नबी ﷺ की आमद: रबीउल अव्वल की वह सुबह जिसने दुनिया को रोशन कर दिया

परिचय

रबीउल अव्वल का नाम आते ही एक मोमिन के दिल में एक खास तरह की खुशी पैदा होती है। यह वही मुबारक महीना है जिसमें इस दुनिया को वह महान हस्ती मिली, जिसके बारे में अल्लाह ने फ़रमाया कि उसे रहमतुल्लिल-आलमीन बनाकर भेजा गया। वह हस्ती जो अंधेरे में भटकती इंसानियत के लिए रोशनी बनकर आई, जिसने टूटे हुए दिलों को जोड़ा, इंसान को उसके रब से मिलाया, गरीब को इज़्ज़त दी, गुलाम को इंसानियत का दर्जा दिया और दुश्मनों तक के साथ रहम और माफ़ी का ऐसा व्यवहार किया जिसकी मिसाल इतिहास में बहुत कम मिलती है।

वह हस्ती थीं—हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा

रबीउल अव्वल केवल कैलेंडर का एक महीना नहीं; यह हमें उस महान नेमत की याद दिलाता है जो पूरी इंसानियत को मिली। यह महीना हमें अपने नबी की सीरत को पढ़ने, उनके अख़लाक़ को समझने और उनकी सुन्नत को अपनी ज़िंदगी में उतारने का संदेश देता है।

क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ और हमने आपको तमाम जहानों के लिए रहमत बनाकर ही भेजा है।
(सूरह अल-अंबिया, 21:107)

यानी नबी की पैग़म्बरी किसी एक क़ौम, नस्ल या इलाके तक सीमित नहीं थी। आपकी रहमत तमाम इंसानियत के लिए थी, बल्कि तमाम जहानों के लिए थी।

जब दुनिया को एक रहबर की ज़रूरत थी

नबी की आमद से पहले अरब का समाज अनेक तरह की बुराइयों में घिरा हुआ था। शिर्क और बुतपरस्ती आम थी। क़बीलों की दुश्मनियाँ पीढ़ियों तक चलती थीं। ताक़तवर कमज़ोर को दबाता था। शराब, जुआ और बदकारी जैसी बुराइयाँ समाज में फैली हुई थीं। बेटियों को पैदा होने पर ज़िंदा दफ़न कर देने जैसी क्रूरता भी पाई जाती थी।

लेकिन यह केवल अरब की समस्या नहीं थी। उस समय दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इंसानियत अनेक तरह के ज़ुल्म, असमानता और नैतिक पतन (moral decline) का सामना कर रही थी। इंसान ने तरक़्क़ी के कुछ रास्ते ज़रूर खोज लिए थे, लेकिन उसे अपने पैदा करने वाले रब की सही पहचान और जीवन का सही उद्देश्य नहीं मिला था।

ऐसे समय में मक्का की धरती पर वह नूर आया जो दुनिया की तस्वीर बदलने वाला था।

हज़रत मुहम्मद ने लोगों को सबसे पहले यह बताया कि इबादत के लायक़ केवल एक अल्लाह है। उन्होंने इंसान को उसके असली मक़सद की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि इंसान की असली इज़्ज़त उसके माल, नस्ल, रंग, क़बीले या पद में नहीं, बल्कि उसके तक़वा और अच्छे किरदार में है।

आप ने उस समाज को बदलना शुरू किया जो अपने ही बनाए हुए झूठे फ़र्क़ों में बँटा हुआ था।

एक तरफ़ अमीर और गरीब के बीच दूरी थी, दूसरी तरफ़ क़बीले और क़बीले के बीच नफ़रत। नबी ने सबको एक रब के बंदे और एक इंसानी परिवार का हिस्सा बताया।

क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ

लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें अलग-अलग क़ौमों और क़बीलों में इसलिए बनाया कि तुम एक-दूसरे को पहचानो। बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।
(सूरह अल-हुजुरात, 49:13)

यही वह पैग़ाम था जिसने इंसान को इंसान के करीब किया।

रबीउल अव्वल: रहमत की याद का महीना

रबीउल अव्वल का अर्थ है—बहारे का पहला महीना। मुसलमानों के लिए इस महीने की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसी महीने में नबी-ए-करीम की पैदाइश हुई।

नबी की पैदाइश की तारीख़ के बारे में इतिहास और सीरत की किताबों में अलग-अलग रिवायतें मिलती हैं। 12 रबीउल अव्वल बहुत मशहूर तारीख़ है।  आप की आमद इंसानियत के लिए अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत थी।

क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ

यक़ीनन अल्लाह ने मोमिनों पर बड़ा एहसान किया कि उनके बीच उन्हीं में से एक रसूल भेजा।
(सूरह आले-इमरान, 3:164)

सोचिए, यह कितना बड़ा एहसान है कि हमें केवल किताब नहीं दी गई, बल्कि उस किताब को समझाने और उसकी ज़िंदगी में मिसाल पेश करने के लिए एक रसूल भी भेजा गया।

क़ुरआन हमें नमाज़ का हुक्म देता है, लेकिन नबी ने हमें नमाज़ पढ़कर दिखाया। क़ुरआन हमें ज़कात का आदेश देता है, लेकिन नबी ने ज़कात का निज़ाम कायम करके दिखाया। क़ुरआन हमें माफ़ी और रहम की शिक्षा देता है, लेकिन नबी ने अपने व्यवहार से माफ़ी और रहम का सबसे ऊँचा नमूना पेश किया।

इसलिए नबी की आमद केवल एक तारीख़ का नाम नहीं है। यह हिदायत के एक मुकम्मल रास्ते की आमद है।

नबी : रहमत, मुहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम

नबी का सबसे बड़ा परिचय यही है कि आप रहमत बनकर आए। आप ने केवल अपने साथियों से अच्छा व्यवहार नहीं किया, बल्कि बच्चों, औरतों, गरीबों, यतीमों, पड़ोसियों, बूढ़ों और यहां तक कि जानवरों के साथ भी रहम और नरमी की शिक्षा दी।

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु, जिन्होंने कई वर्षों तक नबी की ख़िदमत की, बताते हैं कि उन्होंने इतने वर्षों में कभी नबी को उनके किसी काम पर “उफ़” तक कहते नहीं सुना। (सहीह अल-बुख़ारी; सहीह मुस्लिम)

यह हमारे लिए कितना बड़ा सबक है।

आज हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते हैं। घर में आवाज़ ऊँची हो जाती है, बच्चों की छोटी गलती पर सख़्ती हो जाती है, दोस्तों की भूल पर रिश्ते टूट जाते हैं और सोशल मीडिया पर किसी की एक बात हमें महीनों तक नाराज़ रखती है।

ऐसे समय में रबीउल अव्वल हमसे पूछता है:

हम किस नबी को मानते हैं?

वह नबी जो बदले के बजाय माफ़ी पसंद करते थे।

मक्का में वर्षों तक जिन लोगों ने आपको और आपके साथियों को सताया, उन्हीं पर विजय के दिन आपको बदला लेने का पूरा अवसर मिला। मगर आपने आम माफ़ी का रास्ता अपनाया।

ताइफ़ में जब आपको बेहद तकलीफ़ पहुँचाई गई और पत्थर मारे गए, तब भी आपने उनके लिए बददुआ के बजाय उम्मीद और रहमत का रास्ता चुना।

एक अवसर पर एक देहाती ने आपकी चादर को इतनी सख़्ती से खींचा कि आपकी गर्दन पर निशान पड़ गया। सहाबा को गुस्सा आया, लेकिन नबी मुस्कुराए और उसे कुछ देने का आदेश दिया।
(सहीह अल-बुख़ारी; सहीह मुस्लिम)

यही मुहम्मदी अख़लाक़ है।

क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है:

وَإِنَّكَ لَعَلَىٰ خُلُقٍ عَظِيمٍ

और बेशक आप महान चरित्र के ऊँचे दर्जे पर हैं।
(सूरह अल-क़लम, 68:4)

नबी की सीरत का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि आपने केवल भाषण नहीं दिए; आपने अपनी पूरी ज़िंदगी को पैग़ाम बना दिया।

नबी की आमद और आज का इंसान

आज दुनिया वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ चुकी है। इंसान ने चाँद तक पहुँचने की कोशिश की, इंटरनेट ने दुनिया को एक-दूसरे के करीब कर दिया और आधुनिक विज्ञान ने जीवन के अनेक क्षेत्रों को बदल दिया।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इंसान के दिल को सुकून मिल गया?

आज भी दुनिया में अकेलापन, नफ़रत, हिंसा, अन्याय, नस्लवाद, पारिवारिक टूटन और मानसिक बेचैनी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। इससे पता चलता है कि इंसान को केवल भौतिक तरक़्क़ी नहीं चाहिए; उसे अख़लाक़, इंसाफ़, रहमत और रूहानी हिदायत की भी ज़रूरत है।

और यही वह जगह है जहाँ नबी की सीरत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी चौदह सौ साल पहले थी।

अगर हम नबी से मुहब्बत करते हैं तो हमें अपने घरों में उनकी सुन्नत का रंग लाना होगा।

हम अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?

हम अपनी पत्नी और बच्चों के साथ किस तरह पेश आते हैं?

हम अपने पड़ोसी के बारे में क्या सोचते हैं?

हम गरीब और कमज़ोर इंसान को किस नज़र से देखते हैं?

हम अपने से असहमत व्यक्ति के साथ किस भाषा में बात करते हैं?

यही सवाल हमारी मुहब्बत की सच्चाई को सामने लाते हैं।

नबी ने फ़रमाया:

لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّىٰ أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ

तुममें से कोई व्यक्ति उस समय तक (कामिल) मोमिन नहीं हो सकता जब तक मैं उसके लिए उसके पिता, उसकी संतान और तमाम लोगों से अधिक प्रिय हो जाऊँ।
(सहीह अल-बुख़ारी; सहीह मुस्लिम)

लेकिन नबी से मुहब्बत केवल ज़बान से हम मुहम्मद से प्यार करते हैं कहने का नाम नहीं। सच्ची मुहब्बत यह है कि हम आपकी सुन्नत को अपनी ज़िंदगी में जगह दें।

आप सच्चे थे—हम भी सच्चाई अपनाएँ।

आप अमानतदार थे—हम भी अमानत की हिफ़ाज़त करें।

आप माफ़ करने वाले थे—हम भी माफ़ करना सीखें।

आप गरीबों का ख़याल रखते थे—हम भी ज़रूरतमंदों का सहारा बनें।

आप पड़ोसियों के हक़ का ख़याल रखते थे—हम भी पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करें।

आप बच्चों से मुहब्बत करते थे—हम भी बच्चों के साथ रहम और प्यार से पेश आएँ।

यही रबीउल अव्वल का असली पैग़ाम है।

आमद का जश्नऔर सीरत का सबक

रबीउल अव्वल आते ही हमारे दिलों में नबी की मुहब्बत ताज़ा होती है। नातें पढ़ी जाती हैं, महफ़िलें होती हैं, सीरत के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और लोग नबी पर दरूद भेजते हैं। यह मुहब्बत ईमान का हिस्सा है।

लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि नबी की याद केवल कुछ दिनों या किसी एक महीने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

अल्लाह फ़रमाता है:

إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا

बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर दरूद भेजते हैं। ईमान वालो! तुम भी उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।
(सूरह अल-अहज़ाब, 33:56)

इसलिए रबीउल अव्वल में दरूद की कसरत करना, सीरत पढ़ना और नबी की शिक्षाओं को समझना एक खूबसूरत अमल है। मगर इस मुबारक महीने का सबसे बड़ा लाभ तब होगा जब यह हमारे पूरे साल की ज़िंदगी बदल दे।

अगर रबीउल अव्वल में हमने सीरत पढ़ी और फिर झूठ बोलना नहीं छोड़ा, ग़ीबत नहीं छोड़ी, दिल दुखाना नहीं छोड़ा, नमाज़ में सुधार नहीं किया, माता-पिता के साथ व्यवहार नहीं सुधारा और लोगों के अधिकारों का ख़याल नहीं रखा, तो हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि हमने नबी की आमद से क्या सीखा?

नबी हमारे लिए केवल इतिहास की एक महान शख़्सियत नहीं हैं। आप हमारे उसवा हैं—जीवन के हर क्षेत्र में आदर्श।

क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ

यक़ीनन तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में बेहतरीन नमूना है।
(सूरह अल-अहज़ाब, 33:21)

आज का संकल्प

आइए इस रबीउल अव्वल में हम केवल यह न कहें कि नबी की आमद से दुनिया रोशन हुई।

बल्कि हम अपनी ज़िंदगी को भी उस रोशनी से रोशन करने का संकल्प लें।

हम रोज़ थोड़ा-सा क़ुरआन पढ़ें। हम सीरत की किताब पढ़ें। हम नबी पर अधिक से अधिक दरूद भेजें।

हम अपनी ज़बान को झूठ, ग़ीबत और बदज़बानी से बचाएँ। हम अपने घर को मुहब्बत का घर बनाएँ।

हम अपने माता-पिता, बच्चों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के अधिकार पहचानें। हम कमज़ोरों और ज़रूरतमंदों का सहारा बनें। और सबसे बढ़कर—हम नबी की सुन्नत को अपनी ज़िंदगी का रास्ता बनाएँ।

क्योंकि नबी की आमद का सबसे खूबसूरत जश्न यही है कि हमारी ज़िंदगी आपके लाए हुए पैग़ाम की तस्वीर बन जाए।

निष्कर्ष

रबीउल अव्वल की हवाएँ जब चलती हैं तो ऐसा महसूस होता है जैसे इतिहास हमें पुकार रहा हो—मक्का की गलियों से, मदीना की गलियों से, ग़ार-ए-हिरा की ख़ामोशियों से और उस महान ज़िंदगी के हर मोड़ से।

वह पुकार कहती है:

अपने नबी को पहचानो।

उनकी सीरत पढ़ो।

उनकी मुहब्बत को दिल में बसाओ।

उनकी सुन्नत को अपनाओ।

उनके अख़लाक़ को अपनी ज़िंदगी में उतारो।

जिस दिन हमारे घरों में नबी की सुन्नत की खुशबू होगी, हमारी ज़बान पर दरूद के साथ हमारे व्यवहार में भी रहमत होगी, हमारे दिल में ईमान के साथ दूसरों के लिए मुहब्बत होगी—उस दिन हम वास्तव में उस नूर से फ़ायदा उठा रहे होंगे जो नबी-ए-रहमत लेकर आए थे।

रबीउल अव्वल हमें सिर्फ़ यह याद दिलाए कि नबी कब दुनिया में आए; बल्कि यह भी याद दिलाए कि नबी क्यों आए और हम उनकी लाई हुई हिदायत को अपनी ज़िंदगी में कैसे उतार सकते हैं।

अल्लाह हमें अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा की सच्ची मुहब्बत, उनकी सुन्नत पर अमल और उनके अख़लाक़ को अपनाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

اللَّهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ وَبَارِكْ عَلَىٰ سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَىٰ آلِهِ وَصَحْبِهِ أَجْمَعِينَ۔

आमीन।

संदर्भ सूची

  1. सूरह अल-अंबिया (21), आयत 107 — नबी-ए-करीम को तमाम जहानों के लिए रहमत बनाए जाने के संबंध में।
  2. सूरह आले-इमरान (3), आयत 164 — मोमिनों के बीच रसूल की आमद को अल्लाह की बड़ी नेमत बताए जाने के संबंध में।
  3. सूरह अल-हुजुरात (49), आयत 13 — इंसानों की समानता और तक़वा को सम्मान का आधार बताए जाने के संबंध में।
  4. सूरह अल-क़लम (68), आयत 4 — नबी के महान चरित्र के संबंध में।
  5. सूरह अल-अहज़ाब (33), आयत 56 — नबी पर दरूद और सलाम भेजने के संबंध में।
  6. सूरह अल-अहज़ाब (33), आयत 21 — नबी को बेहतरीन नमूना (उसवा-ए-हसना) बताए जाने के संबंध में।
  1. इमाम मुहम्मद बिन इस्माईल अल-बुख़ारी, सहीह अल-बुख़ारी — हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत, जिसमें नबी के नरम और रहमदिल व्यवहार का उल्लेख है।
  2. इमाम मुस्लिम बिन अल-हज्जाज, सहीह मुस्लिम — हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत, जिसमें नबी के उच्च चरित्र और नरम व्यवहार का उल्लेख है।
  3. इमाम मुहम्मद बिन इस्माईल अल-बुख़ारी, सहीह अल-बुख़ारी — उस व्यक्ति से संबंधित रिवायत जिसमें उसने नबी की चादर को सख़्ती से खींचा और नबी ने उसके साथ नरमी का व्यवहार किया।
  4. इमाम मुस्लिम बिन अल-हज्जाज, सहीह मुस्लिम — उसी घटना से संबंधित रिवायत।
  5. इमाम मुहम्मद बिन इस्माईल अल-बुख़ारी, सहीह अल-बुख़ारी — नबी की मुहब्बत को ईमान का हिस्सा बताए जाने वाली हदीस: “तुममें से कोई व्यक्ति उस समय तक कामिल मोमिन नहीं हो सकता जब तक मैं उसके लिए उसके पिता, उसकी संतान और तमाम लोगों से अधिक प्रिय न हो जाऊँ।”
  6. इमाम मुस्लिम बिन अल-हज्जाज, सहीह मुस्लिम — नबी की मुहब्बत और ईमान से संबंधित उपर्युक्त हदीस।
  1. इब्न हिशाम, अस-सीरतुन्नबविय्या — नबी-ए-करीम की पैदाइश, मक्का का दौर, ताइफ़, फ़त्ह-ए-मक्का और सीरत के अन्य प्रमुख प्रसंग।
  2. इब्न कसीर, अस-सीरतुन्नबविय्या — नबी की ज़िंदगी और सीरत के प्रमुख घटनाक्रम।
  3. सफ़ीउर्रहमान मुबारकपुरी, अर-रहीक़ अल-मख़्तूम — नबी की पैदाइश, पैग़म्बरी, मक्की और मदनी जीवन तथा सीरत के विभिन्न पहलुओं के लिए।

सुमय्या परवीन, रफीगंज, बिहार 

Disclaimer

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