आधुनिक दौर में क़ुरआन की प्रभावी रहनुमाई

भूमिका

क़ुरआन को जब कोई आज का समझदार और सोचने-वाला इंसान पढ़ता है, तो उसके मन में सबसे पहले यह सवाल (question) आता है कि क़ुरआन बहुत पुराने ज़माने में उतरा था, जब समाज (society), राजनीति (politics) और संस्कृति (culture) आज से बिल्कुल अलग थीं। क़ुरआन की कुछ आयतें (verses) खास घटनाओं के मौके पर उतरीं, जो कुछ खास लोगों  और हालात से जुड़ी थीं। वहीं कुछ आयतें पहले के नबियों (Prophets) और बीती हुई क़ौमों की कहानियों के बारे में हैं। ऐसे में यह सवाल पैदा होता है कि इतनी पुरानी बातों और शिक्षाओं  का आज के आधुनिक दौर में हमारी ज़िन्दगी से क्या रिश्ता (relevance) है, और वे हमारे लिए आज भी कैसे काम की (applicable) हैं?

एक तरफ़ कुछ लोग क़ुरआन की ऐतिहासिकतावादी व्याख्या (Historicist Reading) का समर्थन करते हैं। उनके मुताबिक, क़ुरआन को उसी ऐतिहासिक संदर्भ (historical context) में समझना चाहिए जिसमें वह उतरा था। उनका मानना है कि क़ुरआन की शिक्षाएँ और क़ानून (laws) सिर्फ़ उन्हीं लोगों के लिए थे जिन्हें वह सीधे संबोधित कर रहा था, यानी मक्का और मदीना के लोग। हालाँकि वे क़ुरआन के इलाही किताब (divine book) को मानते हैं, फिर भी वे इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या क़ुरआन की आयतें (verses) हर समय और हर जगह के लिए समान रूप से लागू (universally applicable) हैं या नहीं

कुछ आधुनिक सोच रखने वाले लोग (modern thinkers) यह कहते हैं कि क़ुरआन का मक़सद खास क़ानूनों और अनुष्ठानों (rituals) को तय करना नहीं था, बल्कि कुछ बुनियादी नैतिक मूल्यों (core values) को सामने रखना था। उनके मुताबिक, यही बुनियादी मूल्य हर ज़माने के लिए हैं और यही वे मूल्य हैं जिन्हें आज की पश्चिमी सभ्यता (modern Western society) भी बढ़ावा देती है। इस नज़रिए  के अनुसार, क़ुरआन में बताए गए साफ़ क़ानूनों (explicit laws) को बदला जा सकता है, क्योंकि वे शुरुआती मुसलमानों  को एक नया सामाजिक ढाँचा (social structure) खड़ा करने में मदद देने के लिए थे, और बाद की पीढ़ियों (later generations) की ज़रूरतों के हिसाब से उन्हें छोड़ा भी जा सकता है।

 इसके उलट, मुसलमान सदियों से यह मानते आए हैं कि क़ुरआन की शिक्षाएँ  सभी के लिए हैं और पूरी तरह सार्वभौमिक (universal) हैं। उनका विश्वास है कि क़ुरआन की वे आयतें  भी, जो किसी खास घटना  से जुड़ी हैं, अपने भीतर ऐसे निर्देश और आदेश रखती हैं जो हर ज़माने और हर जगह के लिए लागू होते हैं।

इस लेख में हम इसी नज़रिए को साफ़ करेंगे और यह बताएँगे कि अपने ऐतिहासिक संदर्भों (historical contexts) के बावजूद क़ुरआन हर इंसान (human being) से बात करता है।

सम्पूर्ण मानवता के लिए संदेश (A message for all of humanity)

क़ुरआन की सार्वभौमिकता (universality) को साबित करने का सबसे आसान और मज़बूत प्रमाण  खुद क़ुरआन का साफ़ बयान है। अल्लाह स्वयं क़ुरआन को पूरी मानवता  के लिए, हर समय  और हर जगह  के लिए रास्ता दिखाने वाली किताब बताता है।

क़ुरआन अपने संदेश (message) को अल-‘आलमीन—यानी पूरी दुनिया और सारी सृष्टि (entire world, whole creation)—के लिए बताता है। अल्लाह इस वह़्य (revelation) को हर मख़लूक़ के लिए याद दिलाने वाली बात (Reminder) घोषित करता है।

 अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

تَبَارَكَ الَّذِي نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلَىٰ عَبْدِهِ لِيَكُونَ لِلْعَالَمِينَ نَذِيرًا
बहुत ही बरकत वाला है वह जिसने अपने बंदे पर फ़ुरक़ान उतारा, ताकि वह समस्त संसारों के लिए चेतावनी देने वाला बन जाए।” (सूरह अल-फ़ुरक़ान: 1)

इसी प्रकार अल्लाह फ़रमाता है:

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ
और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसारों के लिए केवल रहमत बनाकर भेजा है।” (सूरह अल-अंबिया: 107)

अल-‘आलमीन शब्द क़ुरआन में हर जगह व्यापक और सार्वभौमिक (universal) मतलब में इस्तेमाल हुआ है। क़ुरआन की शुरुआत ही अल्लाह की इस पहचान से होती है कि वह رَبِّ الْعَالَمِينَ—यानी सारे संसारों का पालनहार  है। शुरुआती मुफस्सिरों (early commentators) जैसे क़तादा, मुजाहिद और हसन अल-बसरी रज़िअल्लाहु अन्हुम ने साफ़ बताया है कि अल-‘आलमीन से मुराद पूरी सृष्टि  है, जिसमें नस्ल , इलाक़ा, ज़माना  या सामाजिक हालात  का कोई फ़र्क़ नहीं किया गया है।

क़ुरआन में इंसानों की अलग-अलग भाषाओं और रंगों की विविधता (diversity) को भी पूरी सृष्टि के लिए अल्लाह की निशानी (sign) बताया गया है। इससे यह बात और ज़्यादा साफ़ हो जाती है कि क़ुरआन का पैग़ाम सबके लिए है और उसकी शिक्षाएँ पूरी मानवता को संबोधित करती हैं।

 क़ुरआन यह साफ़ बताता है कि नबी मुहम्मद को भी पूरी मानवता के लिए भेजा गया। यानी उनका पैग़ाम (message) और उनकी रहनुमाई (guidance) किसी एक क़ौम या ज़माने तक सीमित नहीं, बल्कि हर इंसान के लिए है। अल्लाह फ़रमाता है:

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِلنَّاسِ

और हमने आपको समस्त मानवता के लिए ही भेजा है।” (सूरह सबा: 28)

इमाम इब्न अतीया अपनी तफ़सीर में स्पष्ट करते हैं कि यहाँ काफ़्फ़ा का अर्थ हैपूरी मानव जाति, बिना किसी अपवाद के। यही अर्थ अन्य आयतों में भी दोहराया गया है:

قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا

कह दीजिए: ऐ लोगो! मैं तुम सब की ओर अल्लाह का रसूल हूँ।” (सूरह अल-राफ़: 158)

नबी की हदीस भी इस सार्वभौमिकता (universality) की पुष्टि करती है। आपने फ़रमाया:

وَكَانَ النَّبِيُّ يُبْعَثُ إِلَىٰ قَوْمِهِ خَاصَّةً وَبُعِثْتُ إِلَى النَّاسِ كَافَّةً
हर नबी केवल अपनी क़ौम की ओर भेजा जाता था, जबकि मुझे पूरी मानवता की ओर भेजा गया है।”— (सहीह अल-बुख़ारी)

एक अन्य हदीस में नबी ने प्रतीकात्मक भाषा (symbolic language) में फ़रमाया:

بُعِثْتُ إِلَى كُلِّ أَحْمَرَ وَ أَسْوَدَ (صحيح مسلم)

मुझे लाल और काले (सब) की ओर भेजा गया है।

इमाम नववी इसकी व्याख्या करते हुए बताते हैं कि लालसे मुराद ग़ैर-अरब और कालेसे अरब हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे इंसानों और जिन्नों के रूप में भी समझते हैं। इमाम नववी निष्कर्ष निकालते हैं कि ये सभी अर्थ सही हैं, क्योंकि नबी वास्तव में इंसानों और जिन्नोंदोनों के लिए भेजे गए।

 इस्लामी इतिहास में विद्वानों ने क़ुरआन और शरीअत की सार्वभौमिकता (universality) को एक बुनियादी सिद्धांत (basic principle) के रूप में माना है। इमाम अबू इसहाक़ अल-शातिबी अपनी किताब अल-मुवाफ़क़ात (Al-Muwafaqat) में लिखते हैं कि इस्लामी शरीअत हर किसी को शामिल करने वाली और सबके लिए है। वे अपने दौर के कुछ सूफ़ियों की आलोचना करते हुए कहते हैं कि कुछ लोग यह मान लेते थे कि कुछ खास व्यक्तियों को शरीअत के आदेशों से छूट मिल सकती है। इस पर वे साफ़ कहते हैं:
“शरीअत हर ज़िम्मेदार व्यक्ति के लिए है; यह किसी एक समूह  तक सीमित नहीं है।”

 इमाम अल-शातिबी के मुताबिक, चूँकि इस्लाम पूरी मानवता की भलाई  के लिए उतारा गया है, इसलिए इसे किसी खास ज़माने या किसी एक समुदाय  तक सीमित करना ठीक (logical) नहीं है।

इस तरह क़ुरआन की आयतें, नबी की शिक्षाएँ और पुराने विद्वानों की समझ—सब मिलकर एक ही नतीजे  पर पहुँचते हैं: क़ुरआन एक सार्वभौमिक वह़्य (universal revelation) है, जो इंसानों और जिन्नों, अरब और ग़ैर-अरब , और हर ज़माने—अतीत (past), वर्तमान (present) और भविष्य (future)—के लिए है।

विशेष आदेश सार्वभौमिक सत्य

क़ुरआन यह सिखाता है कि इंसानों के साथ अल्लाह का तय किया हुआ नियम—सुन्नतुल्लाह (Divine Law)—कभी नहीं बदलता है।

 अल्लाह फ़रमाता है:

وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا

तुम अल्लाह की सुन्नत में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाओगे।” (सूरह अल-अहज़ाब: 62)

इसका मतलब यह है कि अल्लाह का इंसाफ़ करने वालों और ज़ुल्म करने वालों के साथ बर्ताव हर ज़माने  में एक जैसा रहता है। कोई आदेश (command) भले ही खास लगे, लेकिन असल में वह एक आम और सार्वभौमिक दैवी नियम (universal divine law) को ही दिखाता है।

 क़ुरआन बार-बार पूर्ववर्ती क़ौमों से शिक्षा लेने का आदेश देता है:

فَاعْتَبِرُوا يَا أُولِي الْأَبْصَارِ “तो ऐ समझ रखने वालों! सबक़ (lesson) हासिल करो।” (सूरह अल-हशर: 2)

इसका मक़सद अतीत (past) और वर्तमान (present) की तुलना करना है, ताकि यह समझा जा सके कि एक जैसे कारण (same causes) हमेशा एक जैसे नतीजे (same results) पैदा करते हैं।

नूह, हूद, सालेह, इब्राहीम, लूत और शुऐब (अलैहिमुस्सलाम) की क़ौमों के किस्से इसी सार्वभौमिक नियम को दर्शाते हैं: ईमान वालों को नजात मिलती है और इनकार करने वालों पर अज़ाब आता है।

सूरह हूद और सूरह अश-शुअरा में बार-बार अल्लाह फ़रमाता है:

إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً
निश्चय ही इसमें एक निशानी है।

हर क़िस्सा अल्लाह की सुन्नत को हर युग के लिए स्पष्ट करता है। इस सिद्धांत को उलेमा ने इस क़ायदे में संक्षेपित (summary) किया है:

العِبْرَةُ بِعُمُومِ اللَّفْظِ لَا بِخُصُوصِ السَّبَبِ
“किसी हुक्म (rule) को समझने का आधार उसके शब्दों की व्यापकता (general meaning) होती है, न कि वह किस खास वजह या घटना (specific cause) पर उतरा था।”

उदाहरण के लिए, अल्लाह फ़रमाता है:

إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ

निश्चय ही नेकियाँ बुराइयों को मिटा देती हैं। (हूद: 114)

हालाँकि यह आयत एक खास व्यक्ति  के बारे में उतरी थी, लेकिन नबी ने साफ़ कर दिया कि यह हुक्म  सब लोगों के लिए है।

इसी तरह, चोरी की सज़ा (punishment for theft) भले ही एक खास घटना  से जुड़ी हो, लेकिन इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु के मुताबिक यह हर चोर  पर लागू होती है। इमाम तबरी रहिमहुल्लाह ने भी शराब की मनाही (prohibition of alcohol) और फ़िज़ूलखर्ची की मनाही  सबके लिए समान रूप से लागू (universal) बताया है।

हालाँकि, असबाब-ए-नुज़ूल—यानी आयतों के उतरने की पृष्ठभूमि (background of revelation)—को जानना बहुत ज़रूरी है। इमाम सुयूती के मुताबिक, यह क़ुरआनी क़ानूनों की हिकमत  समझने में मदद करता है, गलतफ़हमी  दूर करता है और ग़लत व्याख्या (misinterpretation) से बचाता है।

निष्कर्ष

क़ुरआन की अपनी गवाही, नबी की सुन्नत (Prophetic Sunnah) और पुराने विद्वानों  की एक जैसी समझ के आधार पर यह बात साफ़ हो जाती है कि क़ुरआन किसी बीते ज़माने  तक सीमित किताब नहीं है, बल्कि हर इंसान के लिए हर दौर में रास्ता दिखाने वाली ईश्वरीय किताब (divine guidance) है। “अल-‘आलमीन” और “अल-नास जमी‘अन” जैसे शब्द इस सच्चाई की तसदीक़ करते हैं कि नबी मुहम्मद का पैग़ाम नस्ल, भूगोल  और इतिहास  की हदों से कहीं आगे है।

क़ुरआन की खास कहानियाँ  और आदेश अल्लाह की कभी न बदलने वाली सुन्नत (unchangeable Divine law) को सामने लाते हैं। “अल-इबरह बि-उमूम अल-लफ़्ज़” के सिद्धांत (principle) से हम यह समझ पाते हैं कि ऐतिहासिक संदर्भ (historical context) क़ुरआन को सीमित नहीं करता, बल्कि उसकी गहराई (depth) और हमेशा लागू रहने वाली सच्चाई (timeless relevance) को और उजागर करता है।

इसलिए असल सवाल यह नहीं है कि क़ुरआन आज भी प्रासंगिक (relevant) है या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या हम इसे उसके अपने शब्दों और उसकी शर्तों पर समझने और अपनाने के लिए तैयार हैं या नहीं—एक ज़िन्दा वह़्य (living revelation) के रूप में, जो पूरी दुनिया के लिए रहमत भी है और चेतावनी भी, और जिसकी रोशनी हर दौर में इंसानियत को रास्ता दिखाती रहेगी।

 

 

संदर्भ 

  • कुरआन मजीद
  • सहीह अल-बुखारी
  • तफसीर इब्न कसीर
  • अल-मुवाफकात फी उसूल अश-शरईअह
  • अल-इत्कान फी उलूमिल कुरआन
  • शरह सहीह मुस्लिम। इमाम नहववी
  • तफसीर तबरी, इमाम तबरी

लेखक

मोहम्मद हामिद हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार।

 

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