क़तर 2022 से अमेरिका 2026 तक: आलोचक अब कहाँ हैं?
प्रस्तावना
साल 2022 में जब क़तर ने फीफा वर्ल्ड कप की मेज़बानी की, तब पूरी दुनिया की नज़रें उस पर थीं। लेकिन यह ध्यान सिर्फ़ फुटबॉल की वजह से नहीं था। टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही पश्चिमी देशों के कई नेता, बड़े मीडिया संस्थान, मानवाधिकार संगठन और कुछ फुटबॉल एसोसिएशन क़तर की लगातार आलोचना कर रहे थे।
किसी ने मज़दूरों के अधिकारों का मुद्दा उठाया, किसी ने शराब पर लगी पाबंदी की आलोचना की, तो किसी ने क़तर की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं पर सवाल उठाए। कुछ लोगों ने तो यह तक कहा कि क़तर को वर्ल्ड कप की मेज़बानी ही नहीं मिलनी चाहिए थी। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में टूर्नामेंट के बहिष्कार की भी बातें हुईं।
लेकिन इन सबके बावजूद क़तर ने दुनिया का स्वागत किया। उसने कोशिश की कि यह वर्ल्ड कप सिर्फ़ एक खेल प्रतियोगिता न रहे, बल्कि अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के क़रीब लाने का ज़रिया बने।
उद्घाटन समारोह में क़ुरआन की एक बहुत ख़ूबसूरत आयत पढ़ी गई:
﴿يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ﴾
(سورة الحجرات: 13)
अनुवाद
"ऐ लोगो! हमने तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया, और तुम्हें अलग-अलग क़ौमों और क़बीलों में इसलिए बाँटा, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वही है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार (तक़वा वाला) है। बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हर बात से पूरी तरह ख़बर रखने वाला है।"
(सूरह अल-हुजुरात, आयत: 13)
इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि पूरी इंसानियत की शुरुआत एक ही बाप (हज़रत आदम अलैहिस्सलाम) और एक ही माँ (हज़रत हव्वा अलैहास्सलाम) से हुई है। इसलिए किसी इंसान को उसकी जाति, नस्ल, भाषा, रंग या क़ौम की वजह से दूसरे पर कोई श्रेष्ठता नहीं है।
इस आयत का संदेश साफ़ था कि इंसानों के बीच रंग, नस्ल, भाषा और मुल्क का फ़र्क़ नहीं, बल्कि इंसानियत, आपसी इज़्ज़त और अच्छे किरदार की अहमियत है। अरब और इस्लामी संस्कृति का यह संदेश करोड़ों लोगों तक पहुँचा। बहुत से लोगों ने पहली बार इस्लाम और अरब समाज को एक नए नज़रिए से समझने की कोशिश की।
आज, चार साल बाद, फीफा वर्ल्ड कप 2026 अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको में हो रहा है। लेकिन इस बार माहौल पहले जैसा नहीं है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जिन लोगों ने क़तर की इतनी आलोचना की थी, वे आज कहाँ हैं?
क़तर पर सवाल, लेकिन अमेरिका पर ख़ामोशी क्यों?
वर्ल्ड कप 2026 शुरू होने से पहले कई ऐसी ख़बरें सामने आईं, जिनमें अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों, रेफ़रियों, अधिकारियों और फुटबॉल प्रशंसकों को अमेरिका में प्रवेश करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
रिपोर्टों के मुताबिक़ स्विट्ज़रलैंड के खिलाड़ी ब्रिल एम्बोलो का वीज़ा कुछ समय तक रोक दिया गया, जिससे उनकी यात्रा में देरी हुई। इराक़ के खिलाड़ी अयमन हुसैन से अमेरिका पहुँचने पर कई घंटों तक पूछताछ की गई। ईरान के प्रतिनिधिमंडल को भी वीज़ा से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा और कुछ अधिकारियों को प्रवेश नहीं मिल सका।
इसी तरह अफ्रीका के मशहूर रेफ़री उमर अब्दुलक़ादिर अर्तान को भी वीज़ा नहीं मिला। जबकि उनके पास डिप्लोमैटिक पासपोर्ट था। इसकी वजह से वे वर्ल्ड कप में रेफ़री की ज़िम्मेदारी नहीं निभा सके। दक्षिण अफ्रीका, सेनेगल और उज़्बेकिस्तान के कुछ प्रतिनिधियों को भी यात्रा के दौरान अलग-अलग तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
इन समस्याओं का असर सिर्फ़ खिलाड़ियों और अधिकारियों पर ही नहीं पड़ा। बहुत से फुटबॉल प्रशंसकों ने पहले ही टिकट खरीद लिए थे, होटल बुक कर लिए थे और यात्रा की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन बाद में उनका वीज़ा रद्द हो गया या मंज़ूर ही नहीं हुआ। इससे उन्हें काफ़ी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसी देश को अपनी सुरक्षा का अधिकार है या नहीं। हर देश अपनी सुरक्षा के लिए नियम बना सकता है। सवाल यह है कि जब यही बातें क़तर में हुईं, तब उन्हें मानवाधिकार और आज़ादी का मुद्दा बना दिया गया। लेकिन जब ऐसी परेशानियाँ अमेरिका में सामने आईं, तो उन्हें सिर्फ़ "सुरक्षा प्रक्रिया" या "इमिग्रेशन की सामान्य कार्रवाई" कहकर छोड़ दिया गया।
यही बात बहुत से लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।
क़तर में जब स्टेडियमों के आसपास शराब की बिक्री पर रोक लगाई गई, तो कई पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इसे व्यक्तिगत आज़ादी के ख़िलाफ़ बताया। लेकिन यह कम ही बताया गया कि क़तर एक मुस्लिम देश है, जहाँ की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ हैं। वहाँ के क़ानून उसी समाज की मान्यताओं के अनुसार बनाए गए हैं।
हर देश की अपनी संस्कृति होती है। जैसे यूरोप और अमेरिका के अपने क़ानून हैं, वैसे ही अरब देशों के भी अपने सामाजिक और धार्मिक नियम हैं। अगर दुनिया सच में विविधता (diversity) का सम्मान करती है, तो हर देश की पहचान और संस्कृति (culture) का भी सम्मान होना चाहिए।
क़तर ने वर्ल्ड कप के दौरान दुनिया भर से आए लाखों मेहमानों का स्वागत किया। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और देशों के लोग वहाँ पहुँचे। बहुत से लोगों ने क़तर की मेहमाननवाज़ी, साफ़-सफ़ाई और अच्छे इंतज़ाम की तारीफ़ भी की। हय्या कार्ड व्यवस्था की वजह से कई देशों के लोगों के लिए यात्रा और प्रवेश आसान हो गया था।
इसके बावजूद टूर्नामेंट शुरू होने से पहले जो आलोचना हुई, वह इतनी ज़्यादा थी कि खेल से ज़्यादा चर्चा राजनीति और विवादों की होने लगी।
अब जब अमेरिका में वीज़ा, यात्रा और प्रवेश से जुड़ी कई समस्याएँ सामने आई हैं, तो वैसी बड़ी बहस या आलोचना दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि बहुत से लोग पूछ रहे हैं कि क्या दुनिया में सभी देशों के लिए एक जैसे नियम हैं, या फिर अलग-अलग देशों को अलग नज़र से देखा जाता है?
कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर यही घटनाएँ किसी अरब या मुस्लिम देश में होतीं, तो शायद पूरी दुनिया में उनकी कहीं ज़्यादा चर्चा होती। लेकिन जब ऐसी बातें किसी पश्चिमी देश में होती हैं, तो उन्हें सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया कहकर आगे बढ़ जाया जाता है।
यही दोहरा रवैया लोगों के मन में सवाल पैदा करता है।
दोहरे मापदंड से उठते सवाल
कई लोगों का मानना है कि यहाँ असली मुद्दा सिर्फ़ वीज़ा या सुरक्षा जाँच का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया के सभी देशों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता है?
जब क़तर में कोई छोटी-सी बात होती थी, तो कई मीडिया संस्थान उसे बहुत बड़े मुद्दे के रूप में पेश करते थे। ऐसा लगता था जैसे पूरी दुनिया की नज़र सिर्फ़ क़तर पर ही है। हर दिन नए-नए सवाल उठाए जाते थे। कभी मज़दूरों की बात होती, कभी सामाजिक नियमों की, तो कभी धार्मिक परंपराओं की।
लेकिन आज जब अमेरिका में खिलाड़ियों, रेफ़रियों और दर्शकों को वीज़ा और यात्रा से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, तो वैसी चर्चा बहुत कम दिखाई देती है। कई रिपोर्टें ज़रूर सामने आई हैं, लेकिन वह माहौल नहीं बना जो क़तर के समय बनाया गया था।
यही वजह है कि बहुत से लोग इसे दोहरा मापदंड (Double standards) कहते हैं।
हर देश को अपनी सुरक्षा का अधिकार है। अगर कोई देश अपने यहाँ आने वाले लोगों की जाँच करता है, तो यह उसका अधिकार है। लेकिन यही बात दूसरे देशों के लिए भी लागू होनी चाहिए। अगर किसी अरब या मुस्लिम देश के सुरक्षा नियमों की आलोचना होती है, तो पश्चिमी देशों के नियमों पर भी उसी नज़र से चर्चा होनी चाहिए।
इंसाफ़ तभी होता है, जब एक ही नियम सब पर लागू हो।
कई पर्यवेक्षकों का कहना है कि पश्चिमी देशों की सरकारें और मीडिया अक्सर दूसरे देशों की कमियों पर खुलकर बात करते हैं, लेकिन अपने देशों की कमियों पर उतनी सख़्ती नहीं दिखाते।
दुनिया जानती है कि पिछले कई दशकों में अलग-अलग हिस्सों में युद्ध हुए, लाखों लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए और बड़ी मानवीय त्रासदियाँ सामने आईं। नस्लीय भेदभाव, शरणार्थियों की मुश्किलें और प्रवासियों के साथ होने वाले व्यवहार पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
लेकिन इन मुद्दों पर उतनी लगातार बहस नहीं होती, जितनी दूसरे देशों के मामलों पर होती है।
इसी वजह से कई लोग कहते हैं कि अगर मानवाधिकारों की बात करनी है, तो वह सबके लिए बराबर होनी चाहिए। किसी एक देश को बार-बार निशाना बनाना और दूसरे देशों की कमियों को नज़रअंदाज़ करना इंसाफ़ नहीं कहलाता।
एक और बात भी ध्यान देने लायक़ है।
अफ्रीका, एशिया और मध्य-पूर्व के बहुत से लोग वर्षों से पश्चिमी देशों में वीज़ा लेने के दौरान कठिन प्रक्रियाओं का सामना करते रहे हैं। लंबा इंतज़ार, बार-बार दस्तावेज़ माँगना, अतिरिक्त पूछताछ और सख़्त जाँच जैसी बातें उनके लिए नई नहीं हैं।
कई बार लोग महीनों तैयारी करते हैं, टिकट खरीदते हैं, होटल बुक करते हैं, लेकिन आख़िरी समय में वीज़ा नहीं मिल पाता। इससे उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का नुकसान होता है।
ऐसे अनुभव दुनिया के बहुत से लोगों के लिए आम बात हैं।
अगर यही स्थिति किसी दूसरे देश में होती, तो शायद उसे भेदभाव या मानवाधिकार का मामला बताया जाता। लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसा होने पर अक्सर इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया कह दिया जाता है। यही अंतर लोगों को सोचने पर मजबूर करता है।
क़तर 2022 की एक और ख़ास बात थी उसकी मेहमाननवाज़ी।
दुनिया के लाखों लोग वहाँ पहुँचे। अलग-अलग धर्म, भाषा और संस्कृति के लोग एक साथ मौजूद थे। क़तर ने हय्या कार्ड व्यवस्था शुरू की, जिससे बहुत से लोगों के लिए प्रवेश आसान हुआ।
कई विदेशी पत्रकारों और दर्शकों ने यह भी कहा कि सुरक्षा व्यवस्था अच्छी थी, सार्वजनिक परिवहन आसान था और आयोजन काफ़ी व्यवस्थित रहा।
इसका मतलब यह नहीं कि क़तर में कोई कमी नहीं थी। हर बड़े आयोजन में कुछ न कुछ समस्याएँ होती हैं। लेकिन यह भी सच है कि क़तर की कई अच्छी बातों को उतनी जगह नहीं मिली, जितनी उसकी आलोचनाओं को मिली।
दूसरी ओर, अमेरिका में सामने आई कठिनाइयों को ज़्यादातर सुरक्षा या प्रशासनिक प्रक्रिया कहकर समझाया जा रहा है।
आज दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा जुड़ी हुई है। सोशल मीडिया और इंटरनेट की वजह से किसी भी घटना की ख़बर कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया तक पहुँच जाती है।
इसलिए अब लोगों के लिए यह देखना आसान हो गया है कि अलग-अलग देशों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है।
अगर एक देश से बहुत ऊँचे मानकों की उम्मीद की जाती है, तो वही मानक दूसरे देशों पर भी लागू होने चाहिए।
यही असली बराबरी है।
अगर किसी देश की धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का सम्मान किया जाता है, तो दूसरे देशों की पहचान का भी सम्मान होना चाहिए।
अगर किसी देश की गलतियों पर सवाल उठाए जाते हैं, तो दूसरे देशों की गलतियों पर भी उसी ईमानदारी से बात होनी चाहिए। यही न्याय का तक़ाज़ा है।
निष्कर्ष
फीफा वर्ल्ड कप सिर्फ़ फुटबॉल का टूर्नामेंट नहीं है। यह दुनिया के अलग-अलग देशों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक साथ लाने का सबसे बड़ा मंच है। इसका मक़सद लोगों को जोड़ना है, उन्हें एक-दूसरे को समझने का अवसर देना है और इंसानियत के रिश्ते को मज़बूत करना है।
क़तर 2022 और अमेरिका 2026 की तुलना हमें एक अहम सबक देती है। किसी भी देश का मूल्यांकन एक ही पैमाने से होना चाहिए। अगर मानवाधिकार, बराबरी और इंसाफ़ की बात की जाती है, तो ये सिद्धांत हर देश पर समान रूप से लागू होने चाहिए।
किसी एक देश की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना और दूसरे देशों की कमियों को नज़रअंदाज़ करना न्याय नहीं है। इससे मानवाधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों की विश्वसनीयता भी कमज़ोर होती है।
दुनिया को ऐसे रवैये की ज़रूरत है, जहाँ हर देश के साथ बराबरी का व्यवहार हो, हर संस्कृति का सम्मान किया जाए और हर इंसान को बिना किसी भेदभाव के इज़्ज़त मिले।
अगर अंतरराष्ट्रीय खेल सचमुच दुनिया को जोड़ना चाहते हैं, तो मैदान के अंदर ही नहीं, मैदान के बाहर भी बराबरी, इंसाफ़ और सम्मान का वही पैमाना अपनाना होगा।
तभी खेल वास्तव में लोगों के बीच दूरियाँ कम करेंगे और पूरी दुनिया को एक परिवार की तरह जोड़ने का अपना असली मक़सद पूरा कर पाएँगे।
By:
Web Desk
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