हिजरत-ए-नबवी ﷺ : इस्लामी इतिहास का महान मोड़ और हिजरी कैलेंडर की शुरुआत
मक्का का संघर्ष, अत्याचारों का दौर और हिजरत की पृष्ठभूमि
जब हम इस्लाम के इतिहास का अध्ययन करते हैं तो एक घटना ऐसी दिखाई देती है जिसने पूरे इतिहास की दिशा बदल दी। यह घटना है "हिजरत" (Migration)। सामान्य रूप से लोग हिजरत को मक्का से मदीना की यात्रा समझते हैं, लेकिन वास्तव में यह केवल एक यात्रा नहीं थी। यह एक विचार का संघर्ष था, एक आस्था की रक्षा थी, एक नए समाज की स्थापना की भूमिका थी और अल्लाह पर पूर्ण भरोसे का महान उदाहरण था।
हिजरत को समझने के लिए हमें उस वातावरण (Environment) को समझना होगा जिसमें यह घटना घटित हुई। यदि हम केवल यह पढ़ लें कि रसूलुल्लाह ﷺ मक्का से मदीना चले गए, तो हम हिजरत के असली अहमियत को कभी नहीं समझ पाएँगे। हिजरत की कहानी उस रात से नहीं शुरू होती जब नबी ﷺ अपने घर से निकले, बल्कि उससे लगभग तेरह वर्ष पहले शुरू होती है, जब ग़ार-ए-हिरा में पहली वह्य नाज़िल हुई थी।
इस्लाम से पहले का अरब : अज्ञानता का युग
इस्लाम से पहले का अरब "जाहिलियत" अर्थात अज्ञानता (Ignorance) का युग कहलाता है। यह केवल अशिक्षा का नाम नहीं था, बल्कि नैतिक (moral) और आध्यात्मिक (spritual) गिरावट की हालत थी। लोग मूर्तियों की पूजा (idol worship) करते थे। काबा, जिसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने तौहीद के केंद्र के रूप में बनाया था, सैकड़ों मूर्तियों से भर चुका था। इतिहासकारों के अनुसार काबा में लगभग 360 मूर्तियाँ रखी हुई थीं।
समाज कबीलाई घमंड (tribal arrogance) में बँटा हुआ था। ताकतवर कमजोरों का शोषण करते थे। गरीबों का कोई सहारा नहीं था। महिलाओं की स्थिति बहुत बुरी थी। कहीं-कहीं बेटियों को जीवित दफन कर दिया जाता था। शराब, जुआ, सूद और बदला की भावना समाज में गहराई तक फैली हुई थी।
ऐसे समय में अल्लाह ने मानवता पर महान कृपा करते हुए हज़रत मुहम्मद ﷺ को अपना अंतिम रसूल बनाकर भेजा।
नुबुव्वत का एलान और सत्य का संदेश
चालीस वर्ष की आयु में, जब रसूलुल्लाह ﷺ ग़ार-ए-हिरा में चिंतन और इबादत में समय बिताया करते थे, तब अल्लाह की ओर से पहली वह्य (क़ुरआन) नाज़िल हुई।
और ये थीं पहली पांच आयतें, अल्लाह तआला फ़रमाता है:
﴿اِقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ اِقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ﴾
"पढ़ो अपने उस पालनहार के नाम से जिसने पैदा किया। उसने इंसान को रक्त-पिंड से पैदा किया। पढ़ो, और तुम्हारा पालनहार सबसे अधिक कृपालु है।" (सूरह अल-अलक़ : 1–3)
यहीं से नुबुव्वत का मिशन शुरू हुआ। आपने लोगों को एक अल्लाह की इबादत, न्याय, करुणा, मानव समानता और नैतिक जीवन का संदेश देना शुरू किया।
सबसे पहले आपकी पत्नी हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इस्लाम स्वीकार किया। फिर हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे महान लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया।
शुरुआत में दावत का कार्य सीमित रूप से चलता रहा, लेकिन जब अल्लाह का आदेश आया कि खुलकर लोगों को संदेश पहुँचाया जाए, तब मक्का के सरदारों की चिंता बढ़ने लगी।
कुरैश क्यों डर गए?
आज यह प्रश्न उठ सकता है कि यदि रसूलुल्लाह ﷺ केवल धर्म का संदेश दे रहे थे तो कुरैश इतने भयभीत क्यों हुए?
वास्तव में इस्लाम केवल पूजा-पद्धति बदलने का संदेश नहीं था। इस्लाम कहता था कि सभी मनुष्य अल्लाह के सामने बराबर हैं। अमीर और गरीब में कोई श्रेष्ठता नहीं। किसी अरब को किसी गैर-अरब पर कोई जन्मजात श्रेष्ठता नहीं। अत्याचार छोड़ो, सूद छोड़ो, मूर्तिपूजा छोड़ो, अन्याय छोड़ो।
यह संदेश सीधे उस व्यवस्था को चुनौती दे रहा था जिसके आधार पर कुरैश की शक्ति कायम थी। इसलिए उन्होंने इस्लाम का विरोध शुरू कर दिया।
पहले उपहास किया गया। फिर अफवाहें फैलायी गईं। किसी ने कहा कि मुहम्मद ﷺ कवि (poet) हैं, किसी ने कहा कि जादूगर (magician) हैं, किसी ने कहा कि पागल हैं। लेकिन जब लोग इन आरोपों पर विश्वास नहीं करने लगे तो अत्याचारों (persecution and atrocity) का दौर शुरू हो गया।
अत्याचारों का काला दौर (A dark era of atrocities)
मक्का में मुसलमानों पर ऐसे अत्याचार किए गए जिनकी कल्पना करना भी कठिन है।
हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु को तपती हुई रेत पर लिटाया जाता। उनके सीने पर भारी पत्थर रख दिया जाता। उनसे कहा जाता कि मुहम्मद ﷺ का इनकार करो।
लेकिन उनकी ज़बान पर केवल एक ही शब्द रहता:
"أَحَدٌ أَحَدٌ"
"अल्लाह एक है, अल्लाह एक है।"
हज़रत यासिर रज़ियल्लाहु अन्हु और उनकी पत्नी हज़रत सुमय्या रज़ियल्लाहु अन्हा को सख्त तकलीफें दी गईं। अंततः हज़रत सुमय्या रज़ियल्लाहु अन्हा इस्लाम की पहली शहीदा बनीं।
रसूलुल्लाह ﷺ इन सब अत्याचारों को देखते और अपने साथियों को सब्र की शिक्षा देते।
सब्र की शिक्षा
एक अवसर पर रसूलुल्लाह ﷺ ने पीड़ित मुसलमानों को संबोधित करते हुए फ़रमाया:
صَبْرًا آلَ يَاسِرٍ، فَإِنَّ مَوْعِدَكُمُ الْجَنَّةُ
"ऐ यासिर के परिवार! सब्र करो, क्योंकि तुम्हारा वादा जन्नत है।"
यह केवल तसल्ली नहीं थी। यह विश्वास का वह चिराग था जिसने मुसलमानों को कठिन से कठिन हालातों में भी स्थिर और क़ायम रखा।
तीन वर्षों की घेराबंदी (The Three-Year Siege)
जब कुरैश ने देखा कि अत्याचारों के बावजूद मुसलमान अपने ईमान से पीछे नहीं हट रहे हैं, तो उन्होंने सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार (economic boycott) का निर्णय लिया।
एक लिखित समझौता तैयार किया गया जिसमें यह तय किया गया कि बनू हाशिम और मुसलमानों से कोई व्यापार नहीं करेगा, उनसे विवाह नहीं करेगा और उनसे किसी प्रकार का सामाजिक संबंध नहीं रखेगा।
इसके नतीजे में मुसलमानों और बनू हाशिम को मक्का के निकट एक घाटी, शिब-ए-अबी तालिब, में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
लगभग तीन वर्षों तक यह घेराबंदी जारी रही।
भोजन की इतनी कमी हो गई कि लोगों को पेड़ों के पत्ते खाने पड़े। बच्चों के रोने की आवाज़ें रात के अंधेरे में दूर तक सुनाई देती थीं।
करीब तीन साल बीतने के बाद, क़ुरैश के कुछ बड़े सरदारों ने इस बहिष्कार का विरोध करना शुरू कर दिया।
उनका कहना था कि:
- यह समझौता ज़ालिमाना और नाइंसाफ़ी पर आधारित था।
- बेगुनाह औरतें और बच्चे तकलीफ़ झेल रहे थे।
- क़बाइली रिवायतों की ख़िलाफ़वर्ज़ी हो रही थी।
इसी दौरान, नबी ﷺ ने अबू तालिब को बताया कि अल्लाह ने उन्हें खबर दी है कि कीड़ों ने बहिष्कार वाले दस्तावेज़ को खा लिया है और उसमें सिर्फ़ अल्लाह के नाम से जुड़े शब्द ही बाकी बचे हैं।
जब उस दस्तावेज़ की जाँच की गई, तो बताया जाता है कि वह वैसा ही खराब मिला जैसा नबी ﷺ ने बताया था।
इस घटना से बहिष्कार के खिलाफ़ चल रही मुहिम और मज़बूत हो गई, और आखिरकार उस समझौते को सबके सामने फाड़ दिया गया।
लेकिन इन कठिनाइयों के बावजूद किसी ने अपना ईमान नहीं छोड़ा। यह इस्लाम के इतिहास में त्याग और धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक थी।
आमुल-हुज़्न : दुख का वर्ष
घेराबंदी समाप्त होने के कुछ समय बाद रसूलुल्लाह ﷺ के जीवन में दो ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने आपको गहरे दुख में डाल दिया।
सबसे पहले आपके चाचा अबू तालिब का निधन हुआ। अगरचे उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था, लेकिन जीवन भर उन्होंने आपकी रक्षा की थी।
इसके कुछ ही समय बाद आपकी प्रिय पत्नी हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा का भी इंतिकाल हो गया।
हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा केवल पत्नी ही नहीं थीं, बल्कि नुबुव्वत के प्रारंभिक वर्षों की सबसे बड़ी समर्थक भी थीं। जब पूरी दुनिया विरोध कर रही थी, तब वे आपके साथ खड़ी थीं।
इन दोनों महान सहारों के चले जाने के कारण इस वर्ष को "आमुल-हुज़्न" अर्थात "दुख का वर्ष" कहा जाता है।
अब मक्का में विरोधियों का साहस और बढ़ गया।
ताइफ़ : जब पत्थरों के जवाब में दुआ दी गई
मक्का की परिस्थितियाँ दिन-प्रतिदिन कठिन होती जा रही थीं। ऐसे समय में रसूलुल्लाह ﷺ ने ताइफ़ जाने का निर्णय लिया।
आपको आशा थी कि शायद वहाँ के लोग इस्लाम के संदेश को स्वीकार कर लें। लेकिन वहाँ जो हुआ, वह इतिहास का बहुत दर्दनाक चैप्टर है।
ताइफ़ के सरदारों ने न केवल आपका संदेश अस्वीकार किया, बल्कि शहर के लड़कों और गुंडों को आपके पीछे लगा दिया। लोगों ने पत्थर मारे। आपका शरीर लहूलुहान हो गया। जूते खून से भर गए।
उस समय यदि कोई दूसरा व्यक्ति होता तो शायद बददुआ करता, लेकिन रहमतुल्लिल आलमीन ﷺ ने ऐसा नहीं किया।
जब फ़रिश्ते ने कहा कि यदि आप चाहें तो इन लोगों पर पहाड़ों को कुचल दिया जाए, तो आपने उत्तर दिया:
بَلْ أَرْجُو أَنْ يُخْرِجَ اللَّهُ مِنْ أَصْلَابِهِمْ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ وَحْدَهُ لَا يُشْرِكُ بِهِ شَيْئًا
"नहीं, बल्कि मुझे उम्मीद है कि अल्लाह उनकी नस्लों से ऐसे लोग पैदा करेगा जो सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करेंगे और उसके साथ किसी को शरीक नहीं ठहराएँगे।"
यही वह करुणा थी जिसने आगे चलकर अरब के दिलों को जीत लिया।
मदीना से आने वाली रोशनी
जब मक्का के दरवाज़े बंद होते दिखाई दे रहे थे, उसी समय अल्लाह ने एक नया रास्ता तैयार कर दिया था।
यसरिब (मदीना) के कुछ लोग हज के अवसर पर मक्का आए। उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ की बातें सुनीं और इस्लाम स्वीकार कर लिया।
उनमें से कई लोग पहले से यहूदियों से अंतिम नबी के आने की भविष्यवाणियाँ (prediction) सुन चुके थे। इसलिए उन्होंने सत्य को पहचान लिया।
अगले वर्ष वे फिर आए। फिर उससे अगले वर्ष और अधिक लोग आए। यहीं बैअत-ए-अक़बा की ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं।
मक्का में अत्याचार अपने चरम पर पहुँच चुके थे और मदीना में आशा का नया सूरज उग रहा था। बहुत जल्द वह समय आने वाला था जब अल्लाह के रसूल ﷺ अपने साथियों के साथ उस नगर की ओर प्रस्थान (migration) करेंगे जहाँ इस्लाम को पहली बार आज़ाद माहौल मिलेगा और जहाँ से इस्लामी सभ्यता (Islamic civilization) की वास्तविक शुरुआत होगी।
बैअत-ए-अक़बा : हिजरत की वास्तविक भूमिका
यसरिब, जो बाद में "मदीनतुन-नबी" अर्थात नबी का नगर कहलाया, लंबे समय से आंतरिक संघर्षों का शिकार था। औस और ख़ज़राज नामक दो प्रमुख कबीलों के बीच वर्षों तक युद्ध होते रहे थे। लोग शांति चाहते थे और किसी ऐसे नेतृत्व की तलाश में थे जो उन्हें एकजुट कर सके।
हज के अवसर पर मदीना से आए कुछ लोगों ने रसूलुल्लाह ﷺ की बातें सुनीं। उन्होंने कुरआन की आयतें सुनीं और तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण संदेश नहीं है। उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और वापस जाकर अपने नगर में इस संदेश का प्रचार किया।
अगले वर्ष बारह लोग आए और उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ के हाथ पर बैअत की। इसे इतिहास में "पहली बैअत-ए-अक़बा" कहा जाता है।
फिर अगले वर्ष तिहत्तर पुरुष और दो महिलाएँ मदीना से आए। उन्होंने रात के अंधेरे में अक़बा नामक स्थान पर रसूलुल्लाह ﷺ से मुलाक़ात की और वचन दिया कि वे आपकी उसी प्रकार रक्षा करेंगे जैसे अपने परिवार और बच्चों की रक्षा करते हैं। इसे इतिहास में "दूसरी बैअत-ए-अक़बा" कहा जाता है।
यही वह क्षण था जब मदीना इस्लाम का नया केंद्र बनने के लिए तैयार हो गया।
हिजरत की अनुमति
जब मदीना में हालात मुनासिब हो गईं तो अल्लाह की ओर से मुसलमानों को हिजरत की इजाज़त मिल गई।
एक-एक करके मुसलमान मक्का छोड़कर मदीना जाने लगे।
किसी ने अपना घर छोड़ा, किसी ने व्यापार छोड़ा, किसी ने बाग़ छोड़े, किसी ने धन-दौलत छोड़ी। लेकिन किसी ने अपना ईमान नहीं छोड़ा।
यही लोग आगे चलकर "मुहाजिर" (Emigrant) कहलाए। "मुहाजिर" का अर्थ है वह व्यक्ति जिसने अल्लाह और उसके दीन की खातिर अपना घर छोड़ दिया हो।
कुरैश यह देखकर चिंतित हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि यदि मुसलमान मदीना में संगठित हो गए तो उनका प्रभाव और शक्ति बढ़ जाएगी।
इसलिए उन्होंने अंतिम और सबसे खतरनाक योजना बनाई।
हिजरत की रात : रसूलुल्लाह ﷺ की हत्या की साज़िश
कुरैश के नेताओं ने दारुन्नदवा में बैठक की।
बहुत विचार-विमर्श और सोच व फिक्र के बाद यह निर्णय लिया गया कि हर बड़े कबीले से एक-एक युवक चुना जाए और वे सब मिलकर एक ही रात में मुहम्मद ﷺ पर हमला करें।
इस योजना का उद्देश्य यह था कि यदि हत्या हो जाए तो बनू हाशिम किसी एक कबीले से बदला न ले सकें।
लेकिन अल्लाह की योजना सबसे ऊपर थी।
कुरआन कहता है:
﴿وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللّٰهُ ۖ وَاللّٰهُ خَيْرُ الْمَاكِرِينَ﴾
"वे अपनी योजनाएँ बना रहे थे और अल्लाह अपनी योजना बना रहा था, और अल्लाह सबसे उत्तम योजना बनाने वाला है।"
(सूरह आल-इमरान: 54)
अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ को इस साज़िश की सूचना दे दी।अल्लाह के आदेश से रसूलुल्लाह ﷺ ने हिजरत का निर्णय किया।
उस रात आपने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से कहा कि वे आपके बिस्तर पर सो जाएँ। यह बहुत खतरे से भरा काम था, क्योंकि घर को चारों ओर से घेरा जा चुका था और हमलावर किसी भी समय हमला कर सकते थे।
लेकिन हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने बिना किसी झिझक के यह जिम्मेदारी स्वीकार कर ली। यह इस्लामी इतिहास में साहस और निष्ठा का अद्भुत उदाहरण है।
रिवायतों में आता है कि जब रसूलुल्लाह ﷺ घर से बाहर निकले तो आपने सूरह यासीन की शुरुआती आयतें पढ़ीं:
﴿يٰسٓ وَالْقُرْآنِ الْحَكِيمِ إِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِينَ﴾
और फिर यह आयत पढ़ी:
﴿وَجَعَلْنَا مِنۢ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ سَدًّا وَمِنْ خَلْفِهِمْ سَدًّا فَأَغْشَيْنَاهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ﴾
"और हमने उनके आगे एक दीवार बना दी और उनके पीछे एक दीवार बना दी, फिर हमने उन्हें ढाँप दिया, इसलिए वे देख नहीं सकते।"
(सूरह यासीन: 9)
कई सीरत की पुस्तकों में वर्णन मिलता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मुट्ठी भर मिट्टी ली और घेराव करने वालों की ओर डालते हुए अल्लाह के भरोसे घर से निकल गए। अल्लाह ने उनकी आँखों पर ऐसा पर्दा डाल दिया कि वे आपको देख न सके, जबकि आप उनके बीच से निकल गए।
सुबह जब हमलावरों ने घर में प्रवेश किया तो उन्होंने देखा कि बिस्तर पर हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु लेटे हुए हैं। तब उन्हें पता चला कि मुहम्मद ﷺ उनके घेरे से निकल चुके हैं।
यह घटना हमें सिखाती है कि हिजरत केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि अल्लाह की विशेष सहायता, उत्कृष्ट योजना और पूर्ण तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसे) का अद्भुत उदाहरण थी। रसूलुल्लाह ﷺ ने सभी आवश्यक सावधानियाँ भी अपनाईं और साथ ही अपने रब पर पूरा भरोसा भी रखा।
अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु: सफ़र के साथी
रसूलुल्लाह ﷺ सीधे मदीना की ओर नहीं गए। सबसे पहले आप अपने सबसे करीबी साथी हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के घर पहुँचे।
जब अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु को पता चला कि उन्हें इस ऐतिहासिक यात्रा में साथ रहने का सम्मान मिलने वाला है, तो वे खुशी से रो पड़े।
वर्षों से वे इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।
दोनों ने यात्रा की तैयारी की और दक्षिण (south) दिशा में स्थित ग़ार-ए-सौर की ओर प्रस्थान किया, जबकि मदीना उत्तर (north)दिशा में था। यह एक रणनीतिक निर्णय था ताकि पीछा करने वालों को भ्रमित किया जा सके।
ग़ार-ए-सौर : तवक्कुल का महान पाठ
रसूलुल्लाह ﷺ और हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु तीन दिन तक ग़ार-ए-सौर में रहे।
इसी दौरान हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के पुत्र अब्दुल्लाह दिन में मक्का में लोगों की गतिविधियों की जानकारी लेते और रात में गुफा तक पहुँचाते।
उनकी बेटी हज़रत अस्मा रज़ियल्लाहु अन्हा भोजन पहुँचाती थीं। इसी कारण उन्हें "ज़ातुन्निताकैन" यानि "दो कमरबंद वाली" कहा गया, क्योंकि उन्होंने अपना कमरबंद फाड़कर खाने का सामान बाँधा था।
जब कुरैश के खोजी गुफा के मुहाने तक पहुँच गए तो हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु चिंतित हो गए।
उन्होंने कहा:
"यदि इनमें से कोई अपने पैरों के नीचे देख ले तो हमें देख लेगा।"
तब रसूलुल्लाह ﷺ ने वह ऐतिहासिक वाक्य कहा जो आज भी पूरी उम्मत को आशा देता है:
﴿لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللّٰهَ مَعَنَا﴾
"ग़म न करो, बे शक अल्लाह हमारे साथ है।"
(सूरह अत-तौबा : 40)
यह वाक्य केवल उस गुफा के लिए नहीं था; यह हर युग के मुसलमानों के लिए संदेश है कि जब इंसान अल्लाह पर भरोसा करता है, तो वह कभी अकेला नहीं होता।
सुराक़ा बिन मालिक की घटना
जब कुरैश ने रसूलुल्लाह ﷺ को पकड़ने वाले के लिए बड़ा इनाम घोषित किया, तो कई लोग तलाश में निकल पड़े।
उनमें सुराक़ा बिन मालिक भी थे।
उन्होंने दूर से रसूलुल्लाह ﷺ और अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु को देख लिया और तेज़ी से पीछा करने लगे।
लेकिन जैसे ही वे निकट पहुँचे, उनका घोड़ा बार-बार जमीन में धँसने लगा।
उन्होंने कई बार प्रयास किया, लेकिन हर बार असफल रहे।
तब उन्हें समझ में आ गया कि यह अल्लाह की विशेष सुरक्षा का मामला है।
उन्होंने आगे बढ़ने के बजाय सुरक्षा का वचन लिया और वापस लौट गए।
बाद में यही सुराक़ा इस्लाम स्वीकार करने वालों में शामिल हुए।
क़ुबा में आमद
लंबी और कठिन यात्रा के बाद रसूलुल्लाह ﷺ मदीना के निकट स्थित क़ुबा नामक बस्ती में पहुँचे।
यहाँ आपने कुछ दिन ठहरकर इस्लाम की पहली मस्जिद की स्थापना की।
कुरआन में इसकी प्रशंसा करते हुए कहा गया:
﴿لَمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَىٰ مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَنْ تَقُومَ فِيهِ﴾
"वह मस्जिद जो पहले दिन से तक़वा पर स्थापित की गई, इस बात की अधिक हकदार है कि आप उसमें खड़े हों।"
(सूरह अत-तौबा: 108)
मदीना में ऐतिहासिक स्वागत
मदीना के लोग कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहे थे।
हर सुबह वे शहर के बाहर निकल जाते और दोपहर की गर्मी तक इंतजार करते। जब रसूलुल्लाह ﷺ नहीं आते तो वापस लौट जाते।
फिर वह ऐतिहासिक दिन आया जिसका उन्हें इंतजार था। दूर से लोगों ने देखा कि दो मुसाफ़िर आ रहे हैं। समाचार पूरे नगर में फैल गया।
"रसूलुल्लाह आ गए! रसूलुल्लाह आ गए!"
बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग और युवा सब रास्तों पर निकल आए। लोग खुशी से रो रहे थे। घर की छतें लोगों से भर गईं। इतिहासकार लिखते हैं कि मदीना ने अपने इतिहास में ऐसा आनंद पहले कभी नहीं देखा था।
कुछ रिवायतों में मशहूर स्वागत-गीत "طَلَعَ الْبَدْرُ عَلَيْنَا" (हम पर पूर्णिमा का चाँद उदित हो गया) का भी उल्लेख मिलता है, जो लोगों की खुशी और प्रेम को व्यक्त करता है।
हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु की मेज़बानी और मस्जिद-ए-नबवी की नींव
जब रसूलुल्लाह ﷺ मदीना पहुँचे तो लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था। हर व्यक्ति चाहता था कि अल्लाह के रसूल ﷺ उसके घर में ठहरें। अंसार के लोग आपकी ऊँटनी की लगाम पकड़कर आग्रह करते थे कि आप उनके घर चलें। प्रत्येक व्यक्ति के दिल में यह इच्छा थी कि उसे रसूलुल्लाह ﷺ की मेज़बानी का सम्मान प्राप्त हो।
लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
دَعُوهَا فَإِنَّهَا مَأْمُورَةٌ
"ऊँटनी को छोड़ दो, क्योंकि वह अल्लाह के आदेश के अधीन है।"
इसके बाद ऊँटनी जिसका नाम क़सवा था आगे बढ़ती रही। लोग उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। कुछ दूर जाकर वह एक स्थान पर बैठ गई। फिर थोड़ी देर बाद उठी और कुछ कदम आगे बढ़ी। उसके बाद वह वापस उसी स्थान पर आई और फिर बैठ गई। तब रसूलुल्लाह ﷺ ने समझ लिया कि यही वह जगह है जिसे अल्लाह ने चुना है।
वह ज़मीन दो अनाथ बच्चों, सहल और सुहैल, की थी। बाद में उचित मूल्य देकर वह भूमि खरीद ली गई। यही वह स्थान था जहाँ आगे चलकर मस्जिद-ए-नबवी का निर्माण हुआ, जो आज दुनिया की सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण मस्जिदों में से एक है।
जब ऊँटनी उस स्थान पर बैठी, तब सबसे निकट का घर हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु का था। उन्होंने तुरंत रसूलुल्लाह ﷺ का सामान उठाया और अपने घर ले गए। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
الْمَرْءُ مَعَ رَحْلِهِ
"आदमी वहीं ठहरता है जहाँ उसका सामान हो।"
इस प्रकार हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु को यह महान सौभाग्य प्राप्त हुआ कि रसूलुल्लाह ﷺ उनके घर में मेहमान बने।
शुरू में रसूलुल्लाह ﷺ घर की निचली मंज़िल में ठहरे और अबू अय्यूब रज़ियल्लाहु अन्हु तथा उनकी पत्नी ऊपर की मंज़िल पर रहते थे। लेकिन उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती थी कि वे ऊपर रहें और अल्लाह के रसूल ﷺ नीचे। वे अत्यंत आदर और प्रेम के कारण धीरे-धीरे चलते थे ताकि ऊपर की आवाज़ नीचे न जाए।
एक रात पानी का घड़ा गिर गया। अबू अय्यूब रज़ियल्लाहु अन्हु और उनकी पत्नी घबरा गए कि कहीं पानी नीचे टपककर रसूलुल्लाह ﷺ को कष्ट न पहुँचा दे। उन्होंने तुरंत अपने कंबल से पानी सुखाया। इसके बाद उन्होंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि रसूलुल्लाह ﷺ ऊपर की मंज़िल पर आ जाएँ और वे स्वयं नीचे रहने लगें। रसूलुल्लाह ﷺ ने उनकी भावना का सम्मान किया और बाद में ऊपर की मंज़िल पर रहने लगे।
लगभग सात महीने तक रसूलुल्लाह ﷺ हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु के घर में रहे। इसी दौरान मस्जिद-ए-नबवी और आपके रहने के कमरों का निर्माण पूरा हुआ।
यह घटना अंसार के प्रेम, सम्मान और मेहमाननवाज़ी का एक महान उदाहरण है। इससे यह भी पता चलता है कि मदीना के लोगों ने केवल रसूलुल्लाह ﷺ का स्वागत ही नहीं किया था, बल्कि उन्हें अपने दिलों में सबसे ऊँचा स्थान दिया था।
मुहाजिर और अंसार : इतिहास का अनोखा भाईचारा
हिजरत के बाद एक नई चुनौती सामने आई। मक्का से आने वाले मुसलमान सब कुछ छोड़कर आए थे। उनके पास घर नहीं थे, व्यापार नहीं था, संपत्ति नहीं थी।
लेकिन मदीना के मुसलमानों ने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जिसकी मिसाल इतिहास में दुर्लभ है। मदीना के मुसलमान "अंसार" कहलाए, यानि सहायता करने वाले।
रसूलुल्लाह ﷺ ने मुहाजिरों और अंसार के बीच भाईचारा स्थापित किया। अंसार ने अपने घर खोले, अपने बाग़ बाँटे, अपनी संपत्ति साझा की और अपने मुहाजिर भाइयों को परिवार का हिस्सा बना लिया।
कुरआन उनकी प्रशंसा करते हुए कहता है:
﴿وَيُؤْثِرُونَ عَلَى أَنْفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ﴾
"वे दूसरों को अपने ऊपर प्राथमिकता देते हैं, चाहे स्वयं उन्हें आवश्यकता ही क्यों न हो।"
(सूरह अल-हश्र : 9)
यही भाईचारा आगे चलकर इस्लामी समाज की सबसे बड़ी शक्ति बना।
मदीना अब केवल एक नगर नहीं रहा था। वह एक नई उम्मत का केंद्र बन चुका था। लेकिन हिजरत का महत्व केवल यहीं तक सीमित नहीं था। अब एक ऐसे समाज की स्थापना होने वाली थी जो न्याय (justice), समानता (equality), धार्मिक स्वतंत्रता (religious freedom) और नैतिक मूल्यों (moral values) पर आधारित था। यही वह चरण है जिसने आगे चलकर इस्लामी सभ्यता की नींव रखी और जिसकी स्मृति में बाद में हिजरी कैलेंडर की शुरुआत की गई।
मदीना में इस्लामी समाज की स्थापना, हिजरी कैलेंडर की शुरुआत और हिजरत का शाश्वत संदेश
जब रसूलुल्लाह ﷺ मदीना पहुँचे तो हिजरत की यात्रा समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि वास्तव में एक नए युग की शुरुआत हुई थी। मक्का में मुसलमान एक उत्पीड़ित और बिखरा हुआ समूह थे, लेकिन मदीना में उन्हें पहली बार ऐसा वातावरण मिला जहाँ वे अपने दीन के अनुसार जीवन जी सकते थे। हिजरत का उद्देश्य केवल सुरक्षा प्राप्त करना नहीं था; इसका उद्देश्य एक ऐसे समाज की स्थापना करना था जो अल्लाह की हिदायत, न्याय, भाईचारे (brotherhood) और नैतिक मूल्यों पर आधारित हो।
मदीना में पहुँचने के बाद सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कार्य मस्जिद-ए-नबवी का निर्माण था। यह केवल नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं थी। आधुनिक दृष्टि से देखें तो यह एक साथ मस्जिद, विद्यालय (school), न्यायालय (court), संसद (assembly), प्रशिक्षण केंद्र (training center) और सामाजिक संस्थान का कार्य करती थी। यहीं कुरआन की शिक्षा दी जाती थी, यहीं नए मुसलमानों को दीन सिखाया जाता था, यहीं सामाजिक समस्याओं का समाधान किया जाता था और यहीं से पूरे समाज का मार्गदर्शन होता था।
रसूलुल्लाह ﷺ स्वयं निर्माण कार्य में भाग लेते थे। सहाबा मिट्टी और पत्थर उठाते थे और नबी ﷺ भी उनके साथ काम करते थे। यह इस बात का प्रमाण था कि इस्लाम में नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना भी है।
मदीना : विविध समुदायों का नगर
मदीना केवल मुसलमानों का नगर नहीं था। वहाँ विभिन्न कबीलों के लोग रहते थे। औस और ख़ज़राज के अलावा कई यहूदी कबीले भी वहाँ बसे हुए थे। यदि किसी नगर में इतने विभिन्न समूह हों, तो संघर्ष की संभावना स्वाभाविक होती है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इस चुनौती का समाधान अत्यंत बुद्धिमत्ता (wisdom) के साथ किया। आपने एक सामाजिक और राजनीतिक समझौता (socio-political treaty) तैयार कराया जिसे इतिहास में "मिसाक़-ए-मदीना" या "मदीना चार्टर" (Charter of Madeena) कहा जाता है।
कई इतिहासकार इसे विश्व इतिहास के प्रारम्भिक लिखित संविधानों में से एक मानते हैं।
इस समझौते में यह निर्धारित किया गया कि:
- सभी समुदाय अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
- नगर की सुरक्षा सबकी साझा जिम्मेदारी होगी।
- किसी पर अत्याचार नहीं किया जाएगा।
- न्याय निष्पक्ष रूप से किया जाएगा।
- बाहरी शत्रु के विरुद्ध सभी मिलकर नगर की रक्षा करेंगे।
यह व्यवस्था उस समय की दुनिया के लिए अत्यंत प्रगतिशील थी। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम केवल इबादत का धर्म नहीं, बल्कि एक संतुलित सामाजिक व्यवस्था भी प्रस्तुत करता है।
मुहाजिर और अंसार : एक आदर्श समाज की नींव
मदीना में इस्लामी समाज की स्थापना का सबसे महत्वपूर्ण आधार मुहाजिर और अंसार का भाईचारा था।
मुहाजिर वे लोग थे जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की खातिर अपना सब कुछ छोड़ दिया था। वे अपने घर, व्यापार, संपत्ति और कई बार अपने रिश्तेदारों तक को पीछे छोड़ आए थे।
दूसरी ओर अंसार थे, जिन्होंने उनका स्वागत किया और अपने दिलों के दरवाज़े खोल दिए।
इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ अंसार ने अपने मुहाजिर भाइयों को अपनी आधी संपत्ति देने की पेशकश की। लेकिन मुहाजिरों ने भी मेहनत और आत्मनिर्भरता का मार्ग चुना। वे केवल सहायता लेने वाले नहीं थे, बल्कि समाज के निर्माण में सक्रिय भागीदार बने।
इस प्रकार एक ऐसा समाज अस्तित्व में आया जिसमें त्याग, सहयोग और भाईचारे का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
हिजरत : केवल स्थान परिवर्तन नहीं
बहुत से लोग हिजरत को केवल एक ऐतिहासिक यात्रा मानते हैं, लेकिन वास्तव में हिजरत एक विचार है।
मक्का में मुसलमानों को यह सिखाया गया कि कठिन परिस्थितियों में भी ईमान पर अडिग रहना चाहिए। मदीना में उन्हें यह सिखाया गया कि जब अवसर मिले तो न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करनी चाहिए।
इस दृष्टि से हिजरत केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि एक मानसिक, सामाजिक और सभ्यतागत परिवर्तन थी।
मक्का में इस्लाम ने लोगों के दिल बदले।
मदीना में इस्लाम ने समाज को बदला।
मक्का में कुरआन ने व्यक्तित्व का निर्माण किया।
मदीना में उसी कुरआन ने सभ्यता का निर्माण किया।
यही कारण है कि इस्लामी इतिहास में हिजरत को एक निर्णायक मोड़ माना जाता है।
कुरआन की नज़र में हिजरत
कुरआन में हिजरत करने वालों की बहुत प्रशंसा की गई है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
﴿وَالَّذِينَ هَاجَرُوا فِي سَبِيلِ اللّٰهِ ثُمَّ قُتِلُوا أَوْ مَاتُوا لَيَرْزُقَنَّهُمُ اللّٰهُ رِزْقًا حَسَنًا﴾
अर्थ: "जो लोग अल्लाह के मार्ग में हिजरत करते हैं, फिर वे शहीद हो जाएँ या उनकी मृत्यु हो जाए, अल्लाह उन्हें उत्तम रोज़ी प्रदान करेगा।"
(सूरह अल-हज्ज : 58)
एक अन्य स्थान पर अल्लाह फ़रमाता है:
﴿إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللّٰهِ أُولَٰئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ اللّٰهِ﴾
"बेशक जो लोग ईमान लाए, हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया, वही लोग अल्लाह की रहमत के उम्मीदवार हैं।"
(सूरह अल-बक़रा : 218)
इन आयतों से स्पष्ट है कि हिजरत इस्लाम में केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक महान इबादत और त्याग का प्रतीक है।
हिजरी कैलेंडर की आवश्यकता क्यों पड़ी?
रसूलुल्लाह ﷺ के जीवनकाल में मुसलमान महीनों के नाम तो प्रयोग करते थे, लेकिन कोई औपचारिक इस्लामी वर्ष सिस्टम नहीं थी।
इस्लामी राज्य के विस्तार के बाद प्रशासनिक कार्य (administrative works) बढ़ने लगे। विभिन्न प्रदेशों में पत्र भेजे जाते थे, सरकारी आदेश जारी होते थे और वित्तीय रिकॉर्ड (financial records) रखे जाते थे।
हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़त काल में एक बार एक पत्र आया जिसमें केवल महीना लिखा था, वर्ष नहीं लिखा गया था। इससे भ्रम उत्पन्न हुआ।
तब यह आवश्यकता महसूस हुई कि मुसलमानों के पास अपना एक व्यवस्थित कैलेंडर होना चाहिए।
हिजरी कैलेंडर की स्थापना
हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने प्रमुख सहाबा को जमा किया और मश्वरा किया कि इस्लामी वर्ष-गणना किस घटना से शुरू की जाए।
कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि नबी ﷺ के जन्म से शुरुआत की जाए। कुछ ने कहा कि पहली क़ुरआन वह्य और नुबुव्वत की शुरुआत से की जाए।
कुछ ने वफ़ात को आधार बनाने का विचार रखा।
लेकिन अंततः सहाबा ने जिस राय को स्वीकार किया, वह हिजरत थी।
क्यों?
क्योंकि हिजरत वह घटना थी जिसने इस्लाम को एक नई पहचान दी।
हिजरत के बाद:
- मुसलमानों को स्वतंत्र समाज मिला।
- इस्लामी राज्य की स्थापना हुई।
- दीन को खुले रूप में लागू करने का अवसर मिला।
- एक नई सभ्यता का जन्म हुआ।
इसीलिए निर्णय लिया गया कि इस्लामी इतिहास की गणना हिजरत से शुरू की जाए।
यह निर्णय हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के शासनकाल में लिया गया और इस प्रकार "हिजरी कैलेंडर" (Hijri Calender) अस्तित्व में आया।
मुहर्रम पहला महीना क्यों बना?
यहाँ एक रोचक प्रश्न उत्पन्न होता है। यदि हिजरत रबीउल अव्वल में हुई थी, तो फिर हिजरी वर्ष का पहला महीना मुहर्रम क्यों रखा गया?
इसका उत्तर यह है कि अरब समाज में मुहर्रम पहले से ही वर्ष का पहला महीना माना जाता था। साथ ही बैअत-ए-अक़बा और हिजरत की तैयारियों के बाद असल फैसला का चरण मुहर्रम से ही जुड़ता था। इसलिए सहाबा ने मुहर्रम को वर्ष का पहला महीना निर्धारित किया।
हिजरत का आध्यात्मिक संदेश (The Spiritual Message of Hijrat)
हिजरत का महत्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। आज भी हर मुसलमान के जीवन में हिजरत का एक अर्थ है। जब कोई व्यक्ति बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों की ओर बढ़ता है, तो यह भी एक प्रकार की हिजरत है। जब कोई व्यक्ति पाप से तौबा करके अल्लाह की ओर लौटता है, तो यह भी एक हिजरत है।
इसी अर्थ में रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
وَالْمُهَاجِرُ مَنْ هَجَرَ مَا نَهَى اللّٰهُ عَنْهُ
"सच्चा मुहाजिर वह है जो उन बातों को छोड़ दे जिनसे अल्लाह ने मना किया है।" (सहीह अल-बुख़ारी)
यह हदीस बताती है कि हिजरत केवल शरीर की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा भी है।
निष्कर्ष : इतिहास से लेकर वर्तमान तक
यदि हम पूरी घटना पर नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि हिजरत इस्लामी इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ थी। मक्का का संघर्ष, अत्याचारों का सामना, शिब-ए-अबी तालिब की भूख, आमुल-हुज़्न का दुख, ताइफ़ की पीड़ा, बैअत-ए-अक़बा की आशा, ग़ार-ए-सौर का तवक्कुल, मदीना का स्वागत, मुहाजिर और अंसार का भाईचारा तथा इस्लामी समाज की स्थापना—ये सभी घटनाएँ मिलकर हिजरत को महान बनाती हैं।
इसीलिए जब हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु और अन्य सहाबा ने इस्लामी कैलेंडर के लिए किसी एक घटना को चुनना चाहा, तो उन्होंने हिजरत को चुना। क्योंकि हिजरत केवल अतीत की याद (memory of the past) नहीं थी, बल्कि इस्लामी पहचान की शुरुआत थी।
आज 1448 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हिजरत हमें यह सिखाती है कि कठिनाइयाँ स्थायी नहीं होतीं, अल्लाह पर भरोसा कभी व्यर्थ नहीं जाता, और जो लोग सत्य के लिए त्याग करते हैं, इतिहास उन्हें कभी नहीं भूलता।
यही हिजरत का संदेश है। यही उसकी विरासत है। और यही कारण है कि हिजरत-ए-नबवी ﷺ को इस्लामी इतिहास की सबसे महान घटनाओं में गिना जाता है।
संदर्भ (References)
- सूरह अल-अलक़
- सूरह आले-इमरान
- सूरह यासीन
- सूरह अत-तौबा
- सूरह अल-हश्र
- सूरह अल-हज्ज
- सूरह अल-बक़रा
- सहीह अल-बुख़ारी
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
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