कुरआन-ए-मजीद में गैर-अरबी शब्द: एक भाषाई, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विश्लेषण
कुरआन की भाषाई प्रकृति और 'अरबी मुबीन' की हकीकत
कुरआन-ए-करीम अल्लाह तआला का वह पवित्र कलाम है जिसे 'अरबी मुबीन' (स्पष्ट अरबी) में नाजिल किया गया है। अल्लाह तआला का इरशाद है: إِنَّا أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ("बेशक हमने इसे अरबी कुरआन बनाकर उतारा है ताकि तुम समझ सको" - सूरह यूसुफ: 2)। लेकिन जब हम गहराई से भाषाई शोध (Linguistic Research) करते हैं, तो हमें इसमें ऐसे शब्द मिलते हैं जिनकी जड़ें फारसी, रूमी, इब्रानी, सीरियाई और हब्शी भाषाओं में हैं। यह विषय सदियों से 'उलूम-उल-कुरआन' (कुरआन के विज्ञान) का हिस्सा रहा है। यह समझना आवश्यक है कि किसी भाषा में विदेशी शब्दों का होना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी व्यापकता और जीवंतता का प्रमाण होता है। कुरआन ने उस समय की सबसे उन्नत और प्रचलित भाषा का उपयोग किया, जिसमें कई संस्कृतियों का निचोड़ समाहित था।
अरबों का दुनिया से जुड़ाव
अरब लोग इस्लाम के आगमन से पहले ही एक व्यापारिक जाति थे। उनके व्यापारिक काफिले उत्तर में शाम (सीरिया) और दक्षिण में यमन तक जाते थे। शाम उस समय रोमन साम्राज्य और सीरियाई संस्कृति का केंद्र था, जबकि यमन का संपर्क हब्शा (इथियोपिया) से बहुत गहरा था। पूर्व में अरबों का संपर्क फारसी साम्राज्य से था। अल्लाह तआला का कानून है: وَمَآ أَرۡسَلۡنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوۡمِهِۦ لِيُبَيِّنَ لَهُم ("हमने हर रसूल को उसकी कौम की जुबान में भेजा" - सूरह इब्राहिम: 4)। चूंकि कुरआन कयामत तक की तमाम कौमों के लिए है, इसलिए इसमें विभिन्न भाषाओं की झलक मिलना इसके 'आफाकी' (Universal) होने का प्रमाण है। व्यापार और आपसी मेल-जोल के कारण विदेशी सभ्यताओं के बहुत से शब्द अरबी भाषा का अटूट हिस्सा बन गए थे, जिन्हें कुरआन ने उनकी प्रभावशीलता के कारण अपना लिया।
'ता-रीब' की प्रक्रिया: विदेशी से अरबी बनने का सफर
जब कोई गैर-अरबी शब्द अरबी में दाखिल होता है, तो वह 'ता-रीब' (Arabization) की प्रक्रिया से गुजरता है। अरब लोग अपनी जुबान की मिठास और व्याकरण के अनुसार विदेशी शब्दों के अक्षरों को बदल देते हैं। उदाहरण के तौर पर, फारसी शब्द 'कुलीद' (चाबी) को अरबों ने 'मकालीद' में बदल दिया। कुरआन ने इन शब्दों को उसी रूप में अपनाया जो अरबी सांचे में ढल चुके थे। यही कारण है कि ये शब्द कुरआन में अजनबी महसूस नहीं होते, बल्कि अरबी के अपने शब्द लगते हैं। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: "अल्लाह ने हर चीज को एक माप और सांचे में बनाया है।" इसी तरह, कुरआन ने इन शब्दों को अरबी के सुंदर सांचे में पिरोकर भाषाई शिखर पर पहुँचा दिया है, जिससे कुरआन की लय और छंद में एक अनोखी खूबसूरती पैदा हो गई है।
प्रमुख भाषाओं के शब्दों का वैज्ञानिक वर्गीकरण
कुरआन में फारसी मूल के कई शब्द मिलते हैं जो सभ्यता और वैभव को दर्शाते हैं। जैसे 'सिज्जील' (سجيل), जो फारसी के 'संग-ओ-गिल' (पत्थर और मिट्टी) से बना है। इसी तरह 'इस्तबरक' (استبرق), जो मोटे रेशमी कपड़े के लिए इस्तेमाल होता है, फारसी के 'इस्तबरह' से निकला है। जन्नत के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द 'फिरदौस' (فردوس) भी प्राचीन फारसी से प्रेरित है। रूमी और यूनानी मूल के शब्दों में 'किस्तास' (قسطास) शामिल है, जिसका अर्थ न्याय का तराजू है। इसी तरह 'सिरत' (صراط) शब्द लातिनी के 'स्ट्रेटा' (सड़क) से प्रभावित माना जाता है। ये शब्द दर्शाते हैं कि कुरआन ने उन उन्नत सभ्यताओं के तकनीकी और सुंदर शब्दों को भी अपने अंदर समाहित किया है ताकि आध्यात्मिक और कानूनी गहराई को प्रभावी ढंग से समझाया जा सके।
नबियों के नाम और प्राचीन भाषाओं का संबंध
कुरआन में वर्णित अधिकांश नबियों के नाम गैर-अरबी हैं। 'इब्राहीम', 'मूसा' और 'ईसा' जैसे नाम इब्रानी और सीरियाई मूल के हैं। चूँकि ये नबी बनी इसराइल से थे, इसलिए उनके नाम उनकी मूल भाषा में ही रखे गए। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अल्लाह का संदेश हमेशा से एक ही रहा है और कुरआन पिछली सभी आसमानी किताबों और सभ्यताओं का संगम है। अल्लाह फरमाता है: قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ إِلَىٰ إِبْرَاهِيمَ ("कहो कि हम अल्लाह पर ईमान लाए और उस पर जो इब्राहिम पर उतारा गया" - सूरह अल-बकरा: 136)। इन नामों की मौजूदगी कुरआन की 'आफाकियत' को सिद्ध करती है और बताती है कि अल्लाह का कलाम पूरी मानवता के इतिहास को अपने अंदर समेटे हुए है।
विद्वानों के बीच ऐतिहासिक और शैक्षणिक बहस
इस विषय पर उलेमाओं के दो बड़े स्कूल हैं। एक स्कूल (जैसे इमाम शाफई) का कहना है कि कुरआन में कोई भी विदेशी शब्द नहीं है, क्योंकि अल्लाह ने इसे 'अरबी' कहा है। वे इसे 'इत्तेफाक-ए-लसानी' (Coincidence) मानते हैं। इसके विपरीत, दूसरा स्कूल (जैसे इमाम सुयूती और हज़रत इब्न अब्बास) यह मानता है कि कुरआन में विदेशी शब्द मौजूद हैं, लेकिन वे अरबीकृत होकर पूरी तरह अरबी बन चुके थे। इमाम सुयूती ने अपनी पुस्तक 'अल-इतकान' में ऐसे शब्दों की विस्तृत सूची दी है। यह दूसरा मत आधुनिक भाषाविज्ञान के अधिक करीब है। अल्लाह ने भाषाओं के फर्क को अपनी निशानी बताया है: وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافُ أَلْسِنَتِكُمْ ("और उसकी निशानियों में से आसमानों और जमीन की पैदावार और तुम्हारी जुबानों का फर्क है" - सूरह अर-रूम: 22)।
निष्कर्ष: भाषाई चमत्कार का शिखर
कुरआन-ए-मजीद में गैर-अरबी मूल के शब्दों की मौजूदगी उसकी भाषाई कमजोरी नहीं, बल्कि उसके 'मोजज़ा' (चमत्कार) होने की दलील है। कुरआन ने दुनिया की विभिन्न भाषाओं के सबसे सुंदर और प्रभावी शब्दों को चुना और उन्हें एक ऐसे लयबद्ध तरीके से पिरोया कि वे अरबी साहित्य का शिखर बन गए। यह शब्दों का वह महान महासागर है जिसमें दुनिया की सभी भाषाओं की नदियाँ आकर मिल गई हैं। यह साबित करता है कि अल्लाह का ज्ञान और उसकी रहमत किसी एक भौगोलिक सीमा या भाषा की कैद में नहीं है। कुरआन का यह भाषाई वैभव यह संदेश देता है कि इस्लाम पूरी मानवता के लिए है और यह हर सभ्यता की बेहतरीन चीजों को अपनाने की हिकमत रखता है। यह पवित्र ग्रंथ आज भी अपनी भाषाई शुद्धता और वैश्विक अपील के साथ पूरी दुनिया का मार्गदर्शन कर रहा है।
संदर्भ
कुरआन मजीद
अल-इतकान फी उलूम अल-कुरआन
अल-मुअर्रब मिन अल-कलाम अल-आज़मी अला हुरूफ अल-मुअजम (इमाम अल-जवालीकी)
अल-रिसाला
अल-बुर्हान फी उलूम अल-कुरआन
द फॉरेन वोकैबुलरी ऑफ द कुरआन
उलूम-उल-कुरआन
तारीख़-ए-तशरी-ए-इस्लामी
लेखक:
मुहम्मद फैसल
दारुल हुदा पंगानुर, सेकेंडरी फाइनल ईयर
Disclaimer
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