क़ुरआन के अनुसार झगड़ों का हल और शांति की स्थापना
क़ुरआन में अमन का पैग़ाम (The Message of Peace in the Qur’an)
कुरान का मूल संदेश “इस्लाम” शब्द में ही समाया हुआ है। “इस्लाम” का अर्थ है शांति (Peace) और अल्लाह के लिए स्वयं को झुका देना (Submission to the Will of Allah)। इसलिए इस्लाम केवल एक धर्म नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति (Way of Life) है जो संतुलन (Balance), न्याय (Justice ) और दया (Mercy) सिखाती है।
कुरान के अनुसार शांति (Peace) का मतलब केवल युद्ध (War) या हिंसा (Violence) का न होना नहीं है। बल्कि यह एक सकारात्मक स्थिति (Positive State) है, जहाँ इंसान का अंदरूनी मन (Inner Self) और बाहरी समाज (Society) दोनों संतुलित हों।
अल्लाह कुरान में शांति के रास्तों (Paths of Peace) का ज़िक्र करता है:
يَهْدِي بِهِ اللَّهُ مَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَهُ سُبُلَ السَّلَامِ وَيُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ بِإِذْنِهِ
“अल्लाह इसके माध्यम से उन लोगों को शांति के रास्ते दिखाता है जो उसकी प्रसन्नता चाहते हैं, और उन्हें अंधेरों से निकालकर रौशनी की ओर ले जाता है।” — सूरह अल-माइदा (Surah Al-Ma’idah)
यह आयत बताती है कि शांति कोई इत्तेफाक नहीं है। यह अल्लाह के मार्गदर्शन पर चलने का परिणाम है।
कुरान यह भी मानता है कि मतभेद (Differences) और संघर्ष (Conflict) इंसानी स्वभाव (Human Nature) का हिस्सा हो सकते हैं, क्योंकि इंसान को स्वतंत्र इच्छा (Free Will) दी गई है। लेकिन समाधान अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वरीय मार्गदर्शन (Divine Guidance) से होना चाहिए।
कुरान में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
وَإِن جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا
“यदि वे शांति की ओर झुकें, तो तुम भी शांति की ओर झुको।” — (सूरह अल-अनफ़ाल)
इस्लाम के कानूनी ढांचे (Legal Framework) में शांति को सामान्य स्थिति माना गया है। युद्ध (War) केवल रक्षात्मक (Defensive) और अत्याचार (Oppression) रोकने के लिए अंतिम उपाय के रूप में ही स्वीकार किया गया है।
कुरान लोगों को क्षमा और दया की शिक्षा देता है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
وَأَن تَعْفُوا أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى
“और यदि तुम क्षमा कर दो, तो यह तक़वा (God-consciousness) के अधिक क़रीब है।” (सूरह अल-बक़रह 2:237)
रसूलुल्लाह ﷺ ने भी शांति और दया की शिक्षा दी। उन्होंने फरमाया:
عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: الرَّاحِمُونَ يَرْحَمُهُمُ الرَّحْمٰنُ، ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“रहमत करने वालों पर रहमान रहमत करता है। तुम ज़मीन वालों पर दया करो, आसमान वाला तुम पर दया करेगा।” (सुनन अत-तिर्मिज़ी)
यदि समाज में विवाद हो जाए, तो कुरान “इसलाह” (Reconciliation) का आदेश देता है:
فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ
“अपने दो भाइयों के बीच सुलह (Reconciliation) करा दो।” (सूरह अल-हुजुरात-49:10)
इसलाह केवल बाहरी झगड़ा खत्म करना नहीं है, बल्कि दिलों की कड़वाहट, घृणा (Hatred) और अविश्वास को भी दूर करना है।
इस प्रकार इस्लाम में शांति व्यक्ति से शुरू होकर परिवार, समाज और अंतर्राष्ट्रीय स्तर फैलती है।
इसका अंतिम उद्देश्य एक न्यायपूर्ण समाज बनाना है, जहाँ हर व्यक्ति—चाहे वह किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो—स्वयं को सुरक्षित महसूस करे और बिना भय के अपनी आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth) और भौतिक प्रगति (Material Progress) कर सके। यही कुरान का सच्चा और व्यापक शांति संदेश है।
इसलाह और सुलह: संघर्ष समाधान की नींव (Islah and Sulh: The Foundation of Conflict Resolution)
कुरान के शांति-दर्शन (Philosophy of Peace) में “सुलह” (Reconciliation) और “इसलाह” (Reform) दो बहुत महत्वपूर्ण शब्द हैं। ये केवल शब्द नहीं, बल्कि समाज में विवाद सुलझाने की मजबूत नींव हैं।
“सुलह” का अर्थ है—दो पक्षों के बीच आपसी सहमति से झगड़ा खत्म करना।“इसलाह” का अर्थ इससे भी बड़ा है—बिगाड़ को सुधारना, रिश्तों को ठीक करना और समाज के भले के लिए काम करना।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
“निश्चय ही मोमिन (Believers) आपस में भाई-भाई हैं। इसलिए अपने दो भाइयों के बीच सुलह कराओ और अल्लाह से डरो, ताकि तुम पर रहमत की जाए।” (सूरह अल-हुजुरात-49:10)
यह आयत बताती है कि अगर मुसलमानों के दो समूहों में झगड़ा हो जाए, तो समाज (Community) के लोगों को चुप नहीं बैठना चाहिए। उन्हें न्याय (Justice ) और निष्पक्षता (Fairness) के साथ सुलह करानी चाहिए।
अल्लाह तआला एक और जगह इरशाद फ़रमाता है:
وَالصُّلْحُ خَيْرٌ“और सुलह ही सबसे बेहतर है।” ( सूरह अन-निसा-4:128)
इससे पता चलता है कि अहंकार छोड़कर किया गया समझौता (Reconciliation) अल्लाह को पसंद है।
कुरान केवल सैद्धांतिक बात (Theory) नहीं करता, बल्कि व्यावहारिक तरीका (Practical Method) भी बताता है। अगर पति-पत्नी के बीच झगड़ा हो जाए, तो अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُوا حَكَمًا مِّنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِّنْ أَهْلِهَا
“यदि तुम्हें डर हो कि दोनों (पति-पत्नी) के बीच फूट पड़ जाएगी, तो एक मध्यस्थ पति के परिवार से और एक पत्नी के परिवार से नियुक्त करो।” (सूरह अन-निसा-4:35)
यह तरीका दिखाता है कि इस्लाम में मध्यस्थता (Mediation) का सिद्धांत बहुत पहले से मौजूद है। इसका उद्देश्य परिवार को टूटने से बचाना और रिश्तों को फिर से जोड़ना है।
इसलाह केवल कागज पर समझौता (Formal Agreement) नहीं है। इसका असली उद्देश्य दिलों की कड़वाहट (Bitterness), नफरत (Hatred) और गुस्से (Anger) को खत्म करना है।
कुरान के अनुसार जब दो लोगों या समूहों के बीच सुलह कराई जाती है, तो यह केवल सामाजिक काम नहीं, बल्कि एक इबादत (Act of Worship) भी है।
जब न्याय (Justice – Adl) और निष्पक्षता (Fairness – Qist) के साथ सुलह होती है, तो किसी को यह महसूस नहीं होता कि उसके साथ अन्याय (Injustice) हुआ है। इससे समाज में स्थायी शांति और स्थिरता (Stability) आती है।
इस प्रकार “सुलह” और “इसलाह” इस्लाम में केवल विवाद समाप्त करने का तरीका नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज बनाने का माध्यम हैं।
न्याय और निष्पक्षता: शांति की पूर्व शर्त (Justice and Fairness: A Pre-Condition for Peace)
कुरान साफ़ बताता है कि शांति बिना न्याय के संभव नहीं है। केवल युद्ध रुक जाना (Ceasefire) असली शांति नहीं है। असली शांति वह है जो न्याय की मजबूत नींव पर खड़ी हो। अगर समाज में कहीं भी अन्याय है, तो शांति अस्थायी और दिखावटी होती है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ
“ऐ ईमान वालों! न्याय पर मजबूती से खड़े रहने वाले बनो और अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह तुम्हारे अपने खिलाफ हो या तुम्हारे माता-पिता और रिश्तेदारों के खिलाफ।” (सूरह अन-निसा 4:135)
यह आयत सिखाती है कि न्याय (Justice) करते समय पक्षपात (Bias) नहीं होना चाहिए, चाहे मामला अपने ही खिलाफ क्यों न हो।
अल्लाह तआला एक और जगह इरशाद फ़रमाता है:
وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ
“किसी कौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर न उकसाए कि तुम न्याय न करो। न्याय करो, यही तक़वा (God-consciousness) के अधिक निकट है।” (सूरह अल-माइदा-5:8)
इससे पता चलता है कि दुश्मनी भी न्याय को प्रभावित नहीं करनी चाहिए। अगर किसी झगड़े में एक पक्ष जुल्म करे, तो कुरान कहता है कि उसे रोका जाए।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّىٰ تَفِيءَ إِلَىٰ أَمْرِ اللَّهِ ۚ فَإِن فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا
“जो पक्ष ज्यादती करे, उससे लड़ो यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश (न्याय) की ओर लौट आए। फिर अगर वह लौट आए तो उनके बीच न्याय के साथ सुलह करा दो।” (सूरह अल-हुजुरात- 49:9)
असल शांति हथियारों के संतुलन (Balance of Power) से नहीं, बल्कि अधिकारों के संतुलन (Balance of Rights) से आती है। जब हर व्यक्ति को विश्वास हो कि उसके साथ अन्याय नहीं होगा, तब समाज में स्थायी शांति स्थापित होती है।
सब्र और माफ़ी: संघर्ष को रोकने के साधन (Patience and Forgiveness: Tools to Prevent Conflict)
कई बार झगड़े अहंकार और गलतफहमी से पैदा होते हैं। ऐसे समय में क़ुरआन “सबर” (Patience) और “अफ़ू” (Forgiveness) की शिक्षा देता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ فَإِذَا الَّذِي بَيْنَكَ وَبَيْنَهُ عَدَاوَةٌ كَأَنَّهُ وَلِيٌّ حَمِيمٌ
“बुराई को उस चीज़ से दूर करो जो सबसे अच्छी हो, फिर तुम देखोगे कि जिसके और तुम्हारे बीच दुश्मनी थी, वह क़रीबी मित्र (Close Friend) बन जाएगा।” ( सूरह फुस्सिलत-41:34)
यह आयत सिखाती है कि बुराई (Evil) का जवाब भलाई (Goodness) से देना चाहिए।
अल्लाह तआला एक और जगह इरशाद फ़रमाता है:
وَإِذَا خَاطَبَهُمُ الْجَاهِلُونَ قَالُوا سَلَامًا
“जब अज्ञानी लोग उनसे उलझते हैं, तो वे कहते हैं: ‘सलाम’ (शांति)।” (सूरह अल-फुरकान- 25:63)
यह तरीका छोटे विवाद (Minor Conflicts) को बड़े संघर्ष (Major Conflict) बनने से रोकता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
لَيْسَ الشَّدِيدُ بِالصُّرَعَةِ، إِنَّمَا الشَّدِيدُ الَّذِي يَمْلِكُ نَفْسَهُ عِنْدَ الْغَضَبِ
“ताकतवर वह नहीं जो कुश्ती में किसी को गिरा दे, बल्कि ताकतवर वह है जो गुस्से (Anger) के समय खुद पर काबू रखे।” (सहीह अल-बुखारी)
यह शिक्षा बताती है कि असली शक्ति (Real Strength) आत्म-नियंत्रण (Self-Control) में है।
इस प्रकार न्याय (Justice), धैर्य (Patience) और क्षमा (Forgiveness) मिलकर समाज में स्थायी शांति स्थापित करते हैं और दिलों से नफरत और बदले की भावना को खत्म कर देते हैं।
सबके साथ मिलकर रहना और शांति फैलाना (Coexistence and Global Peace)
क़ुरआन का संदेश केवल मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है। यह धार्मिक स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Coexistence) की शिक्षा देता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ
“धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है।” (सूरह अल-बक़रह-2:256)
इस आयत से स्पष्ट होता है कि इस्लाम में किसी को मजबूर करके धर्म स्वीकार करवाना सही नहीं है। यह सिद्धांत धार्मिक संघर्ष की जड़ को खत्म कर देता है।
अल्लाह तआला एक और जगह इरशाद फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا
“ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें अलग-अलग जातियों और कबीलों में बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।” (सूरह अल-हुजुरात- 49:13)
यह आयत सिखाती है कि विविधता लड़ाई के लिए नहीं, बल्कि पहचान और सहयोग (Cooperation) के लिए है।
वैश्विक शांति (Global Peace) के लिए क़ुरआन संधियों (Treaties) और वादों (Promises) को पूरा करने पर जोर देता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَإِن جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ
“यदि वे शांति की ओर झुकें, तो तुम भी शांति की ओर झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो।”
(सूरह अल-अनफ़ाल-8:61)
इससे पता चलता है कि इस्लाम में युद्ध (War) पहला विकल्प नहीं, बल्कि शांति (Peace) ही मूल मार्ग है।
अल्लाह तआला उन लोगों के साथ भलाई (Kindness) और न्याय (Justice) करने का आदेश देता है जिन्होंने धर्म के कारण लड़ाई नहीं की:
لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ
“अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ भलाई और न्याय करने से नहीं रोकता जिन्होंने तुमसे धर्म के कारण युद्ध नहीं किया और तुम्हें तुम्हारे घरों से नहीं निकाला।” (सूरह अल-मुम्तहिना-60:8)
यह आयत बताती है कि इस्लाम में न्याय और भलाई केवल अपने समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी इंसानों के लिए है।
इस प्रकार क़ुरआन एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था (Global Order) की कल्पना करता है जहाँ “सलाम” का वातावरण हो, हर इंसान को सम्मान मिले, और लोग बिना भय के जीवन जी सकें। यही इस्लाम का सच्चा और सार्वभौमिक शांति संदेश है।
निष्कर्ष:
क़ुरआन द्वारा दिया गया शांति और संघर्ष समाधान का सिद्धांत केवल धार्मिक आदेश नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण सामाजिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था है। आज के वर्ष 2026 के आधुनिक युग में, जहाँ तकनीकी प्रगति के साथ-साथ वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष बढ़ रहे हैं, क़ुरआन की शिक्षाएँ और भी अधिक प्रासंगिक (Relevant) हो जाती हैं।
कुरान स्पष्ट करता है कि असली शांति केवल हथियारों के शांत होने से नहीं आती, बल्कि दिलों के अंदर न्याय, संतोष और अल्लाह के प्रति समर्पण से पैदा होती है। कुरान का मुख्य संदेश “इसलाह” है, जो इंसान को अपने अहंकार से ऊपर उठकर सामूहिक भलाई के बारे में सोचने की प्रेरणा देता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا
“जिसने किसी निर्दोष (Innocent) व्यक्ति की हत्या की, तो मानो उसने पूरी मानवता की हत्या कर दी।” ( सूरह अल-माइदा- 5:32)
यह आयत जीवन की पवित्रता (Sanctity) और शांति की सर्वोच्चता (Supremacy of Peace) को स्पष्ट करती है।
क़ुरआन हमें सिखाता है कि शांति का आधार शक्ति (Power) नहीं, बल्कि नैतिकता (Morality) है। यदि विश्व के नेता और नागरिक क़ुरआन के सिद्धांत—जैसे निष्पक्ष न्याय, अटूट धैर्य, और बुराई का उत्तर भलाई से देना (Responding to Evil with Good)—को अपनाएँ, तो आज के जटिल वैश्विक विवादों (Global Conflicts) का स्थायी समाधान (Permanent Solution) संभव है।
संदर्भ
सूरह अल-माइदा
सूरह अल-अनफ़ाल
सूरह अल-बक़रह
सूरह अल-हुजुरात
सूरह अन-निसा
सूरह फुस्सिलत
सूरह अल-फुरकान
सूरह अल-मुम्तहिना
सुनन अत-तिर्मिज़ी
सहीह अल-बुखारी
लेखक:
अब्दुल हसीब. के, छात्र, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरल
Disclaimer
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