भारतीय गणतंत्र और इस्लाम का न्याय दर्शन
भूमिका
न्याय, समानता और मानव गरिमा किसी भी सभ्य समाज (Civilized Society) की आत्मा होते हैं। इतिहास यह गवाही देता है कि जिन राष्ट्रों ने न्याय (Justice), समानता (Equality) और मानव गरिमा (Human Dignity) को अपने मूल आदर्श बनाए, वे केवल राजनीतिक रूप से मज़बूत ही नहीं बने, बल्कि नैतिक रूप से (Morally) भी पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुए।
भारत का गणतंत्र (Republic of India) और इस्लाम का न्याय दर्शन (Islamic Concept of Justice) अलग-अलग समय, परिस्थितियों और संदर्भों में विकसित हुए, लेकिन दोनों की मूल चिंता एक ही रही है—मनुष्य की गरिमा (Human Dignity), अधिकार (Rights) और सामाजिक संतुलन (Social Balance)।
भारतीय संविधान (Indian Constitution) आधुनिक युग की लोकतांत्रिक चेतना (Democratic Spirit) का प्रतिनिधि दस्तावेज है, जबकि इस्लाम का न्याय दर्शन ईश्वरीय मार्गदर्शन (Divine Guidance) पर आधारित एक समग्र जीवन-प्रणाली (Complete Way of Life) है। इन दोनों का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक ढांचा (Religious Framework) और संवैधानिक ढांचा (Constitutional Framework) एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि कई बिंदुओं पर पूरक (Complementary) हैं।
न्याय, समानता और विधि का शासन: इस्लामी और संवैधानिक आधार (Justice,equality and the rule of law: Islamic and constitutional foundations)
भारतीय गणतंत्र का अस्तित्व केवल एक भौगोलिक सीमा या राजनीतिक ढांचे का नाम नहीं है, बल्कि यह उन हजारों वर्षों की सभ्यतागत यात्रा का परिणाम है जहाँ विभिन्न विचारों और धर्मों ने मिलकर 'सत्य' और 'न्याय' की खोज की। 26 जनवरी 1950 को जब भारत ने अपना संविधान अंगीकार किया, तो वह केवल कागजों का पुलिंदा नहीं था, बल्कि वह एक प्रतिज्ञा थी—एक ऐसी प्रतिज्ञा जो हर नागरिक को सम्मान, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देती है। जब हम इस्लाम के न्याय दर्शन (Islamic Jurisprudence) और भारतीय संवैधानिक मूल्यों की तुलना करते हैं, तो हमें हैरानी होती है कि सदियों के अंतराल और अलग-अलग पृष्ठभूमियों के बावजूद दोनों का केंद्र 'इंसानी गौरव' (Human Dignity) ही है।
न्याय, समानता और विधि का शासन: इस्लामी और संवैधानिक आधार (Justice, equality and the rule of law: Islamic and constitutional foundations)
भारतीय गणतंत्र केवल एक भौगोलिक सीमा (Geographical Boundary) या राजनीतिक ढांचा (Political Structure) नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की उस सभ्यतागत यात्रा (Civilizational Journey) का परिणाम है जिसमें विभिन्न विचारधाराओं, परंपराओं और धर्मों ने मिलकर सत्य (Truth) और न्याय (Justice) की खोज की है।
26 जनवरी 1950 को जब भारत ने अपना संविधान (Constitution) अंगीकार किया, तो वह मात्र काग़ज़ों का दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक सामूहिक प्रतिज्ञा (Collective Promise) थी—ऐसी प्रतिज्ञा जो हर नागरिक को सम्मान (Dignity), स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality) और न्याय (Justice) की गारंटी देती है। यही भावना विधि के शासन (Rule of Law) की बुनियाद बनती है, जहाँ क़ानून से ऊपर कोई नहीं होता।
जब हम इस्लाम के न्याय दर्शन (Islamic Jurisprudence / Fiqh) और भारतीय संवैधानिक मूल्यों (Constitutional Values) का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं, तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि सदियों के अंतर (Historical Gap) और भिन्न सामाजिक संदर्भों (Different Contexts) के बावजूद दोनों का केंद्र एक ही है—इंसानी गौरव (Human Dignity) और न्यायपूर्ण व्यवस्था (Just Order)।
इस्लाम में न्याय को इबादत (Moral Obligation) का दर्जा प्राप्त है, जबकि भारतीय संविधान में न्याय को राज्य का मूल कर्तव्य (Foundational Duty of the State) माना गया है। इस प्रकार, दोनों परंपराएँ यह स्पष्ट करती हैं कि कोई भी समाज तब तक स्थिर, शांत और नैतिक नहीं हो सकता, जब तक वह न्याय, समानता और क़ानून के सम्मान को अपने सामाजिक जीवन की आधारशिला न बनाए।
इस्लाम का पूरा ढांचा 'अदल' (Justice) पर टिका है। अल्लाह तआला कुरान करीम में न्याय को एक ईश्वरीय गुण के रूप में प्रस्तुत करता है। सूरह अन-नहल की आयत 90 में स्पष्ट आदेश है कि إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ وَإِيتَاءِ ذِي الْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ وَالْبَغْيِ यानी "बेशक अल्लाह न्याय (अदल), भलाई (इहसान) और रिश्तेदारों को दान देने का हुक्म देता है, और निर्लज्जता, बुराई और सरकशी से रोकता है।"
यहाँ 'अदल' को सबसे पहले रखा गया है क्योंकि बिना न्याय के कोई भी समाज या गणतंत्र स्थिर नहीं रह सकता। भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) भी सबसे पहले 'न्याय' (Justice) (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) की ही बात करती है। यह समानता अद्भुत है कि एक तरफ सातवीं सदी का ईश्वरीय संदेश है और दूसरी तरफ बीसवीं सदी का महानतम कानूनी दस्तावेज, और दोनों की प्राथमिकता एक ही है।
गणतंत्र में न्याय की निष्पक्षता सबसे बड़ी कसौटी है। अक्सर राजनीतिक हितों के कारण न्याय प्रभावित होता है, लेकिन इस्लाम ने इसे पूरी तरह वर्जित किया है। कुरान में सूरह अन-निसा (4:135) में हिदायत दी गई है कि يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰ أَنْفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ जिसका अर्थ है "ऐ ईमान वालों! न्याय पर डट जाने वाले बनो और अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह तुम्हारे अपने खिलाफ हो या तुम्हारे माता-पिता और रिश्तेदारों के खिलाफ।" यह आयत उस 'Rule of Law' की नींव है जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में 'कानून के समक्ष समानता' के रूप में परिभाषित किया गया है। कानून अंधा होता है, इसका मतलब यही है कि वह चेहरा नहीं देखता, वह केवल सत्य और प्रमाण देखता है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने क़ानून के सामने पूर्ण समानता और न्याय की निष्पक्षता पर अत्यंत ज़ोर दिया। इस संदर्भ में आपने फ़रमाया:
إِنَّمَا أَهْلَكَ الَّذِينَ قَبْلَكُمْ، أَنَّهُمْ كَانُوا إِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الشَّرِيفُ تَرَكُوهُ، وَإِذَا سَرَقَ فِيهِمُ الضَّعِيفُ أَقَامُوا عَلَيْهِ الْحَدَّ، وَايْمُ اللَّهِ! لَوْ أَنَّ فَاطِمَةَ بِنْتَ مُحَمَّدٍ سَرَقَتْ، لَقَطَعْتُ يَدَهَا (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)।
इसका अर्थ है कि तुमसे पहले की क़ौमें इसलिए तबाह हो गईं क्योंकि वे प्रभावशाली लोगों के अपराधों को नज़रअंदाज़ कर देती थीं और कमज़ोरों पर सख़्ती से सज़ा लागू करती थीं; अल्लाह की क़सम, यदि मुहम्मद की बेटी फ़ातिमा भी चोरी करती, तो उसके लिए भी वही सज़ा होती।
यह हदीस इस्लामी न्याय-दर्शन की आत्मा को स्पष्ट करती है और यह सिद्ध करती है कि एक मज़बूत और नैतिक गणतंत्र वही होता है जहाँ क़ानून सबके लिए समान हो, किसी ऊँच-नीच या वीआईपी संस्कृति (VIP Culture) को स्थान न दिया जाए, और न्याय व्यक्ति की हैसियत नहीं बल्कि उसके कर्म के आधार पर किया जाए।
समानता (Equality) गणतंत्र का दूसरा बड़ा और अनिवार्य स्तंभ है। भारत जैसे अत्यंत विविधतापूर्ण देश में, जहाँ इतिहास में जाति, वर्ग और सामाजिक ऊँच-नीच की गहरी खाइयाँ रही हैं, वहाँ संविधान ने “एक व्यक्ति, एक मूल्य” (One Person, One Value) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। यही सिद्धांत हर नागरिक को समान गरिमा और समान अधिकार की गारंटी देता है।
इसी तरह इस्लाम ने भी अपने आरंभिक दौर में ही अरब समाज के कबीलाई, नस्ली और रंगभेदी अहंकार (tribal & racial arrogance) को पूरी तरह नकार दिया। पैग़म्बर इस्लाम Muhammad ﷺ ने अपने अंतिम प्रवचन (ख़ुत्बा-ए-हज्तुल विदा / Farewell Sermon) में मानवता के लिए एक सार्वभौमिक चार्टर (Universal Charter of Human Equality) प्रस्तुत किया। आपने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की:
أَلَا لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَى أَعْجَمِيٍّ، وَلَا لِعَجَمِيٍّ عَلَى عَرَبِيٍّ، وَلَا لِأَحْمَرَ عَلَى أَسْوَدَ، وَلَا لِأَسْوَدَ عَلَى أَحْمَرَ إِلَّا بِالتَّقْوَى
अर्थात: “किसी अरबी को गैर-अरबी पर, और न किसी गैर-अरबी को अरबी पर कोई बढ़त है; न किसी गोरे को काले पर और न काले को गोरे पर—सिवाय ईश्वरीय भय (तक़वा / God-consciousness) के।” (सहीह बुखारी)
यह घोषणा न केवल इस्लामी नैतिकता की आधारशिला है, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों—समानता (Equality), मानव गरिमा (Human Dignity) और भेदभाव-विरोध (Anti-discrimination)—से भी गहरा सामंजस्य रखती है। इस प्रकार, भारतीय संविधान और इस्लामी शिक्षा दोनों एक ही संदेश देते हैं: इंसान की क़ीमत उसकी पहचान से नहीं, बल्कि उसके आचरण और नैतिकता (Conduct & Ethics) से तय होती है।
यह संदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (Article 15) की रूह (spirit) है, जो धर्म (religion), मूलवंश (descent), जाति (caste), लिंग (gender) या जन्मस्थान (place of birth) के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव (discrimination) को सख़्ती से रोकता है। इसी तरह, जब हम मस्जिद की एक सफ़ (row/line) में खड़े होते हैं, तो वहाँ राजा और रंक, अमीर और ग़रीब—सबके बीच का फर्क मिट जाता है। यही वास्तविक समानता (equality) है, जिसे भारतीय गणतंत्र अपनी जम्हूरियत (democracy) में साकार होते देखना चाहता है।
लोकतंत्र, परामर्श, अल्पसंख्यक अधिकार और आर्थिक न्याय (Democracy, consultation, minority rights and economic justice)
लोकतंत्र की सफलता 'मशवरे' (Consultation) में है। भारत की संसदीय प्रणाली इसी विचार पर आधारित है कि शक्ति एक हाथ में केंद्रित न होकर चर्चा और सहमति में हो। इस्लाम ने इसे 'शूरा' (Shura) का नाम दिया है। कुरान में सूरह अश्-शूरा में मोमिनों की विशेषता बताते हुए कहा गया है कि وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ यानी "उनके तमाम सामूहिक मामले आपस में परामर्श से तय होते हैं।"
यहाँ तक कि पैगंबर साहब को भी, जिन्हें सीधे अल्लाह से ज्ञान प्राप्त होता था, हुक्म दिया गया कि وَشَاوِرْهُمْ فِي الْأَمْرِ यानी "ऐ नबी! मामलों में इनसे मशवरा लें।" यह लोकतांत्रिक मूल्यों की पराकाष्ठा है। भारतीय गणतंत्र में जब हम मतदान करते हैं या हमारी संसद में बहस होती है, तो हम वास्तव में इसी 'परामर्श (Culture) की संस्कृति' को जी रहे होते हैं। निरंकुशता (Autocracy) इस्लाम और गणतंत्र दोनों के मिजाज के खिलाफ है।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर चर्चा किए बिना गणतंत्र की बात अधूरी है। भारत का संविधान अनुच्छेद 29 और 30 के माध्यम से अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति (Culture) और शिक्षा (Education) को संरक्षित करने का विशेष अधिकार देता है। इस्लाम ने गैर-मुस्लिम नागरिकों को 'जम्मी' (सुरक्षित) कहा है। उनके अधिकारों की रक्षा को इतना महत्वपूर्ण बताया गया है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया مَنْ ظَلَمَ مُعَاهِدًا، أَوِ انْتَقَصَهُ، أَوْ كَلَّفَهُ فَوْقَ طَاقَتِهِ، أَوْ أَخَذَ مِنْهُ شَيْئًا بِغَيْرِ طِيبِ نَفْسٍ، فَأَنَا حَجِيجُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ यानी "जिसने किसी गैर-मुस्लिम नागरिक पर जुल्म किया, या उसका हक कम किया, या उसकी ताकत से ज्यादा बोझ उस पर डाला, तो कयामत के दिन मैं (पैगंबर) उस जुल्मी के खिलाफ गवाह बनूँगा।" (सुनन अबू-दाऊद)
यह हदीस किसी भी आधुनिक मानवाधिकार चार्टर (Human Rights Charter) से कहीं अधिक प्रभावशाली है। एक गणतंत्र की खूबसूरती ही यह है कि वह बहुसंख्यक समाज के साथ-साथ सबसे कमजोर और अल्पसंख्यक वर्ग को भी सुरक्षा का एहसास दिलाए।
आर्थिक न्याय (Economic Justice) के मोर्चे पर भी दोनों विचारधाराएं एक ही धरातल पर हैं। भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles) यह सुनिश्चित करते हैं कि धन का संकेंद्रण कुछ ही हाथों में न हो। इस्लाम ने 'जकात' और 'सदका' के माध्यम से धन के प्रवाह को समाज के निचले तबके की ओर मोड़ दिया। कुरान में सूरह अल-हश्र (59:7) में स्पष्ट नीति दी गई है कि كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْأَغْنِيَاءِ مِنْكُمْ यानी "ताकि यह धन केवल तुम्हारे अमीरों के बीच ही न घूमता रहे।"
इस्लाम ब्याज (सूद/ interest) को हराम करार देकर उस शोषणकारी व्यवस्था (exploitative system) को जड़ से काटता है जो गरीबों को और गरीब बनाती है। भारतीय गणतंत्र का भी यही लक्ष्य है कि विकास का फल अंतिम व्यक्ति (Antyodaya) तक पहुँचे।
स्वतंत्रता, शिक्षा, देशप्रेम और सह-अस्तित्व का दर्शन (The philosophy of freedom, education, patriotism, and coexistence)
स्वतंत्रता (Liberty) मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता' (Right to Life) की बात करता है। हजरत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु का वह प्रसिद्ध वाक्य आज भी विश्व इतिहास में न्याय का स्वर्ण अक्षरों में लिखा नियम है जब उन्होंने एक गवर्नर को फटकारते हुए कहा था कि مَتَى اسْتَعْبَدْتُمُ النَّاسَ وَقَدْ وَلَدَتْهُمْ أُمَّهَاتُهُمْ أَحْرَارًا यानी "तुमने लोगों को कब से अपना गुलाम बना लिया जबकि उनकी माताओं ने उन्हें स्वतंत्र पैदा किया था?" यह विचार ही लिबर्टी की नींव है।
इस्लाम ने विचार और अभिव्यक्ति की आजादी का भी सम्मान किया है। कुरान का उद्घोष है لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ यानी "दीन (धर्म) के मामले में कोई जबरदस्ती नहीं है।" यह धार्मिक स्वतंत्रता का वह अधिकार है जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 में सुरक्षित किया गया है।
शिक्षा और राष्ट्र-निर्माण के प्रति समर्पण (nation-building commitment) एक जागरूक नागरिक का परम कर्तव्य (supreme duty) है। भारत के गणतंत्र को मज़बूत करने के लिए साइंटिफिक टेम्परामेंट (scientific temper) और शिक्षा (education) को अनिवार्य माना गया है।
इस्लाम की पहली आयत “इक़रा” (Iqra – Read) से शुरू होती है, जो ज्ञान की केंद्रीय भूमिका को स्पष्ट करती है। हदीस में है: طَلَبُ الْعِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ — यानी “शिक्षा प्राप्त करना हर मुसलमान पर अनिवार्य है।”
यहाँ ज्ञान का अर्थ केवल धार्मिक ज्ञान (religious knowledge) नहीं, बल्कि वह हर प्रकार का इल्म (all useful knowledge) है जो मानवता के कल्याण (human welfare) में सहायक हो। जब कोई नागरिक शिक्षित होता है, तो वह अपने अधिकारों (rights) और कर्तव्यों (duties) के प्रति सजग होता है। यही जागरूकता लोकतंत्र (democracy) को सशक्त बनाती है और गणतंत्र (republic) की जड़ों को मज़बूत करती है।
देशप्रेम (Patriotism) के विषय पर अक्सर बहस होती है, लेकिन इस्लाम ने इसे बहुत सरलता से सुलझाया है। हालांकि "हुब्बुल वतनी मिनल ईमान" की रिवायत पर मुहद्दिसीन की अलग-अलग राय है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वतन से मोहब्बत और उसकी वफादारी इस्लाम का मूल हिस्सा है। हदीस में आता है कि المُسْلِمُ مَن سَلِمَ المُسْلِمُونَ مِن لِسانِهِ ويَدِهِ यानी "सच्चा मुसलमान वह है जिसके हाथ और जुबान से दूसरे सुरक्षित रहें।"
एक नागरिक के तौर पर देश के कानूनों का पालन करना 'अहद' (Agreement) को पूरा करने जैसा है। कुरान का हुक्म है يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ यानी "ऐ ईमान वालों! अपने समझौतों को पूरा करो।" संविधान भी राज्य और नागरिक के बीच एक समझौता है, जिसे निभाना हर मुसलमान की धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी है।
आज के दौर में, जब सांप्रदायिकता (communalism) और कट्टरवाद (extremism) बढ़ रहा है, तो ज़रूरत है कि हम भारतीय गणतंत्र (Indian Republic) के उन मूल्यों और इस्लाम के उन सिद्धांतों की ओर लौटें जो हमें जोड़ते (unite) हैं, न कि बाँटते।
इस्लाम ने स्पष्ट रूप से सहिष्णुता और धार्मिक स्वतंत्रता की शिक्षा दी है। क़ुरआन में फ़रमाया गया है: لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِيَ دِينِ — “तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन।” । (सूरह बक़रा)
यह कथन सह-अस्तित्व (Co-existence), आपसी सम्मान (mutual respect) और धार्मिक सहनशीलता (religious tolerance) का एक स्पष्ट सिद्धांत प्रस्तुत करता है। यही वह सूत्र (guiding principle) है जो भारत जैसे बहुधर्मी (multi-religious) और बहुसांस्कृतिक (multi-cultural) देश को एकता के धागे में पिरोता है और गणतंत्र की आत्मा को जीवित रखता है।
पैगंबर साहब ने 'मीसाक-ए-मदीना' (Constitution of Medina) के माध्यम से एक ऐसा समाज बनाकर दिखाया जहाँ अलग-अलग धर्मों के लोग एक ही 'उम्मत' (समुदाय) के रूप में साथ रहते थे। यह आधुनिक गणतंत्र का सबसे पुराना और बेहतरीन उदाहरण है।
अंततः, भारतीय गणतंत्र केवल एक सरकारी तंत्र नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक सफर है। इस्लाम का न्याय दर्शन हमें याद दिलाता है कि हम जो भी करें, उसके पीछे अल्लाह की रजा और इंसानों की भलाई होनी चाहिए। कुरान कहता है وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ وَلَا تَعَاوَنُوا عَلَى الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ यानी "नेकी और भलाई के कामों में एक दूसरे का सहयोग करो और बुराई व जुल्म के कामों में सहयोग न करो।" (सूरह माइदह)
अगर हम इस आयत को अपने नागरिक जीवन का आधार बना लें, तो भारत का लोकतंत्र दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाएगा। एक सच्चा देशभक्त (patriot) और एक सच्चा मोमिन वही है जो न्याय (justice) के लिए खड़ा हो, गरीबों के आंसू पोंछे, और अपने देश को प्रगति की राह पर ले जाए। गणतंत्र दिवस का संदेश यही है कि हम अपने मतभेदों को भुलाकर उस 'सत्य' की राह पर चलें जो हमें इंसानियत से जोड़ता है। खुदा हमारे इस चमन को सलामत रखे और हमें इस महान गणतंत्र का एक वफादार और न्यायप्रिय नागरिक बनाए रखे।
निष्कर्ष (Conclusion)
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय गणतंत्र (Indian Republic) और इस्लाम का न्याय-दर्शन (Islamic concept of justice) किसी टकराव की कहानी नहीं हैं, बल्कि साझा नैतिक मूल्यों (shared moral values) की एक मज़बूत और जीवंत परंपरा हैं। न्याय (Justice), समानता (Equality), स्वतंत्रता (Freedom), परामर्श (Consultation/Shūrā), अल्पसंख्यक अधिकार (Minority Rights), आर्थिक संतुलन (Economic Balance) और मानव गरिमा (Human Dignity)—ये सभी तत्व दोनों व्यवस्थाओं की आत्मा हैं।
जहाँ भारतीय संविधान (Indian Constitution) इन आदर्शों को आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे (democratic framework) में कानूनी रूप देता है, वहीं इस्लाम उन्हें ईश्वरीय दायित्व (divine obligation) और नैतिक उत्तरदायित्व (moral responsibility) के रूप में प्रस्तुत करता है। आज के समय में, जब समाज विभाजन (polarization) और असहिष्णुता (intolerance) की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब इन साझा मूल्यों को अपनाना न केवल राष्ट्र की मजबूती के लिए आवश्यक है, बल्कि मानवता (humanity) की भलाई के लिए भी अनिवार्य है।
संदर्भ (References)
- सूरह अन-नहल
- सूरह माइदह
- सूरह बक़रा
- सूरह अल-हश्र
- सहीह बुखारी
- सहीह मुस्लिम
- सुनन
- अबू-दाऊद
लेखक: मुहम्मद सनाउल्लाह, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी,मलप्पुरम, केरल के डिग्री सेकंड
ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं। उनका रुझान इतिहास के क्षेत्र में है।
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