अय्याम-ए-तशरीक़ : इबादत, तक़वा और अल्लाह की याद के लिए मुबारक दिन

प्रस्तावना(Introduction):

ईदुल-अज़हा के बाद आने वाले तीन मुबारक (मंगलमय) दिन, यानी 11, 12 और 13 ज़िलहिज्जा, को अय्याम-ए-तशरीक़ कहा जाता है। ये दिन इस्लाम में बहुत महत्व रखते हैं। यह सिर्फ़ खाने-पीने और खुशी मनाने के दिन नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की याद, शुक्र, तक़वा, इबादत और बंदगी(आराधना) के दिन हैं। इन दिनों में मुसलमान अल्लाह तआला की नेमतों पर उसका शुक्र अदा करते हैं, कुर्बानी की रुहानियत को समझते हैं और ज़िक्र-ए-इलाही में मशग़ूल रहते हैं।

हज़रत नबी-ए-करीम ने इन दिनों को “खाने, पीने और अल्लाह का ज़िक्र करने” के दिन फ़रमाया। यानी यह दिन सिर्फ़ दुनियावी खुशी के लिए नहीं, बल्कि रूहानी सुकून और अल्लाह की क़ुर्बत हासिल करने के लिए हैं।

कुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَ اذْكُرُوا اللّٰهَ فِيْۤ اَيَّامٍ مَّعْدُوْدٰتٍ

और गिनती के इन खास दिनों में अल्लाह को याद करो। (सूरह अल-बक़रह: 203)

मुफस्सिरीन फ़रमाते हैं कि यहाँ “अय्याम-ए-मअदूदात” से मुराद  अय्याम-ए-तशरीक़ हैं। यानी ये वो दिन हैं जिनमें खास तौर पर अल्लाह की याद, तकबीर(Praising Allah’s greatness) यानी अल्लाहु अकबर, तस्बीह(Glorification of Allah), तहलील(Declaring the oneness of Allah) यानी ला इलाहा इल्लल्लाहु और शुक्र(Gratitude) यानी अल्हम्दु लीलाह का हुक्म दिया गया है।

अय्याम--तशरीक़ की फ़ज़ीलत और अहमियत (The Virtue and Importance of Ayyam-e-Tashriq):

अय्याम-ए-तशरीक़ इस्लाम के बहुत शुभ वाले और महानता वाले दिन हैं। यह दिन हज के अहम अरकान (Pillar) के बाद आते हैं। हाजी इन्हीं दिनों में मिना में ठहरते हैं, जमरात को कंकरी मारते हैं और लगातार अल्लाह का ज़िक्र करते हैं।

रसूलुल्लाह ने इरशाद फ़रमाया:

أَيَّامُ التَّشْرِيقِ أَيَّامُ أَكْلٍ وَشُرْبٍ وَذِكْرِ اللَّهِ

अय्याम-ए-तशरीक़ खाने, पीने और अल्लाह का ज़िक्र करने के दिन हैं। (सहीह मुस्लिम)

इस हदीस से मालूम हुआ कि इन दिनों में मुसलमान अल्लाह की नेमतों पर खुशी भी मनाएं और साथ ही उसकी याद में भी लगे रहें। इस्लाम ऐसा मज़हब है जो इंसान को सिर्फ़ इबादत में ही नहीं लगाता, बल्कि हलाल खुशी और शुक्र की भी शिक्षण देता है।

इन दिनों की सबसे बड़ी विशेषता और खुसूसीयत यह है कि ये “ज़िक्र” वाले दिन हैं। हर तरफ़ तकबीर की यह आवाज़ें गूंजती हैं:

اللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ، وَاللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، وَلِلّٰهِ الْحَمْدُ

इन अल्फ़ाज़ में अल्लाह की बड़ाई, उसकी तौहीद और उसका शुक्र मौजूद है।

अय्याम-ए-तशरीक़ हमें यह एहसास दिलाते हैं कि इंसान की असली कामयाबी अल्लाह की बंदगी में है। दुनिया की दौलत, शोहरत और आराम असली चीज़ नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा सबसे बड़ी दौलत है।

इन मुबारक दिनों में ज़िक्र--इलाही की कसरत:

अय्याम-ए-तशरीक़ की सबसे बड़ी पहचान “ज़िक्रुल्लाह(अल्लाह का ज़िक्र)” यानी अल्लाह की खूब याद करना है। इन दिनों में मुसलमान बार-बार तकबीर पढ़ता है, तस्बीह करता है, कुरआन की तिलावत करता है और अल्लाह की हम्द व सना बयान करता है।

कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

فَاذْكُرُوا اللّٰهَ كَذِكْرِكُمْ اٰبَآءَكُمْ اَوْ اَشَدَّ ذِكْرًا

तो अल्लाह को याद करो, जैसे तुम अपने बाप-दादाओं को याद करते हो, बल्कि उससे भी अधिक।(सूरह अल-बक़रह: 200)

पहले ज़माने में लोग हज के बाद अपने खानदान और बहादुरी का ज़िक्र करते थे। इस्लाम ने सिखाया कि असली ज़िक्र अल्लाह का होना चाहिए।

इन दिनों में “अल्लाहु अकबर”, “सुब्हानल्लाह”, “अल्हम्दुलिल्लाह”, “ला इलाहा इल्लल्लाह” की कसरत करनी चाहिए। घरों में, मस्जिदों में, बाज़ारों में और हर जगह अल्लाह की याद ज़िंदा रहनी चाहिए।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु अय्याम-ए-तशरीक़ में बाज़ार निकलते और ऊँची आवाज़ से तकबीर पढ़ते थे। लोग भी उनके साथ तकबीर पढ़ने लगते। यह मंज़र बताता है कि इस्लामी समाज की असली रूह अल्लाह की याद में है। आज दुःख की बात है कि इन दिनों में लोग मोबाइल, गाने, दुनियावी मशग़लों और बेफ़िज़ूल बातों में वक्त बर्बाद कर देते हैं, जबकि यह दिन ज़िक्र और इबादत के लिए दिए गए हैं।

अगर इंसान इन दिनों में दिल से अल्लाह को याद करे, तो उसका दिल नूर से भर जाता है, गुनाहों(sins) से दूरी पैदा होती है और रूह को सुकून मिलता है।

तकबीर--तशरीक़ का पैग़ाम और रूहानियत:

अय्याम-ए-तशरीक़ की सबसे अहम इबादतों में से एक “तकबीर-ए-तशरीक़” है। हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद मुसलमान तकबीर पढ़ता है।

اللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ، وَاللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، وَلِلّٰهِ الْحَمْدُ

इस तकबीर में बहुत गहरा पैग़ाम  छुपा हुआ है।

अल्लाहु अकबर”, यानी अल्लाह सबसे बड़ा है। दुनिया की हर ताकत, हर बादशाहत, हर दौलत और हर शोहरत से बड़ा सिर्फ़ अल्लाह है।

ला इलाहा इल्लल्लाह”, यानी अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। यही तौहीद का पैग़ाम है, जिसके लिए तमाम नबी दुनिया में आए।

वलिल्लाहिल हम्द”, यानी सारी तारीफें अल्लाह के लिए हैं। जो कुछ हमारे पास है, सब उसी का दिया हुआ है।

तकबीर-ए-तशरीक़ इंसान के दिल में तक़वा पैदा करती है। यह उसे याद दिलाती है कि वह कमजोर बंदा है और अल्लाह ही असली मालिक है। जब पूरी उम्मत एक साथ एक ही तकबीर पढ़ती है, तो यह इस्लामी एकता और ईमान की ताकत का खूबसूरत मंज़र बन जाता है।

कुर्बानी, शुक्र और अल्लाह की इताअत का जज़्बा:

अय्याम-ए-तशरीक़ का रिश्ता कुर्बानी से भी बहुत गहरा है। कुर्बानी मात्र जानवर ज़बह करने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह के हुक्म के सामने झुक जाने का नाम है।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम  ने अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम  को कुर्बान करने का इरादा कर लिया था। यह अल्लाह की इताअत और मोहब्बत की सबसे बड़ी मिसाल है।

कुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

لَنْ يَّنَالَ اللّٰهَ لُحُوْمُهَا وَلَا دِمَآؤُهَا وَلٰكِنْ يَّنَالُهُ التَّقْوٰى مِنْكُمْ

अल्लाह तक उनके गोश्त पहुँचते हैं और उनका खून, बल्कि तुम्हारा तक़वा पहुँचता है।(सूरह अल-हज्ज: 37)

यानी अल्लाह को सिर्फ़ हमारा दिखावा नहीं चाहिए, बल्कि दिल की सच्चाई और तक़वा चाहिए। कुर्बानी हमें सिखाती है कि इंसान को अपनी ख्वाहिशों, अपने नफ़्स(soul) और अपनी बुरी आदतों(habits) को भी अल्लाह के लिए कुर्बान करना चाहिए।

इन दिनों में मुसलमान अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा करता है। खाना खाते वक्त, कुर्बानी करते वक्त और हर खुशी के मौके पर “अल्हम्दुलिल्लाह” कहना चाहिए।

शुक्र करने वाला इंसान कभी घमंडी नहीं बनता। उसे हर वक्त एहसास रहता है कि जो कुछ मिला है, वह अल्लाह की मेहरबानी से मिला है।

अय्याम--तशरीक़ में उम्मत की एकता और भाईचारा:

अय्याम-ए-तशरीक़ उम्मत-ए-मुस्लिमह की एकता का भी खूबसूरत पैग़ाम देते हैं। दुनिया के अलग-अलग मुल्कों, ज़बानों और रंगों के मुसलमान एक ही अल्लाह की इबादत करते हैं, एक ही तकबीर पढ़ते हैं और एक ही दीन पर जमा होते हैं।

हज के मैदानों में यह मंज़र साफ़ दिखाई देता है। अमीर-गरीब, काले-गोरे, अरब-अजमी, सब एक ही कपड़ों में, एक ही आवाज़ में “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” पढ़ते हैं। यह इस बात की निशानी है कि इस्लाम नस्ल, भाषा और मुल्क की दीवारों को तोड़कर इंसानियत और भाईचारे की तालीम देता है।

इन दिनों में गरीबों का खास ख़याल रखना चाहिए। कुर्बानी का गोश्त रिश्तेदारों, पड़ोसियों और जरूरतमंदों तक पहुँचाना चाहिए।

रसूलुल्लाह आदेश देते हैं:

خَيْرُ النَّاسِ أَنْفَعُهُمْ لِلنَّاسِ 

अल्लाह को लोगों में सबसे अधिक प्रिय वह है जो लोगों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाए। (मुअजम अल-औसत)

इसलिए अय्याम-ए-तशरीक़ मात्र अपनी प्रसन्नता का नाम नहीं, बल्कि दूसरों की खुशी में सम्मिलित होने का भी नाम है।

खुशी, रहमत और इबादत से भरे हुए मुबारक दिन:

अय्याम-ए-तशरीक़ रहमत, बरकत और खुशी के दिन हैं। इन दिनों में मुसलमान हलाल खुशी मनाता है, अच्छे कपड़े पहनता है, रिश्तेदारों से मिलता है और अल्लाह का शुक्र अदा करता है।

लेकिन इस खुशी के साथ गुनाह, फुज़ूलखर्ची, दिखावा और बेपर्दगी नहीं होनी चाहिए। इस्लाम ऐसी खुशी सिखाता है जिसमें इबादत भी हो और शराफ़त भी।

इन दिनों में  रोजा रखना हराम करार  दिया गया है ताकि मुसलमान अल्लाह की नेमतों से लाभ उठाए और उसकी रहमत पर खुशी मनाए।

हज़रत नबी-ए-करीम ने इरशाद फ़रमाया:

أَيَّامُ التَّشْرِيقِ أَيَّامُ أَكْلٍ وَشُرْبٍ وَذِكْرٍ لِلَّهِ

ये खाने-पीने और अल्लाह का ज़िक्र करने के दिन हैं। (सही मुस्लिम)

यानी मुसलमान की खुशी भी इबादत बन जाती है, जब वह अल्लाह को याद करते हुए खुशी मनाता है। अगर इन दिनों को सही तरीके से गुज़ारा जाए, तो इंसान के दिल में ईमान ताज़ा हो जाता है, गुनाहों से नफ़रत पैदा होती है और अल्लाह से मोहब्बत बढ़ जाती है।

निष्कर्ष:

अय्याम-ए-तशरीक़ इस्लाम के बहुत ही बरकत वाले, रूहानी और अहम दिन हैं। यह दिन हमें अल्लाह की याद, शुक्र, कुर्बानी, तक़वा, भाईचारे और इताअत का पैग़ाम देते हैं।

इन दिनों में सिर्फ़ दुनियावी खुशी में खो जाना मक़सद नहीं, बल्कि अल्लाह से अपना रिश्ता मजबूत करना असली मक़सद है। हमें चाहिए कि इन मुबारक दिनों में ज़िक्र-ए-इलाही की कसरत करें, तकबीर-ए-तशरीक़ का एहतमाम करें, गरीबों और जरूरतमंदों का ध्यान रखें और अपनी जीवित अवस्था को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाने की प्रयास करें।

अल्लाह तआला हमें अय्याम-ए-तशरीक़ की सही क़द्र करने, इन दिनों की बरकतों से फायदा उठाने और अपनी जिंदगी को तक़वा और इबादत से सजाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

 

संदर्भ (References):

सूरह अल-बक़रह: 203

सूरह अल-बक़रह: 200

सूरह अल-हज्ज: 37

सहीह मुस्लिम

मुअजम अल-औसत

 

लेखक:

 रेहान आलम, बारहवीं कक्षा, कुर्तुबा लीडर्स अकैडमी, किशनगंज, बिहार

 

Disclaimer

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