इस्लाम की रोशनी में पिकनिक मनोरंजन इबादत और नैतिक सीमाओं का संतुलन
भूमिका
इस्लाम एक पूर्ण जीवन-प्रणाली (complete way of life) है। यह केवल नमाज़, रोज़ा और इबादत तक सीमित नहीं है, बल्कि इंसान के व्यवहार (behaviour), भावनाओं (emotions), सामाजिक जीवन (social life) और यहाँ तक कि मनोरंजन (entertainment) तक को सही दिशा देता है। यह सोचना कि इस्लाम इंसान को खुशी और आनंद से रोकता है, बिल्कुल गलत धारणा है। इस्लाम यह सिखाता है कि हलाल (lawful) तरीकों से खुशी और आनंद लेना इंसान की प्राकृतिक ज़रूरत है, बशर्ते वह नैतिकता (morality) और अल्लाह की याद (remembrance of Allah) के दायरे में हो।
पिकनिक का सामान्य अर्थ है—खुले माहौल में परिवार या दोस्तों के साथ समय बिताना, खाना खाना और मन को सुकून देना। इस्लामी नज़रिए से पिकनिक न तो अपने आप में हराम (forbidden) है और न ही अपने आप में कोई बड़ा सवाब (reward)। इसका सही या गलत होना इस बात पर निर्भर करता है कि नीयत (intention) क्या है, व्यवहार कैसा है और इस्लामी उसूलों (principles) का कितना पालन किया गया है। अगर पिकनिक में अल्लाह की याद, शालीनता और हलाल तरीकों का ध्यान रखा जाए, तो वही पिकनिक इबादत (worship) का रूप भी ले सकती है।
इस्लाम का संतुलित जीवन दृष्टिकोण
इस्लाम को दीन-ए-फ़ित्रत (religion of nature) कहा जाता है, यानी ऐसा धर्म जो इंसान की प्राकृतिक बनावट (human nature) के बिल्कुल अनुकूल है। इस्लाम यह मानता है कि इंसान को केवल इबादत ही नहीं, बल्कि आराम, सुकून और ताज़गी की भी ज़रूरत होती है, ताकि वह संतुलित और बेहतर जीवन जी सके।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَابْتَغِ فِيمَا آتَاكَ اللَّهُ الدَّارَ الْآخِرَةَ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ الدُّنْيَا
“जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें दिया है, उससे आख़िरत की भलाई चाहो, लेकिन दुनिया में अपना हिस्सा न भूलो।” (सूरह अल-क़सस) आयत 77
यह आयत सिखाती है कि दुनिया का आनंद लेना मना नहीं है, बस वह आख़िरत को भुला देने वाला न हो। इसी दायरे में पिकनिक भी जायज़ है।
इस्लाम में प्रकृति और चिंतन (तफ़क्कुर)
इस्लाम में प्रकृति केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि अल्लाह की कुदरत की निशानी है। कुरआन बार-बार इंसान को प्रकृति पर विचार करने के लिए कहता है।
अल्लाह फ़रमाता है:
إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ… لَآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ
“निश्चय ही आकाशों और धरती की रचना में, और रात-दिन के बदलते रहने में, अक़्ल वालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं।” (सूरह आल-ए-इमरान), आयत 190
और आगे फ़रमाता है:
الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ
“जो लोग खड़े हुए, बैठे हुए और अपनी करवटों पर (लेटे हुए भी) अल्लाह को याद करते रहते हैं।” (सूरह आल-ए-इमरान), आयत 191
हरी-भरी जगह, नदी, पहाड़ या खुले मैदान में पिकनिक करना इंसान को अल्लाह की कुदरत पर सोचने का अवसर देता है। इस तरह पिकनिक केवल सैर नहीं, बल्कि इबादत बन जाती है।
नबी की सुन्नत और मनोरंजन
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी संतुलन (balance) का सबसे सुंदर और आदर्श उदाहरण है। वे अल्लाह की इबादत में भी पूर्ण रूप से लगे रहते थे और साथ ही इंसान की प्राकृतिक ज़रूरतों (human needs), आराम और खुशी को भी भली-भाँति समझते थे।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं:
عَن عَائِشَة رَضِي الله عَنْهَا أَنَّهَا كَانَتْ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي سَفَرٍ قَالَتْ: فَسَابَقْتُهُ فَسَبَقْتُهُ عَلَى رِجْلَيَّ فَلَمَّا حَمَلْتُ اللَّحْمَ سَابَقْتُهُ فَسَبَقَنِي قَالَ: «هَذِهِ بِتِلْكَ السَّبْقَةِ» . رَوَاهُ أَبُو دَاوُدَ
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि वह एक सफ़र में रसूलुल्लाह ﷺ के साथ थीं। वह कहती हैं:
“मैंने उनसे दौड़ लगाई और पैदल दौड़ते हुए मैं उनसे आगे निकल गई। फिर जब मेरा वज़न बढ़ गया (मैं भारी हो गई), तो मैंने उनसे दोबारा दौड़ लगाई और इस बार वे मुझसे आगे निकल गए। तब रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: ‘यह उस पहली दौड़ की बराबरी हो गई।’ (इस अबू दाऊद ने रिवायत किया है।) (मिश्कातुल-मसाबीह)
यह हदीस बताती है कि हल्के-फुल्के मनोरंजन और खेल इस्लाम में जायज़ हैं।
एक और हदीस में रसूल ने फ़रमाया:
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ، وَفِي كُلٍّ خَيْرٌ
“मज़बूत मोमिन, कमज़ोर मोमिन से बेहतर है और अल्लाह को अधिक प्रिय है; हालांकि दोनों में भलाई है। (सहीह मुस्लिम)
पिकनिक में चलना-फिरना, बच्चों के साथ खेलना शरीर और मन दोनों को मज़बूत करता है।
इस्लाम में पिकनिक के नैतिक नियम
इस्लाम मनोरंजन की अनुमति देता है, लेकिन कुछ सीमाओं के साथ।
1. हलाल भोजन और फिज़ूलखर्ची से बचाव
अल्लाह तआला फ़रमाता है: كُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا
“खाओ और पियो, लेकिन फ़िज़ूलखर्ची न करो।” (सूरह: अल-आ‘राफ़, आयत: 31)
पिकनिक में हलाल खाना, सादगी और भोजन की बर्बादी से बचना ज़रूरी है।
2. शालीनता और पर्दा
इस्लाम शालीनता पर बहुत ज़ोर देता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ
“मोमिनों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें।” (सूरह अन-नूर), आयत 30
बे-पर्दगी, गलत कपड़े और अनुचित मेल-जोल इस्लामी पिकनिक के खिलाफ़ हैं।
3. नमाज़ और अल्लाह की याद
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
جُعِلَتْ لِيَ الْأَرْضُ مَسْجِدًا وَطَهُورًا
“पूरी ज़मीन मेरे लिए नमाज़ की जगह बना दी गई है। ( सहीह मुस्लिम)
इसलिए पिकनिक के दौरान नमाज़ छोड़ना सही नहीं है।
इस्लाम में उत्सव और इस्लामी नववर्ष
इस्लामिक कैलेंडर चाँद पर आधारित है और इसका पहला महीना मुहर्रम है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है: إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِندَ اللَّهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا
“निश्चय ही अल्लाह के यहाँ महीनों की गिनती बारह महीने है।” सूरह अत-तौबा), आयत 36
इस्लामी नववर्ष को शोर-शराबे या पिकनिक से नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन और इतिहास की याद से मनाया जाता है।
इस्लामी त्योहार और अन्य धर्मों के उत्सव
इस्लाम में दो महत्पूर्ण त्योहार हैं:
1. ईद-उल-फ़ित्र
2. ईद-उल-अज़हा
रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ لِكُلِّ قَوْمٍ عِيدًا، وَهَذَا عِيدُنَا
“हर क़ौम का एक त्योहार होता है, और यह हमारा त्योहार है। (सहीह बुख़ारी)
अन्य धर्मों के धार्मिक त्योहारों में भाग लेना इस्लाम में मना है। रसूल ने चेतावनी दी: مَنْ تَشَبَّهَ بِقَوْمٍ فَهُوَ مِنْهُمْ “जो किसी क़ौम की नकल करता है, वह उन्हीं में से है।” (सुनन अबू दाऊद)
इस्लामी पिकनिक के लाभ
इस्लामी तरीक़े से की गई पिकनिक के कई फ़ायदे हैं:
परिवार में प्यार बढ़ता है।
बच्चों में अनुशासन आता है।
मानसिक तनाव कम होता है।
शरीर स्वस्थ रहता है।
अल्लाह की याद मज़बूत होती है।
रसूल ﷺ ने फ़रमाया: «خَيْرُكُمْ خَيْرُكُمْ لِأَهْلِهِ، وَأَنَا خَيْرُكُمْ لِأَهْلِي»
“तुम में सबसे अच्छा वह है जो अपने परिवार के लिए सबसे अच्छा हो।” (सुनन तिर्मिज़ी)
निष्कर्ष (Conclusion)
इस्लाम खुशी और आराम का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे सही दिशा देता है। जब पिकनिक हलाल तरीकों, शालीनता, नमाज़ और अल्लाह की याद के साथ की जाए, तो वह गुनाह नहीं बल्कि सवाब बन जाती है।
इस्लाम सिखाता है कि असली आनंद संतुलन में है—न अति में, न नकल में, बल्कि अल्लाह की आज्ञा में।
अल्लाह हमें अपने जीवन में संतुलन रखने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
लेखक:
आदिल इकबाल, कक्षा:11 का छात्र, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज बिहार
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