हिजरी कैलेंडर की आवश्यकता और उसकी स्थापना की कहानी

जब भी कोई मुसलमान "1448 हिजरी" या "1447 हिजरी" लिखता है, तो वह केवल एक वर्ष नहीं लिख रहा होता, बल्कि वह अपने इतिहास की एक महान घटना की याद को जीवित रख रहा होता है। हिजरी कैलेंडर केवल समय गिनने का तरीका नहीं है, बल्कि यह इस्लामी पहचान, इतिहास और सभ्यता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस्लाम से पहले अरबों के पास महीनों के नाम तो थे, लेकिन वर्षों की कोई निश्चित गिनती नहीं थी। लोग महत्वपूर्ण घटनाओं के आधार पर समय को याद रखते थे। उदाहरण के लिए, जिस वर्ष रसूलुल्लाह ﷺ का जन्म हुआ, उसे "आमुल फ़ील" (हाथी वाला साल) कहा जाता था। लोग कहते थे कि फलां क घटना हाथी वाले साल के पाँच वर्ष बाद हुई या दस वर्ष बाद हुई। उस समय के लिए यह तरीका पर्याप्त था, लेकिन जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ, इसकी सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं।

इस्लाम ने समय की गणना (Calculation of time) को चाँद से जोड़ा। कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَهِلَّةِ ۖ قُلْ هِيَ مَوَاقِيتُ لِلنَّاسِ وَالْحَجِّ﴾

"वे आपसे नए चाँदों के बारे में पूछते हैं। कह दीजिए कि वे लोगों और हज के लिए समय निर्धारित करने का साधन हैं।" (सूरह अल-बक़रा : 189)

एक अन्य स्थान पर अल्लाह फ़रमाता है:

﴿إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِنْدَ اللّٰهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا﴾ "अल्लाह के यहाँ महीनों की संख्या बारह है।"

(सूरह अत-तौबा: 36)

इसीलिए इस्लामी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित है और इसके बारह महीने हैं। नया महीना चाँद दिखाई देने से शुरू होता है।

रसूलुल्लाह ﷺ के जीवनकाल में महीनों के नाम तो प्रयोग होते थे, लेकिन कोई आधिकारिक वर्ष संख्या नहीं थी। पत्र लिखे जाते थे, समझौते होते थे और प्रशासनिक कार्य भी होते थे, लेकिन आमतौर पर केवल महीना लिखा जाता था। उस समय तक अलग कैलेंडर की आवश्यकता बहुत अधिक महसूस नहीं हुई थी।

लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात के बाद इस्लामी राज्य तेजी से फैलने लगा। हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु और विशेष रूप से हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर में इस्लामी शासन अरब से निकलकर इराक, शाम, मिस्र और फ़ारस तक फैल गया। अब सरकारी कामकाज बढ़ चुका था। विभिन्न इलाकों में आदेश भेजे जाते थे, करों का हिसाब रखा जाता था और सरकारी दस्तावेज़ तैयार किए जाते थे।

इसी दौरान एक पत्र हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आया जिसमें महीना तो लिखा था, लेकिन वर्ष नहीं लिखा गया था। इससे भ्रम पैदा हुआ कि यह आदेश किस वर्ष का है। यहीं से यह आवश्यकता महसूस हुई कि मुसलमानों का अपना एक व्यवस्थित कैलेंडर होना चाहिए।

हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने प्रमुख सहाबा को बुलाकर मशविरा किया। प्रश्न यह था कि इस्लामी वर्ष-गणना की शुरुआत किस घटना से की जाए? 

कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ के जन्म से गिनती शुरू होनी चाहिए। कुछ ने नुबुव्वत की शुरुआत का सुझाव दिया। कुछ ने वफ़ात को आधार बनाने की बात कही। लेकिन अंततः सहाबा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सबसे उपयुक्त घटना हिजरत (Migration) है।

इसका कारण स्पष्ट था। हिजरत केवल एक यात्रा नहीं थी। मक्का में मुसलमान एक सताया हुआ समुदाय थे, जबकि मदीना में पहुँचकर उन्होंने एक स्वतंत्र समाज स्थापित किया। मस्जिद-ए-नबवी बनी, मुहाजिर और अंसार का भाईचारा स्थापित हुआ और इस्लामी समाज की नींव रखी गई। इसलिए हिजरत इस्लामी इतिहास का वास्तविक मोड़ थी।

इसीलिए निर्णय लिया गया कि इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत हिजरत से की जाएगी। यही निर्णय आगे चलकर "हिजरी कैलेंडर" (Hijri Calender) के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

हिजरी कैलेंडर का महत्व और उसका संदेश

जब सहाबा ने हिजरत को आधार बनाने का निर्णय कर लिया, तो एक और प्रश्न सामने आया। हिजरत तो रबीउल अव्वल महीने में हुई थी, फिर वर्ष का पहला महीना कौन-सा रखा जाए?

मशविरे के बाद मुहर्रम को पहला महीना निर्धारित किया गया। मुहर्रम पहले से ही अरबों के बीच वर्ष का प्रारम्भिक महीना माना जाता था। साथ ही बैअत-ए-अक़बा के बाद हिजरत की तैयारी भी इसी समय से शुरू हो चुकी थी। इसलिए मुहर्रम को वर्ष का पहला महीना बना दिया गया।

हिजरी कैलेंडर के बारह महीने हैं:

मुहर्रम, सफ़र, रबीउल अव्वल, रबीउस्सानी, जुमादा अल-ऊला, जुमादा अल-आख़िरा, रजब, शाबान, रमज़ान, शव्वाल, ज़िलक़ादा और ज़िलहिज्जा।

इन महीनों में कई महत्वपूर्ण इबादतें जुड़ी हुई हैं। रमज़ान में रोज़े रखे जाते हैं, शव्वाल में ईदुल-फ़ित्र मनाई जाती है और ज़िलहिज्जा में हज तथा ईदुल-अज़हा अदा की जाती है। यदि हिजरी कैलेंडर न हो, तो इन इबादतों का सही समय निर्धारित करना संभव नहीं होगा।

इस्लाम में चार महीनों को विशेष सम्मान प्राप्त है। क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

 ﴿مِنْهَا أَرْبَعَةٌ حُرُمٌ﴾

"इनमें से चार महीने सम्मान वाले हैं।" (सूरह अत-तौबा: 36)

ये महीने हैं: मुहर्रम, रजब, ज़िलक़ादा और ज़िलहिज्जा।

हिजरी कैलेंडर का महत्व केवल धार्मिक अवसरों तक सीमित नहीं है। यह मुसलमानों को उनके इतिहास से जोड़ता है। हर नया हिजरी वर्ष हमें हिजरत की याद दिलाता है—उस महान त्याग की, जब रसूलुल्लाह ﷺ और उनके साथियों ने अल्लाह की खातिर अपने घर, अपनी संपत्ति और अपना आराम छोड़ दिया।

हिजरत की यही भावना हिजरी कैलेंडर की आत्मा है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ

"अमलों का दारोमदार नीयतों पर है।" (सहीह अल-बुख़ारी)

यह हदीस हिजरत के संदर्भ में कही गई थी। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी कार्य का मूल्य उसकी नीयत से तय होता है। हिजरत केवल स्थान बदलने का नाम नहीं था, बल्कि अल्लाह की खुशी के लिए किया गया त्याग था।

आज के समय में मुसलमान दैनिक जीवन में ईस्वी कैलेंडर का उपयोग करते हैं, जो आवश्यक भी है। लेकिन साथ ही हिजरी कैलेंडर से जुड़ाव बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। रमज़ान, हज, आशूरा, शाबान और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों की पहचान इसी कैलेंडर से होती है। यदि नई पीढ़ी हिजरी महीनों और उनकी विशेषताओं को जानेगी, तो उसका संबंध अपने इतिहास और अपनी पहचान से मजबूत होगा।

निष्कर्ष

हिजरी कैलेंडर केवल तारीख़ों और महीनों की सूची नहीं है। यह इस्लाम के संघर्ष, त्याग, सब्र और सफलता की कहानी है। इसकी शुरुआत किसी राजा या साम्राज्य से नहीं, बल्कि हिजरत जैसी महान घटना से हुई। यही बात इसे विशेष बनाती है।

जब हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु और अन्य सहाबा ने हिजरत को इस्लामी वर्ष-गणना की शुरुआत बनाया, तो उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दिया कि मुसलमानों की पहचान केवल सत्ता और विजय से नहीं, बल्कि ईमान, कुर्बानी और अल्लाह पर भरोसे से बनती है।

इसीलिए हिजरी कैलेंडर आज भी केवल समय की गिनती नहीं, बल्कि इस्लामी इतिहास और पहचान की एक जीवित विरासत है।

 By: Web Desk

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