फ़रिश्तों की इस्मत और हारूत–मारूत
ईमान की बुनियाद जिन छह बातों पर है, उनमें से एक फ़रिश्तों पर ईमान लाना भी है। हर मुसलमान के लिए यह ज़रूरी है कि वह अल्लाह, उसके रसूलों, उसकी किताबों, क़यामत और तक़दीर की तरह फ़रिश्तों पर भी ईमान रखे। लेकिन अफ़सोस की बात है कि फ़रिश्तों के बारे में बहुत-सी ऐसी कहानियाँ भी मशहूर हो गई हैं जिनका आधार न तो कुरआन में मिलता है और न ही सही हदीसों में।
इन्हीं कहानियों में सबसे ज़्यादा चर्चा हारूत और मारूत की होती है। कुछ लोग कहते हैं कि ये दोनों फ़रिश्ते दुनिया में आए, गुनाह किए और फिर उन्हें सज़ा मिली। जबकि कुछ लोग कहते हैं कि यह बात सही नहीं है।
तो आख़िर सच क्या है? क्या फ़रिश्ते गुनाह कर सकते हैं? क्या हारूत और मारूत ने अल्लाह की नाफ़रमानी की थी? आइए, इन सवालों का जवाब कुरआन और सही इस्लामी शिक्षाओं की रोशनी में समझते हैं।
फ़रिश्ते कौन हैं?
फ़रिश्ते अल्लाह की एक विशेष मख़लूक़ (creatures) हैं। उन्हें अल्लाह ने नूर (light) से पैदा किया है। वे न खाते हैं, न पीते हैं, न शादी करते हैं और न ही उनकी कोई अपनी इच्छाएँ (desires) होती हैं जैसी इंसानों की होती हैं। उनका सबसे बड़ा काम रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: अल्लाह के हर हुक्म को पूरी तरह मानना और उसे पूरा करना है।
«خُلِقَتِ الْمَلَائِكَةُ مِنْ نُورٍ»
"फ़रिश्तों को नूर से पैदा किया गया है।" (सहीह मुस्लिम)
यानी फ़रिश्ते इंसानों और जिन्नों से बिल्कुल अलग मख़लूक़ हैं।
फ़रिश्तों की सबसे बड़ी पहचान
फ़रिश्तों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वे कभी अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं करते।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
﴿لَا يَعْصُونَ اللّٰهَ مَا أَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ﴾
"वे अल्लाह के किसी भी हुक्म की नाफ़रमानी नहीं करते और जो आदेश दिया जाता है, वही करते हैं "
(सूरह अत-तहरीम: 6)
एक दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
﴿بَلْ عِبَادٌ مُكْرَمُونَ لَا يَسْبِقُونَهُ بِالْقَوْلِ وَهُمْ بِأَمْرِهِ يَعْمَلُونَ﴾
"बल्कि वे सम्मानित बंदे हैं। वे अल्लाह से आगे बढ़कर कोई बात नहीं कहते और केवल उसी के आदेश के अनुसार काम करते हैं।" (सूरह अल-अंबिया : 26–27)
इन आयतों से साफ़ पता चलता है कि फ़रिश्ते अल्लाह के आज्ञाकारी बंदे हैं। वे गुनाह नहीं करते।
इसी गुण को इस्लामी विद्वान "इस्मत" (infallibility) कहते हैं।
फ़रिश्तों की इस्मत (infallibility) क्या है?
"इस्मत" का अर्थ है कि अल्लाह ने अपने फ़रिश्तों को गुनाह और नाफ़रमानी से सुरक्षित रखा है।
इसका अर्थ यह है कि अल्लाह ने उन्हें ऐसी प्रकृति दी है कि वे केवल वही काम करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है।
इंसानों के पास सही और गलत दोनों रास्ते चुनने की आज़ादी है। जिन्नों के पास भी चुनाव की शक्ति है।
लेकिन फ़रिश्तों का काम केवल अल्लाह की इबादत और उसकी आज्ञा का पालन करना है। इसीलिए उन्हें गुनाहगार कहना या उनके बारे में ऐसी बातें कहना जिनका प्रमाण न हो, सही नहीं है।
फ़रिश्तों के महत्वपूर्ण काम
अल्लाह ने हर फ़रिश्ते को एक विशेष ज़िम्मेदारी दी है।
हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम वही (प्रकाशना/revelation) लेकर आते थे।
हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम बारिश और रोज़ी से जुड़े कामों पर नियुक्त हैं।
हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम क़यामत के दिन सूर फूँकेंगे।
हज़रत मलकुल-मौत अज़राएल अलैहिस्सलाम इंसानों की रूह (soul) क़ब्ज़ करने का काम करते हैं।
कुछ फ़रिश्ते हमारे अच्छे और बुरे काम लिखते हैं। कुछ फ़रिश्ते हर समय अल्लाह की तस्बीह करते रहते हैं।
यानी फ़रिश्तों अल्लाह की इबादत और उसकी आज्ञा का पालन करते है।
हारूत और मारूत कौन थे?
अब हम उस विषय पर आते हैं जिसके बारे में सबसे अधिक बातें की जाती हैं।
हारूत और मारूत का ज़िक्र कुरआन में केवल एक जगह आया है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
﴿وَمَا أُنْزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَا إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ﴾
"और (वे उस चीज़ के पीछे लग गए) जो बाबिल में दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतारी गई थी। लेकिन वे दोनों किसी को कुछ सिखाने से पहले यही कहते थे, 'हम तो केवल एक परीक्षा हैं, इसलिए तुम कुफ़्र में मत पड़ना।'" (सूरह अल-बक़रा : 102)
यह आयत हमें हारूत और मारूत के बारे में सबसे प्रमाणित जानकारी देती है।
हारूत और मारूत को क्यों भेजा गया?
उस समय बाबिल (बेबीलोन) में जादू का बहुत प्रचलन था। लोग जादू को चमत्कार और अल्लाह की दी हुई शक्ति समझने लगे थे।
अल्लाह ने हारूत और मारूत को लोगों की परीक्षा के लिए भेजा। वे लोगों को यह बताते थे कि जादू क्या है, ताकि लोग सच्चे चमत्कार और जादू के बीच अंतर समझ सकें।
लेकिन वे हर बार पहले ही साफ़ चेतावनी देते थे:
"हम तो तुम्हारे लिए एक परीक्षा हैं, इसलिए कुफ़्र मत करना।"
यानी वे लोगों को जादू अपनाने के लिए नहीं कहते थे, बल्कि पहले से ही उन्हें मना करते थे।
यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर ज़हर के बारे में पढ़ाता है, ताकि लोग उससे बच सकें; वह लोगों को ज़हर खाने के लिए नहीं कहता।
क्या हारूत और मारूत ने गुनाह किया?
यहीं से सबसे बड़ी ग़लत फ़हमी पैदा होती है।
कुछ मशहूर कहानियों में बताया जाता है कि हारूत और मारूत दुनिया में आए, एक औरत के कारण गुनाह में पड़ गए, शराब पी, हत्या की और फिर उन्हें सज़ा मिली।
लेकिन जब हम कुरआन देखते हैं, तो उसमें ऐसी कोई बात नहीं मिलती। हदीसों में भी यह कहानी प्रमाणित नहीं है।
बहुत से बड़े सुन्नी विद्वानों ने लिखा है कि ये कहानियाँ भरोसेमंद प्रमाण पर आधारित नहीं हैं और इनमें से कई इस्राईलियात (पहले के लोगों से आई हुई मनगढ़ंत या कमज़ोर अप्रमाणित रिवायतें) हैं।
इसलिए एक मुसलमान को वही बात माननी चाहिए जो कुरआन और हदीस से साबित हो।
कुरआन ने केवल इतना बताया है कि हारूत और मारूत अल्लाह की ओर से लोगों की परीक्षा के लिए भेजे गए थे और वे हर व्यक्ति को पहले चेतावनी देते थे कि जादू सीखकर कुफ़्र में मत पड़ना।
यही सबसे सुरक्षित और सही समझ है।
लेकिन यदि हारूत और मारूत ने गुनाह नहीं किया, तो फिर उनकी कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? और जादू के बारे में इस्लाम की क्या शिक्षा है? साथ ही, उन मशहूर कहानियों की वास्तविकता क्या है जो लोगों में सुनाई जाती रही हैं?
इन्हीं महत्वपूर्ण बातों को हम विस्तार से समझेंगे।
हारूत–मारूत से मिलने वाले सबक और जादू के बारे में इस्लाम की शिक्षा
पिछले भाग में हमने जाना कि फ़रिश्ते अल्लाह की एक विशेष मख़लूक़ हैं। वे नूर से पैदा किए गए हैं और अल्लाह की किसी भी बात की नाफ़रमानी नहीं करते। हमने यह भी देखा कि हारूत और मारूत का ज़िक्र कुरआन में केवल एक जगह आया है और वहाँ कहीं भी यह नहीं कहा गया कि उन्होंने गुनाह किया था। अब समझते हैं कि इस से हमें क्या सीख मिलती है और जादू के बारे में इस्लाम की क्या शिक्षा है।
जादू एक बड़ी परीक्षा है
सूरह अल-बक़रा की आयत 102 में अल्लाह तआला साफ़ फ़रमाता है कि हारूत और मारूत लोगों से कहते थे:
﴿إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ﴾
"हम तो केवल एक परीक्षा हैं, इसलिए कुफ़्र में मत पड़ना।"
यानी वे लोगों को जादू सीखने के लिए नहीं बुलाते थे, बल्कि पहले ही सावधान कर देते थे कि यह तुम्हारे लिए परीक्षा है।
इसके बावजूद कुछ लोग उनकी चेतावनी को नज़र अंदाज़ करके जादू सीखते थे और उसका ग़लत प्रयोग करते थे।
इससे हमें एक बड़ी सीख मिलती है कि अल्लाह कभी-कभी इंसानों की परीक्षा लेता है। जो व्यक्ति अल्लाह के हुक्म पर चलता है, वह कामयाब होता है, और जो अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़ता है, वह नुकसान उठाता है।
जादू के बारे में इस्लाम क्या कहता है?
इस्लाम जादू को बहुत गंभीर मामला मानता है।
कुरआन बताता है कि कुछ लोग जादू सीखकर लोगों के बीच दुश्मनी पैदा करते थे।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
﴿فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِهِ﴾
"फिर लोग उनसे ऐसी बातें सीखते थे जिनसे वे पति और पत्नी के बीच अलगाव पैदा कर देते थे।"
(सूरह अल-बक़रा : 102)
लेकिन उसी आयत में अल्लाह यह भी फ़रमाता है:
﴿وَمَا هُمْ بِضَارِّينَ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللّٰهِ﴾
"वे अल्लाह की अनुमति के बिना किसी का कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचा सकते।" (सूरह अल-बक़रा : 102)
इसका मतलब यह है कि मुसलमान को जादू से डरने के बजाय अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। कोई भी चीज़ अल्लाह की अनुमति के बिना असर नहीं कर सकती।
क्या हारूत–मारूत की मशहूर कहानी सही है?
हमारे समाज में एक कहानी बहुत प्रसिद्ध है। उसमें कहा जाता है कि हारूत और मारूत एक औरत के कारण गुनाह में पड़ गए, शराब पी, हत्या की और फिर उन्हें दुनिया और आख़िरत की सज़ा में से एक चुनने को कहा गया।
यह कहानी कई किताबों और भाषणों में सुनाई जाती है। लेकिन जब हम कुरआन और हदीसों को देखते हैं, तो ऐसी कोई बात नहीं मिलती।
बहुत से बड़े सुन्नी विद्वानों ने लिखा है कि यह कहानी मज़बूत प्रमाण से साबित नहीं है। इसकी अधिकांश रिवायतें कमज़ोर हैं या इस्राईलियात (पहले के लोगों से आई हुई ऐसी बातें जिनकी पुष्टि नहीं हुई) में से हैं।
इसलिए एक मुसलमान को चाहिए कि वह ऐसी कहानियों को दीन का हिस्सा न बनाए। हमारा ईमान कुरआन और हदीस पर होना चाहिए, न कि हर मशहूर कहानी पर।
फ़रिश्तों की इस्मत पर ईमान
हारूत और मारूत का सही परिचय हमें फ़रिश्तों की महानता को और अच्छी तरह समझाता है।
फ़रिश्ते अल्लाह के ऐसे बंदे हैं जो हर समय उसकी इबादत करते हैं। वे थकते नहीं,वे कभी अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं करते।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
﴿يُسَبِّحُونَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لَا يَفْتُرُونَ﴾
"वे रात-दिन अल्लाह की तस्बीह करते रहते हैं और कभी थकते नहीं।" (सूरह अल-अंबिया : 20)
यही फ़रिश्तों की असली पहचान है।
इंसान और फ़रिश्ते में क्या फ़र्क़ है?
इंसान के सामने दो रास्ते होते हैं। वह चाहे तो नेकी करे। चाहे तो गुनाह करे। इसी वजह से इंसान की परीक्षा होती है।
लेकिन फ़रिश्तों के साथ ऐसा नहीं है। उनका काम केवल अल्लाह की इबादत और उसके हुक्म का पालन करना है। इसलिए इंसानों और फ़रिश्तों की तुलना करना सही नहीं है। अल्लाह ने दोनों को अलग-अलग उद्देश्य के लिए पैदा किया है।
हारूत–मारूत की घटना से हमें क्या सीख मिलती है?
इस घटना से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं।
सबसे पहली सीख यह है कि हमें केवल वही बात माननी चाहिए जो कुरआन और हदीस से साबित हो।
दूसरी सीख यह है कि हर मशहूर कहानी सही नहीं होती।
तीसरी सीख यह है कि जादू से बचना चाहिए और किसी भी हालत में उसे सीखने या करवाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
चौथी सीख यह है कि हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वही हर नुकसान और हर फ़ायदे का मालिक है।
पाँचवीं सीख यह है कि दीन के मामले में हमेशा भरोसेमंद विद्वानों और प्रमाणित इस्लामी स्रोतों की ओर रुख़ करना चाहिए।
अगर किसी को जादू का डर हो तो क्या करे?
आज भी बहुत से लोग जादू, नज़र और ऐसी बातों से डर जाते हैं। इसका समाधान यह है कि हम अल्लाह का जिक्र करके अपने आप को महफूज़ रखें। एक मुसलमान का पहला सहारा अल्लाह होना चाहिए। उसे पाँचों वक़्त की नमाज़ की पाबंदी करनी चाहिए।
सुबह-शाम की मस्नून दुआएँ पढ़नी चाहिए। सूरह अल-फ़ातिहा, आयतुल-कुर्सी, सूरह अल-इख़लास, सूरह अल-फ़लक़ और सूरह अन-नास पढ़ने की आदत बनानी चाहिए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इन्हीं दुआओँ और कुरआनी आयतों के माध्यम से अल्लाह की पनाह माँगना सिखाया है।
यही एक मोमिन की सबसे बड़ी सुरक्षा है।
निष्कर्ष
फ़रिश्तों पर ईमान लाना इस्लाम के बुनियादी विश्वासों में से एक है। कुरआन हमें सिखाता है कि फ़रिश्ते अल्लाह के सम्मानित और आज्ञाकारी बंदे हैं। वे उसकी किसी भी बात मैं नाफ़रमानी नहीं करते और हर समय उसी के आदेश के अनुसार काम करते हैं।
हारूत और मारूत भी अल्लाह की ओर से लोगों की परीक्षा के लिए भेजे गए थे। उन्होंने लोगों को पहले ही चेतावनी दी थी कि जादू सीखकर कुफ़्र में न पड़ें। कुरआन ने कहीं भी यह नहीं बताया कि उन्होंने स्वयं गुनाह किया था। इसलिए उनके बारे में मशहूर लेकिन कमज़ोर कहानियों को दीन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए।
एक सच्चे मुसलमान का रास्ता यह है कि वह कुरआन और हदीस को मज़बूती से पकड़े, हर अप्रमाणित कहानी से बचे और अपने ईमान को ज्ञान, समझ और अक़ीदे के साथ मज़बूत बनाए।
यही फ़रिश्तों की इस्मत पर ईमान का सही अर्थ है। और यही हारूत–मारूत की घटना से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक भी है।
संदर्भ
- सूरह अल-बक़रा
- सूरह अल-अंबिया
- सूरह अत-तहरीम
- सहीह मुस्लिम
लेखक:
गौहर जिया, छात्र, कुर्तुबा इंस्टिट्यूट, बिहार
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