क़ुरआन की तफ़्सीर (व्याख्या) की ज़रूरत और अहमियत (महत्त्व)

परिचय(Introduction):

क़ुरआन मजीद अल्लाह तआला की आख़िरी और मुकम्मल किताब है, जो पूरी इंसानियत की हिदायत और कामयाबी के लिए नाज़िल हुई है। यह सिर्फ़ एक मज़हबी किताब नहीं बल्कि एक मुकम्मल ज़िन्दगी का रास्ता दिखाने वाली किताब है। इसमें इंसान की ज़िन्दगी के हर पहलू—अक़ीदा, इबादत, अख़लाक़ और मुआमलात—का बयान मौजूद है। लेकिन क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ लेना या उसका साधारण तर्जुमा समझ लेना काफी नहीं होता, क्योंकि इसकी भाषा बहुत गहरी और असरदार है बल्कि उसकी तफसीर और व्याख्या जानना भी बहुत महत्वपूर्ण है।

आज के दौर में तफ़्सीर की बढ़ती हुई ज़रूरत

आज का दौर (Present Time) तेज़ रफ़्तार और जानकारी (Information) से भरा हुआ है। लोग क़ुरआन की तिलावत (Recitation) तो करते हैं, लेकिन उसके मआनी (Meanings) और पैग़ाम (Message) को समझने की कोशिश कम करते हैं। अरबी ज़बान से दूरी बढ़ गई है, और बहुत से लोग सिर्फ़ पढ़ने तक सीमित हो गए हैं।

हालाँकि क़ुरआन मजीद सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समझने और उस पर अमल (Practice) करने के लिए नाज़िल हुआ है।

अल्लाह तआला खुद इरशाद फरमाता है:

أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ

क्या ये लोग क़ुरआन में ग़ौर (गहराई से सोच-विचार) नहीं करते?”
(
सूरह मुहम्मद 47:24)

यह आयत हमें साफ़ तौर पर दावत देती है कि हम क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ें नहीं, बल्कि उस पर सोचें, समझें और अपनी ज़िंदगी में उतारें।

एक और जगह अल्लाह तआला फरमाता है:

كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِّيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ

यह एक बरकत वाली किताब है, जिसे हमने आपकी तरफ नाज़िल किया, ताकि लोग इसकी आयतों में गहराई से सोचें।”
(
सूरह साद 38:29)

इन आयतों से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि क़ुरआन का असली मकसद (Purpose) सिर्फ़ तिलावत नहीं, बल्कि तदब्बुर (Deep Understanding) है।

आज के दौर में जब लोगों के सामने तरह-तरह की अफवाहें (Rumours) और गलत विचार (Wrong Ideas) आ रहे हैं, सोशल मीडिया (Social Media) पर हर तरह की बातें फैल रही हैं, दीन (Religion) को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, तो ऐसे समय में तफ़्सीर (Interpretation of Qur’an) की जरूरत और भी बढ़ जाती है।

क्यूंकि तफ़्सीर हमें यह सिखाती है कि आयत का सही मतलब (Correct Meaning) क्या है, उसका संदर्भ (Context) क्या है, और उसे अपनी जिंदगी में कैसे लागू (Apply) करना है

अगर इंसान सिर्फ पढ़ेगा लेकिन समझेगा नहीं, तो वह आसानी से गुमराही (Misguidance) का शिकार हो सकता है।

इसलिए आज के मुसलमान के लिए यह जरूरी है कि वह क़ुरआन को समझने की कोशिश करें और तफ़्सीर की मदद से उसके मआनी जानें और उसे अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में लागू करें।

यही असल में क़ुरआन से जुड़ने का सही तरीका है— पढ़ना + समझना + अमल करना

और यही हमें गुमराही से बचाकर हिदायत (Guidance) की तरफ ले जाता है।

तफ़्सीर की ज़रूरत और उम्मत की हालत

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ

यह एक बरकत वाली किताब है, जिसे हमने आपकी तरफ नाज़िल किया, ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर (गहराई से सोच) करें।” (सूरह साद 38:29)

इस आयत से यह बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है कि क़ुरआन का मक़सद सिर्फ़ तिलावत (Recitation) नहीं, बल्कि तदब्बुर (Deep Thinking), समझ (Understanding) और अमल (Practice) है।

लेकिन हकीकत यह है कि जब तक हम तफ़्सीर (Interpretation) का सहारा नहीं लेंगे, तब तक हम क़ुरआन के गहरे मतलब (Deep Meanings) को सही तरह नहीं समझ पाएंगे। क्योंकि हर आयत का एक संदर्भ (Context), एक पसमंजर (Background) और एक खास मक़सद होता है, जिसे तफ़्सीर ही स्पष्ट करती है।

आज उम्मत की जो गिरावट (Decline) दिखाई देती है, उसका एक बड़ा कारण यही है कि हमने क़ुरआन को समझना छोड़ दिया है। हम सिर्फ़ पढ़ने तक सीमित हो गए हैं, लेकिन उसके पैग़ाम (Message) को अपनी ज़िंदगी में लागू नहीं कर रहे हैं।

जबकि असल मक़सद यही था कि इंसान क़ुरआन से हिदायत (Guidance) ले और अपनी पूरी जिंदगी को उसके मुताबिक ढाल ले।

क़ुरआन खुद हमें सोचने और समझने के लिए बार-बार बुलाता है:

أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ

क्या ये लोग क़ुरआन में ग़ौर नहीं करते?” (सूरह मुहम्मद 47:24)

यह सवाल सिर्फ़ उस दौर के लोगों से नहीं, बल्कि आज हमसे भी है।

पहले के लोग (Salaf) क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ते नहीं थे, बल्कि उसे समझते थे, उस पर ग़ौर करते थे, और उसे अपनी ज़िंदगी में लागू करते थे।

इसी वजह से उन्हें दुनिया और आख़िरत (Hereafter) दोनों में कामयाबी मिली।

क़ुरआन: हिदायत और शिफ़ा

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

قُلْ هُوَ لِلَّذِينَ آمَنُوا هُدًى وَشِفَاءٌ

“कह दीजिए: यह (क़ुरआन) ईमान वालों के लिए हिदायत (रास्ता दिखाने वाला) और शिफ़ा (दिलों की बीमारी की दवा) है।” (सूरह फ़ुस्सिलत 41:44)

इस आयत में क़ुरआन की दो बहुत बड़ी खासियतें बयान की गई हैं— हिदायत (Guidance) और शिफ़ा (Healing)।

यानी क़ुरआन सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को सही रास्ता दिखाने वाला (Guide/ هُدًى) है और उसके दिल की बीमारियों—जैसे शक (Doubt), डर (Fear), गुमराही (Misguidance), और गुनाह की आदत—का इलाज भी है।

लेकिन यहाँ एक अहम बात समझने की है कि यह हिदायत और शिफ़ा उसी को मिलती है, जो क़ुरआन को समझकर (Understanding) पढ़ता है।

अगर इंसान सिर्फ़ तिलावत करे, लेकिन उसके मआनी (Meanings) को न समझे, तो वह इस बड़ी नेमत (Blessing) से पूरी तरह फायदा नहीं उठा पाएगा।

इसीलिए तफ़्सीर की अहमियत (Importance) और बढ़ जाती है।

जब इंसान क़ुरआन को समझकर पढ़ता है, तो उसके अंदर बदलाव (Transformation) आता है— दिल को सुकून (Peace) मिलता है, सोच साफ़ होती है, और इंसान सही और गलत में फर्क करने लगता है।

आज के दौर में जब इंसान परेशानियों (Problems), उलझनों (Confusion) और मानसिक दबाव (Stress) में घिरा हुआ है, तो क़ुरआन की यह “शिफ़ा” और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है।

क़ुरआन के सही मआनी और तफ़्सीर की अहमियत:

क़ुरआन अरबी ज़बान में नाज़िल हुआ है, और अरबी एक बहुत ही फसीह (eloquent) और गहरी ज़बान है। इसमें एक ही लफ़्ज़ कई अलग-अलग मतलब दे सकता है, इसलिए अगर कोई इंसान सिर्फ़ तर्जुमा पढ़े तो वह असली मआनी तक नहीं पहुँच सकता। तफ़्सीर हमें यह बताती है कि कौन सा लफ़्ज़ किस जगह किस मतलब में इस्तेमाल हुआ है और उसका सही मक़सद क्या है।

अल्लाह तआला फरमाता है:
وَاَنْزَلْنَا اِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ اِلَيْهِمْ

“और हमने तुम पर यह ‘ज़िक्र’ (क़ुरआन) उतारा है, ताकि तुम लोगों के लिए वह (हुक्म) स्पष्ट कर दो जो उनकी ओर उतारा गया है।” (सूरह अन-नहल 16:44)

इस आयत से साफ़ पता चलता है कि क़ुरआन की वज़ाहत (explanation) ज़रूरी है। इसी तरह क़ुरआन में गहराई से सोचने को भी कहा गया है, जिसे तदब्बुर (reflection) कहा जाता है। यह तभी मुमकिन है जब हम तफ़्सीर का सहारा लें।

नबी और सहाबा के ज़माने में तफ़्सीर की ज़रूरत:

अगर हम यह सोचें कि सिर्फ़ अरबी जान लेने से क़ुरआन पूरी तरह समझ में आ जाएगा, तो यह सही नहीं है। सहाबा-ए-किराम, जो अरबी के माहिर थे, उन्हें भी कई आयतों को समझने के लिए नबी ﷺ से पूछना पड़ता था।

जब यह आयत नाज़िल हुई:
اَلَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ

जो लोग ईमान लाए और अपने ईमान को ज़ुल्म (अत्याचार/शिर्क) के साथ नहीं मिलाया
तो सहाबा परेशान हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि हर इंसान किसी न किसी तरह ज़ुल्म करता है। तब नबी ﷺ ने समझाया कि यहाँ ज़ुल्म से मुराद शिर्क है।

इससे पता चलता है कि क़ुरआन को सही समझने के लिए तशरीह (interpretation) बहुत ज़रूरी है। नबी ﷺ खुद भी लोगों को क़ुरआन की तालीम देते थे और उसकी तफ़्सीर बताते थे।

अहकाम-ए-दीन को समझने में तफ़्सीर की भूमिका:

क़ुरआन मजीद में बहुत से दीन के अहकाम (rules) संक्षेप (short) और मुख़्तसर रूप में बताए गए हैं। लेकिन इनकी पूरी समझ हमें तफ़्सीर और हदीस के ज़रिए ही मिलती है। जैसे क़ुरआन में नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया गया है, लेकिन नमाज़ कैसे पढ़नी है, कितनी रकअत होती है, कौन-कौन से तरीके हैं—यह सब हमें तफ़्सीर और नबी ﷺ की हदीस से पता चलता है।

इसी तरह रोज़े के बारे में क़ुरआन में आता है:
كُلُوا وَاشْرَبُوا حَتّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الأَسْوَدِ (البقرة: 187)

खाओ और पियो, यहाँ तक कि तुम्हारे लिए सुबह (फ़ज्र) का सफेद धागा काले धागे से स्पष्ट हो जाए।” (सूरह अल-बक़रह 2:187)

इस आयत में “सफेद धागा” और “काला धागा” का ज़िक्र है। अगर कोई तफ़्सीर न पढ़े, तो वह इसे सच में धागा समझ सकता है, लेकिन नबी ﷺ ने समझाया कि इसका मतलब सुबह की रोशनी और रात की अंधेरा है।

इससे साफ़ पता चलता है कि तफ़्सीर के बिना सही समझ और सही अमल करना मुश्किल हो जाता है, इसलिए तफ़्सीर बहुत ज़रूरी है।

ग़लत फ़हमियों से बचाव और सही रहनुमाई:

आज के दौर में बहुत लोग सिर्फ़ क़ुरआन का तर्जुमा पढ़कर अपने हिसाब से मतलब निकाल लेते हैं, जिससे ग़लत फ़हमियाँ (misunderstandings) पैदा हो जाती हैं। लेकिन तफ़्सीर हमें इन गलतफहमियों से बचाती है और सही रास्ता दिखाती है।

अल्लाह तआला फरमाता है:
فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (النحل: 43)
अगर तुम नहीं जानते, तो इल्म वालों से पूछो।”

इस आयत से पता चलता है कि बिना सही इल्म के खुद से मतलब निकालना ठीक नहीं, बल्कि जानकार लोगों (उलमा) से समझना चाहिए, और यही काम तफ़्सीर करती है।

जो लोग तफ़्सीर के बिना क़ुरआन पढ़ते हैं, वे कई बार गलत नतीजे (conclusions) निकाल लेते हैं, जबकि तफ़्सीर सही रहनुमाई (guidance) देती है।

इसलिए कहा गया है कि तफ़्सीर के बिना क़ुरआन पढ़ना ऐसा है जैसे अंधेरे में कोई चीज़ ढूंढना—जबकि तफ़्सीर एक रोशनी (light) की तरह है, जो इंसान को सही रास्ता दिखाती है।

उलमा और मुफस्सिरीन की कोशिशें और ख़िदमात

इस्लाम की तारीख़ में सहाबा, ताबेईन और बाद के उलमा ने तफ़्सीर के इल्म को बड़ी मेहनत और लगन के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ा ही नहीं, बल्कि गहराई से समझा और दूसरों तक भी सही तरीके से पहुँचाया। इसी मेहनत का नतीजा है कि आज हमारे पास तफ़्सीर का एक बड़ा इल्मी ख़ज़ाना मौजूद है। उन्होंने बड़ी-बड़ी किताबें लिखीं, जैसे: तफ़सीर तबरी, तफ़सीर क़ुर्तुबी, मफ़ातीहुल ग़ैब, रूहुल मआनी।

इन किताबों में मात्र आयतों का तरजुमा (अनुवाद) ही नहीं है, बल्कि उनका पूरा मतलब, उनका पृष्ठभूमि और पसमंजर (context),  (यानी किस स्थिति में आयत उतरी), और उनसे मिलने वाली मार्गदर्शन (हिदायत) भी बहुत आसान तरीके से समझाया गया है।

इन उलमा (विद्वानों) ने अपना पूरा जीवन (ज़िंदगी) इसी काम में लगा दिया कि लोग क़ुरआन को ठीक और सही तरीके से अच्छी तरह समझ सकें।

हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु का यह क़ौल (statement) उनकी सोच को साफ़ दिखाता है:

"لَأَنْ أُفَسِّرَ آيَةً مِنَ الْقُرْآنِ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْ أَنْ أَحْفَظَهَا"

मुझे यह ज़्यादा पसंद है कि मैं क़ुरआन की एक आयत की तफ़्सीर करूँ, बजाय इसके कि उसे सिर्फ़ याद कर लूँ।”

इससे यह समझ में आता है कि केवल याद करना ही काफी नहीं होता, बल्कि समझना ज़्यादा महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि आज हम आसानी से क़ुरआन के गहरे अर्थ (मतलब) तक पहुँच सकते हैं, क्योंकि उलमा (Religious Scholars) ने हमारे लिए रास्ता सरल और आसान बना दिया है।

निष्कर्ष(Conclusion):

आख़िर में यह कहा जा सकता है कि “मुतालआ-ए-तफ़्सीर” हर मुसलमान के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने की नहीं बल्कि समझने और उस पर अमल करने की किताब है। तफ़्सीर के ज़रिए हम क़ुरआन के सही मआनी समझते हैं, गलतफहमियों से बचते हैं और अपनी ज़िन्दगी को सही रास्ते पर ला सकते हैं।

मुहम्मद ﷺ ने इरशाद फरमाया:

خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ
तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और उसे दूसरों को सिखाए।”
(सहीह अल-बुखारी)

यह हदीस हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त सिखाती है— इंसान की असली भलाई (माल (Wealth), शोहरत (Fame) या ताकत (Power) में नहीं बल्कि क़ुरआन से जुड़ने (Connection with Qur’an) में है, लेकिन यहाँ “सीखने” का मतलब सिर्फ़ पढ़ लेना (Recitation) नहीं है, बल्कि: क़ुरआन को समझना (Understanding),  उसके मआनी जानना (Knowing Meanings) और उस पर अमल करना  (Practice) भी हैं।

और फिर “सिखाने” का मतलब भी सिर्फ़ लफ़्ज़ (Words) पढ़ाना नहीं, बल्कि: लोगों तक क़ुरआन का पैग़ाम (Message) पहुँचाना, उन्हें हिदायत (Guidance) देना, यानी एक सच्चा मुसलमान (True Believer) वह है जो खुद भी क़ुरआन से जुड़ा हो और दूसरों को भी उससे जोड़ता हो।

संदर्भ (References):

  • सूरह मुहम्मद
  • सूरह अनआम
  • सूरह बक़रह
  • सूरह साद
  • सहीह बुख़ारी
  • अल-इत्कान फी उलूमिल क़ुरआन – इमाम जलालुद्दीन स्यूती

लेखक:

रेहान आलम, बारहवीं कक्षा, क़ुर्तुबा इंस्टिट्यूट ऑफ़ एकेडमिक एक्सीलेंस, किशनगंजबिहार

 

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