आख़िरत के पड़ाव: मृत्यु से लेकर हमेशगी तक

परिचय

इस्लाम में आख़िरत (परलोक) का विश्वास ईमान का एक अहम हिस्सा है। यह वह सच्चाई है जो हर इंसान को याद दिलाती है कि यह दुनिया फ़ानी है और असली ज़िंदगी मृत्यु के बाद शुरू होती है। आख़िरत का सफ़र मृत्यु से शुरू होकर बरज़ख (मध्यवर्ती अवस्था), क़यामत (पुनर्जनन), और हिसाब-किताब (अंतिम न्याय) तक जाता है, जो जन्नत या जहन्नम की हमेशगी में ख़त्म होता है। क़ुरआन और हदीस में इस सफ़र को विस्तार से बयान किया गया है, ताकि इंसान अल्लाह के ख़ौफ़ और उसकी रहमत की उम्मीद के साथ जीवन व्यतीत करे।

मृत्यु: आख़िरत का पहला पड़ाव

मृत्यु वह दरवाज़ा है जो दुनिया से आख़िरत की ओर खुलता है। इस्लाम में मृत्यु को अल्लाह की मर्ज़ी और एक तयशुदा वक़्त का हिस्सा माना जाता है। जब इंसान की साँसें ख़त्म होती हैं, उसकी रूह शरीर से निकाल ली जाती है, और वह आख़िरत के सफ़र पर रवाना हो जाता है। अल्लाह तआला क़ुरआन में इरशाद फरमाता है:

  كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۗ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ

"हर जान को मृत्यु का स्वाद चखना है। और तुम्हें तुम्हारा पूरा बदला क़यामत के दिन मिलेगा।” (सूरह आल-इमरान (3:185)

मृत्यु का अनुभव

क़ुरआन और हदीस बताते हैं कि मृत्यु के वक़्त फ़रिश्ते इंसान की रूह को लेने आते हैं। नेक लोगों की रूह को आसानी और सुकून से निकाला जाता है, जबकि गुनहगारों को तकलीफ़ होती है। अल्लाह तआला क़ुरआन में इरशाद फरमाता है:

وَالنَّازِعَاتِ غَرْقًا ۝ وَالنَّاشِطَاتِ نَشْطًا

"कसम है उन (फ़रिश्तों) की जो (रूहों को) ज़ोर से खींचते हैं, और उन की जो (रूहों को) नरमी से निकालते हैं।" (सूरह अन-नाज़िआत (79:1-2)

पैगंबर मुहम्मद ﷺ फरमाते हैं:

‏"‏ إِذَا حُضِرَ الْمُؤْمِنُ أَتَتْهُ مَلاَئِكَةُ الرَّحْمَةِ بِحَرِيرَةٍ بَيْضَاءَ فَيَقُولُونَ اخْرُجِي رَاضِيَةً مَرْضِيًّا عَنْكِ إِلَى رَوْحِ اللَّهِ وَرَيْحَان

"जब मोमिन की मृत्यु का वक़्त आता है, तो रहमत के फ़रिश्ते सफ़ेद रेशमी कपड़े के साथ आते हैं और कहते हैं: 'ऐ रूह! ख़ुश और ख़ुशी के साथ निकल, अल्लाह की रहमत और उसकी ख़ुशबू की तरफ़।'" (सुनन निसाई)

हज़रत बिलाल की मृत्यु

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु, जो पैगंबर मुहम्मद ﷺ के मोअज़्ज़िन थे, ने अपनी मृत्यु के वक़्त ख़ुशी ज़ाहिर की। जब उनकी बीवी ने रोते हुए कहा, "हाय, तुम जा रहे हो," तो उन्होंने जवाब दिया, "क्यों रोती हो? मैं तो अपने रब और पैगंबर मुहम्मद ﷺ से मिलने जा रहा हूँ।" यह नेक इंसान की मृत्यु में इहसान की मिसाल थी।

बरज़ख: मृत्यु और क़यामत के बीच की अवस्था

मृत्यु के बाद रूह बरज़ख में चली जाती है, जो क़यामत तक का एक मध्यवर्ती आलम है जो कभी खत्म नही होगी। बरज़ख में रूह को उसके अमलों के मुताबिक़ सुकून या अज़ाब मिलता है। अल्लाह तआला क़ुरआन में इरशाद फरमाता है:

حَتَّىٰ إِذَا جَاءَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِ ۝ لَعَلِّي أَعْمَلُ صَالِحًا فِيمَا تَرَكْتُ كَلَّا إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَائِلُهَا وَمِنْ وَرَائِهِمْ بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ

"जब उनमें से किसी की मृत्यु आती है, तो वह कहता है, 'ऐ मेरे रब! मुझे वापस भेज दे, शायद मैं वह नेक काम कर लूँ जो मैंने छोड़ दिया।' हरगिज़ नहीं! यह तो बस उसका कहना है, और उनके पीछे बरज़ख है उस दिन तक जब वे दोबारा उठाए जाएँगे।" (सूरह अल-मुमिनून (23:100)

बरज़ख में क्या होता है?

हदीस में आता है कि बरज़ख में रूह से उसके अमलों के बारे में सवाल-जवाब होता है। नेक लोगों की रूह को जन्नत की खिड़की दिखाई जाती है, जबकि गुनहगारों को जहन्नम की सजा का ज़ायका मिलता है।

 إِذَا مَاتَ ابنُ آدم انْقَطَعَ عَنْهُ عَمَلُهُ إِلَّا مِنْ ثَلَاثٍ: صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ، أو عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ، أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“जब इंसान मर जाता है तो उसके सारे आमाल बंद हो जाते हैं, सिवाय तीन चीज़ों के:

1. सदक़ा-ए-जारिया (ऐसा दान जिसका सवाब लगातार मिलता रहे),

2. ऐसा इल्म जिससे लोग फ़ायदा उठाते रहें,

3. नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करती रहे।”

(सही मुस्लिम)

क़ब्र का सवाल-जवाब

عَنْ أَنَسٍ ـ رضى الله عنه ـ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الْعَبْدُ إِذَا وُضِعَ فِي قَبْرِهِ، وَتُوُلِّيَ وَذَهَبَ أَصْحَابُهُ حَتَّى إِنَّهُ لَيَسْمَعُ قَرْعَ نِعَالِهِمْ، أَتَاهُ مَلَكَانِ فَأَقْعَدَاهُ فَيَقُولاَنِ لَهُ مَا كُنْتَ تَقُولُ فِي هَذَا الرَّجُلِ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم فَيَقُولُ أَشْهَدُ أَنَّهُ عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ‏.‏ فَيُقَالُ انْظُرْ إِلَى مَقْعَدِكَ مِنَ النَّارِ، أَبْدَلَكَ اللَّهُ بِهِ مَقْعَدًا مِنَ الْجَنَّةِ ـ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَيَرَاهُمَا جَمِيعًا ـ وَأَمَّا الْكَافِرُ ـ أَوِ الْمُنَافِقُ ـ فَيَقُولُ لاَ أَدْرِي، كُنْتُ أَقُولُ مَا يَقُولُ النَّاسُ‏.‏ فَيُقَالُ لاَ دَرَيْتَ وَلاَ تَلَيْتَ‏.‏ ثُمَّ يُضْرَبُ بِمِطْرَقَةٍ مِنْ حَدِيدٍ ضَرْبَةً بَيْنَ أُذُنَيْهِ، فَيَصِيحُ صَيْحَةً يَسْمَعُهَا مَنْ يَلِيهِ إِلاَّ الثَّقَلَيْنِ (Sahih al-Bukhari)

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:

“जब किसी बंदे को उसकी क़ब्र में रख दिया जाता है और उसके साथी उसे छोड़कर चले जाते हैं—यहाँ तक कि वह उनके जूतों की आवाज़ भी सुनता है—तो उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं। वे उसे बैठाते हैं और उससे पूछते हैं:

1. مَا كُنْتَ تَقُولُ فِي هَذَا الرَّجُلِ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم

‘तुम इस व्यक्ति—मुहम्मद ﷺ—के बारे में क्या कहते थे?’

मोमिन कहता है:

أَشْهَدُ أَنَّهُ عَبْدُ اللَّهِ وَرَسُولُهُ

‘मैं गवाही देता हूँ कि वे अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।’

तो उससे कहा जाता है:

‘नरक में अपने ठिकाने को देखो; अल्लाह ने उसके बदले तुम्हें जन्नत का ठिकाना दे दिया है।’

नबी ﷺ ने फ़रमाया: ‘फिर वह दोनों ठिकानों को देख लेता है।’

और काफ़िर या मुनाफ़िक़ कहता है:

فَيَقُولُ لاَ أَدْرِي

‘मुझे नहीं पता; मैं वही कहता था जो लोग कहते थे।’

तो उससे कहा जाता है:

‘न तुमने जाना और न तुमने (हक़ को) पढ़ा।’

फिर उसे लोहे के हथौड़े से दोनों कानों के बीच मारा जाता है, जिससे वह ऐसी ज़ोरदार चीख़ मारता है कि उसके आस-पास की सारी मख़लूक़ उसे सुन लेती है—सिवाय इंसानों और जिन्नों के।

(सहीह अल-बुख़ारी)

 हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह सुनकर कहा, "ऐ अल्लाह! मुझे इन सवालों के जवाब देने की तौफ़ीक़ दे।" यह बरज़ख के सवालों की अहमियत दिखाता है।[^2]

क़यामत: पुनर्जनन का दिन

क़यामत वह दिन है जब पूरी कायनात नष्ट हो जाएगी और सभी इंसान दोबारा जीवित होकर अल्लाह के सामने हिसाब के लिए खड़े होंगे। यह आख़िरत का सबसे अहम पड़ाव है। अल्लाह फरमाता है:

وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ ۖ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَىٰ فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنْظُرُونَ

"और सूर में फूँका जाएगा, तो जो कोई आसमानों और ज़मीन में है, वह बेहोश हो जाएगा, सिवाय उसके जिसे अल्लाह चाहे। फिर उसमें दूसरी बार फूँका जाएगा, तो वे खड़े होकर देखने लगेंगे।" (सूरह अज़-ज़ुमार (39:68)

क़यामत की बड़ी निशानियाँ

कुरआन और हदीस में क़यामत की छोटी और बड़ी बहुत सारी निशानियाँ बयान की गई हैं, जैसे इमाम महदी का आगमन, सूरज का पश्चिम से उगना, ईसा अलैहिस सलाम का नुज़ूल (दुबारा अवतरण)और दज्जाल का प्रकट होना ईत्यादि। पैगंबर मुहम्मद ﷺ फरमाते हैं:

عَنْ حُذَيْفَةَ بْنِ أَسِيدٍ الْغِفَارِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: اطَّلَعَ النَّبِيُّ ﷺ عَلَيْنَا وَنَحْنُ نَتَذَاكَرُ، فَقَالَ: مَا تَذَاكَرُونَ؟

قَالُوا: نَذْكُرُ السَّاعَةَ. قَالَ: إِنَّهَا لَنْ تَقُومَ حَتَّى تَرَوْا قَبْلَهَا عَشْرَ آيَاتٍ: الدُّخَانَ، وَالدَّجَّالَ، وَالدَّابَّةَ، وَطُلُوعَ الشَّمْسِ مِنْ مَغْرِبِهَا، وَنُزُولَ عِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ، وَيَأْجُوجَ وَمَأْجُوجَ، وَثَلَاثَةَ خُسُوفٍ: خَسْفٌ بِالْمَشْرِقِ، وَخَسْفٌ بِالْمَغْرِبِ، وَخَسْفٌ بِجَزِيرَةِ الْعَرَبِ، وَآخِرُ ذَلِكَ نَارٌ تَخْرُجُ مِنَ الْيَمَنِ، تَطْرُدُ النَّاسَ إِلَى مَحْشَرِهِمْ»

صحيح مسلم، كتاب الفتن

हज़रत हुदैफ़ा बिन असीद अल-ग़िफ़ारी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:

नबी ﷺ हमारे पास आए, जब हम आपस में (क़यामत के बारे में) बातचीत कर रहे थे।

आप ﷺ ने फ़रमाया:

“तुम किस बारे में चर्चा कर रहे हो?”

हमने कहा: “हम क़यामत के बारे में चर्चा कर रहे हैं।”

तो आपने ﷺ फ़रमाया:

“क़यामत उस समय तक क़ायम नहीं होगी जब तक उससे पहले तुम दस निशानियाँ न देख लो:

(1) धुआँ,

(2) दज्जाल,

(3) ज़मीन से निकलने वाला जानवर,

(4) सूरज का पश्चिम से निकलना,

(5) ईसा बिन मरयम का उतरना,

(6) याजूज और माजूज,

और तीन ज़मीन में धँसने की घटनाएँ—

(7) पूरब में,

(8) पश्चिम में,

(9) अरब की धरती में,

और अंत में

(10) यमन से एक आग निकलेगी, जो लोगों को हाँककर उनके इकट्ठा होने की जगह (मैदान-ए-हश्र) की ओर ले जाएगी।” (Sahih Muslim)

क़यामत की कुछ प्रसिद्ध छोटी निशानियाँ (Minor Signs)

क़यामत की कई छोटी-छोटी निशानियाँ हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण निशानियाँ नीचे दी गई हैं:

عَنْ أَنَسٍ قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «إِنَّ مِنْ أَشْرَاطِ السَّاعَةِ أَنْ يُرْفَعَ الْعِلْمُ وَيَكْثُرَ الْجَهْلُ وَيَكْثُرَ الزِّنا ويكثُرَ شُربُ الخمرِ ويقِلَّ الرِّجالُ وتكثُرَ النِّسَاءُ حَتَّى يَكُونَ لِخَمْسِينَ امْرَأَةً الْقَيِّمُ الْوَاحِدُ» . وَفِي رِوَايَةٍ: «يَقِلُّ الْعِلْمُ وَيَظْهَرُ الْجَهْلُ» مُتَّفَقٌ عَلَيْهِ

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वे कहते हैं: मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़रमाते हुए सुना:

“क़यामत की निशानियों में से यह है कि इल्म उठा लिया जाएगा, जहालत बहुत बढ़ जाएगी, ज़िना आम हो जाएगा, शराबख़ोरी बढ़ जाएगी, मर्द कम हो जाएँगे और औरतें ज़्यादा हो जाएँगी—यहाँ तक कि पचास औरतों के लिए एक ही मर्द निगरानी/देखरेख करने वाला रह जाएगा।” और एक दूसरी रिवायत में है: “इल्म कम हो जाएगा और जहालत प्रकट हो जाएगी।” (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

हिसाब-किताब: अंतिम न्याय

क़यामत के दिन हर इंसान अपने अमलों का हिसाब देगा। जो अच्छे कर्म करेंगे, उन्हें जन्नत में जगह मिलेगी, और जो बुरे कर्म करेंगे, उन्हें जहन्नम का सामना करना होगा। अल्लाह हर छोटे-बड़े काम का हिसाब लेगा, और कोई भी ज़ुल्म नहीं होगा।

क़ुरआन में अल्लाह ने फरमाया:

فَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ ۝ وَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ

"जो कोई ज़र्रा बराबर नेकी करेगा, वह उसे देखेगा। और जो कोई ज़र्रा बराबर बुराई करेगा, वह उसे देखेगा।" (सूरह अज़-ज़लज़ला (99:7-8)

हदीस बताती है कि हिसाब के दिन इंसान का नामा-ए-आमाल (अमलों की किताब) खोला जाएगा। नेक लोगों को उनकी किताब दाएँ हाथ में मिलेगी, जबकि गुनहगारों को बाएँ हाथ में।

क़यामत के दिन की हालत बहुत खतरनाक होगी।

عَنِ الْمِقْدَادِ قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «تُدْنَى الشَّمْسُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْخَلْقِ حَتَّى تَكُونَ مِنْهُمْ كَمِقْدَارِ مِيلٍ فَيَكُونُ النَّاسُ عَلَى قَدْرِ أَعْمَالِهِمْ فِي الْعَرَقِ فَمِنْهُمْ مَنْ يَكُونُ إِلَى كَعْبَيْهِ وَمِنْهُمْ مَنْ يَكُونُ إِلَى رُكْبَتَيْهِ وَمِنْهُمْ مَنْ يَكُونُ إِلَى حَقْوَيْهِ وَمِنْهُمْ مَنْ يُلْجِمُهُمُ الْعَرَقُ إِلْجَامًا» وَأَشَارَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِيَدِهِ إِلَى فِيهِ.) رَوَاهُ مُسلم(

हज़रत मिक़दाद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वे कहते हैं: मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़रमाते हुए सुना:

“क़यामत के दिन सूरज लोगों के बहुत क़रीब कर दिया जाएगा—यहाँ तक कि वह उनसे केवल एक ‘मील’ की दूरी पर होगा।

फिर लोग अपने-अपने अमलों के अनुसार पसीने में डूबे होंगे।किसी का पसीना टखनों तक होगा, किसी का घुटनों तक, किसी का कमर तक, और किसी को पसीना पूरी तरह जकड़ लेगा।” (और रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने हाथ से अपने मुँह की ओर इशारा किया।) (सहीह मुस्लिम)

जन्नत और जहन्नम: हमेशगी का मक़ाम

हिसाब के बाद इंसान को उसके अमलों के मुताबिक़ जन्नत (स्वर्ग) या जहन्नम (नरक) में भेजा जाएगा। जन्नत अल्लाह की रहमत का इनाम है, जहाँ नेक लोग हमेशा सुख और सुकून में रहेंगे। जहन्नम गुनाहगारों के लिए सजा का मक़ाम है। क़ुरआन में अल्लाह ने फरमाया

وَالسَّابِقُونَ السَّابِقُونَ ۝ أُولَٰئِكَ الْمُقَرَّبُونَ ۝ فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ

"और जो सबसे आगे वाले हैं, वही सबसे आगे वाले हैं। यही लोग (अल्लाह के) क़रीबी होंगे। नेअमतों की जन्नतों में।" (सूरह अल-वाक़िआ (56:10-12)

जन्नत का बयान

हदीस में जन्नत को ऐसी जगह बताया गया है जहाँ हर ख़्वाहिश पूरी होती है, और इंसान हमेशा अल्लाह की क़ुर्बत में रहता है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ फरमाते हैं:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "إِنَّ فِي الْجَنَّةِ مَا لَا عَيْنٌ رَأَتْ، وَلَا أُذُنٌ سَمِعَتْ، وَلَا خَطَرَ عَلَى قَلْبِ بَشَرٍ"

अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने फरमाया: "जन्नत में वह है जो न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी इंसान के दिल में ख़याल आया।"

(सहीह बुखारी)

जहन्नम का बयान

जहन्नम को क़ुरआन और हदीस में डरावनी सजा की जगह बताया गया है, जहाँ गुनहगारों को आग और तकलीफ़ मिलेगी। अल्लाह फरमाता है:

الَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا

"वे लोग जो कहते हैं, 'ऐ हमारे रब! हम से जहन्नम का अज़ाब टाल दे, बेशक उसका अज़ाब हमेशा का है।" (सूरह अल-फ़ुरक़ान (25:65)

आख़िरत की तैयारी

आख़िरत के सफ़र की तैयारी दुनिया में ही शुरू होती है। इस्लाम हमें सिखाता है कि नेक अमल, तौबा, और अल्लाह का ख़ौफ़ इस सफ़र को आसान करते हैं। नमाज़ और इबादत कर के हम अल्लाह से करीब हो सकते है। ग़रीबों की मदद और नेक काम हिसाब को आसान करते हैं। तौबा अर्थात गुनाहों की माफ़ी माँगने और नेक रास्ते पर चलने से हम जन्नत का हक़दार हो सकते है।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ

"और जो लोग ईमान लाए और नेक काम किए, वही जन्नत के हक़दार हैं। वे उसमें हमेशा रहेंगे।"

(सूरह अल-बकरा (2:82)

हज़रत अबू ज़र का तौबा

हज़रत अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक बार ग़लती से किसी को ताना मारा। बाद में उन्हें पछतावा हुआ, और उन्होंने तौबा की। पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने उनकी तौबा को क़बूल किया और फरमाया, "तौबा करने वाला ऐसा है जैसे उसने गुनाह किया ही न हो।"

निष्कर्ष

आख़िरत का सफ़र मृत्यु से शुरू होकर बरज़ख, क़यामत, और हिसाब-किताब के ज़रिए जन्नत या जहन्नम की हमेशगी तक जाता है। क़ुरआन और हदीस हमें सिखाते हैं कि यह सफ़र अल्लाह की हिकमत और इंसाफ़ का हिस्सा है। नेक अमल और अल्लाह का ख़ौफ़ इस सफ़र को आसान करते हैं। आख़िरत का विश्वास इंसान को दुनिया में तक़वा, इहसान, और नेकी की ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देता है। हमें चाहिए कि हम क़ुरआन और सुन्नत से सीखें, अपनी ज़िंदगी को नेक अमलों से सजाएँ, और अल्लाह की रहमत और जन्नत की उम्मीद के साथ आख़िरत की तैयारी करें।

संदर्भ

● सूरह अल-बकरा

● सूरह अल-फ़ुरक़ान

● सूरह अल-वाक़िआ

● सूरह अज़-ज़लज़ला

● सहीह मुस्लिम

● सहीह बुखारी

 

लेखक:

 निसार अहमद, सीनियर सेकेंडरी, कुर्तुबा इंस्टिट्यूट, किशनगंज, बिहार

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