अल्लाह और इंसान का रिश्ता: सच्चाई दया और प्रेम का आधार
दुनिया में जितने भी रिश्ते मौजूद हैं—जैसे माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त या जीवन साथी—उन सब में सबसे पवित्र, मौलिक और गहरा रिश्ता अल्लाह और उसके बंदे (इंसान) का है। यह संबंध जन्म, जीवन और मृत्यु के परे तक फैला हुआ है। इंसान चाहे कितना भी कमज़ोर, भूलने वाला, या गुनाहगार क्यों न हो, अल्लाह अपनी असीम दया और रहमत के कारण हमेशा उसके करीब रहता है। यह रिश्ता केवल प्रभुत्व (dominance) और आज्ञाकारिता (obedience) पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रेम, मार्गदर्शन, क्षमा और निरंतर समर्थन पर टिका है। यह संबंध ही इंसान के जीवन का केंद्र बिंदु है, जो उसे दुनियावी भटकावों के बीच एक स्थिर आधार और सच्चा सुकून प्रदान करता है।
इंसान की रचना और अल्लाह की दया (रचना, प्रतिनिधि और रोज़ी)
इंसान की जिंदगी की शुरुआत ही अल्लाह की दया और रहमत से होती है। अल्लाह तआला ही खालिक (सृष्टिकर्ता) हैं और वही हर चीज़ का मालिक है।
कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: "اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكُمْ ثُمَّ رَزَقَكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ" (अल्लाह ही ने तुम्हें पैदा किया, फिर रोज़़ी दी, फिर मौत देगा और फिर ज़िंदा करेगा - सूरह अर-रूम 30:40)।
यह आयत बताती है कि इंसान का हर कदम, हर सांस, हर खुशी और हर दुख अल्लाह की देखभाल में है। रोज़ी (रिज़्क़) का मतलब सिर्फ खाने-पीने की चीज़ें नहीं है, बल्कि इसमें स्वास्थ्य, ज्ञान, परिवार, सुरक्षा और हर वह साधन शामिल है जिसकी इंसान को ज़िंदगी गुज़ारने के लिए ज़रूरत होती है। इंसान चाहे कितना भी स्वतंत्र महसूस करे, वह हर पल अल्लाह की रहमत और निगरानी में होता है। इंसान का अस्तित्व केवल भौतिक कारणों से नहीं है; बल्कि यह अल्लाह की योजना और रहमत का परिणाम है।
अह्सन-ए-तक़्वीम और ख़िलाफ़त
अल्लाह ने इंसान को केवल मिट्टी से बनाया ही नहीं, बल्कि उसे एक विशेष सम्मान दिया। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ فِي أَحْسَنِ تَقْوِيم
(हमने इंसान को सबसे सुंदर और बेहतरीन ढंग से पैदा किया। (सूरह अत-तीन 95:4)
यह ‘सबसे सुंदर रूप’ केवल शारीरिक सुंदरता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सोचने, समझने, तर्क करने (अक़्ल), अच्छे-बुरे का फ़र्क करने (तमीज़), और अपनी मर्ज़ी से रास्ता चुनने (इख़्तियार) की क्षमता भी शामिल है।
इंसान केवल एक जीव नहीं है; उसे ज़मीन पर अल्लाह के प्रतिनिधि (ख़लीफ़ा) के रूप में भेजा गया है। यह ख़िलाफ़त इंसान को जिम्मेदारी के साथ दुनिया में भेजती है, ताकि वह अपनी क्षमता, ज्ञान और हिम्मत से दुनिया में न्याय, सुधार और भलाई (इसलाह) ला सके। यह प्रतिनिधित्व ही अल्लाह और इंसान के रिश्ते को एक उद्देश्य प्रदान करता है।
आज़माइश में अल्लाह की हिकमत
इस रिश्ते की एक खूबसूरती यह भी है कि अल्लाह इंसान को चुनौतियों और कठिनाइयों के माध्यम से परखता है। इंसान की जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा में सुख-दुख, मुश्किलें और अवसर सभी अल्लाह की योजना (तदबीर) का हिस्सा हैं। ये मुश्किलें इंसान को कमज़ोर करने के लिए नहीं, बल्कि उसे मज़बूत बनाने और अल्लाह की ओर झुकाने के लिए आती हैं। यह समझने से इंसान का दिल अल्लाह की ओर झुकता है, और वह अपने जीवन में उसकी रहमत और मार्गदर्शन को महसूस करता है।
अल्लाह की करीबी और इंसान का भरोसा (निकटता, प्रार्थना और तवक्कुल)
अल्लाह इंसान के दिल से भी अधिक करीब है। कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है: "وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِيدِ" (हम इंसान की गर्दन की नस से भी ज्यादा उसके करीब हैं । ( सूरह क़ाफ़ 50:16)
यह आयत बताती है कि इंसान की हर सोच, हर भावना और हर हरकत अल्लाह के सामने स्पष्ट है। यह करीबी रिश्ता इंसान को सुकून और सुरक्षा देता है, साथ ही उसे हर काम इह्सान (उत्तमता) के साथ करने के लिए प्रेरित करता है।
हज़रत उमर رضي الله عنه से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ से इह्सान के बारे में पूछा गया। आप ने फ़रमाया:
أَنْ تَعْبُدَ اللَّهَ كَأَنَّكَ تَرَاهُ، فَإِنْ لَمْ تَكُنْ تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاكَ
इह्सान का मतलब यह है कि इंसान अल्लाह की इबादत इस तरह करे जैसे वह उसे देख रहा हो। और अगर वह उसे देख नहीं सकता, तो कम से कम यह यक़ीन रखे कि अल्लाह उसे हर समय देख रहा है। (सहीह मुस्लिम, बुखारी)
यह निरंतर निगरानी इंसान के व्यवहार को सच्चा और शुद्ध रखती है। इंसान अपनी समस्याओं और दुखों से दुनिया से छिप सकता है, लेकिन अल्लाह से नहीं। इसलिए जब इंसान कठिन समय से गुज़रता है—चाहे वह आर्थिक संकट हो, व्यक्तिगत कठिनाई हो या भावनात्मक परेशानी—तो उसे यह यकीन रहता है कि अल्लाह उसके साथ है।
दुआ (प्रार्थना) और जवाब का वादा
कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
"وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ"
(जब मेरा बंदा मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार का जवाब देता हूँ । - (सूरह अल-बक़रह 2:186) दुआ इंसान और अल्लाह के बीच सबसे मजबूत और खूबसूरत पुल है। दुआ न केवल इंसान की मुश्किलों का समाधान करती है, बल्कि उसके दिल को भी सुकून और शक्ति देती है। दुआ अल्लाह की क़रीबी का सीधा प्रमाण है।
तवक्कुल (भरोसा) और कर्म का संतुलन
अल्लाह और इंसान के इस करीबी रिश्ते का यह मतलब नहीं कि इंसान को अपनी ज़िम्मेदारियों और मेहनत को भूल जाना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि इंसान अपने कामों में ईमानदारी, नेकनीयत और अल्लाह की याद रखे। वह मेहनत करे, योजना बनाए, और फिर परिणाम अल्लाह पर छोड़ दे—इसी को तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) कहते हैं।
हदीस में है:
عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَجُلًا قَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، أَأَعْقِلُهَا وَأَتَوَكَّلُ، أَوْ أُطْلِقُهَا وَأَتَوَكَّلُ؟ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْ.
हज़रत अनस رضي الله عنه से रिवायत है कि एक आदमी ने रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा:
“ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं अपने ऊँट को बाँधकर अल्लाह पर भरोसा करूँ,
या उसे खुला छोड़कर अल्लाह पर भरोसा करूँ?” तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “पहले उसे बाँधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो।” (सुनन अत-तिर्मिज़ी)
जब इंसान अल्लाह पर तवक्कुल रखता है, तो उसकी ज़िंदगी में स्थिरता और संतोष आता है, क्योंकि वह जानता है कि उसकी मेहनत जाया नहीं जाएगी और हर अंतिम परिणाम अल्लाह की मर्ज़ी से होगा।
अल्लाह की माफ़ी और रहमत
अल्लाह और इंसान के रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह माफ़ी (मग़फ़िरत), रहमत और प्रेम पर आधारित है। इंसान भले ही गुनाह करता है, भूल करता है, या बार-बार गलतियाँ करता है, अल्लाह की मग़फ़िरत का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है।
अल्लाह की असीम ख़ुशी और तौबा (पश्चाताप)
हदीस में आता है कि अल्लाह तौबा करने वाले बंदे से बहुत खुश होता है।
रसूलुल्लाह ﷺ इरशाद फरमाते हैं:
لَلَّهُ أَشَدُّ فَرَحًا بِتَوْبَةِ عَبْدِهِ مِنْ أَحَدِكُمْ سَقَطَ عَلَى بَعِيرِهِ وَقَدْ أَضَلَّهُ فِي أَرْضٍ فَلَاةٍ
अल्लाह अपने बंदे की तौबा से इतना ज़्यादा खुश होता है, जितना तुम में से कोई व्यक्ति उस समय खुश होता है जब वह रेगिस्तान में अपना ऊँट खो देता है, फिर अचानक वही ऊँट उसे मिल जाता है और वह उस पर सवार हो जाता है। (सहीह बुख़ारी)
यह हदीस अल्लाह की असीम दया और प्रेम को दर्शाती है। तौबा केवल ज़बान से माफ़ी माँगना नहीं है, बल्कि इसमें तीन शर्तें शामिल हैं: गलती को स्वीकार करना, उस गलती पर शर्मिंदा होना, और भविष्य में उस गलती को न दोहराने का दृढ़ संकल्प करना। जब इंसान सच्चे दिल से तौबा करता है, तो अल्लाह उसे स्वीकार करता है।
रहमत के नाम: ग़फ़ूर और रहीम
कुरआन में अल्लाह बार-बार अपनी माफ़ी और दया का ज़िक्र करता है। उसके दो सुंदर नाम इस रिश्ते की नींव हैं: अल-ग़फ़ूर (बहुत माफ़ करने वाला) और अर-रहीम (अत्यंत दयालु)। कुरआन में अल्लाह फरमाता है:
"إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا"
(अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला और अत्यंत रहमत करने वाला है । (सूरह अन-निसा 4:23)
यह दर्शाता है कि इंसान चाहे कितनी भी बार गलतियाँ करे, अल्लाह की रहमत उसके गुनाहों पर हमेशा भारी रहती है, बशर्ते वह सच्चे दिल से सुधार की कोशिश करे।
क्षमता से अधिक बोझ नहीं
अल्लाह अपने बंदे पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं देता। कुरआन में फरमाया गया है:
"لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا"
(अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। (सूरह अल-बक़रह 2:286)
इसका मतलब यह है कि हर कठिनाई और आज़माइश जो इंसान को मिलती है, वह उसकी आत्मा को शुद्ध करने और उसे मज़बूत बनाने के लिए होती है। यह कठिनाइयाँ उसके लिए सजा नहीं, बल्कि अल्लाह की ओर से मार्गदर्शन और उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) का हिस्सा हैं। यह विश्वास इंसान को निराशा और तनाव से बचाता है।
इंसान का मकसद और अल्लाह के साथ संबंध
इंसान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अल्लाह की इबादत और नेक काम करना है। यह मकसद ही इंसान और अल्लाह के रिश्ते को दिशा देता है।
कुरआन में अल्लाह सुब्हानहु व तआला इरशाद फ़रमाता है: "وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ"
(मैंने जिन्न और इंसान को सिर्फ इसलिए पैदा किया कि वे मेरी इबादत करें। (सूरह अज़-ज़ारियात 51:56) इबादत (उबूदियत) का मतलब केवल औपचारिक पूजा-पाठ जैसे नमाज़, रोज़ा या ज़कात देना नहीं है। इबादत का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें हर वह नेक काम शामिल है जो अल्लाह की रज़ा (खुशी) के लिए किया जाए:
- मुआमलात (आपसी व्यवहार): सच्चाई, ईमानदारी से व्यापार करना, वादे पूरे करना।
- ख़िद्मत-ए-ख़ल्क़ (समाज सेवा): दूसरों की मदद करना, बड़ों का सम्मान करना, छोटों पर दया करना।
- अख़लाक़ (नैतिकता): अच्छा व्यवहार, विनम्रता और अच्छाई का पालन करना।
इंसान जब अपने जीवन में नेक काम करता है, तो यह अल्लाह की ओर बढ़ने का तरीका है। यही कारण है कि अल्लाह और इंसान का रिश्ता केवल दुआ और तौबा तक सीमित नहीं है; यह हर छोटे-बड़े नेक काम में भी दिखाई देता है।
अल्लाह का प्रेम और बंदे का प्रयास
अल्लाह अपने बंदे से हमेशा प्यार करता है और उसके प्रयासों को देखता है। हदीस-ए-कुद्सी में अल्लाह फरमाता है:
وَمَنْ تَقَرَّبَ إِلَىَّ شِبْرًا تَقَرَّبْتُ إِلَيْهِ ذِرَاعًا وَمَنْ تَقَرَّبَ إِلَىَّ ذِرَاعًا تَقَرَّبْتُ إِلَيْهِ بَاعًا وَإِذَا أَقْبَلَ إِلَىَّ يَمْشِي أَقْبَلْتُ إِلَيْهِ أُهَرْوِلُ
अल्लाह फ़रमाता है कि जो बंदा मेरी तरफ़ एक बालिश्त (थोड़ी सी दूरी) बढ़ता है, मैं उसकी तरफ़ एक हाथ बढ़ जाता हूँ। और जो मेरी तरफ़ एक हाथ बढ़ता है, मैं उसकी तरफ़ कई हाथ बढ़ जाता हूँ। और जब मेरा बंदा मेरी तरफ़ चलकर आता है, तो मैं उसकी तरफ़ तेज़ी से बढ़कर आता हूँ। (सहीह मुस्लिम)
यह हदीस-ए-कुद्सी अल्लाह के असीम प्रेम और उत्साह को दर्शाती है। यह दिखाता है कि इंसान का छोटा सा नेक प्रयास भी अल्लाह की ओर से बड़े समर्थन और रहमत को खींच लाता है। यह प्रेम और करीबी रिश्ता इंसान के प्रयासों का हर पल समर्थन करता है और उसे कभी अकेला महसूस नहीं होने देता।
इस रिश्ते के लाभ और अंतिम लक्ष्य
इंसान के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि दुनिया में अकेले वह कुछ नहीं कर सकता। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, अल्लाह हमेशा उसके साथ है। इस रिश्ते को मज़बूत करने के दो मुख्य लाभ हैं:
- दुनियावी सुकून (आराम): इस बात का यकीन कि हर चीज़ अल्लाह के कंट्रोल में है, इंसान को मानसिक शांति (इत्मीनान) देता है। जब इंसान अल्लाह को याद रखता है, तो अल्लाह उसके दिल को सुकून देता है। कुरआन में है: أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوب (सुनो! अल्लाह की याद से ही दिलों को सुकून मिलता है। (सूरह अर-राद 13:28)।
- आख़िरत की कामयाबी (अंतिम सफलता): इंसान का अंतिम लक्ष्य जन्नत (स्वर्ग) है, जो अल्लाह की रज़ा और क़रीबी हासिल करने से मिलता है। दुनियावी रिश्ते टूट सकते हैं, लेकिन अल्लाह के साथ मज़बूत रिश्ता ही आख़िरत में सफलता की गारंटी है।
निष्कर्ष
अल्लाह और इंसान का रिश्ता भरोसे, प्रेम, रहमत और माफ़ी पर आधारित है। इंसान डगमगाता है, अल्लाह उसे संभालता है। इंसान टूटता है, अल्लाह उसे सहारा देता है। इंसान गलतियाँ करता है, अल्लाह उसे माफ़ करता है। इंसान तौबा करता है, अल्लाह उसे गले लगाता है। इंसान का मकसद नेक काम और इबादत है, और अल्लाह उसे उसकी मेहनत और नेक इरादों के अनुसार सही रास्ता दिखाता है। यही रिश्ता दुनिया और आख़िरत में इंसान की सबसे बड़ी सुरक्षा, शक्ति और सुकून है। अल्लाह का प्यार, उसकी दया, उसकी रहमत और माफ़ी इंसान की जिंदगी का आधार हैं। इंसान चाहे कितनी भी भूलें करे, उसकी तौबा और नेक इरादे उसे अल्लाह के करीब ले जाते हैं। यही रिश्ता हर इंसान के लिए जीवन में मार्गदर्शन और सच्चा सहारा है।
संदर्भ
- सूरह अर-रूम
- सूरह अत-तीन
- सूरह क़ाफ़
- सूरह अल-बक़रह
- सूरह अन-निसा
- सूरह अज़-ज़ारियात
- सूरह अर-राद
- सहीह बुखारी
- सहीह मुस्लिम
- सुनन अत-तिर्मिज़ी
लेखक:
मुहम्मद फैसल
दारुल हुदा पंगानुर,
सेकेंडरी फाइनल ईयर
Disclaimer
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