पानी : अल्लाह तआला की एक महान नेमत

पानी जीवन, रहमत और अल्लाह तआला की महान निशानी

अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को इंसानों के लिए एक बहुत बड़ी नेमत बनाया है। उसने हमें साँस लेने के लिए हवा दी, रहने के लिए ज़मीन दी, खाने के लिए फल, सब्ज़ियाँ और अनाज पैदा किए, परिवार और रिश्तों जैसी अनमोल नेमतें अता फ़रमाईं। इन्हीं महान नेमतों में एक ऐसी नेमत भी है जिसके बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, और वह है पानी

अगर कुछ समय तक इंसान को भोजन न मिले, तो वह किसी हद तक जीवित रह सकता है। लेकिन पानी के बिना जीवन बहुत जल्दी समाप्त हो सकता है। इंसान, जानवर, पेड़-पौधे, खेती, उद्योग, पर्यावरण और पूरी सभ्यता—सबका अस्तित्व पानी पर निर्भर है। इसलिए इस्लाम पानी को केवल एक प्राकृतिक संसाधन (Natural Resource) नहीं मानता, बल्कि अल्लाह तआला की बहुत बड़ी रहमत और अमानत मानता है।

आज जब पूरी दुनिया जल संकट, जल प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना कर रही है, तब क़ुरआन और हदीस की शिक्षाएँ पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं। इस्लाम हमें केवल पानी का उपयोग करना ही नहीं सिखाता, बल्कि उसकी रक्षा करना, उसका सम्मान करना और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना भी सिखाता है।

पानी अल्लाह तआला की अनगिनत नेमतों में से एक

इंसान चाहे जितना भी विज्ञान में आगे बढ़ जाए, वह एक बूंद पानी भी पैदा नहीं कर सकता। पानी केवल अल्लाह तआला की दी हुई नेमत है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَآتَاكُمْ مِنْ كُلِّ مَا سَأَلْتُمُوهُ ۚ وَإِنْ تَعُدُّوا نِعْمَتَ اللّٰهِ لَا تُحْصُوهَا ۗ إِنَّ الْإِنسَانَ لَظَلُومٌ كَفَّارٌ﴾

"अल्लाह ने तुम्हें वह सब कुछ दिया जिसकी तुम्हें ज़रूरत थी। यदि तुम अल्लाह की नेमतों को गिनना चाहो, तो उन्हें कभी नहीं गिन सकते। निश्चय ही इंसान बड़ा नाशुक्रा है।"

(सूरह इब्राहीम : 34)

यह आयत हमें सिखाती है कि पानी सहित हर नेमत पर हमें अल्लाह तआला का शुक्र अदा करना चाहिए। जो इंसान नेमत की क़दर करता है, अल्लाह तआला उसकी नेमतों में बरकत अता फ़रमाता है।

  1. पानी जीवन की बुनियाद

आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि पानी के बिना जीवन संभव नहीं है।

पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से ढका हुआ है। मानव शरीर का अधिकांश भाग भी पानी से बना है।

खेती, पशुपालन, उद्योग, पर्यावरण, जंगल, नदियाँ और समुद्र—सब पानी पर निर्भर हैं। लेकिन यह सच्चाई विज्ञान ने आज बताई, जबकि क़ुरआन ने लगभग चौदह सौ वर्ष पहले ही इसका ऐलान कर दिया था।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَجَعَلْنَا مِنَ الْمَاءِ كُلَّ شَيْءٍ حَيٍّ ۖ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ﴾

"और हमने हर जीवित चीज़ को पानी से पैदा किया। फिर भी क्या वे ईमान नहीं लाएँगे?"

(सूरह अल-अंबिया : 30)

यह आयत केवल एक धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सच्चाई भी है। आज जीवविज्ञान (Biology) भी मानता है कि प्रत्येक जीवित कोशिका (Cell) में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए पानी केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन की बुनियाद है।

बारिश अल्लाह तआला की रहमत

जब धरती सूख जाती है, खेत बंजर हो जाते हैं और इंसान बारिश का इंतज़ार करता है, तब अल्लाह तआला अपनी रहमत के रूप में बारिश भेजता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَهُوَ الَّذِي يُنَزِّلُ الْغَيْثَ مِنْ بَعْدِ مَا قَنَطُوا وَيَنْشُرُ رَحْمَتَهُ ۚ وَهُوَ الْوَلِيُّ الْحَمِيدُ﴾

"वही है जो लोगों के निराश हो जाने के बाद बारिश बरसाता है और अपनी रहमत फैला देता है। वही सबका संरक्षक है और हर प्रशंसा का अधिकारी है।"

(सूरह अश-शूरा : 28)

एक दूसरी जगह अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَكُمْ﴾

"उसने आसमान से पानी बरसाया और उसके माध्यम से तुम्हारे लिए तरह-तरह के फल पैदा किए, जो तुम्हारी रोज़ी हैं।"

(सूरह अल-बक़रा : 22)

जब सूखी धरती पर बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो कुछ ही दिनों में वहाँ हरियाली छा जाती है। यह केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की शक्ति और रहमत की जीवित निशानी है।

इसी तरह जिस तरह अल्लाह तआला सूखी धरती को दोबारा जीवित कर देता है, उसी तरह वह क़ियामत के दिन इंसानों को भी दोबारा ज़िंदा करेगा।

पानी और सभ्यता का गहरा रिश्ता

यदि हम इतिहास का अध्ययन करें, तो पता चलता है कि दुनिया की लगभग सभी महान सभ्यताएँ (Civilizations) नदियों के किनारे विकसित हुईं। मिस्र (Egypt) की सभ्यता नील नदी के किनारे फली-फूली।

मेसोपोटामिया (Mesopotamia) की सभ्यता दजला (Tigris) और फ़ुरात (Euphrates) नदियों के बीच विकसित हुई। भारत की सिंधु घाटी सभ्यता सिंधु नदी (Sindhu river) के किनारे बसी।चीन की प्राचीन सभ्यता ह्वांग-हो (Hwang-Ho) नदी के आसपास विकसित हुई।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जहाँ पानी था, वहीं खेती थी। जहाँ खेती थी, वहीं भोजन था। जहाँ भोजन था, वहीं लोग बसने लगे। और जहाँ लोग बसे, वहीं सभ्यता का विकास हुआ। यानी पानी केवल जीवन नहीं देता, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति का निर्माण भी करता है।

मक्का और ज़मज़म पानी से बसती हुई एक बस्ती

इस्लामी इतिहास में पानी की सबसे सुंदर मिसाल ज़मज़म का पानी है।

जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला के हुक्म से अपनी पत्नी हज़रत हाजिरा रज़ियल्लाहु अन्हा और छोटे बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को मक्का की सूखी घाटी में छोड़कर गए, तब वहाँ न कोई खेती थी, न कोई आबादी और न ही पानी का कोई स्रोत।

उस समय हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने दुआ की, जिसे अल्लाह तआला ने क़ुरआन में बयान किया है:

﴿رَبَّنَا إِنِّي أَسْكَنْتُ مِنْ ذُرِّيَّتِي بِوَادٍ غَيْرِ ذِي زَرْعٍ عِنْدَ بَيْتِكَ الْمُحَرَّمِ...

" हमारे रब! मैंने अपनी कुछ संतान को तेरे पवित्र घर के पास ऐसी घाटी में बसाया है जहाँ कोई खेती नहीं होती, ताकि वे नमाज़ क़ायम करें..."

(सूरह इब्राहीम : 37)

जब पानी समाप्त हो गया, तो हज़रत हाजिरा रज़ियल्लाहु अन्हा अपने बच्चे के लिए पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा पहाड़ियों के बीच दौड़ीं। उनकी इस कोशिश के बाद अल्लाह तआला ने ज़मज़म का चश्मा जारी कर दिया।

यही पानी आगे चलकर मक्का की बस्ती बसने का कारण बना। लोग वहाँ आने लगे, क़बीले बसने लगे और धीरे-धीरे वही स्थान दुनिया के सबसे पवित्र शहर में बदल गया।

यह घटना हमें सिखाती है कि जहाँ पानी होता है, वहाँ जीवन, बस्ती और सभ्यता विकसित होती है। साथ ही यह भी कि इंसान कोशिश करे और अल्लाह तआला पर भरोसा रखे, तो वह ऐसे रास्ते खोल देता है जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

लेकिन आज यही पानी, जो कभी सभ्यताओं को बसाने का कारण था, मानव की लापरवाही के कारण संकट में पड़ता जा रहा है। जल प्रदूषण, भूजल की कमी, जलवायु परिवर्तन और पानी की बर्बादी जैसी समस्याएँ पूरी दुनिया के सामने चुनौती बन चुकी हैं। इन समस्याओं का समाधान क्या है? इस्लाम पानी के संरक्षण और उसके संतुलित उपयोग के बारे में क्या सिखाता है?

जल संरक्षण, इस्लामी ज़िम्मेदारी और हमारा भविष्य

जाना कि पानी केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि के जीवन की बुनियाद है। क़ुरआन ने हमें बताया कि हर जीवित चीज़ की रचना पानी से हुई है। हमने यह भी देखा कि बारिश अल्लाह तआला की रहमत है और इतिहास की महान सभ्यताएँ भी पानी के आसपास ही विकसित हुईं। मक्का की घाटी में ज़मज़म का चश्मा फूटना भी इस बात का प्रमाण है कि जहाँ पानी होता है, वहाँ जीवन और बस्तियाँ बसती हैं।

लेकिन आज इंसान उसी नेमत की क़दर करना भूलता जा रहा है। पानी की बर्बादी, नदियों का प्रदूषण, भूजल का लगातार कम होना और जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। ऐसे समय में इस्लाम की शिक्षाएँ हमें संतुलित जीवन और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा का रास्ता दिखाती हैं।

पानी की हिफ़ाज़त हर इंसान की ज़िम्मेदारी

इस्लाम सिखाता है कि इंसान इस धरती का मालिक नहीं, बल्कि अल्लाह तआला का ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) है। उसे धरती की नेमतों का सही उपयोग करना है, न कि उन्हें नष्ट करना।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ﴾

"फ़िज़ूलखर्ची मत करो। निश्चय ही अल्लाह तआला फ़िज़ूलखर्ची करने वालों को पसंद नहीं करता।"

(सूरह अल-आराफ़ : 31)

यद्यपि यह आयत सामान्य रूप से फ़िज़ूलखर्ची के बारे में है, लेकिन इस्लामी विद्वानों ने बताया है कि इसमें पानी सहित हर नेमत का अनावश्यक उपयोग भी शामिल है।

आज लाखों लीटर पानी केवल लापरवाही के कारण व्यर्थ बह जाता है। कहीं नल खुले रहते हैं, कहीं साफ़ पानी गंदा कर दिया जाता है और कहीं आवश्यकता से कई गुना अधिक पानी खर्च किया जाता है। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की नेमत की नाशुक्री भी है।

रसूलुल्लाह ने पानी बचाने की शिक्षा दी

आज पूरी दुनिया "Water Conservation" की बात कर रही है, लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ ने लगभग चौदह सौ वर्ष पहले ही पानी बचाने की शिक्षा दे दी थी।

एक बार आपने फ़रमाया:

«لَا تُسْرِفْ فِي الْمَاءِ وَلَوْ كُنْتَ عَلَى نَهْرٍ جَارٍ»

"पानी में फ़िज़ूलखर्ची मत करो, चाहे तुम बहती हुई नदी के किनारे ही क्यों हो।"

(सुनन इब्न माजह)

इस हदीस का संदेश बहुत गहरा है।

अगर बहती हुई नदी के किनारे भी पानी व्यर्थ नहीं बहाना चाहिए, तो आज जब दुनिया के अनेक क्षेत्रों में पीने का पानी भी कठिनाई से मिलता है, तब हमें कितनी सावधानी बरतनी चाहिए।

रसूलुल्लाह ﷺ स्वयं वुज़ू करते समय भी बहुत कम पानी इस्तेमाल करते थे। इससे हमें सादगी, संतुलन और संसाधनों की क़दर करने की शिक्षा मिलती है।

पानी को गंदा करना इस्लाम में मना है

इस्लाम केवल पानी बचाने की ही नहीं, बल्कि उसे स्वच्छ रखने की भी शिक्षा देता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«لَا يَبُولَنَّ أَحَدُكُمْ فِي الْمَاءِ الدَّائِمِ الَّذِي لَا يَجْرِي»

"तुममें से कोई भी ठहरे हुए पानी में पेशाब करे।"

(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

यह हदीस केवल एक व्यक्तिगत आदाब नहीं सिखाती, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का भी महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करती है।

आज नदियों, झीलों और तालाबों में औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक और गंदगी डालने से जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। इससे केवल इंसानों को ही नहीं, बल्कि मछलियों, पक्षियों, जानवरों और पूरे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। इस्लाम ऐसी हर हरकत से रोकता है जो समाज और प्रकृति को हानि पहुँचाए।

वैश्विक जल संकट और हमारी ज़िम्मेदारी

आज दुनिया के अनेक देशों में पीने योग्य पानी की कमी बढ़ रही है।

जनसंख्या में वृद्धि, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण, भूजल का अत्यधिक दोहन, जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते जल संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में पानी सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती बन सकता है।

ऐसे समय में इस्लाम हमें केवल चिंता करने के लिए नहीं, बल्कि समाधान अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

हम अपने जीवन में कुछ छोटे-छोटे कदम उठाकर भी बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं—

  • वुज़ू और घरेलू कामों में आवश्यकता के अनुसार पानी का उपयोग करें।
  • खुला नल कभी न छोड़ें।
  • वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को बढ़ावा दें।
  • नदियों, तालाबों और कुओँ को गंदा न करें।
  • पेड़ लगाएँ, क्योंकि पेड़ वर्षा और जल संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • बच्चों को बचपन से पानी की क़दर करना सिखाएँ।

यही इस्लाम की सच्ची शिक्षा है।

पानी नेमत भी, इम्तिहान भी

पानी अल्लाह तआला की बहुत बड़ी नेमत है, लेकिन साथ ही यह इंसान के लिए एक इम्तिहान भी है।

क्या हम उसका शुक्र अदा करते हैं? क्या हम उसकी हिफ़ाज़त करते हैं?

क्या हम उसे दूसरों के साथ बाँटते हैं? क्या हम उसे बर्बाद होने से बचाते हैं?

इन सभी सवालों का जवाब हमें अपने जीवन से देना होगा।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَأَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً بِقَدَرٍ فَأَسْكَنَّاهُ فِي الْأَرْضِ ۖ وَإِنَّا عَلَىٰ ذَهَابٍ بِهِ لَقَادِرُونَ﴾

"हमने आसमान से एक निश्चित मात्रा में पानी उतारा और उसे धरती में ठहरा दिया, और यदि चाहें तो उसे समाप्त भी कर सकते हैं।"

(सूरह अल-मुमिनून : 18)

यह आयत हमें याद दिलाती है कि पानी पर हमारा अधिकार नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की मेहरबानी है। यदि वह चाहे, तो यह नेमत हमसे वापस भी ले सकता है।

निष्कर्ष

पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की महान रहमत, इंसानी जीवन की बुनियाद और पूरी सभ्यता का आधार है। क़ुरआन हमें बताता है कि हर जीवित चीज़ की रचना पानी से हुई है, और हदीस हमें सिखाती है कि इस नेमत का उपयोग संतुलित और ज़िम्मेदारी के साथ किया जाए।

आज जब पूरी दुनिया जल संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब इस्लाम की शिक्षाएँ पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। यदि हम क़ुरआन और सुन्नत के बताए हुए उसूलों को अपनाएँ—पानी की क़दर करें, उसकी बर्बादी रोकें, उसे स्वच्छ रखें और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनाएँ—तो हम न केवल एक अच्छे नागरिक बनेंगे, बल्कि अल्लाह तआला की इस महान नेमत का सही शुक्र भी अदा करेंगे।

आइए, हम आज यह संकल्प लें कि पानी को केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की अमानत समझेंगे। हर बूंद की क़दर करेंगे, उसे व्यर्थ नहीं बहाएँगे और दूसरों को भी जल संरक्षण के लिए प्रेरित करेंगे। यही इस्लाम की शिक्षा है, यही इंसानियत की माँग है और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की सबसे मज़बूत नींव है।

संदर्भ

  • सूरह इब्राहीम
  • सूरह अल-अंबिया
  • सूरह अश-शूरा
  • सूरह अल-बक़रा
  • सूरह अल-आराफ़
  • सूरह अल-मुमिनून
  • सुनन इब्न माजह
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम

 

 

लेखक:

फ़ैज़ान कौसर, दारुल हुदा उच्च माध्यमिक विद्यालय, प्रथम वर्ष, किशनगंज, बिहार

Disclaimer

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