों को ईमानदारी से अपनाएँ, तो न केवल हमारी दुनिया बेहतर बनेगी, बल्कि आख़िरत में भी कामयाबी और अल्लाह की रज़ा हासिल होगी।

संदर्भ

  • सूरह अल-माइदा
  • सूरह अत-तौबा
  • सूरह अल-बक़रा
  • सूरह अन-नहल
  • सूरह अल-अहज़ाब
  • सूरह अर-रअद
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन तिर्मिज़ी
  • सुनन इब्न माजह
  • सुनन अबू दाऊद

 

लेखक:

फैजान, दारूल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरल

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