इस्लाम में नारीवाद: अधिकार और समानता की अवधारणा

प्रस्तावना

समाज में महिलाओं की स्थिति, उनके अधिकार (rights) और उनकी इज़्ज़त (dignity) का सवाल आज सिर्फ़ एक सामाजिक बहस (social debate) नहीं रहा, बल्कि पूरी मानव सभ्यता (human civilization) की बुनियाद से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।

फ़ेमिनिज़्म (Feminism), जिसे आम तौर पर “महिलाओं के अधिकार और समानता (equality) की सोच” कहा जाता है, दुनिया के अलग-अलग समाजों में अलग-अलग रूपों में सामने आया। लेकिन एक अहम बात यह है कि बहुत से लोग यह नहीं जानते कि इस्लाम ने अपने शुरुआती दौर (early period) में ही महिलाओं के अधिकारों की ऐसी मज़बूत नींव रखी थी, जिसकी उस समय किसी दूसरी सभ्यता (civilization) में मिसाल नहीं मिलती।

इस्लामी शिक्षाओं  का अध्ययन करने पर यह साफ़ हो जाता है कि इस्लाम का मूल संदेश ही न्याय (justice), दया (compassion), मानव-गरिमा (human dignity) और लैंगिक संतुलन (gender balance) पर आधारित है। इसलिए अगर फ़ेमिनिज़्म (Feminism) का मतलब “महिलाओं की समानता (equality), सुरक्षा , सम्मान और अधिकार ” है, तो इस्लाम इन सिद्धांतों को न सिर्फ़ स्वीकार करता है, बल्कि उन्हें एक धार्मिक कर्तव्य (religious duty) के रूप में पेश करता है।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

( وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا )“और उसी (एक जान) से उसका जोड़ा पैदा किया।” (सूरह अन-निसा 4:1)

यह आयत मानवता की समान उत्पत्ति की घोषणा करती है, जिससे यह सिद्ध होता है कि लैंगिक भेदभाव का कोई धार्मिक आधार नहीं।

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं:

(طَلَبُ الْعِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِم)

 “इल्म (ज्ञान) हासिल करना हर मुसलमान पर फर्ज़ है।” (सुन्नन इब्न माजा)

आर्थिक आत्मनिर्भरता और महिला की स्वतंत्र पहचान (Economic Self-Reliance and Independent Identity of Women)

इस्लाम ने न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र पहचान दी, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि उनकी कमाई (income), धन (wealth), उपहार (gifts), विरासत (inheritance) और चल-अचल संपत्ति (movable and immovable property) पर किसी भी पुरुष—चाहे वह पिता (father) हो, पति (husband) हो या भाई—का कोई अधिकार न हो। यह अधिकार उस दौर में बहुत क्रांतिकारी (revolutionary) था, जब अरब समाज में महिलाएँ अक्सर विरासत और संपत्ति से पूरी तरह वंचित (deprived) कर दी जाती थीं।

विरासत में महिलाओं का सुनिश्चित हिस्सा (Guaranteed Share of Women in Inheritance)

कुरआन ने महिलाओं को विरासत में हिस्सा स्पष्ट रूप से निर्धारित किया—और यह एक ऐतिहासिक बदलाव था।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

(لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ)
 “मातापिता और रिश्तेदार जो कुछ छोड़ जाएँ, उसमें पुरुषों का भी हिस्सा है और महिलाओं का भी हिस्सा है।”(सूरह अन-निसा 4:7)

यह आयत यह सिद्ध करती है कि आर्थिक अधिकार सिर्फ पुरुषों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि महिलाओं का भी उतना ही सुरक्षित अधिकार है।

 महिलाओं का महर पर पूर्ण अधिकार (Women’s Full Right over Mahr (Dower)

इस्लाम ने स्त्री की आर्थिक गरिमा की रक्षा के लिए महर को एक अनिवार्य और महिला के निजी अधिकार के रूप में स्थापित किया।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

( وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً )  “और महिलाओं को उनका महर खुशी-खुशी देकर दो।” (सूरह अन-निसा 4:4)

यहाँ महर को उनका अपना धन कहा गया है, जिस पर किसी अन्य व्यक्ति का अधिकार नहीं।

 स्त्री की कमाई और व्यापार पर पूरा अधिकार (Woman’s Full Right over Her Earnings and Business)

इस्लाम ने यह भी स्पष्ट किया कि स्त्री जो कमाएगी, वह उसका स्वयं का है। न पति उसका धन ले सकता है, न ही पिता।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

(لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِّمَّا اكْتَسَبُوا وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِّمَّا اكْتَسَبْنَ)  “पुरुषों को भी उनके कमाए हुए का हिस्सा है और महिलाओं को भी उनके कमाए हुए का हिस्सा है।” (सूरह अन-निसा 4:32)

यह आयत महिला की कमाई को उसकी आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक बनाती है।

इस्लाम ने महिलाओं को सदक़ा व ज़कात देने का अधिकार भी देता है।

पैग़ंबर ﷺ इरशाद फरमाते हैं: يَا مَعْشَرَ النِّسَاءِ تَصَدَّقْنَ“हे महिलाओं! सदक़ा किया करो।”(सहीह मुस्लिम)

यह हदीस दर्शाती है कि महिला अपनी संपत्ति का उपयोग धार्मिक व सामाजिक कार्यों में स्वतंत्र रूप से कर सकती है।

विवाह में स्त्री की सहमति, इस्लाम का क्रांतिकारी सिद्धांत (Woman’s Consent in Marriage: A Revolutionary Principle in Islam)

इस्लाम आने से पहले कई समाजों में महिलाओं को जबरन विवाह में धकेल दिया जाता था। इस्लाम ने विवाह में स्त्री की सहमति को अनिवार्य कर दिया।

(لَا تُنْكَحُ الْبِكْرُ حَتَّى تُسْتَأْذَنَ) “बेक़सूर (कुंवारी) लड़की का निक़ाह उसकी अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।” (सहीह बुखारी)

यह महिलाओं के आत्मसम्मान और व्यक्तिगत निर्णय के अधिकार का धार्मिक प्रमाण है।

घरेलू हिंसा पर इस्लाम का रुख़ (Islam’s Stance on Domestic Violence)

इस्लाम ने घरेलू हिंसा (domestic violence) को सिर्फ़ एक सामाजिक बुराई (social evil) के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक अपराध (moral crime) और आध्यात्मिक पाप (spiritual sin) के रूप में देखा है। इस्लामी शिक्षाओं (Islamic teachings) के अनुसार परिवार (family) समाज की सबसे छोटी इकाई (basic unit) है, और अगर इस इकाई में हिंसा (violence), अपमान (humiliation) या अन्याय (injustice) मौजूद हो, तो पूरा समाज नैतिक रूप से (morally) कमजोर हो जाता है।

इसी कारण क़ुरआन और हदीस दोनों ने पति-पत्नी के रिश्ते में रहमत, मवद्दत (love) और इहसान (kind and excellent behaviour) को अनिवार्य (essential) शर्त बताया है।

क़ुरआन (Qur’an) में पति-पत्नी (husband and wife) के संबंध की जो मूलभूत संरचना (basic framework) बताई गई है, वह हिंसा (violence) के किसी भी रूप की अनुमति नहीं देती। क़ुरआन यह बताता है कि विवाह (marriage) का उद्देश्य मानसिक शांति (mental peace), आत्मिक संतुलन (spiritual balance) और एक-दूसरे को सहारा देना (mutual support) है।

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

( لِتَسْكُنُوا إِلَيْهَا) “ताकि तुम उन्हें (अपनी पत्नियों) के पास सुकून पाओ।” (रूम 30:21)

हिंसा सुकून के इस उद्देश्य के बिल्कुल विरुद्ध है। यदि वह रिश्ता जिसमें मनुष्य को प्रेम और सुरक्षा का अनुभव होना चाहिए, वहीं भय, चोट और अपमान मौजूद हो, तो यह कुरआन की मूल शिक्षा का खुला उल्लंघन है।

इसी तरह, कुरआन का नैतिक दर्शन इस बात पर ज़ोर देता है कि ज़ुल्म का हर रूप निषिद्ध है, और ज़ुल्म चाहे घर की चारदीवारी में हो या समाज में, उसकी प्रकृति नहीं बदलती।
इस्लाम में ज़ुल्म केवल शारीरिक चोट नहीं, बल्कि भावनात्मक उत्पीड़न, अपमान, धमकी, या आर्थिक दबाव, सभी को शामिल करता है।

पैग़ंबर मुहम्मद (ﷺ) की निजी ज़िंदगी इस शिक्षण का सर्वोच्च उदाहरण है।

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ:
مَا ضَرَبَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ شَيْئًا قَطُّ بِيَدِهِ، وَلَا امْرَأَةً، وَلَا خَادِمًا، إِلَّا أَنْ يُجَاهِدَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने कभी किसी स्त्री या नौकर पर हाथ नहीं उठाया, सिवाय अल्लाह के रास्ते में जिहाद के समय। (सहीह मुस्लिम)

यह केवल एक व्यक्तिगत गुण नहीं था; यह मुस्लिम समाज के लिए एक स्थायी नैतिक दिशा-निर्देश था। इसका अर्थ यह है कि एक मुस्लिम पुरुष की मर्दानगी का मानदंड उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसकी नर्मी, संयम और न्यायप्रियता है।

पैग़ंबर (ﷺ) केवल हिंसा से रोकते नहीं थे, बल्कि यह भी बताते थे कि हिंसा करने वाले व्यक्ति का चरित्र कैसा होता है। उन्होंने कठोर शब्दों में कहा कि لَا يَجْلِدُ أَحَدُكُمُ امْرَأَتَهُ جَلْدَ الْعَبْدِ، तुम में से कोई भी अपनी पत्नी को गुलाम की तरह न मारे। (सहीह बुखारी) यह कथन घरेलू हिंसा के खिलाफ एक स्पष्ट धार्मिक और नैतिक निर्णय है।

 और उन्होंने फरमाया: خِيَارُكُمْ خِيَارُكُمْ لِنِسَائِهِمْ. तुम में सबसे अच्छे वही हैं जो अपनी पत्नियों के साथ सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं। (सहीह बुखारी)

इसके अतिरिक्त, इस्लाम में पति की भूमिका अधिकारों और ज़िम्मेदारियों का संतुलन है। वह पत्नी पर अत्याचार करने वाला शासक नहीं, बल्कि अमानतदार है, और पत्नी उसके लिए एक ईश्वरीय “अमानत” है। हदीस में आता है:

وَاسْتَوْصُوا بِالنِّسَاءِ خَيْرًا , فَإِنَّهُنَّ خُلِقْنَ مِنْ ضِلَعٍ , وَإِنَّ أَعْوَجَ شَيْءٍ فِي اَلضِّلَعِ أَعْلَاهُ , فَإِنْ ذَهَبْتَ تُقِيمَهُ كَسَرْتَهُ , وَإِنْ تَرَكْتَهُ لَمْ يَزَلْ أَعْوَجَ , فَاسْتَوْصُوا بِالنِّسَاءِ خَيْرًا

औरतों के साथ अच्छा व्यवहार करने की नसीहत करो, क्योंकि वे पसली से पैदा की गई हैं, और पसली में सबसे ज़्यादा टेढ़ा हिस्सा उसका ऊपरी भाग होता है; अगर तुम उसे सीधा करने जाओगे तो वह टूट जाएगी, और अगर उसे छोड़ दोगे तो टेढ़ी ही रहेगी—इसलिए औरतों के साथ अच्छा व्यवहार करो। (सहीह बुखारी)

इस आदेश में किसी प्रकार की घोषणा नहीं, बल्कि व्यवहारिक और नैतिक ज़िम्मेदारी निहित है।

संक्षेप में, इस्लाम घरेलू हिंसा (domestic violence) को सिर्फ़ नापसंद (disapprove) ही नहीं करता, बल्कि उसे इस्लामी चरित्र (Islamic character), आध्यात्मिकता (spirituality) और न्याय (justice) के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ घोषित करता है।
इस्लाम की नज़र में सच्चा मुसलमान वही है, जो अपने परिवार को सुरक्षा दे, उनकी भावनाओं का सम्मान करे और रिश्ते में प्रेम व करुणा को प्राथमिकता दे।

इसलिए घरेलू हिंसा केवल सामाजिक या कानूनी अपराध नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक अपराध भी है।

राजनीतिक भागीदारी (Political Participation)

इस्लाम ने महिलाओं की राजनीतिक भूमिका (political role) को सिर्फ़ अनुमति (permission) देने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक व्यवस्था (social system) का एक आवश्यक और सम्मानित हिस्सा बनाया। इस्लामी शिक्षाओं (Islamic teachings) के अनुसार समाज तभी संतुलित (balanced) और न्यायपूर्ण (just) बनता है जब पुरुष और महिला—दोनों—समान रूप से सलाह (consultation), नेतृत्व (leadership) और विचार-विमर्श (deliberation) में योगदान दें।

इसी कारण क़ुरआन और हदीस  में महिलाओं की राजनीतिक उपस्थिति (political participation) को न केवल स्वीकार (accepted) किया गया, बल्कि कई उदाहरणों में उसे वांछनीय (desirable) और सार्थक (meaningful) भी बताया गया है।

 

इस्लाम का राजनीतिक सिद्धांत (political principle) “शूरा” (Shura – collective consultation) यानी सामूहिक परामर्श पर आधारित है, और यह सिद्धांत किसी एक लिंग (gender) तक सीमित नहीं है।

जब अल्लाह ने परामर्श (consultation) के आधार पर शासन (governance) की बात की, तो उसने पुरुष और महिला का अलग-अलग उल्लेख नहीं किया, बल्कि सभी ईमान वालों को शामिल किया।

इस्लाम में नीतिगत फैसलों (policy decisions) का केंद्र नैतिकता (morality) और बुद्धिमत्ता (wisdom) है—और ये दोनों गुण किसी विशेष लिंग की मोनॉपॉली (monopoly) नहीं हैं।

यही कारण है कि पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ ने कई बार महिलाओं की राजनीतिक राय (political opinion) को निर्णायक रूप से स्वीकार किया, जिससे यह साबित होता है कि इस्लाम की दृष्टि में महिलाओं की सोच, अनुभव और निर्णय क्षमता (decision-making ability) समाज के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी पुरुषों की।

इस्लामी इतिहास (Islamic history) में महिलाएँ केवल राजनीतिक माहौल (political environment) की दर्शक नहीं थीं, बल्कि उस माहौल को आकार देने वाली सक्रिय (active) हस्तियाँ थीं। उनका परामर्श (consultation) युद्ध-नीति (war strategy) से लेकर सामाजिक सुधारों (social reforms) तक में लिया जाता था, और उनके ज्ञान को नेतृत्व के लिए मार्गदर्शक माना जाता था। इस्लाम ने यह सिद्धांत (principle) स्थापित किया कि राजनीतिक भागीदारी (political participation) योग्यता (merit/competence) पर आधारित है, लिंग (gender) पर नहीं।

इस प्रकार, इस्लाम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी (political participation) को दायित्व (responsibility), अधिकार (rights) और सम्मान (respect)—तीनों रूपों में देखता है, और उन्हें समाज के सामूहिक निर्णयों (collective decisions) में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

कुरआन में महिलाओं की बैअत का साफ़ आदेश मौजूद है: ( يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ)
“हे नबी! जब तुम्हारे पास ईमान वाली महिलाएँ बैअत के लिए आएँ…”
(सूरह अल-मुम्तहिना 60:12)

यह आयत प्रमाण है कि राजनीतिक प्रतिबद्धता केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी; महिलाओं से भी बैअत ली जाती थी—जो एक राजनीतिक प्रक्रिया है।

सामाजिक भागीदारी (Social Participation)

सामाजिक क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका हमेशा से बहुत महत्वपूर्ण (important) और प्रभावशाली (influential) रही है। इस्लाम ने उन्हें शिक्षा , व्यापार , चिकित्सा (medicine), सामाजिक नेतृत्व (social leadership) और सामुदायिक सेवा (community service) के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की पूरी स्वतंत्रता (freedom) और नैतिक आधार (moral foundation) दिया है।

पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के दौर (era) से ही महिलाओं की सामाजिक भागीदारी (social participation) को सम्मानित दर्जा (respected status) दिया गया। इस्लाम की मूल शिक्षाओं (core teachings) में कहीं भी महिलाओं को समाज से अलग (isolated) या निष्क्रिय (inactive) रहने की सलाह नहीं दी गई, बल्कि यह साफ़ कहा गया कि हर व्यक्ति—चाहे पुरुष हो या महिला—अपने समाज (society) के लिए उपयोगी (useful) बने और अपनी क्षमताओं (abilities) का सकारात्मक (positive) उपयोग करे।

प्रारंभिक इस्लामी इतिहास (early Islamic history) खुद इस बात का प्रमाण (evidence) है कि महिलाओं ने सामाजिक (social), आर्थिक (economic) और सार्वजनिक (public) क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उम्मे-अम्मारा (नसीबा बिन्त काब) रज़ियल्लाहु अन्हा का उदाहरण दुनिया के सामने एक बड़ी प्रेरणा (inspiration) है। उन्होंने न केवल युद्ध के मैदान में घायल मुसलमानों की सेवा की, बल्कि कठिन परिस्थितियों (difficult circumstances) में पैग़म्बर ﷺ की रक्षा करते हुए तलवार और तीरों का भी सामना किया। उनकी बहादुरी और सामाजिक जिम्मेदारी का यह स्तर इस्लामी इतिहास (Islamic history) का एक उज्ज्वल अध्याय है।

इसी प्रकार सहाबियात (female companions of Prophet), जैसे हज़रत ख़दीजा रज़ि., जो व्यापार (business) के क्षेत्र में अरब की सबसे सफल महिलाओं में गिनी जाती थीं, ने सामाजिक जीवन में सक्रिय (active) भूमिका निभाई। उस समय कई महिलाएँ बाज़ारों में व्यापार करती थीं, कृषि (agriculture) और कारोबार (trade) में पुरुषों की तरह हिस्सा लेती थीं, न्यायिक मामलों (judicial matters) में गवाही (testimony) देती थीं, और समाज के व्यवहारिक मामलों (practical social matters) में सलाहकार (advisors) के रूप में सम्मानित थीं।

हज़रत शिफ़ा बिन्त अब्दुल्लाह रज़ि. को बाज़ार की निगरानी की ज़िम्मेदारी दी गई थी, जो अपने आप में इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस्लाम महिलाओं की सामाजिक नेतृत्व क्षमता (social leadership capacity) को स्वीकार करता है और उनका उपयोग समाज के हित  में करने को प्रोत्साहित करता है।

 

आज के दौर (modern era) में भी मुस्लिम महिलाएँ शिक्षा, पत्रकारिता (journalism), स्वास्थ्य सेवा (healthcare), सामाजिक कार्य, क़ानून , प्रशासन (administration) और तकनीक जैसे क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर योगदान (active contribution) दे रही हैं। इस्लाम उन्हें ज्ञान की प्राप्ति, कौशल विकास (skill development) और सामाजिक सुधार (social reform) में सक्रिय भागीदारी (active participation) का एक मज़बूत वैचारिक आधार (strong ideological foundation) देता है।

क़ुरआन (Qur’an) में कहा गया है कि “ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली महिलाएँ, दोनों एक-दूसरे के सहायक और संरक्षक हैं।” इसका अर्थ यह है कि इस्लाम दोनों को समाज के उत्थान (social upliftment) में समान रूप से भाग लेने की प्रेरणा (motivation) देता है, न कि किसी एक को श्रेष्ठ (superior) या दूसरे को गौण (secondary) साबित करता है।

 

सार रूप में, सामाजिक भागीदारी (social participation) इस्लामी नारी जीवन (Islamic women’s life) की एक स्वाभाविक (natural) और आवश्यक (essential) पहचान है। यह न केवल महिलाओं के अधिकारों (women’s rights) की पुष्टि करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि इस्लाम एक सशक्त (empowered), सक्रिय (active) और सम्मानित महिला समाज का पक्षधर (supporter) है, जो अपने परिवार (family), समुदाय (community) और राष्ट्र निर्माण (nation building) में समान रूप से योगदान (equal contribution) देती है।

मातृत्व और स्त्री-गरिमा, इस्लामी परंपरा की विशेष शिक्षा (Motherhood and Women’s Dignity: A Special Teaching of Islamic Tradition)

इस्लाम में मातृत्व (motherhood) को असाधारण (extraordinary) सम्मान दिया गया है, क्योंकि माँ न केवल बच्चे के जन्म (birth) का साधन है, बल्कि नैतिक (moral), आध्यात्मिक (spiritual) और सामाजिक निर्माण (social formation) की मूल इकाई भी है।

क़ुरआन (Qur’an) माँ की कठिनाइयों (hardships), बलिदानों (sacrifices) और निरंतर दया (continuous compassion) को विशेष रूप से उल्लेखित  करता है।

 अल्लाह तआला फरमाता है: “उसकी माँ ने उसे कमजोरी पर कमजोरी उठाए रखा।” (सूरह लुक़मान 31:14) यह आयत मातृत्व के संघर्षों को ईश्वरीय सम्मान देती है और बताती है कि माँ की सेवा करना केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं बल्कि इबादत का हिस्सा है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का यह कथन, “जन्नत तुम्हारी माँ के पैरों तले है” (नसाई)—इस्लामी नैतिकता में मातृत्व के उच्चतम दर्जे को स्पष्ट करता ह

स्त्री-गरिमा (woman’s dignity) इस्लाम में केवल माँ बनने के बाद नहीं मिलती, बल्कि स्त्रीत्व अपने आप में सम्मान और पवित्रता का प्रतीक है। इस्लाम स्त्री को एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में देखता है—जो अपनी बुद्धिमत्ता (intelligence), दया (compassion), नैतिकता (morality) और सामाजिक भूमिका (social role) के आधार पर सम्मान की पात्र है।

मातृत्व उस गरिमा को और ऊँचा करता है, क्योंकि एक माँ अपनी गोद से आने वाली पीढ़ियों (future generations) के विचार, चरित्र (character) और आध्यात्मिकता (spirituality) का निर्माण करती है।

इसीलिए इस्लाम महिला को केवल घर का हिस्सा (part of household) नहीं, बल्कि समाज की निर्माता (builder of society) मानता है। माँ की दुआ (prayer), उसकी शिक्षा (education) और उसका स्नेह (affection) इस्लामी परंपरा (Islamic tradition) में उम्मत (Ummah) की सफलता (success) की नींव माने गए हैं, और यही मातृत्व और स्त्री-गरिमा का वह अद्वितीय संगम (unique combination) है जिसे इस्लाम ने विशेष रूप से सम्मानित (specially honoured) किया है।

(أُمُّكَ ثُمَّ أُمُّكَ ثُمَّ أُمُّك ثُمَّ أَبُوكٍََ)

“(नेकी और सेवा में सबसे पहला हक़) तुम्हारी माँ का है, फिर तुम्हारी माँ का, फिर तुम्हारी माँ का।” (सहीह मुस्लिम)

इस हदीस में माँ को तीन बार प्राथमिकता देकर महिलाओं की गरिमा का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।

निष्कर्ष

यदि नारीवाद (feminism) का सार (essence) यह है कि महिलाएँ सम्मानित हों, उनके पास शिक्षा, संपत्ति, निर्णय और सामाजिक भागीदारी के अधिकार हों, और उनके साथ न्याय , दया तथा समान व्यवहार (equal treatment) किया जाए—तो यह कहना पूरी तरह उचित  होगा कि इस्लाम का मूल संदेश फ़ेमिनिस्ट सिद्धांतों (feminist principles) का विरोध नहीं करता, बल्कि उनका आधार (foundation) प्रदान करता है।

समस्या इस्लामी सिद्धांतों (Islamic principles) में नहीं, बल्कि उन सामाजिक रवैयों (social attitudes) में है जिन्होंने कई बार धर्म (religion) की वास्तविक शिक्षाओं को अपने फायदे  के लिए बदल दिया। इसलिए आधुनिक मुस्लिम महिलाओं (modern Muslim women) का संघर्ष (struggle) धर्म से नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच से है जिसने इस्लाम की प्रगतिशील (progressive) शिक्षाओं को दबा दिया।

इस्लाम अपने मूल (essence) में एक न्यायपूर्ण, संतुलित और स्त्री-गरिमामय (women-dignity-centred) जीवन व्यवस्था (way of life) प्रस्तुत करता है, और यही बात इसे आज के फ़ेमिनिज़्म विमर्श (feminist discourse) में अत्यंत प्रासंगिक बनाती है।

 

 References:

    सूरह अन-निसा

    सूरह अन-निसा

    इब्न माजा

    सहीह बुखारी

  

लेखक: साहिल रजा, कक्षा: 11 का छात्र, क़ुरतुबा, किशनगंज, बिहार

Disclaimer

The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.

Leave A Comment

Related Posts