नमाज़ में किन सूरों की तिलावत की जाए?
नमाज़ तकबीर, तस्बीह और क़ुरआन की तिलावत का सुंदर संगम है। नमाज़ में क़ुरआन की कोई भी सूरह पढ़ी जाए, तो फ़र्ज़ अदा हो जाता है और नमाज़ सही (Valid) हो जाती है। लेकिन कुछ सूरहें ऐसी हैं जिनके बारे में अहादीस में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने उन्हें नमाज़ में पढ़ा, बल्कि कई सूरहों की तिलावत को अपना नियमित अमल (Regular Practice) बनाया।
इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे इन सूरहों की तिलावत का भी एहतिमाम करें, ताकि रसूलुल्लाह ﷺ की यह सुन्नत फिर से ज़िंदा हो सके।
मुख्तलिफ अहादीस-ए-मुबारका के अनुसार, रसूलुल्लाह ﷺ ने पाँचों वक्त की नमाज़ (Five Daily Prayers), जुमा और ईदैन आदि में निम्नलिखित सूरहों की तिलावत फ़रमाई:
नमाज़ में पढ़ी जाने वाली सूरहें
- सूरह अल-फ़ातिहा (Surah Al-Fatihah)
- सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah)
- सूरह आले-इमरान (Surah Aal-e-Imran)
- सूरह अन-निसा (Surah An-Nisa)
- सूरह अल-माइदा (Surah Al-Ma’idah)
- सूरह अल-अनआम (Surah Al-An‘am)
- सूरह अल-आराफ़ (Surah Al-A‘raf)
- सूरह अल-मोमिनून (Surah Al-Mu’minun)
- सूरह अस-सज्दा (Surah As-Sajdah)
- सूरह अद-दुखान (Surah Ad-Dukhan)
- सूरह क़ाफ़ (Surah Qaf)
- सूरह अज़-ज़ारियात (Surah Adh-Dhariyat)
- सूरह अल-क़मर (Surah Al-Qamar)
- सूरह अल-जुमुआ (Surah Al-Jumu‘ah)
- सूरह अल-मुनाफ़िकून (Surah Al-Munafiqun)
- सूरह अद-दहर / अल-इंसान (Surah Ad-Dahr / Al-Insan)
- सूरह अल-मुरसलात (Surah Al-Mursalat)
- सूरह अत-तकवीर (Surah At-Takwir)
- सूरह अल-आला (Surah Al-A‘la)
- सूरह अल-गाशियह (Surah Al-Ghashiyah)
- सूरह अश-शम्स (Surah Ash-Shams)
- सूरह अल-लैल (Surah Al-Layl)
- सूरह अत-तीन (Surah At-Tin)
- सूरह अल-फ़लक़ (Surah Al-Falaq)
- सूरह अन-नास (Surah An-Nas)
इन सूरहों की तिलावत नमाज़ में करना सुन्नत की पैरवी और रसूलुल्लाह ﷺ के अमल को ज़िंदा करने का एक बेहतरीन तरीका है।
अब इन सूरों के बारे में अहादीस-ए-मुबारका मुलाहज़ा फरमाइए
1. सूरह अल-मोमिनून
सहीह मुस्लिम में हज़रत अब्दुल्लाह बिन सायिब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
صَلَّى لَنَا النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الصُّبْحَ بِمَكَّةَ، فَاسْتَفْتَحَ سُورَةَ الْمُؤْمِنِينَ، حَتَّى إِذَا جَاءَ ذِكْرُ مُوسَى وَهَارُونَ أَوْ ذِكْرُ عِيسَى، أَخَذَتِ النَّبِيَّ ﷺ سَعْلَةٌ فَرَكَعَ
“नबी करीम ﷺ ने मक्का मुकर्रमा में हमें फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाई। आपने सूरह अल-मोमिनून की तिलावत शुरू की। जब हज़रत मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के ज़िक्र तक पहुँचे, तो आपको खाँसी आ गई और आप रुकू में चले गए।”
इस हदीस से मालूम होता है कि नबी करीम ﷺ फ़ज्र की नमाज़ में सूरह अल-मोमिनून की तिलावत फ़रमाते थे।
2–5. सूरह अस-सज्दा, सूरह अद-दहर, सूरह अल-जुमुआ और सूरह अल-मुनाफिकून
عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ يَقْرَأُ يَوْمَ الْجُمُعَةِ فِي صَلَاةِ الْفَجْرِ بِـ ﴿الم تَنْزِيلُ﴾ السَّجْدَةِ، وَ﴿هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ﴾، وَكَانَ يَقْرَأُ فِي صَلَاةِ الْجُمُعَةِ بِسُورَةِ الْجُمُعَةِ وَ﴿إِذَا جَاءَكَ الْمُنَافِقُونَ﴾.
हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि:
रसूलुल्लाह ﷺ जुमे के दिन फ़ज्र की नमाज़ में सूरह अस-सज्दा (الم تَنْزِيلُ السَّجْدَةُ) और सूरह अल-इन्सान (هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ) पढ़ते थे।
और जुमे की नमाज़ में सूरह अल-जुमुआह और सूरह अल-मुनाफ़िकून (إِذَا جَاءَكَ الْمُنَافِقُونَ) पढ़ते थे।
(सहीह मुस्लिम)
इस हदीस से मिलने वाले महत्वपूर्ण सबक
- जुमे की फ़ज्र में सूरह अस-सज्दा (सूरह 32) और अल-इन्सान (सूरह 76) पढ़ना सुन्नत है।
- जुमे की नमाज़ में पहली रकअत में सूरह अल-जुमुआह (सूरह 62) और दूसरी रकअत में सूरह अल-मुनाफ़िकून (सूरह 63) पढ़ना सुन्नत है।
- इन सूरहों में इंसान की पैदाइश, क़ियामत, हिसाब-किताब, ईमान और निफ़ाक़ (पाखंड) जैसे महत्वपूर्ण विषयों का ज़िक्र है, जो जुमे के दिन की याददिहानी के लिए उपयुक्त हैं।
6. सूरह क़ाफ़ (Surah Qaf)
وَعَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ قَالَ: كَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقْرَأُ فِي الْفَجْرِ ب (ق وَالْقُرْآن الْمجِيد) وَنَحْوِهَا وَكَانَتْ صَلَاتُهُ بَعْدُ تَخْفِيفًا. رَوَاهُ مُسْلِمٌ
हज़रत जाबिर बिन समुरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ फ़ज्र की नमाज़ में सूरह “قٓ وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ” (सूरह क़ाफ़) पढ़ा करते थे, और इसके बाद आपकी नमाज़ हल्की (मध्यम लंबाई की) होती थी। (सहीह मुस्लिम)
7. सूरह अत-तकवीर (Surah At-Takwir)
وَعَنْ عَمْرِو بْنِ حُرَيْثٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ: أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ ﷺ يَقْرَأُ فِي الْفَجْرِ: ﴿وَاللَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ﴾. رَوَاهُ مُسْلِمٌ.
हज़रत अम्र बिन हुरैस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
"मैंने नबी करीम ﷺ को फ़ज्र की नमाज़ में 'وَاللَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ' पढ़ते हुए सुना।"(सहीह मुस्लिम)
यह आयत सूरह अत-तकवीर की है। इस हदीस से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़ज्र की नमाज़ में क़ुरआन की लंबी सूरतें और आयतें पढ़ा करते थे।
8. सूरह अल-आला (Surah Al-A‘la)
सहीह मुस्लिम में हज़रत जाबिर बिन समुरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
﴿سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى﴾
अनुवाद:
“नबी करीम ﷺ ज़ुहर की नमाज़ में सूरह अल-आला की तिलावत फ़रमाते थे, जबकि फ़ज्र में इससे लंबी क़िराअत करते थे।”
عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ النَّبِيَّ ﷺ كَانَ يَقْرَأُ فِي الظُّهْرِ بِـ ﴿سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى﴾، وَفِي الصُّبْحِ بِأَطْوَلَ مِنْ ذَلِكَ.
हज़रत जाबिर बिन समुरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि
"नबी करीम ﷺ ज़ुहर की नमाज़ में ‘سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى’ (सूरह अल-आला) की तिलावत फ़रमाते थे, और फ़ज्र की नमाज़ में इससे भी लंबी क़िराअत फ़रमाते थे।"
(सहीह मुस्लिम)
इस हदीस से पता चलता है कि रसूलुल्लाह ﷺ नमाज़ों में उनकी मुनासिब हालत के मुताबिक़ क़िराअत फ़रमाते थे। ज़ुहर में मध्यम लंबाई की सूरतें पढ़ते थे, जबकि फ़ज्र में निस्बतन लंबी क़िराअत करते थे। इसलिए फ़ज्र की नमाज़ में लंबी तिलावत करना सुन्नत है।
9. सूरह अश-शम्स (Surah Ash-Shams)
जामे तिर्मिज़ी में है:
عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ يَقْرَأُ فِي الْعِشَاءِ الْآخِرَةِ بِـ ﴿وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا﴾ وَنَحْوِهَا مِنَ السُّوَرِ.
हज़रत अब्दुल्लाह बिन बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु अपने वालिद हज़रत बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि:
"रसूलुल्लाह ﷺ इशा की नमाज़ में ‘وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا’ (सूरह अश-शम्स) और उसके जैसी दूसरी सूरहों की तिलावत फ़रमाते थे।"
होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ इशा की नमाज़ में आम तौर पर मध्यम लंबाई की सूरहें पढ़ते थे। सूरह अश-शम्स और उसके जैसी सूरहें न बहुत लंबी हैं और न बहुत छोटी, इसलिए जमाअत की आसानी का भी ख़याल रखा जाता था।
10. सूरह अल-लैल (Surah Al-Layl)
सहीह मुस्लिम में हज़रत जाबिर बिन समुरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: كَانَ النَّبِيُّ ﷺ يَقْرَأُ فِي الظُّهْرِ بِـ ﴿وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى﴾، وَفِي الْعَصْرِ نَحْوَ ذَلِكَ، وَفِي الصُّبْحِ أَطْوَلَ مِنْ ذَلِكَ.
हज़रत जाबिर बिन समुरह रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
"नबी करीम ﷺ ज़ुहर की नमाज़ में ‘وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى’ (सूरह अल-लैल) की तिलावत फ़रमाते थे। अस्र की नमाज़ में भी लगभग इसी के बराबर क़िराअत करते थे, और फ़ज्र की नमाज़ में इससे ज़्यादा लंबी क़िराअत फ़रमाते थे।"
इस हदीस से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ज़ुहर और अस्र की नमाज़ में मध्यम लंबाई की सूरहें पढ़ते थे, जबकि फ़ज्र की नमाज़ में उनसे अधिक लंबी क़िराअत फ़रमाते थे। इससे नमाज़ों की क़िराअत में संतुलन और सुन्नत का तरीका समझ में आता है।
11. सूरह अत-तूर (Surah At-Tur)
सहीह बुख़ारी में हज़रत जुबैर बिन मुतइम रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ يَقْرَأُ فِي الْمَغْرِبِ بِالطُّورِ
“मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को मग़रिब की नमाज़ में सूरह अत-तूर की तिलावत करते हुए सुना।”
इस हदीस से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ कभी-कभी मग़रिब की नमाज़ में लंबी सूरहें भी पढ़ते थे। हालाँकि आम तौर पर मग़रिब में छोटी सूरहें पढ़ी जाती थीं, लेकिन कभी सूरह अत-तूर जैसी लंबी सूरह की तिलावत भी फ़रमाते थे। इससे पता चलता है कि मग़रिब की क़िराअत एक ही प्रकार तक सीमित नहीं थी।
12. सूरह अल-क़मर (Surah Al-Qamar)
सहीह मुस्लिम में हज़रत अबू वाक़िद लैसी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
عَنْ أَبِي وَاقِدٍ اللَّيْثِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّهُ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ يَقْرَأُ فِي الْفِطْرِ وَالْأَضْحَى بِـ ﴿قٓ وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ﴾ وَ﴿اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَانْشَقَّ الْقَمَرُ﴾.
हज़रत अबू वाक़िद लैसी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
"रसूलुल्लाह ﷺ ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा की नमाज़ में ‘قٓ وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ’ (सूरह क़ाफ़) और ‘اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَانْشَقَّ الْقَمَرُ’ (सूरह अल-क़मर) की तिलावत फ़रमाते थे।"
इस हदीस से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ईद की नमाज़ों में कभी सूरह क़ाफ़ और सूरह अल-क़मर पढ़ा करते थे। इन दोनों सूरहों में अल्लाह की कुदरत, क़ियामत, हिसाब-किताब और नसीहत के महत्वपूर्ण विषय बयान हुए हैं, जो ईद के बड़े इज्तिमा में लोगों को याद दिलाने के लिए बहुत मुनासिब हैं।
13. सूरह अल-मुरसलात (Surah Al-Mursalat)
सहीह बुख़ारी में हज़रत उम्मुल फ़ज़्ल रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है:
عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، أَنَّهُ قَالَ: إِنَّ أُمَّ الْفَضْلِ سَمِعَتْهُ وَهُوَ يَقْرَأُ ﴿وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا﴾، فَقَالَتْ: يَا بُنَيَّ، وَاللَّهِ لَقَدْ ذَكَّرْتَنِي بِقِرَاءَتِكَ هَذِهِ السُّورَةَ، إِنَّهَا لَآخِرُ مَا سَمِعْتُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ يَقْرَأُ بِهَا فِي الْمَغْرِبِ.
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि:
उम्मुल फ़ज़्ल रज़ियल्लाहु अन्हा ने उन्हें सूरह ‘وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا’ पढ़ते हुए सुना, तो उन्होंने कहा:
"ऐ मेरे बेटे! अल्लाह की क़सम, तुम्हारी इस तिलावत ने मुझे उस सूरह की याद दिला दी, क्योंकि यही आख़िरी सूरह थी जिसे मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को मग़रिब की नमाज़ में पढ़ते हुए सुना था।"
सहीह बुख़ारी
इस हदीस से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दौर में भी मग़रिब की नमाज़ में सूरह अल-मुर्सलात की तिलावत फ़रमाई थी। इससे यह भी साबित होता है कि मग़रिब की नमाज़ में कभी-कभी लंबी सूरहें पढ़ना भी सुन्नत है।
14. सूरह अल-इंशिक़ाक़ (Surah Al-Inshiqaq)
सहीह बुख़ारी में हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّهُ قَرَأَ ﴿إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ﴾ فَسَجَدَ فِيهَا، ثُمَّ قَالَ: سَجَدْتُ بِهَا خَلْفَ أَبِي الْقَاسِمِ ﷺ، فَلَا أَزَالُ أَسْجُدُ بِهَا حَتَّى أَلْقَاهُ.
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु ने नमाज़ में सूरह ‘إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ’ की तिलावत की और आयत-ए-सज्दा पर सज्दा किया। फिर फ़रमाया:
"मैंने इस सूरह की आयत-ए-सज्दा पर अबुल-क़ासिम (रसूलुल्लाह ﷺ) के पीछे सज्दा किया था, इसलिए मैं हमेशा इस पर सज्दा करता रहूँगा, यहाँ तक कि उनसे जा मिलूँ।"
इस हदीस से मालूम होता है कि सूरह अल-इंशिक़ाक़ (إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ) में आने वाली आयत-ए-सज्दा पर रसूलुल्लाह ﷺ ने सज्दा किया था। हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु ने उसी सुन्नत को ज़िन्दा रखा और फ़रमाया कि मैं भी इसी तरह सज्दा करता रहूँगा।
क़ुरआन में जहाँ आयत-ए-सज्दा आए, वहाँ सज्दा-ए-तिलावत करना रसूलुल्लाह ﷺ की वाजिब है, और सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने भी इसी पर अमल किया।
15. सूरह अत-तीन (Surah At-Tin)
सहीह बुख़ारी में हज़रत बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
سَمِعْتُ النَّبِيَّ ﷺ يَقْرَأُ بِـ ﴿وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ﴾ فِي الْعِشَاءِ، وَمَا سَمِعْتُ أَحَدًا أَحْسَنَ صَوْتًا مِنْهُ أَوْ قِرَاءَةً
“मैंने नबी करीम ﷺ को इशा की नमाज़ में सूरह अत-तीन की तिलावत करते हुए सुना, और मैंने आप ﷺ से अधिक मधुर आवाज़ और सुंदर क़िराअत किसी की नहीं सुनी।”
निष्कर्ष (Conclusion)
उपरोक्त अहादीस से यह स्पष्ट होता है कि नमाज़ में क़ुरआन की कोई भी सूरह पढ़ना जायज़ है, लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ ने कुछ विशेष सूरहों की तिलावत विभिन्न नमाज़ों में नियमित रूप से फ़रमाई। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे इन सूरहों की तिलावत का भी एहतिमाम (Special Practice) करें, ताकि नबी करीम ﷺ की इस मुबारक सुन्नत को जीवित रखा जा सके और नमाज़ में अधिक सुन्नत के अनुसार अमल करने का सौभाग्य प्राप्त हो।
संदर्भ (References)
- सहीह बुख़ारी (Sahih al-Bukhari), किताबुल-अज़ान, बाब: मग़रिब में ऊँची आवाज़ से क़िराअत
- सहीह बुख़ारी (Sahih al-Bukhari), किताबुल-अज़ान, बाब: मग़रिब में क़िराअत
- सुनन बैहक़ी (Sunan al-Bayhaqi), किताबुस्सलाह
- सहीह मुस्लिम (Sahih Muslim), किताबुस्सलाह, बाब: फ़ज्र में क़िराअत
- सहीह मुस्लिम (Sahih Muslim), किताबुल-जुमुआ, बाब: जुमुआ की नमाज़ में क़िराअत
- जामे तिर्मिज़ी (Jami‘ al-Tirmidhi), अबवाबुस्सलाह
- सहीह मुस्लिम (Sahih Muslim), किताबु सलातिल-ईदैन, बाब: ईद की नमाज़ में क़िराअत
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
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