उज़्बेकिस्तान में इस्लामी सभ्यता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

इमाम बुख़ारी, इमाम तिरमिज़ी और इमाम मातुरीदी की महान विरासत को समर्पित

ताशकंद: उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan) की राजधानी ताशकंद (Tashkent) में पहली बार "इस्लामी सभ्यता: अमन, सहिष्णुता और ज्ञान का रास्ता" (Islamic Civilization: The Path of Peace, Tolerance, and Enlightenment) विषय पर एक बड़े अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम (International Forum) का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम 7 जुलाई 2026 से शुरू हुआ।

इस फ़ोरम का आयोजन इस्लामिक वर्ल्ड एजुकेशनल, साइंटिफ़िक एंड कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन (Islamic World Educational, Scientific and Cultural Organization)  (ICESCO) ने उज़्बेकिस्तान के सेंटर ऑफ़ इस्लामिक सिविलाइज़ेशन (Center of Islamic Civilization) के सहयोग से किया है। यह कार्यक्रम उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव (Shavkat Mirziyoyev) के संरक्षण (Patronage) में आयोजित हो रहा है।

इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के 40 देशों से 300 से अधिक विद्वान (Scholars), मंत्री (Ministers), धार्मिक नेताओं (Religious Leaders), अंतरराष्ट्रीय संगठनों (International Organizations) के प्रमुख और विशेषज्ञ शामिल हुए हैं।

फ़ोरम का उद्देश्य

इस फ़ोरम का मुख्य उद्देश्य दुनिया को यह बताना है कि इस्लामी सभ्यता (Islamic Civilization) ने विज्ञान (Science), संस्कृति (Culture), नैतिकता (Ethics) और मानव सभ्यता (Human Civilization) के विकास में कितना बड़ा योगदान दिया है। साथ ही यह सम्मेलन आपसी संवाद (Dialogue), शोध (Research), ज्ञान (Scholarship) और अंतरराष्ट्रीय सहयोग (International Cooperation) को बढ़ावा देने का भी प्रयास कर रहा है।

इस पाँच दिवसीय कार्यक्रम में चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (International Conferences), दस सामान्य सत्र (General Sessions), पंद्रह पूर्ण अधिवेशन (Plenary Sessions) और छह विशेष पैनल चर्चा (Panel Discussions) आयोजित की जा रही हैं।

इन बैठकों में इस्लामी इतिहास (Islamic History), हदीस अध्ययन (Hadith Studies), इल्मुल कलाम (Theology/Kalām), प्राचीन पांडुलिपियाँ (Manuscripts), पुरातत्त्व (Archaeology), संग्रहालय विज्ञान (Museology), सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage), पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण (Digitisation) और शिक्षा सुधार (Educational Reform) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हो रही है।

तीन महान इमामों की इल्मी विरासत पर विशेष ध्यान

यह फ़ोरम 7 से 11 जुलाई तक ताशकंद (Tashkent), समरकंद (Samarkand) और तेरमिज़ (Termez) में आयोजित किया जा रहा है।

इस दौरान तीन महान इस्लामी विद्वानों की सेवाओं और उनकी इल्मी विरासत (Scholarly Legacy) पर विशेष सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं—

  • इमाम बुख़ारी (Imam al-Bukhārī) पर सम्मेलन – "अल-जामिअ अल-मुस्नद अस-सहीह: एक उम्मत की किताब" (Al-Jāmiʿ al-Musnad al-Ṣaḥīḥ: The Book of a Nation)
  • इमाम मातुरीदी (Imam al-Māturīdī) पर सम्मेलन – "संयम, सहिष्णुता और ज्ञान की बुनियाद" (The Foundation of Moderation, Tolerance and Enlightenment)
  • इमाम तिरमिज़ी (Imam al-Tirmidhī) पर सम्मेलन – "तिरमिज़ी की हदीस परंपरा और आधुनिक शोध" (The Tirmidhi School of Hadith: Scholars' Heritage and Contemporary Research)

तीनों इमामों का परिचय

इमाम मुहम्मद बिन इस्माईल अल-बुख़ारी (Imam al-Bukhārī, 810–870 ई.) इस्लाम के सबसे महान मुहद्दिस (Hadith Scholar) माने जाते हैं। उनकी मशहूर किताब सहीह अल-बुख़ारी (Ṣaḥīḥ al-Bukhārī), क़ुरआन के बाद सबसे विश्वसनीय हदीस संग्रह (Hadith Collection) मानी जाती है।

इमाम अबू ईसा अल-तिरमिज़ी (Imam al-Tirmidhī, 824–892 ई.) हदीस के महान विद्वान थे। उनकी प्रसिद्ध किताब जामिअ अत-तिरमिज़ी (Jāmiʿ al-Tirmidhī) इस्लामी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण हदीस पुस्तकों में शामिल है।

इमाम अबू मंसूर अल-मातुरीदी (Imam Abū Manṣūr al-Māturīdī, निधन 944 ई.) सुन्नी इस्लाम (Sunni Islam) के सबसे बड़े धर्मशास्त्रियों (Theologians) में गिने जाते हैं। उन्होंने मातुरीदी मसलक (Māturīdī School of Theology) की बुनियाद रखी, जो आज भी दुनिया भर के करोड़ों मुसलमानों के अक़ीदे (Creed) की अहम बुनियाद है।

समरकंद में इमाम बुख़ारी पर विशेष सम्मेलन

समरकंद (Samarkand) में "अल-जामिअ अल-मुस्नद अस-सहीह: एक उम्मत की किताब" शीर्षक से एक विशेष अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।

इसका आयोजन इमाम अल-बुख़ारी इंटरनेशनल साइंटिफ़िक रिसर्च सेंटर (Imam al-Bukhari International Scientific Research Centre) के सहयोग से किया गया है।

इस सम्मेलन में यह बताया जा रहा है कि इमाम बुख़ारी की मशहूर किताब ने हदीस के इल्म (Science of Hadith) को किस तरह नई दिशा दी और आज भी पूरी मुस्लिम दुनिया में उसकी क्या अहमियत है।

राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव का संदेश

उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव का संदेश उनके सलाहकार ख़ैरिद्दीन सुल्तानोव (Khayriddin Sultanov) ने सम्मेलन में पढ़कर सुनाया।

राष्ट्रपति ने कहा कि इस्लामी विरासत (Islamic Heritage) को फिर से ज़िंदा करना, उसकी हिफ़ाज़त (Preservation) करना, उस पर शोध करना और उसे पूरी दुनिया तक पहुँचाना उज़्बेकिस्तान की सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राथमिकताओं (National Priorities) में शामिल है।

ICESCO की सराहना

ICESCO के महानिदेशक डॉ. सलीम एम. अल-मालिक (Dr. Salim M. AlMalik) ने कहा कि उज़्बेकिस्तान ने इस्लामी और मानव सभ्यता (Islamic and Human Civilization) को महान विद्वान दिए हैं। उन्होंने इमाम बुख़ारी, इमाम तिरमिज़ी, इमाम मातुरीदी, अल-बिरूनी (Al-Bīrūnī), अल-ख़्वारिज़्मी (Al-Khwārizmī) और इब्न सीना (Ibn Sīnā) जैसे महान वैज्ञानिकों और विद्वानों की सेवाओं को याद किया।

उन्होंने कहा कि सेंटर ऑफ़ इस्लामिक सिविलाइज़ेशन (Center of Islamic Civilization) आज दुनिया का एक महत्वपूर्ण ज्ञान और संस्कृति केंद्र (Knowledge and Cultural Institution) बनता जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि यहाँ ICESCO सेंटर फ़ॉर कैलीग्राफ़ी एंड मैन्युस्क्रिप्ट्स (ICESCO Centre for Calligraphy and Manuscripts) की स्थापना से इस्लामी पांडुलिपियों (Islamic Manuscripts) की सुरक्षा, शोध और उन्हें दुनिया के सामने पेश करने का काम और मज़बूत होगा।

दुनिया के लिए एक मिसाल

फ़ोरम शुरू होने से पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ़्रेंस (Press Conference) में डॉ. सलीम अल-मालिक ने कहा कि यह कार्यक्रम इस बात का सबूत है कि उज़्बेकिस्तान आज इस्लामी सभ्यता और उसके महान विद्वानों की सेवाओं को दुनिया के सामने लाने में एक वैश्विक मार्गदर्शक (Global Beacon) की भूमिका निभा रहा है।

यह फ़ोरम यह भी दिखाता है कि उज़्बेकिस्तान पिछले कई वर्षों से अपनी समृद्ध इस्लामी बौद्धिक विरासत (Islamic Intellectual Heritage) को दोबारा ज़िंदा करने के लिए लगातार काम कर रहा है। ऐतिहासिक इमारतों (Historic Monuments) की मरम्मत, दुर्लभ पांडुलिपियों (Rare Manuscripts) का संरक्षण और डिजिटलीकरण (Digitisation), तथा सेंटर ऑफ़ इस्लामिक सिविलाइज़ेशन, इमाम बुख़ारी इंटरनेशनल साइंटिफ़िक रिसर्च सेंटर, इमाम मातुरीदी इंटरनेशनल साइंटिफ़िक रिसर्च सेंटर और इमाम तिरमिज़ी इंटरनेशनल साइंटिफ़िक रिसर्च सेंटर जैसे संस्थानों की स्थापना इसी दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण क़दम हैं।

यह सम्मेलन केवल तीन महान इमामों को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया को यह संदेश भी देता है कि इस्लामी सभ्यता हमेशा अमन (Peace), सहिष्णुता (Tolerance), ज्ञान (Knowledge) और इंसानियत (Humanity) की हिमायती रही है। यही मूल्य आज भी पूरी दुनिया के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने सदियों पहले थे।

By: Web Desk

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