इस्लाम की अन्य धर्मों के प्रति करुणा और संवेदनशीलता
प्रस्तावना
इस्लाम के मूल दर्शन (core philosophy) को समझने के लिए उसके नाम, अर्थ और मूल स्रोतों का विश्लेषण करना आवश्यक है। ‘इस्लाम’ शब्द अरबी मूल ‘सलाम’ से निकला है, जिसका अर्थ है शांति (peace), सुरक्षा (security) और समर्पण (submission to God)। क़ुरआन के अनुसार, अल्लाह ने मानवता को विभिन्न जातियों, क़बीलों और समुदायों में इसलिए विभाजित किया है ताकि वे एक-दूसरे को पहचानें (mutual recognition), न कि आपस में घृणा या संघर्ष करें। इस दृष्टि से विविधता (diversity) ईश्वरीय योजना का हिस्सा है, न कि समस्या।
इसी कारण इस्लाम ने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक अन्य धर्मों और समुदायों के साथ करुणा (compassion), सहिष्णुता (tolerance) और संवेदनशीलता (sensitivity) का व्यवहार करने पर ज़ोर दिया है। यह केवल एक धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था (social order) भी है, जो “जियो और जीने दो” (live and let live) के विचार को मजबूत आधार प्रदान करती है।
क़ुरआन और सुन्नत में धार्मिक संवेदनशीलता के स्रोत (Sources of religious sensitivity in the Quran and Sunnah)
इस्लाम यह सिखाता है कि किसी भी व्यक्ति को ज़बरदस्ती किसी धर्म को अपनाने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
इसी सिद्धांत को क़ुरआन मजीद में स्पष्ट रूप से बताया गया है। सूरह अल-काफ़िरून में अल्लाह तआला फ़रमाता हैं:
لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِيَ دِينِ
“तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म।” है। (सूरह अल-काफ़िरून, आयत 6)
इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम धार्मिक स्वतंत्रता और आपसी सम्मान का संदेश देता है। इस्लाम में ईमान ज़बरदस्ती से नहीं, बल्कि समझ, सहमति और दिल की सच्ची स्वीकार्यता से आता है। हर इंसान को अपने विश्वास पर चलने की आज़ादी है, और मुसलमानों को दूसरों के धर्म और आस्था का सम्मान करने का आदेश दिया गया
इस्लाम में अन्य धर्मों के प्रति व्यवहार की बुनियाद क़ुरआन और पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सुन्नत पर आधारित है। क़ुरआन साफ़ शब्दों में कहता है: لَا إكْرَاهَ في الدِّيْنِ (سورة البقرة)
“दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है” (2:256)। इसका सीधा अर्थ यह है कि आस्था (faith) दिल का मामला है, जिसे किसी पर ज़ोर-ज़बरदस्ती से थोपा नहीं जा सकता। इस्लाम हर इंसान को सोचने, समझने और अपने विवेक (free will) से विश्वास चुनने का अधिकार देता है।
इसी तरह क़ुरआन मुसलमानों को यह भी आदेश देता है कि वे दूसरे धर्मों के पूज्य देवताओं को अपशब्द न कहें, ताकि बदले में वे अज्ञानवश अल्लाह के बारे में अपमानजनक शब्द न कहें।
क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ فَيَسُبُّوا اللَّهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
“और जो लोग अल्लाह के सिवा दूसरों को पुकारते हैं, तुम उन्हें गाली मत दो, कहीं ऐसा न हो कि वे अज्ञानवश अत्याचार से अल्लाह को गाली देने लगें। इस प्रकार हमने हर समुदाय के लिए उनके कर्मों को सुहावना बना दिया है। फिर अंततः सबको अपने रब की ओर लौटना है, तब वह उन्हें बता देगा जो कुछ वे करते रहे।” (सूरह अल-अनआम — आयत 108)
क़ुरआन में अल्लाह तआला स्पष्ट रूप से इरशाद फ़रमाता हैं कि मुसलमानों को चाहिए कि वे उन देवताओं को गाली न दें जिन्हें लोग अल्लाह के सिवा पूजते हैं, क्योंकि ऐसा करने से वे लोग अज्ञान (Ignorance) और द्वेष (Hatred) में अल्लाह तआला के बारे में भी अपमानजनक शब्द कह सकते हैं। इस आयत के माध्यम से इस्लाम हमें संयम (Restraint), शिष्टाचार (Etiquette) और बुद्धिमत्ता (Wisdom) का महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाता है।
क़ुरआन यह भी स्पष्ट करता है कि हर क़ौम अपने कर्मों और आस्थाओं को सही समझती है, लेकिन अंततः सभी को अपने रब की ओर ही लौटना है, जहाँ अल्लाह तआला हर व्यक्ति को उसके कर्मों का पूरा हिसाब देगा। यह शिक्षा आपसी सम्मान (Mutual Respect), सामाजिक शांति (Social Harmony) और अंतरधार्मिक सौहार्द (Interfaith Harmony) को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है, और एक ऐसे समाज की नींव रखती है जहाँ मतभेद के बावजूद सह-अस्तित्व (Co-existence) संभव हो।
यह आयत धार्मिक संवेदनशीलता (religious sensitivity) और आपसी सम्मान (mutual respect) की उच्च मिसाल है।
मुहम्मद ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
كَانَ غُلَامٌ يَهُودِيٌّ يَخْدُمُ النَّبِيَّ ﷺ فَمَرِضَ، فَأَتَاهُ النَّبِيُّ ﷺ يَعُودُهُ، فَقَعَدَ عِنْدَ رَأْسِهِ، فَقَالَ لَهُ: أَسْلِمْ، فَنَظَرَ إِلَىٰ أَبِيهِ وَهُوَ عِنْدَهُ، فَقَالَ: أَطِعْ أَبَا الْقَاسِمِ، فَأَسْلَمَ، فَخَرَجَ النَّبِيُّ ﷺ وَهُوَ يَقُولُ: الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَنْقَذَهُ مِنَ النَّارِ
“एक यहूदी लड़का नबी ﷺ की सेवा किया करता था। वह बीमार हो गया, तो नबी ﷺ उसकी तबीयत पूछने गए। आप ﷺ उसके सिरहाने बैठे और उससे कहा: ‘इस्लाम क़ुबूल कर लो।’ उसने अपने पिता की ओर देखा, जो वहीं मौजूद थे। पिता ने कहा: ‘अबुल-क़ासिम की बात मान लो।’ उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। तब नबी ﷺ ने कहा: ‘अल्लाह का शुक्र है जिसने इसे आग (जहन्नम) से बचा लिया।’” (सहीह अल-बुख़ारी)
यह हदीस दिखाती है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने ग़ैर-मुस्लिम के साथ भी दया और सहानुभूति का व्यवहार किया। आप ﷺ केवल धार्मिक उपदेश ही नहीं देते थे, बल्कि बीमार की देखभाल कर मानवीय मूल्य सिखाते थे। इस घटना से स्पष्ट होता है कि इस्लाम में दावत ज़बरदस्ती नहीं, बल्कि प्रेम और सदाचार से दी जाती है।
अतः एक सच्चे मोमिन की पहचान इबादत के साथ-साथ करुणा, न्याय और मानवीय व्यवहार से होती है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने अपने व्यवहार से भी यही सिखाया—ग़ैर-मुस्लिम पड़ोसी की बीमारी में उसकी देखभाल करना, उसके साथ न्याय करना और उसके अधिकारों की रक्षा करना। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम में एक सच्चे मोमिन की पहचान केवल इबादत से नहीं, बल्कि करुणा (compassion), न्याय (justice) और मानवीय व्यवहार (human values) से होती है।
मदीना का चार्टर (Charter of Medina)
इस्लाम के शुरुआती दौर में मदीना का चार्टर (Charter of Madina) एक बहुत ही ऐतिहासिक और क्रांतिकारी दस्तावेज़ के रूप में सामने आया। इसे दुनिया के पहले लिखित संविधान (Written Constitution) के रूप में देखा जाता है, जिसने एक बहु-धार्मिक समाज (Multi-religious Society) की मज़बूत नींव रखी। इस समझौते के तहत मदीना में रहने वाले यहूदी, ईसाई और अन्य समुदायों को वही नागरिक अधिकार (Civil Rights) दिए गए जो मुसलमानों को प्राप्त थे। सभी को अपने धर्म पर चलने, इबादत करने और अपने धार्मिक क़ानूनों के अनुसार विवाद सुलझाने की पूरी आज़ादी थी।
यह उस दौर में धार्मिक सहिष्णुता (Religious Tolerance) की एक अनोखी मिसाल थी, जब दुनिया के कई हिस्सों में असहिष्णुता (Intolerance) और ज़ुल्म आम बात थी। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने इस चार्टर के ज़रिये साफ़ कर दिया कि समाज में शांति और न्याय सभी के लिए समान होगा। उन्होंने यह भी फ़रमाया कि जो कोई किसी “मुआहिद” (यानी शांति समझौते के तहत रहने वाले ग़ैर-मुस्लिम) पर ज़ुल्म करेगा, तो क़यामत के दिन पैग़म्बर ﷺ ख़ुद उसके ख़िलाफ़ गवाही देंगे। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम शुरू से ही न्याय (Justice), मानव गरिमा (Human Dignity) और सह-अस्तित्व (Co-existence) का समर्थक रहा है।
ख़िलाफ़त-ए-राशिदा: इबादतगाहों का संरक्षण (The Rashidun Caliphate: The protection of places of worship)
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के बाद ख़िलाफ़त-ए-राशिदा (Rightly Guided Caliphate) के चारों ख़लीफ़ाओं ने धार्मिक संवेदनशीलता (Sensitivity), न्याय और धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) की उसी परंपरा को मज़बूती से आगे बढ़ाया। ख़ास तौर पर हज़रत उमर (रज़ि.) के शासनकाल में जब यरूशलेम (Jerusalem) पर इस्लामी नियंत्रण हुआ, तो उन्होंने वहाँ के ईसाइयों को एक लिखित सुरक्षा पत्र दिया, जिसे “अमान” (Guarantee of Protection) कहा जाता है। इस दस्तावेज़ में साफ़ लिखा गया था कि ईसाइयों के चर्च (Churches) सुरक्षित रहेंगे, न तो उन्हें गिराया जाएगा और न ही उनके क्रॉस या संपत्ति को कोई नुकसान पहुँचाया जाएगा।
इतिहास में हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की एक घटना बहुत प्रसिद्ध है। जब उन्हें चर्च ऑफ़ द होली सेपल्चर (Church of the Holy Sepulchre) के अंदर नमाज़ पढ़ने का निमंत्रण दिया गया, तो उन्होंने विनम्रता से इनकार कर दिया। उनका डर यह था कि आने वाली पीढ़ियाँ उनकी नमाज़ को बहाना बनाकर उस चर्च को मस्जिद में न बदल दें। यह व्यवहार दूसरे धर्मों के पवित्र स्थलों (Sacred Places) के प्रति गहरी संवेदनशीलता और दूरदृष्टि (Foresight) को दिखाता है। इसी दौर में “धिम्मी” (Dhimmi – Protected Citizen) की अवधारणा विकसित हुई, जिसका अर्थ था ऐसे गैर-मुस्लिम नागरिक (Non-Muslim Citizenजो इस्लामी राज्य की सुरक्षा में हों। राज्य की ज़िम्मेदारी थी कि वह उनकी जान, माल और सम्मान (Life, Property & Dignity) की रक्षा ठीक उसी तरह करे, जैसे एक मुसलमान की करता है। यह व्यवस्था इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस्लामिक शासन का आधार बल नहीं, बल्कि न्याय और सह-अस्तित्व था।
स्पेन (अल-अंडालूस) का स्वर्ण युग: ज्ञान और सह-अस्तित्व (The Golden Age of Spain (Al-Andalus): Knowledge and Coexistence)
इस्लाम की उदारता (Tolerance) और बौद्धिक खुलापन (Intellectual Openness) का सबसे चमकदार उदाहरण मध्यकालीन स्पेन, यानी अल-अंडालूस (Al-Andalus) में दिखाई देता है। लगभग आठ सौ वर्षों तक यहाँ मुसलमान, ईसाई और यहूदी एक साथ शांति से रहे। इसी कारण इस दौर को “स्वर्ण युग (Golden Age)” कहा जाता है। इस समय पुस्तकालय (Libraries), विश्वविद्यालय (Universities) और अस्पताल (Hospitals) ज्ञान के बड़े केंद्र बने, जहाँ हर धर्म के विद्वान मिलकर विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा और साहित्य पर शोध करते थे।
इस दौर में यहूदी विद्वान मूसा बिन मैमन (Maimonides) जैसे दार्शनिकों को इस्लामी शासन में ऊँचे पद मिले। उस समय यूरोप के कई हिस्सों में धार्मिक उत्पीड़न (Religious Persecution) आम था, जबकि अल-अंडालूस में धार्मिक सह-अस्तित्व (Religious Co-existence) के कारण ज्ञान और संस्कृति ने तेज़ी से तरक़्क़ी की।
भारतीय संदर्भ: सूफीवाद और सांस्कृतिक समन्वय (Sufism & Cultural Harmony)
भारत में इस्लाम के आगमन के साथ ही एक ऐसी साझा संस्कृति विकसित हुई, जिसे “गंगा-जमुनी तहज़ीब (Ganga-Jamuni Tehzeeb)” कहा जाता है। यह संस्कृति आपसी सम्मान, सह-अस्तित्व (Co-existence) और भावनात्मक जुड़ाव पर आधारित थी। सूफी संतों जैसे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहिम ने इस्लाम के संदेश को प्रेम (Love), करुणा (Compassion) और मानवता (Humanity) के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने धर्म को कठोर नियमों के बजाय दिलों को जोड़ने का माध्यम बनाया और इस्लामी शिक्षाओं को स्थानीय भाषा, संगीत और संस्कृति से जोड़ा। उनकी खानकाहें (Khanqahs) सभी धर्मों और वर्गों के लोगों के लिए खुली रहती थीं, जहाँ बराबरी और भाईचारे का अनुभव होता था।
आधुनिक युग: चुनौतियाँ और पुनर्परिभाषा (Modern Era: Challenges & Re-definition)
आज के आधुनिक और वैश्वीकृत दौर में इस्लाम की करुणा और धार्मिक संवेदनशीलता की समझ और भी व्यापक हो गई है। आज का मुस्लिम समाज अपनी परंपरागत इस्लामी शिक्षाओं को मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और बहुसांस्कृतिक समाज के साथ जोड़कर देखने की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि संवाद (Dialogue) और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Co-existence) को मज़बूत करना है।
इसी सोच का प्रतीक जॉर्डन के शाह द्वारा शुरू किया गया “अम्मान संदेश (Amman Message)” और “ए कॉमन वर्ड (A Common Word)” जैसी वैश्विक पहलें हैं, जो मुसलमानों और ईसाइयों के बीच आपसी समझ (Mutual Understanding) और सम्मान को बढ़ावा देती हैं। इसके साथ ही कुछ मुस्लिम देशों में अंतरधार्मिक परियोजनाएँ (Interfaith Initiatives) सामने आई हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में बना “अब्राहमिक फैमिली हाउस (Abrahamic Family House)”, जहाँ एक मस्जिद (Mosque), एक चर्च (Church) और एक सिनेगॉग (Synagogue) एक ही परिसर में स्थित हैं, यह स्पष्ट करता है कि इस्लाम आज भी सह-अस्तित्व (Co-existence), शांति (Peace) और मानवीय एकता (Human Unity) का प्रबल समर्थक है।
निष्कर्ष: एक शांतिपूर्ण भविष्य का मार्ग (Conclusion: Path to a Peaceful Future)
निष्कर्षतः, इस्लाम का इतिहास (History) और दर्शन (Philosophy) यह साफ़ तौर पर दिखाता है कि करुणा और संवेदनशीलता इसके मूल तत्व हैं। प्राचीन काल की संधियों (Treaties) से लेकर आधुनिक दौर की सामाजिक सेवाओं (Social Work) और मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) तक, इस्लाम ने हमेशा विविधता का सम्मान किया है और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Co-existence) को बढ़ावा दिया है।
यह सच है कि समय-समय पर कुछ चरमपंथी विचारधाराओं (Extremist Ideologies) ने इस शांतिपूर्ण संदेश को धुंधला करने की कोशिश की, लेकिन इस्लाम की मुख्यधारा (Mainstream Islam) हमेशा “सलाम” (Peace) और “इंसानियत” (Humanity) की पक्षधर रही है। अगर दुनिया को आने वाले समय में संघर्ष (Conflicts) और घृणा (Hatred) से बचना है, तो उसे इस्लाम के उस उदार और मानवीय चेहरे को पहचानना होगा जो हर इंसान की गरिमा (Dignity) और उसके विश्वास (Belief) का सम्मान करना सिखाता है। अंततः, सच्चा धर्म (True Religion) वही है जो दिलों को जोड़ता है—तोड़ता नहीं।
सन्दर्भ (References)
- सहीह अल-बुख़ारी
- क़ुरआन — सूरह अल-काफ़िरून (आयत 6)
- क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह (आयत 256)
- क़ुरआन — सूरह अल-अनआम (आयत 108)
लेखक:
मोहम्मद हनान मोंगम, मलप्पुरम, केरल
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