डिजिटल युग में इस्लामी मूल्य
प्रस्तावना
वर्तमान समय को डिजिटल युग कहा जाता है। मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक ने मानव जीवन के हर क्षेत्र को गहराई से प्रभावित किया है। शिक्षा व्यापार , प्रशासन सामाजिक संपर्क और विचारों की अभिव्यक्ति (expression of ideas) अब ज़्यादातर डिजिटल माध्यमों पर आधारित हो चुके हैं। सूचना का आदान-प्रदान (information exchange) बहुत तेज़ होगया है और कुछ ही पलों में कोई भी संदेश दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँच सकता है।
हालाँकि तकनीकी प्रगति ने जीवन को ज़्यादा सुविधाजनक बना दिया है, लेकिन इसके साथ कई नैतिक, सामाजिक और मानसिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। झूठी ख़बरों का फैलाव, अफ़वाहें, ऑनलाइन नफ़रत , चरित्र हनन (character defamation), निजता का उल्लंघन (privacy violation) और समय का दुरुपयोग आज के डिजिटल समाज की बड़ी समस्याएँ बन गई हैं। ऐसी स्थिति में केवल तकनीकी समाधान ही काफ़ी नहीं हैं, बल्कि सही नैतिक मार्गदर्शन (moral guidance) की आवश्यकता बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
इस्लाम केवल पूजा करने का तरीका ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पूरी और संतुलित व्यवस्था (complete and balanced system of life) बताता है। क़ुरआन मजीद और रसूलुल्लाह ﷺ की शिक्षाएँ इंसान की ज़िंदगी के हर हिस्से में अच्छे आचरण (morality), संयम (self-control) और न्याय को अपनाने का रास्ता दिखाती हैं। यह निबंध डिजिटल युग में इस्लामी मूल्यों की प्रासंगिकता (relevance) और उनके व्यावहारिक उपयोग का एक शैक्षणिक अध्ययन (academic analysis) प्रस्तुत करता है।
डिजिटल युग की नैतिक चुनौतियाँ ) Ethical challenges of the digital age(
डिजिटल साधनों ने बात-चीत को आसान और तेज़ बना दिया है, लेकिन इनके गलत इस्तेमाल से समाज में कई गंभीर परेशानियाँ पैदा हो गई हैं। सोशल मीडिया पर लोग अक्सर जाँच-पड़ताल किए बिना ही खबरें और बातें आगे भेज देते हैं। इससे झूठी खबरें और भ्रम फैलाने वाली जानकारी बहुत जल्दी फैल जाती है। नतीजतन समाज में तनाव, डर और एक-दूसरे पर भरोसे की कमी पैदा होती है।
इसके अलावा, ऑनलाइन मंचों पर लोग कई बार भाषा की मर्यादा भूल जाते हैं। अपमानजनक बातें और नफ़रत भरे संदेश समाज की आपसी एकता और भाईचारे को नुकसान पहुँचाते हैं। डिजिटल दुनिया में इंसान यह भूल जाता है कि स्क्रीन के दूसरी तरफ भी एक संवेदनशील (sensitive) इंसान मौजूद है। इसलिए अगर नैतिक समझ न हो, तो तकनीक इंसानियत के लिए नुकसानदेह बन सकती है।
सत्य और सूचना की ज़िम्मेदारी (The responsibility of truth and information)
डिजिटल युग में सूचना की गति जितनी तेज़ है, उतनी ही बड़ी उसकी जिम्मेदारी भी है। एक गलत समाचार कुछ ही क्षणों में हजारों या लाखों लोगों तक पहुँच सकता है और समाज में गंभीर दुष्परिणाम उत्पन्न कर सकता है। इस्लाम सत्य, न्याय और जिम्मेदारी पर अत्यंत बल देता है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنْ جَاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوا
(سورۃ الحجرات, آیت 6)
“ऐ ईमान वालों! यदि तुम्हारे पास कोई अविश्वसनीय व्यक्ति कोई समाचार लेकर आए, तो उसकी अच्छी तरह जाँच कर लिया करो।”
यह आयत स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि किसी भी सूचना को स्वीकार करने और आगे फैलाने से पहले उसकी सत्यता की जाँच आवश्यक है। डिजिटल युग में यह शिक्षा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि झूठी जानकारी समाज में भ्रम, भय और दुश्मनी पैदा कर सकती है।
मानवीय समानता और डिजिटल संवाद (Human equality and digital dialogue)
सोशल मीडिया पर जाति, धर्म, भाषा और नस्ल के आधार पर अपमान और भेदभाव का चलन बढ़ता जा रहा है। इस्लाम मानव समाज को समानता, सम्मान और भाईचारे के सिद्धांत पर स्थापित करता है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ
(سورۃ الحجرات, آیت 13)
“ऐ लोगों! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें जातियों और क़बीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। निश्चय ही अल्लाह के निकट सबसे अधिक
यह आयत डिजिटल संवाद (digital communication) में शालीन भाषा (polite language), सहिष्णुता (tolerance) और आपसी सम्मान का मज़बूत नैतिक आधार देती है। ऑनलाइन बातचीत में किसी व्यक्ति की पहचान या विचारधारा के आधार पर उसका अपमान करना इस्लामी मूल्यों के बिल्कुल ख़िलाफ़ है।
निजता और मानवीय गरिमा (Privacy and human dignity)
डिजिटल युग में निजता (privacy) का उल्लंघन एक गंभीर नैतिक समस्या बन चुका है। व्यक्तिगत जानकारी, निजी संदेश और तस्वीरें बिना अनुमति सार्वजनिक (public) कर दी जाती हैं, जिससे व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचती है। इस्लाम निजता की रक्षा को अत्यंत महत्व देता है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَب بَعْضُكُمْ بَعْضًا (سورۃ الحجرات, آیت 12)
“और न तो एक-दूसरे की जासूसी करो और न ही एक-दूसरे की पीठ पीछे बुराई करो।”
यह आयत साफ़ तौर पर बताती है कि किसी की निजी ज़िंदगी में दख़ल देना या उसकी पीठ पीछे बुराई करना गलत है। डिजिटल दुनिया में यह शिक्षा निजता और इंसानी सम्मान की हिफ़ाज़त के लिए बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
पैग़म्बरी शिक्षाएँ और ऑनलाइन नैतिकता (Prophetic teachings and online ethics)
रसूलुल्लाह ﷺ की शिक्षाएँ सामाजिक जीवन में करुणा (compassion), सहानुभूति (empathy) और नैतिकता (morality) को बहुत महत्वपूर्ण स्थान देती हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى يُحِبَّ لِأَخِيهِ مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِ
तुम में से कोई व्यक्ति तब तक सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता, जब तक वह अपने भाई के लिए वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है।” (सहीह अल-बुखारी)
यह हदीस डिजिटल व्यवहार में सहानुभूति (empathy) और नैतिक संवेदनशीलता (moral sensitivity) की मज़बूत नींव (foundation) रखती है। ऑनलाइन संवाद में वही व्यवहार अपनाना चाहिए, जो हम अपने लिए सही और स्वीकार्य मानते हैं।
इसी संदर्भ में रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
الغيبة ذِكْرُكَ أَخَاكَ بِمَا يَكْرَهُ
“अपने भाई का ऐसा ज़िक्र करना जिसे वह ना पसंद करता हो, वही परनिंदा है।”
(सहीह मुस्लिम)
यह हदीस ऑनलाइन चरित्र हनन और अपमानजनक टिप्पणियों के विरुद्ध स्पष्ट चेतावनी है।
समय, आत्म-संयम और डिजिटल संतुलन (Time, self-control, and digital balance)
डिजिटल तकनीक का अत्यधिक उपयोग समय की बर्बादी और मानसिक असंतुलन का कारण बन सकता है। इस्लाम आत्म-संयम और उद्देश्यपूर्ण जीवन पर बल देता है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
وَالَّذِينَ هُمْ عَنِ اللَّغْوِ مُعْرِضُونَ (سورۃ المؤمنون, آیت 3)
“और वे लोग जो व्यर्थ और बेकार कामों से दूर रहते हैं।”
यह आयत डिजिटल जीवन में संतुलन, सीमित उपयोग और समय के सदुपयोग की स्पष्ट शिक्षा देती है।
निष्कर्ष
डिजिटल युग इंसानी इतिहास का एक बहुत अहम दौर है। तकनीक अपने आप में न तो अच्छी होती है और न ही बुरी; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है। क़ुरआन और हदीस में बताए गए सच, बराबरी, निजता, सहनशीलता और आत्म-संयम जैसे उसूल डिजिटल ज़िंदगी को संतुलित और इंसानियत भरी बना सकते हैं।
इस्लाम आधुनिक तकनीक का विरोध नहीं करता, बल्कि उसके नैतिक और भलाई वाले इस्तेमाल का रास्ता दिखाता है। अगर डिजिटल व्यवहार को इन इस्लामी मूल्यों के अनुसार अपनाया जाए, तो तकनीक इंसानियत के विकास और भलाई का एक मज़बूत साधन बन सकती है।
स्रोत-सूची
कुरआन मजीद
सहीह अल-बुखारी
सहीह मुस्लिम
लेखक: गुलाब, प्लस वन, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
Disclaimer
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