इस्लाम में टैटू (Tattoo) और पियर्सिंग (Piercing)

आधुनिक दौर में टैटू और पियर्सिंग का बढ़ता चलन

आज का दौर तेज़ी से बदलती हुई जीवनशैली, सोशल मीडिया और फैशन का दौर है। हर दिन कोई नया ट्रेंड सामने आता है और देखते ही देखते वह दुनिया भर के युवाओं में लोकप्रिय हो जाता है। कुछ वर्ष पहले तक टैटू (Tattoo) और शरीर के विभिन्न अंगों में पियर्सिंग (Piercing) केवल कुछ विशेष समुदायों या संस्कृतियों तक सीमित थे, लेकिन आज यह एक वैश्विक फैशन बन चुका है। खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार, गायक, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और फैशन मॉडल अपने शरीर पर अलग-अलग प्रकार के टैटू बनवाते हैं, जिसके कारण लाखों युवा भी उसी की नकल करने लगते हैं। कई लोग इसे आधुनिकता (Modernity) का प्रतीक मानते हैं, कुछ इसे कला (Art) समझते हैं, तो कुछ अपनी पहचान, प्रेम या किसी यादगार घटना को व्यक्त करने का माध्यम बताते हैं।

लेकिन एक मुसलमान का जीवन केवल समाज के बदलते हुए ट्रेंड पर आधारित नहीं होता। इस्लाम हमें सिखाता है कि किसी भी काम को करने से पहले यह देखा जाए कि अल्लाह और उसके रसूल उस विषय में क्या मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए टैटू और पियर्सिंग का विषय केवल फैशन का नहीं, बल्कि अक़ीदे, शरीअत और इस्लामी जीवन-पद्धति का भी विषय है।

दुर्भाग्य से आज इस विषय में बहुत-सी ग़लतफ़हमियाँ भी फैली हुई हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह केवल शरीर की सजावट है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि "मेरा शरीर है, मैं जैसा चाहूँ वैसा करूँ।" दूसरी ओर कुछ लोग बिना पूरी जानकारी के हर प्रकार की पियर्सिंग को भी हराम बता देते हैं। इन दोनों अतियों के बीच इस्लाम का संतुलित दृष्टिकोण समझना अत्यंत आवश्यक है।

इस्लाम में इंसानी जिस्म की हक़ीक़त और उसकी अहमियत

इस्लाम इंसान के शरीर को बहुत बड़ा सम्मान देता है। यह शरीर केवल मांस और हड्डियों का ढाँचा नहीं, बल्कि अल्लाह की एक महान नेमत और अमानत है। इंसान को यह अधिकार नहीं दिया गया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार अपने शरीर में जैसा चाहे वैसा परिवर्तन करता रहे। बल्कि उसे यह सिखाया गया है कि वह इस अमानत की रक्षा करे और उसे उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग करे जिसके लिए अल्लाह ने उसे पैदा किया है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ فِي أَحْسَنِ تَقْوِيمٍ﴾

"निश्चय ही हमने इंसान को सबसे उत्तम रूप में पैदा किया।" (सूरह अत-तीन : 4)

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह ने इंसान को सुंदर, संतुलित और सम्मानित रूप में पैदा किया है। इसलिए मुसलमान का पहला विश्वास यह होना चाहिए कि उसके रब की बनाई हुई रचना सर्वोत्तम है। यदि कोई परिवर्तन किसी बीमारी, चोट या वास्तविक चिकित्सा आवश्यकता के कारण हो, तो उसका हुक्म अलग है। लेकिन केवल फैशन, दिखावे या दूसरों की नकल के लिए शरीर में स्थायी परिवर्तन करना एक गंभीर विषय है, जिस पर शरीअत ने विस्तार से मार्गदर्शन दिया है।

क़ुरआन में शैतान की एक महत्वपूर्ण चाल का भी उल्लेख मिलता है। अल्लाह तआला शैतान का कथन बयान करते हुए इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَلَآمُرَنَّهُمْ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلْقَ اللّٰهِ﴾

"मैं उन्हें आदेश दूँगा और वे अल्लाह की बनाई हुई रचना में परिवर्तन करेंगे।" (सूरह अन-निसा : 119)

इस आयत की व्याख्या करते हुए अनेक मुफस्सिरीन, जैसे इमाम तबरी (रहिमहुल्लाह), इमाम क़ुर्तुबी (रहिमहुल्लाह) और हाफ़िज़ इब्न कसीर (रहिमहुल्लाह) ने लिखा है कि इसमें उन परिवर्तनों की भी निंदा की गई है जो केवल शैतानी प्रेरणा, घमंड, दिखावे या अनावश्यक सौंदर्य प्रदर्शन (Showcase of Beauty) के लिए किए जाएँ।

यही कारण है कि इस्लाम प्राकृतिक सुंदरता (Natural Beauty) को महत्व देता है और इंसान को यह सिखाता है कि वास्तविक सुंदरता केवल बाहरी रूप में नहीं, बल्कि ईमान, तक़वा और अच्छे चरित्र में होती है।

टैटू के बारे में क़ुरआन, हदीस और इस्लामी विद्वानों का नजरिया

टैटू के बारे में सबसे स्पष्ट रहनुमाई हमें सहीह हदीसों में मिलता है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने फ़रमाया—

لَعَنَ اللّٰهُ الْوَاشِمَاتِ وَالْمُسْتَوْشِمَاتِ، وَالنَّامِصَاتِ وَالْمُتَنَمِّصَاتِ، وَالْمُتَفَلِّجَاتِ لِلْحُسْنِ، الْمُغَيِّرَاتِ خَلْقَ اللّٰهِ

"अल्लाह ने टैटू बनाने वाली और टैटू बनवाने वाली, भौंहों के बाल उखाड़ने वाली और उखड़वाने वाली तथा सुंदरता के लिए दाँतों में फाँक बनाने वाली महिलाओं पर लानत फ़रमाई, क्योंकि वे अल्लाह की बनाई हुई रचना में परिवर्तन करती हैं।" (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

एक अन्य हदीस में भी रसूलुल्लाह ने टैटू बनाने वाले और बनवाने वाले दोनों पर लानत फ़रमाई है।

इसी कारण चारों प्रसिद्ध सुन्नी फ़िक़्ही मसलक—हनाफ़ी, मालिकी, शाफ़िई और हम्बली—के विद्वानों की बड़ी संख्या ने स्थायी टैटू को हराम माना है।

इमाम नववी (रहिमहुल्लाह) ने शरह सहीह मुस्लिम में लिखा है कि यह हदीस टैटू के हराम होने की स्पष्ट दलील है, क्योंकि इसमें लानत का उल्लेख आया है और लानत आमतौर पर बड़े गुनाह (कबीरा गुनाह) पर ही आती है।

हाफ़िज़ इब्न हजर अल-असक़लानी (रहिमहुल्लाह) ने फ़त्हुल-बारी में भी इसी मत को मज़बूत किया है।

यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि हदीस में जिन शब्दों का प्रयोग हुआ है—"अल-वाशिमा" और "अल-मुस्तौशिमा"—वे क्रमशः टैटू बनाने वाले और टैटू बनवाने वाले दोनों के लिए हैं। अर्थात इस कार्य में सहयोग करने वाला और इसे करवाने वाला—दोनों इस निषेध (रोक टोक) में आते हैं।

हालाँकि विद्वानों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर में किसी दुर्घटना, जलने, जन्मजात दोष या चिकित्सीय आवश्यकता के कारण कोई विशेष प्रक्रिया करनी पड़े, तो उसका हुक्म अलग होगा। इस्लाम आवश्यकता (ज़रूरत) और केवल फैशन (Fashion) के बीच स्पष्ट अंतर करता है।

इसी प्रकार आजकल बाज़ार में मिलने वाले कुछ Temporary Tattoos केवल त्वचा की ऊपरी सतह पर लगाए जाते हैं और कुछ दिनों में मिट जाते हैं। यदि उनमें हराम पदार्थ हों, वे वुज़ू या ग़ुस्ल में बाधा बनें, और उनका उद्देश्य अनुचित प्रदर्शन हो, तो उनका हुक्म स्थायी टैटू जैसा नहीं माना जाता। यही कारण है कि मेहंदी (हिना), जो सुन्नत से भी सिद्ध है, और स्थायी टैटू को एक जैसा नहीं समझा जाता।

इस्लाम इंसान की प्राकृतिक सुंदरता का सम्मान करता है और उसे यह सिखाता है कि उसका शरीर अल्लाह की दी हुई एक अमानत है। इसलिए केवल फैशन, दिखावे या दूसरों की नकल में ऐसा कोई स्थायी परिवर्तन करना, जिसके बारे में रसूलुल्लाह ने स्पष्ट मनाही फ़रमाई हो, एक मोमिन के लिए उचित नहीं है। वास्तविक सुंदरता शरीर पर बने चित्रों में नहीं, बल्कि ईमान, अच्छे चरित्र और अल्लाह की आज्ञापालन में है।

शरीअत की रोशनी में  पियर्सिंग (Piercing)

आज के समय में पियर्सिंग (Piercing) केवल कान तक सीमित नहीं रही। आधुनिक फैशन के प्रभाव से लोग नाक, होंठ, जीभ, भौंह, गाल, नाभि और शरीर के अनेक अंगों में पियर्सिंग करवाने लगे हैं। सोशल मीडिया ने इस चलन को और भी तेज़ी से बढ़ाया है। ऐसे में बहुत से मुसलमानों के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या हर प्रकार की पियर्सिंग हराम है? क्या कान छिदवाना भी टैटू की तरह निषिद्ध है? क्या नाक में नथ या लौंग पहनना शरीअत में जायज़ है?

इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए हमें क़ुरआन, सुन्नत और फ़ुक़हा (इस्लामी विधिवेत्ताओं) की व्याख्याओं को साथ लेकर चलना होगा।

इस्लाम सुंदरता का विरोध नहीं, बल्कि संतुलन सिखाता है

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि इस्लाम सुंदरता (ज़ीनत) का विरोध नहीं करता। बल्कि वह इंसान को साफ़-सुथरा रहने, अच्छे कपड़े पहनने और हलाल तरीके से सजने-संवरने की प्रेरणा देता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللّٰهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ﴾

कह दीजिए, अल्लाह की उस ज़ीनत (सुंदरता) को किसने हराम कर दिया जिसे उसने अपने बंदों के लिए पैदा किया है, और पाक़ीज़ा रोज़ी को?" (सूरह अल-आराफ़ : 32)

इसी प्रकार रसूलुल्लाह ने फ़रमाया—

«إِنَّ اللّٰهَ جَمِيلٌ يُحِبُّ الْجَمَالَ»

"निश्चय ही अल्लाह सुंदर है और सुंदरता को पसंद करता है।" (सहीह मुस्लिम)

लेकिन इस्लाम यह भी सिखाता है कि सुंदरता का अर्थ अल्लाह की सीमा (हुदूद) को पार करना नहीं है। हर सजावट तभी तक स्वीकार है जब तक वह शरीअत के दायरे में हो, उसमें घमंड, दिखावा या फ़ितना न हो और वह अल्लाह की नाफ़रमानी का कारण न बने।

महिलाओं के लिए कान छिदवाना क्यों जायज़ माना गया?

टैटू और कान छिदवाने में बुनियादी अंतर है। टैटू शरीर में स्थायी परिवर्तन करता है, जबकि कान छिदवाना महिलाओं के स्वाभाविक श्रृंगार का एक माध्यम माना गया है।

रसूलुल्लाह के समय की महिलाओं के कानों में बालियाँ होती थीं। ईद के दिन जब आपने महिलाओं को सदक़ा देने की प्रेरणा दी, तो उन्होंने अपने कानों की बालियाँ और गले के हार उतारकर अल्लाह की राह में दे दिए।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है—

«فَجَعَلْنَ يُلْقِينَ الْخُرُصَ وَالسِّخَابَ»

"महिलाएँ अपनी बालियाँ और हार उतार-उतारकर देने लगीं।" (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

यदि कानों में बालियाँ पहनना हराम होता, तो रसूलुल्लाह उस समय अवश्य उसकी मनाही फ़रमाते। चूँकि ऐसा कोई निषेध नहीं मिला, इसलिए अधिकांश फ़ुक़हा ने महिलाओं के लिए कान छिदवाने को जायज़ कहा।

नाक छिदवाने के बारे में उलेमा की राय

नाक छिदवाने का विषय टैटू की तरह स्पष्ट निषेध और मुमानअत वाला नहीं है। यही कारण है कि इस विषय में इस्लामी विद्वानों की अलग-अलग राय मिलती है।

कुछ फ़ुक़हा ने इसे पसंद नहीं किया, विशेषकर उन समाजों में जहाँ यह महिलाओं के सामान्य श्रृंगार का हिस्सा नहीं था।

दूसरी ओर, अनेक हनफ़ी, शाफ़िई और समकालीन विद्वानों ने कहा कि यदि किसी समाज में नाक में नथ या लौंग पहनना महिलाओं की सामान्य और सम्मानजनक परंपरा ('उर्फ़) हो, तो इसकी अनुमति दी जा सकती है।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में महिलाओं द्वारा नाक में नथ या नोज़ पिन पहनने की परंपरा बहुत पुरानी है। इसलिए इन क्षेत्रों के कई इस्लामी उलेमा इसे जायज़ मानते हैं, यदि इसका उद्देश्य केवल हलाल तरीके से सजना-संवरना हो, कि गैर-महरम पुरुषों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना।

इससे हमें एक महत्वपूर्ण बात समझ में आती है कि इस्लाम हर समाज की अच्छी परंपराओं को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, बल्कि उन्हें शरीअत की कसौटी पर परखता है।

पुरुषों के लिए पियर्सिंग (Piercing) का हुक्म

इस्लाम में महिलाओं को कुछ प्रकार की पियर्सिंग (जैसे कान या कुछ विद्वानों के अनुसार नाक की पियर्सिंग) की अनुमति दी गई है। लेकिन पुरुषों के लिए हुक्म अलग है।

ज़्यादातर इस्लामी विद्वानों के अनुसार, पुरुषों का केवल सजने-संवरने के लिए कान, नाक या शरीर के किसी अन्य हिस्से में पियर्सिंग करवाना जायज़ नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ऐसा करना महिलाओं के विशेष श्रृंगार की नकल (तशब्बुह) माना जाता है, जिससे इस्लाम ने मना किया है।

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया—

لَعَنَ رَسُولُ اللّٰهِ ﷺ الْمُتَشَبِّهِينَ مِنَ الرِّجَالِ بِالنِّسَاءِ، وَالْمُتَشَبِّهَاتِ مِنَ النِّسَاءِ بِالرِّجَالِ

"रसूलुल्लाह ने उन पुरुषों पर लानत फ़रमाई जो महिलाओं की समानता अपनाते हैं और उन महिलाओं पर भी जो पुरुषों की समानता अपनाती हैं।" (सहीह अल-बुख़ारी)

इसलिए केवल फैशन या दूसरों की नकल के लिए पुरुषों का पियर्सिंग करवाना इस्लामी शिक्षाओं के अनुकूल नहीं माना गया।

 

आधुनिक फैशन पर इस्लाम का नज़रिया

आजकल शरीर के लगभग हर हिस्से में पियर्सिंग (Piercing) करवाने का फैशन बढ़ गया है। लेकिन इस्लाम केवल फैशन का नहीं, बल्कि सही और गलत का पैमाना बताता है। इस्लाम यह देखता है कि कोई काम अल्लाह की खुशी के अनुसार है या नहीं। इसलिए अगर कोई पियर्सिंग शरीर को बेवजह तकलीफ़ पहुँचाती हो, सेहत के लिए नुकसानदायक हो, केवल दिखावे या लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कराई जाए, या इस्लामी शालीनता और हया के खिलाफ हो, तो एक मुसलमान को उससे बचना चाहिए।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ﴾

"और पहले अज्ञान (जाहिलियत) के दौर की तरह अपनी सुंदरता का प्रदर्शन मत करो।" (सूरह अल-अहज़ाब : 33)

इस आयत का मकसद महिलाओं को सम्मान, शालीनता और पवित्रता का जीवन जीने की शिक्षा देना है। इसलिए कोई भी आभूषण या सजावट तभी तक सही है, जब तक वह इन इस्लामी मूल्यों के अनुसार हो। साथ ही, इस्लाम इंसान की सेहत का भी पूरा ध्यान रखता है। अगर किसी तरह की पियर्सिंग से संक्रमण होने, ज़्यादा दर्द होने या शरीर को स्थायी नुकसान पहुँचने का खतरा हो, तो उससे बचना चाहिए। रसूलुल्लाह का यह सिद्धांत पूरी इस्लामी फ़िक़्ह का आधार है—

«لَا ضَرَرَ وَلَا ضِرَارَ»

"स्वयं नुकसान पहुँचाओ और किसी दूसरे को नुकसान पहुँचाओ।" (सुनन इब्न माजह)

आधुनिक दौर की ग़लतफ़हमियाँ और इस्लाम का संतुलित संदेश

आज के समय में सोशल मीडिया ने लोगों के सोचने का तरीका बदल दिया है। पहले लोग अपने परिवार, समाज और विद्वानों से प्रभावित होते थे, लेकिन अब फ़िल्मी कलाकार, खिलाड़ी, गायक और इंटरनेट इन्फ्लुएंसर  (Influencer) नई पीढ़ी के आदर्श बनते जा रहे हैं। उनके शरीर पर बने टैटू, अनोखे हेयर स्टाइल और अलग-अलग प्रकार की पियर्सिंग को देखकर बहुत-से युवा बिना सोचे-समझे उनकी नकल करने लगते हैं। धीरे-धीरे यह धारणा बन जाती है कि यदि पूरी दुनिया ऐसा कर रही है, तो इसमें कोई बुराई नहीं होगी। जबकि इस्लाम हमें सिखाता है कि सच्चाई का मापदंड लोगों की संख्या नहीं, बल्कि अल्लाह और उसके रसूल की शिक्षा है।

क्या टैटू केवल एक कला (Art) है?

कुछ लोग कहते हैं कि टैटू सिर्फ़ एक कला (Art) है। इसमें कोई शक नहीं कि चित्र बनाना, डिज़ाइन तैयार करना और रचनात्मकता अपने आप में एक कला है। लेकिन इस्लाम में किसी काम के सही या गलत होने का फैसला केवल इस बात से नहीं होता कि वह सुंदर या कलात्मक दिखता है। अगर कोई काम देखने में आकर्षक हो, लेकिन वह अल्लाह और उसके रसूल की शिक्षा के खिलाफ हो, तो एक मुसलमान केवल उसकी सुंदरता देखकर उसे सही नहीं मानता।

इसी प्रकार कुछ लोग टैटू को अपनी पहचान (Identity) बताते हैं। कोई अपने माता-पिता का नाम लिखवाता है, कोई किसी प्रिय व्यक्ति की याद में टैटू बनवाता है, तो कोई किसी विचारधारा का प्रतीक अपने शरीर पर अंकित करता है। लेकिन इस्लाम सिखाता है कि इंसान की असली पहचान उसके शरीर पर बने चित्र नहीं, बल्कि उसका ईमान, उसका चरित्र और उसका तक़वा है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللّٰهِ أَتْقَاكُمْ﴾

"निश्चय ही अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक सम्मानित वह है जो सबसे अधिक तक़वा वाला है।"(सूरह अल-हुजुरात : 13)

इस आयत से स्पष्ट होता है कि अल्लाह के यहाँ सम्मान का आधार बाहरी रूप, रंग, फैशन या शरीर की सजावट नहीं, बल्कि तक़वा और नेक चरित्र है।

"मेरा शरीर, मेरी पसंद" इस्लाम क्या कहता है?

आजकल एक बात बहुत सुनने को मिलती है—"My Body, My Choice" (मेरा शरीर, मेरी पसंद) पहली नज़र में यह बात सही लग सकती है, लेकिन इस्लाम का नज़रिया इससे अलग है। इस्लाम सिखाता है कि इंसान अपने शरीर का पूरा मालिक नहीं है, बल्कि यह शरीर अल्लाह की दी हुई एक अमानत है। इसलिए इंसान को अपने शरीर के बारे में वही फैसला करना चाहिए जो अल्लाह को पसंद हो। इसी वजह से इस्लाम शराब पीने, नशा करने, आत्महत्या करने, अपने शरीर को नुकसान पहुँचाने या बिना ज़रूरत उसमें बदलाव करने की इजाज़त नहीं देता। क्योंकि यह शरीर अल्लाह की दी हुई एक बड़ी नेमत है, जिसकी हिफाज़त करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا﴾

"अपने आपको हानि मत पहुँचाओ। निश्चय ही अल्लाह तुम पर अत्यन्त दयालु है।"

(सूरह अन-निसा : 29)

इसलिए एक मोमिन की सोच यह होती है— "अल्लाह की रज़ा मेरी सबसे बड़ी पसंद है।"

यदि किसी ने पहले टैटू बनवा लिया हो तो क्या करे?

यह प्रश्न आज बहुत से युवाओं और नए मुसलमानों (Reverts) के मन में आता है। कई लोग इस्लाम स्वीकार करने से पहले टैटू बनवा चुके होते हैं, जबकि कुछ लोग अज्ञानता में ऐसा कर बैठते हैं और बाद में उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है।

इस्लाम ऐसे लोगों को निराश नहीं करता। बल्कि वह तौबा और सुधार का दरवाज़ा खोलता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللّٰهِ ۚ إِنَّ اللّٰهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا﴾

"कह दीजिए, मेरे बंदो, जिन्होंने अपने ऊपर ज़्यादती की है! अल्लाह की रहमत से निराश मत हो। निश्चय ही अल्लाह सभी गुनाहों को क्षमा कर देता है।" (सूरह अज़-ज़ुमर : 53)

عَنْ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ النَّبِيَّ ﷺ قَالَ: أَمَا عَلِمْتَ أَنَّ الإِسْلَامَ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ، وَأَنَّ الْهِجْرَةَ تَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهَا، وَأَنَّ الْحَجَّ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ؟

हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

"क्या तुम्हें मालूम नहीं कि इस्लाम (क़ुबूल करना) उससे पहले के सारे गुनाहों को मिटा देता है, हिजरत उससे पहले के गुनाहों को मिटा देती है, और हज भी उससे पहले के गुनाहों को मिटा देता है?" सहीह मुस्लिम

इसका मतलब "इस्लाम स्वीकार कर लेने से उससे पहले के गुनाह मिट जाते हैं।"

अगर टैटू बिना किसी बड़े नुकसान के हटाया जा सकता हो, तो आज के कई इस्लामी विद्वान उसे हटाने की सलाह देते हैं। लेकिन अगर टैटू हटाने से शरीर को गंभीर नुकसान पहुँचने का डर हो, तो उसे हटाना ज़रूरी नहीं है। क्योंकि अल्लाह तआला किसी इंसान पर उसकी ताकत से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। ऐसे व्यक्ति को सच्चे दिल से अल्लाह से तौबा करनी चाहिए और आगे कभी ऐसा काम न करने का पक्का इरादा करना चाहिए।

मुसलमान की असली सुंदरता क्या है?

आज सुंदरता का मतलब बहुत बदल गया है। कुछ लोग महँगे कपड़ों को सुंदरता मानते हैं, कुछ टैटू बनवाने को, कुछ अलग तरह के हेयर स्टाइल को, और कुछ महँगे गहनों को। लेकिन इस्लाम के अनुसार असली सुंदरता केवल बाहरी रूप में नहीं होती, बल्कि अच्छे चरित्र, शालीनता, पवित्रता और अल्लाह की आज्ञा का पालन करने में होती है।

 

रसूलुल्लाह ने फ़रमाया—

«إِنَّ اللّٰهَ جَمِيلٌ يُحِبُّ الْجَمَالَ»

"निश्चय ही अल्लाह सुंदर है और सुंदरता को पसंद करता है।" (सहीह मुस्लिम)

लेकिन यही हदीस आगे यह भी सिखाती है कि सुंदरता का अर्थ घमंड, दिखावा और लोगों को नीचा समझना नहीं है।

इस्लाम चाहता है कि इंसान साफ़-सुथरा रहे, अच्छे कपड़े पहने, खुशबू लगाए, अपने शरीर की देखभाल करे, लेकिन यह सब अल्लाह की आज्ञा की सीमा के भीतर हो। वास्तविक सुंदरता वह है जो इंसान के चरित्र में दिखाई दे। जब कोई व्यक्ति सच्चा, ईमानदार, दयालु, नम्र, न्यायप्रिय और अल्लाह से डरने वाला होता है, तो वही उसकी सबसे बड़ी सुंदरता बन जाती है।

आज के युवाओं के लिए एक संदेश

आज के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि फैशन बदल रहा है, बल्कि यह है कि वे बिना सोचे-समझे हर नए ट्रेंड का अनुसरण करने लगते हैं। एक मुसलमान का आदर्श कोई अभिनेता, खिलाड़ी या इंटरनेट सेलिब्रिटी नहीं, बल्कि रसूलुल्लाह हैं।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللّٰهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ﴾

"निश्चय ही तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में सबसे उत्तम आदर्श है।" (सूरह अल-अहज़ाब : 21)

यदि हम अपने जीवन का आदर्श रसूलुल्लाह को बना लें, तो हमें हर नए फैशन के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं रहेगी। हमारा उद्देश्य लोगों को प्रभावित करना नहीं, बल्कि अल्लाह को राज़ी करना होगा।

निष्कर्ष : जिस्म भी एक अमानत है और ईमान सबसे बड़ी ज़ीनत

इस्लाम हमें सादा और अच्छा जीवन जीना सिखाता है। यह साफ़-सुथरा रहने और हलाल तरीके से सजने-संवरने की इजाज़त देता है। लेकिन यह भी बताता है कि हमारा शरीर अल्लाह की दी हुई एक अमानत है। इसलिए हमें अपने शरीर में ऐसा कोई बदलाव नहीं करना चाहिए जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की शिक्षा के खिलाफ हो।

स्थायी टैटू के बारे में सहीह हदीसों में साफ़ मनाही है, इसलिए मुसलमान उससे बचता है। वहीं महिलाओं के लिए कान छिदवाने की इजाज़त दी गई है। इससे पता चलता है कि इस्लाम हर चीज़ से नहीं रोकता और न ही हर चीज़ की इजाज़त देता है। वह हमेशा सही और संतुलित रास्ता सिखाता है।

हमें यह याद रखना चाहिए कि क़ियामत के दिन अल्लाह हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कौन-सा फैशन अपनाया था या हमारे शरीर पर कौन-सा टैटू था। वह हमारे ईमान, हमारे अच्छे काम और हमारे अच्छे चरित्र के बारे में पूछेगा। इसलिए एक समझदार मुसलमान वही है जो फैशन से ज़्यादा क़ुरआन और सुन्नत की बात मानता है।

अल्लाह तआला हमें सही बात समझने, उस पर अमल करने और हमेशा क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार जीवन जीने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन, या रब्बुल आलमीन।

संदर्भ

  • सूरह अत-तीन
  • सूरह अन-निसा
  • सूरह अल-आराफ़
  • सूरह अल-अहज़ाब
  • सूरह अल-हुजुरात
  • सूरह अज़-ज़ुमर
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन इब्न माजह

 

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार

Disclaimer

The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.

Leave A Comment

Related Posts