इल्म का सफ़र और जन्नत की राह

इल्म का सफ़र और जन्नत की राह 

इंसान की ज़िंदगी एक सफ़र है। वह जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी मंज़िल की ओर बढ़ता रहता है। इस सफ़र में हर इंसान की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं। कोई दौलत को कामयाबी समझता है, कोई शोहरत को, कोई ऊँचे पद को और कोई दुनियावी तरक़्क़ी को। लेकिन एक मुसलमान के लिए असली कामयाबी इन चीज़ों से आगे है। उसकी सबसे बड़ी मंज़िल अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की कामयाबी है। इस मंज़िल तक पहुँचने के लिए जिस चीज़ की सबसे अधिक ज़रूरत है, वह है इल्म। इल्म इंसान के लिए रोशनी की तरह है। जिस तरह अंधेरे में इंसान रास्ता नहीं देख पाता, उसी तरह जहालत में वह सही और गलत के बीच फर्क नहीं कर पाता। इल्म उसे बताता है कि उसका पैदा करने वाला कौन है, उसे दुनिया में क्यों भेजा गया है और उसे किस तरह अपनी ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए। इसलिए इस्लाम ने इल्म को बहुत ऊँचा स्थान दिया है।

इस्लाम में इल्म की अहमियत

क़ुरआन-ए-करीम की पहली वह्य ही पढ़ने के आदेश से शुरू हुई। अल्लाह तआला ने फ़रमाया:

اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ

“पढ़ो अपने उस रब के नाम से जिसने पैदा किया।” (सूरह अल-अलक़: 1)

  क़ुरआन की शुरुआत में पढ़ने का आदेश होना अपने आप में इल्म की अहमियत को बताता है। अल्लाह तआला ने इंसान को सोचने और समझने की क्षमता दी और उसे ऐसी चीज़ें सिखाईं जिन्हें वह पहले नहीं जानता था। इसलिए इल्म केवल नौकरी, कारोबार या दुनियावी तरक़्क़ी का साधन नहीं है, बल्कि यह इंसान की सोच, ईमान और पूरी ज़िंदगी को सही दिशा देने का ज़रिया भी है। इल्म के ज़रिए इंसान अपने रब को पहचानता है और यह समझता है कि नमाज़ क्यों पढ़नी है, रोज़ा क्यों रखना है, माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना है और दूसरे लोगों के अधिकार क्या हैं। इस तरह इल्म इंसान को केवल पढ़ा-लिखा नहीं बनाता, बल्कि उसे अच्छा इंसान और अच्छा मुसलमान बनाने में भी मदद करता है।

नबी-ए-करीम ﷺ ने इल्म हासिल करने वालों के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी दी है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु  से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيهِ عِلْمًا، سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ

 

 

“जो व्यक्ति इल्म हासिल करने के लिए किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए उसके ज़रिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है।” (सहीह मुस्लिम: 2699)

यह छोटी-सी हदीस इल्म की पूरी अहमियत को सामने रख देती है। नबी ﷺ ने इल्म की तलाश को केवल एक अच्छी आदत नहीं बताया, बल्कि उसे जन्नत के रास्ते से जोड़ दिया। इसका मतलब यह है कि जब कोई व्यक्ति सही नीयत के साथ इल्म हासिल करता है और उस इल्म के ज़रिए अपनी ज़िंदगी को सुधारने की कोशिश करता है, तो उसका यह सफ़र आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया बन सकता है।

हदीस में “रास्ते पर चलने” का ज़िक्र है। पहले के समय में तालिब-ए-इल्म इल्म हासिल करने के लिए दूर-दूर तक सफ़र करते थे। वे कई दिनों और महीनों तक यात्रा करते, उलेमा से मिलते और उनसे हदीस तथा दीन की बातें सीखते। आज हालात बहुत बदल चुके हैं। हमारे पास किताबें, लाइब्रेरी, ऑनलाइन दर्स और दूसरे बहुत-से साधन मौजूद हैं। किताब पढ़ना, उस्ताद से सीखना, किसी मसले के बारे में पूछना और सही जानकारी तक पहुँचने की कोशिश करना भी इल्म के इसी सफ़र का हिस्सा है। लेकिन इल्म की तलाश के लिए केवल इच्छा काफी नहीं है। इसके लिए मेहनत, सब्र और समय चाहिए। कभी कोई किताब कठिन होती है, कभी कोई विषय समझ में नहीं आता और कभी पढ़ाई के लिए समय निकालना मुश्किल होता है। सच्चा तालिब-ए-इल्म वह है जो इन परेशानियों के बावजूद सीखने की कोशिश जारी रखता है। वह अपनी कमियों को स्वीकार करता है, सवाल करता है और धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

नाफ़े इल्म और उसकी असल अहमियत

इस्लाम में केवल बहुत सारी जानकारी जमा कर लेना इल्म की असली मंज़िल नहीं है। असल चीज़ नाफ़े इल्म है, यानी ऐसा ज्ञान जो इंसान को फ़ायदा पहुँचाए और उसकी ज़िंदगी को बेहतर बनाए। नबी-ए-करीम ﷺ ने दुआ की:

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ

 “ऐ अल्लाह! मैं ऐसे इल्म से तेरी पनाह चाहता हूँ जो फ़ायदा न दे।” (सहीह मुस्लिम)

इस दुआ से साफ़ होता है कि इल्म का मक़सद इंसान के अंदर बदलाव पैदा करना है। अगर कोई व्यक्ति जानता है कि झूठ बोलना बुरी बात है, लेकिन फिर भी झूठ बोलता है, अगर उसे माता-पिता के अधिकार मालूम हैं लेकिन वह उनके साथ बुरा व्यवहार करता है, या उसे ग़ीबत की बुराई पता है लेकिन फिर भी दूसरों की बुराई करता है, तो उसके इल्म और अमल के बीच दूरी है।

असल इल्म वह है जो इंसान को अपने रब के करीब करे। वह उसे नमाज़ की पाबंदी सिखाए, गुनाहों से बचाए, माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने की प्रेरणा दे और दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखना सिखाए। इल्म से इंसान के अंदर विनम्रता, सब्र और अच्छा व्यवहार पैदा होना चाहिए। अगर ज्ञान बढ़ने के साथ इंसान में घमंड भी बढ़ता जाए और वह दूसरों को छोटा समझने लगे, तो उसे अपने इल्म के उद्देश्य पर विचार करना चाहिए। सच्चा इल्म इंसान को घमंडी नहीं, बल्कि विनम्र बनाता है।

इल्म की तलाश करने वाले व्यक्ति की फ़ज़ीलत भी बहुत बड़ी है। एक हदीस में आता है कि फ़रिश्ते तालिब-ए-इल्म के काम से खुश होकर उसके लिए अपने पर बिछाते हैं और आसमान तथा ज़मीन की मख़लूक़ उसके लिए दुआ करती है, यहाँ तक कि पानी में रहने वाली मछलियाँ भी उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ करती हैं। (सुनन अबू दाऊद: 3641)

عَنْ أَبِي الدَّرْدَاءِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ يَقُولُ: مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيهِ عِلْمًا، سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ، وَإِنَّ الْمَلَائِكَةَ لَتَضَعُ أَجْنِحَتَهَا رِضًا لِطَالِبِ الْعِلْمِ، وَإِنَّ الْعَالِمَ لَيَسْتَغْفِرُ لَهُ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ، حَتَّى الْحِيتَانُ فِي الْمَاءِ

हज़रत अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़रमाते हुए सुना:

"जो व्यक्ति इल्म हासिल करने के लिए किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है। फ़रिश्ते तालिब-ए-इल्म से ख़ुश होकर उसके लिए अपने पर बिछा देते हैं। आसमानों और ज़मीन में रहने वाली सारी मख़लूक़ उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ करती है, यहाँ तक कि पानी में रहने वाली मछलियाँ भी।" (सुनन अबू दाऊद)

यह हदीस इल्म की तलाश करने वाले व्यक्ति की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत बताती है। जो व्यक्ति सही इल्म हासिल करने के लिए मेहनत करता है, उसके इस काम से फ़रिश्ते ख़ुश होते हैं और उसके सम्मान में अपने पर बिछाते हैं।

इससे भी बढ़कर, ज़मीन और आसमान की मख़लूक़ उसके लिए दुआ करती है। यहाँ तक कि पानी में रहने वाली मछलियाँ भी उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ करती हैं। यह इल्म की तलाश की अज़मत और अल्लाह के यहाँ उसके ऊँचे दर्जे को दिखाता है।

दीन का सही इल्म हासिल करना बहुत बड़ी इबादत है। इसलिए हमें इल्म सीखने के साथ-साथ उसे अपनी ज़िंदगी में उतारने और दूसरों तक पहुँचाने की भी कोशिश करनी चाहिए।

इल्म की तलाश में नीयत की बहुत बड़ी भूमिका है। एक व्यक्ति इल्म इसलिए सीख सकता है कि वह अपने रब को पहचाने और अपनी ज़िंदगी सुधार सके, जबकि दूसरा व्यक्ति उसी इल्म को लोगों की तारीफ़ और अपनी प्रसिद्धि के लिए हासिल कर सकता है। दोनों का काम बाहर से एक जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन उनके मक़सद अलग हैं। इसलिए तालिब-ए-इल्म को समय-समय पर अपनी नीयत को देखना चाहिए। उसे अपने आप से पूछना चाहिए कि वह किसके लिए सीख रहा है और उसके इल्म से उसकी अपनी ज़िंदगी में कितना बदलाव आ रहा है।

इल्म की तलाश में हमारे बुज़ुर्गों की मेहनत

हमारे बुज़ुर्गों की ज़िंदगी इल्म की तलाश और उसके लिए की गई मेहनत की बेहतरीन मिसाल है। उस समय न इंटरनेट था, न मोबाइल और न ही किताबें आसानी से उपलब्ध थीं। इसके बावजूद सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम इल्म हासिल करने के लिए दूर-दूर तक सफ़र करते थे। हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु को जब एक ऐसी हदीस के बारे में पता चला जो उन्होंने पहले नहीं सुनी थी, तो उसे सुनने के लिए उन्होंने मदीना से शाम तक लगभग एक महीने का सफ़र किया। यह इल्म के प्रति उनकी लगन और मेहनत को दिखाता है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया:

﴿فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَائِفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ﴾

"तो ऐसा क्यों न हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग दीन की समझ हासिल करने के लिए निकलते, और फिर जब अपनी क़ौम के पास लौटते तो उन्हें डराते (नसीहत करते), ताकि वे बुरे कामों से बचें।" (सूरह अत-तौबा: 122)

इसी तरह इमाम बुख़ारी रहिमहुल्लाह ने हदीस की तलाश में बहुत-से इलाक़ों का सफ़र किया और वर्षों तक मेहनत की। उन्होंने हदीसों की जाँच-पड़ताल में बहुत सावधानी बरती और उनकी मेहनत के नतीजे में सहीह बुख़ारी जैसी महान किताब सामने आई। नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया:

خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ

“तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और उसे सिखाए।” (सहीह बुख़ारी: 5027)

 आज हमारे पास इल्म हासिल करने के लिए किताबें, इंटरनेट और ऑनलाइन दर्स जैसे बहुत-से साधन हैं। इसलिए हमें अपने बुज़ुर्गों की तरह इल्म की क़द्र करनी चाहिए और उसके लिए समय और मेहनत लगानी चाहिए। असली बात यह नहीं है कि हमारे पास साधन कितने हैं, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हमारे अंदर इल्म हासिल करने की चाह और उसके लिए मेहनत कितनी है।

डिजिटल दौर में इल्म की नई ज़िम्मेदारियाँ

आज का दौर डिजिटल दौर है। मोबाइल और इंटरनेट ने इल्म हासिल करना बहुत आसान बना दिया है। हम घर बैठे क़ुरआन का तर्जुमा पढ़ सकते हैं, हदीस की किताबें देख सकते हैं और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के उलेमा के दर्स सुन सकते हैं। यह हमारे लिए अल्लाह की बड़ी नेमत है। लेकिन यही सुविधा हमारे लिए एक आज़माइश भी है। मोबाइल हमें इल्म तक पहुँचा सकता है और हमारा बहुत-सा समय बर्बाद भी कर सकता है। अगर कोई व्यक्ति घंटों सोशल मीडिया पर रहता है लेकिन क़ुरआन और दीन की किताब के लिए कुछ मिनट भी नहीं निकालता, तो उसे अपनी प्राथमिकताओं पर विचार करना चाहिए।

आज के दौर में इल्म के साथ तहक़ीक़ की ज़रूरत भी बहुत बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर हर बात सही नहीं होती। विशेष रूप से क़ुरआन और हदीस से जुड़ी बातों को बिना जाँच के आगे बढ़ाना उचित नहीं। किसी हदीस को शेयर करने से पहले उसके स्रोत को देखना चाहिए। अगर किसी बात की पुष्टि न हो तो उसे आगे फैलाने से बचना ही बेहतर है। दीन की सही बात लोगों तक पहुँचाना अच्छी बात है, लेकिन बिना जाँच के किसी गलत बात को दीन के नाम पर फैलाना नुकसान का कारण बन सकता है।

डिजिटल दौर में इल्म सीखने के साथ अपनी नीयत की हिफ़ाज़त भी ज़रूरी है। आज कोई व्यक्ति एक धार्मिक बात लिखकर या वीडियो बनाकर बहुत जल्दी हजारों लोगों तक पहुँच सकता है। यह एक बड़ी सुविधा है, लेकिन इसके साथ प्रसिद्धि और दिखावे का खतरा भी है। हमें यह देखना चाहिए कि हम दीन की बात अल्लाह की रज़ा के लिए साझा कर रहे हैं या लोगों की तारीफ़ पाने के लिए। इल्म का असल मक़सद अल्लाह के करीब होना है, अपनी प्रसिद्धि बढ़ाना नहीं।

इल्म का फल अमल है

इल्म का असली फल अमल है। केवल किसी बात को जान लेना काफी नहीं, बल्कि उसे अपनी ज़िंदगी में उतारना भी ज़रूरी है। अगर हमने सीखा कि नमाज़ फ़र्ज़ है तो उसकी पाबंदी करनी चाहिए, अगर ग़ीबत बुरी है तो उससे बचना चाहिए और अगर माता-पिता के अधिकार मालूम हैं तो उनके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

 يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لَا تَفْعَلُونَ ۝ كَبُرَ مَقْتًا عِندَ اللَّهِ أَن تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ

“ऐ ईमान वालों! तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं? अल्लाह के यहाँ यह बहुत नापसंद है कि तुम वह कहो जो करते नहीं।” (सूरह अस-सफ़: 2-3)

इसलिए हमारे ज्ञान का असर हमारे व्यवहार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाई देना चाहिए। नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया:

وَالْقُرْآنُ حُجَّةٌ لَكَ أَوْ عَلَيْك

“क़ुरआन तुम्हारे हक़ में दलील होगा या तुम्हारे खिलाफ़।” (सहीह मुस्लिम: 223)

इसका मतलब है कि क़ुरआन को पढ़ने और समझने के साथ उस पर अमल करना भी ज़रूरी है। अगर हमारा इल्म हमें नमाज़, अच्छे अख़लाक़, सच्चाई और नेक कामों की तरफ़ ले जा रहा है, तो यह नाफ़े इल्म है। लेकिन अगर ज्ञान बढ़ने के बावजूद हमारे व्यवहार में कोई सुधार नहीं आता, तो हमें अपने इल्म और अमल के बीच संबंध पर विचार करना चाहिए।

इल्म का लाभ केवल अपने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जो सही और फ़ायदेमंद बात हमें मालूम हो, उसे अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों तक पहुँचाना भी अच्छी बात है।

 नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: مَنْ دَلَّ عَلَى خَيْرٍ فَلَهُ مِثْلُ أَجْرِ فَاعِلِهِ

“जो किसी अच्छे काम की ओर मार्गदर्शन करे, उसे उस काम को करने वाले के बराबर सवाब मिलता है।” (सहीह मुस्लिम(

इसलिए हमें सही ज्ञान सीखने, उस पर अमल करने और दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन दीन की बात बताते समय सावधानी ज़रूरी है और जिस बात का सही ज्ञान न हो, उसके बारे में किसी योग्य आलिम से पूछना बेहतर है।

सच्चा इल्म इंसान के अंदर विनम्रता भी पैदा करता है। जितना अधिक इंसान सीखता है, उतना ही उसे अपनी सीमाओं का एहसास होता है। इसलिए इल्म बढ़ने के साथ घमंड नहीं, बल्कि अल्लाह के सामने झुकने और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने की भावना बढ़नी चाहिए। अगर इल्म की वजह से हमारे अंदर सच्चाई, विनम्रता, माता-पिता का सम्मान, गरीबों के लिए रहम और दूसरों के अधिकारों की चिंता पैदा होती है, तो यही इल्म की असली बरकत है। इल्म रास्ता दिखाता है और अमल उस रास्ते पर चलाता है। दोनों साथ हों, तभी इंसान अपनी मंज़िल तक पहुँच सकता है।

निष्कर्ष

इंसान की दुनिया की ज़िंदगी चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो, एक दिन उसे मौत का सामना करना है। उस समय उसकी दौलत, मकान, गाड़ी, पद और दुनियावी शोहरत उसके साथ नहीं जाएँगे। उसके साथ उसका ईमान और उसके आमाल जाएँगे। इसलिए हमें ऐसी चीज़ हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए जो हमारी मौत के बाद भी हमारे लिए फ़ायदेमंद हो। इल्म का सफ़र इसी तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसा इल्म जो हमें अपने रब की पहचान दे, सही और गलत का फर्क बताए, हमारे अख़लाक़ को बेहतर करे और हमें नेक कामों की तरफ़ ले जाए, वही हमारे लिए असली दौलत है।

नबी-ए-करीम ﷺ का यह फ़रमान कि “जो व्यक्ति इल्म की तलाश में किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है” हमें उम्मीद भी देता है और ज़िम्मेदारी भी। हमें इल्म हासिल करना है, लेकिन सही नीयत के साथ; उस पर अमल करना है, लेकिन दिखावे के बिना; और उसे दूसरों तक पहुँचाना है, लेकिन पूरी ज़िम्मेदारी के साथ। अगर हम अपनी ज़िंदगी में रोज़ थोड़ा-सा समय इल्म के लिए निकालें, क़ुरआन को समझने की कोशिश करें, सही हदीस और दीनी किताबों का अध्ययन करें, उलेमा से सीखें और जो सीखें उस पर अमल करें, तो हमारा यह छोटा-सा प्रयास धीरे-धीरे हमारी पूरी ज़िंदगी को बदल सकता है।

अल्लाह तआला हमें नाफ़े इल्म अता फ़रमाए, हमारे दिलों को क़ुरआन और सुन्नत के नूर से रोशन करे, हमें अपने इल्म पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे, हमारी नीयतों को ख़ालिस करे और हमारे इल्मी सफ़र को अपनी रज़ा और जन्नत तक पहुँचने का ज़रिया बनाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

संदर्भ

  • सूरह अल-अलक़
  • सूरह अस-सफ़
  • सूरह अत-तौबा
  • सहीह बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन अबू दाऊद

लेखक:

नाम : साकिब रज़ा

स्थान : दरभंगा, बिहार

शिक्षा : दारुल हुडा में सीनियर सेकेंडरी के अंतिम वर्ष के विद्यार्थी

 

Disclaimer

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