औरतों की तरावीह में जमाअत से शामिल होने का शरीअती हुक्म

प्रस्तावना

औरतों को चाहिए कि फ़र्ज़, नफ़्ल और तरावीह — यानी तमाम नमाज़ें अपने-अपने घरों में पढ़ें। कुछ जगहों पर तरावीह के नाम पर औरतें इकट्ठा हो रही हैं और देर रात के बाद घर वापस लौटती हैं। शरीअत के मुताबिक यह सही नहीं है।

फ़ुक़हा, मुहद्दिसीन और उलमा-ए-किराम ने इसे मक़रूह--तहरीमी बताया है। और आज के समय में फ़ितने और बिगाड़ के डर की वजह से औरतों की जमाअत को सख्ती से रोकने की बात कही गई है।

  • नबी करीम ﷺ के ज़माने में कुछ शर्तों के साथ औरतों को बाहर निकलने की अनुमति थी। लेकिन इसके साथ ही खुद नबी करीम ﷺ को यह ज्यादा पसंद था और आप इसकी प्रेरणा देते थे कि औरतें अपने घरों में ही नमाज़ पढ़ें।

इस बारे में कई हदीसों में भी यह बात बताई गई है। एक हदीस मुलाहिज़ा कीजिए:

मुस्नद अहमद में है:

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سُوَيْدٍ الْأَنْصَارِيِّ، عَنْ عَمَّتِهِ أُمِّ حُمَيْدٍ امْرَأَةِ أَبِي حُمَيْدٍ السَّاعِدِيِّ، أَنَّهَا جَاءَتِ النَّبِيَّ ﷺ فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنِّي أُحِبُّ الصَّلَاةَ مَعَكَ.

قَالَ: «قَدْ عَلِمْتُ أَنَّكِ تُحِبِّينَ الصَّلَاةَ مَعِي، وَصَلَاتُكِ فِي بَيْتِكِ خَيْرٌ لَكِ مِنْ صَلَاتِكِ فِي حُجْرَتِكِ، وَصَلَاتُكِ فِي حُجْرَتِكِ خَيْرٌ لَكِ مِنْ صَلَاتِكِ فِي دَارِكِ، وَصَلَاتُكِ فِي دَارِكِ خَيْرٌ لَكِ مِنْ صَلَاتِكِ فِي مَسْجِدِ قَوْمِكِ، وَصَلَاتُكِ فِي مَسْجِدِ قَوْمِكِ خَيْرٌ لَكِ مِنْ صَلَاتِكِ فِي مَسْجِدِي».

قَالَ: فَأَمَرْتْ فَبُنِيَ لَهَا مَسْجِدٌ فِي أَقْصَى شَيْءٍ مِنْ بَيْتِهَا وَأَظْلَمِهِ، فَكَانَتْ تُصَلِّي فِيهِ حَتَّى لَقِيَتِ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ.

अनुवाद:

हज़रत अब्दुल्लाह बिन सुवैद अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि उनकी फूफी हज़रत उम्मे हमीद रज़ियल्लाहु अन्हा, जो अबू हमीद साअिदी रज़ियल्लाहु अन्हु की पत्नी थीं, रसूलुल्लाह ﷺ की खिदमत में हाज़िर हुईं और अर्ज किया:
“ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे आपके साथ नमाज़ पढ़ना बहुत पसंद है।”

आप ﷺ ने फ़रमाया:
“मुझे मालूम है कि तुम्हें मेरे साथ नमाज़ पढ़ना पसंद है। लेकिन तुम्हारा अपने घर में नमाज़ पढ़ना, तुम्हारे कमरे में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है।
और तुम्हारा कमरे में नमाज़ पढ़ना, आँगन में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है।
और तुम्हारा आँगन में नमाज़ पढ़ना, अपने मोहल्ले की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है।
और तुम्हारा अपने मोहल्ले की मस्जिद में नमाज़ पढ़ना, मेरी मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) में नमाज़ पढ़ने से भी बेहतर है।”

हज़रत अब्दुल्लाह बिन सुवैद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि इसके बाद उनकी फूफी हज़रत उम्मे हमीद रज़ियल्लाहु अन्हा ने अपने घर के सबसे आख़िरी और ज़्यादा अंधेरे हिस्से में नमाज़ पढ़ने की एक जगह बना ली, और फिर अपनी ज़िन्दगी के आख़िर तक वहीं नमाज़ पढ़ती रहीं।

(मुस्नद अहमद, अहमद बिन हम्बल, मुस्नदुन-निसा, हदीस उम्मे हमीद)

  • बाद में जब ज़माने के हालात बदल गए (ज़ेब-ओ-ज़ीनत और फ़ितना आदि बढ़ गया), तो हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने औरतों के मस्जिद जाने से मना करने का हुक्म जारी कर दिया। सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन ने भी इसे स्वीकार किया और इस तरह मुत्तफ़िक़ तौर पर यह मनाही साबित हो गई।

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि अगर रसूलुल्लाह ﷺ औरतों में बाद में आने वाले इन बदलावों को देख लेते, तो आप ﷺ खुद ही उन्हें मस्जिद आने से रोक देते। इस बारे में सहीह बुख़ारी की एक रिवायत है:

عَنْ عَمْرَةَ، عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، قَالَتْ:
لَوْ أَدْرَكَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ مَا أَحْدَثَ النِّسَاءُ لَمَنَعَهُنَّ، كَمَا مُنِعَتْ نِسَاءُ بَنِي إِسْرَائِيلَ. قُلْتُ لِعَمْرَةَ: أَوَ مُنِعْنَ؟ قَالَتْ: نَعَمْ.

हज़रत अमरा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि उम्मुल-मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने फरमाया:

“अगर रसूलुल्लाह ﷺ उन बदलावों को देख लेते जो औरतों ने बाद में पैदा कर लिए हैं, तो आप ﷺ उन्हें मस्जिद आने से जरूर रोक देते, जैसे बनी इस्राईल की औरतों को रोक दिया गया था।”

मैंने अमरा से पूछा:
“क्या बनी इस्राईल की औरतों को भी मस्जिद में आने से रोक दिया गया था?”

उन्होंने जवाब दिया:
“हाँ।”

(सहीह अल-बुख़ारी)

  • मलिकुल-उलमा अलाउद्दीन इमाम अबू बक्र बिन मसऊद अल-कासानी अल-हनफ़ी (वफ़ात 587 हिजरी) अपनी किताब बदाइउ-स्सनाइʿ में लिखते हैं:

وَأَمَّا الْمَرْأَةُ فَإِنَّهَا مَشْغُولَةٌ بِخِدْمَةِ الزَّوْجِ، مَمْنُوعَةٌ عَنِ الْخُرُوجِ إِلَى مَحَافِلِ الرِّجَالِ، لِكَوْنِ الْخُرُوجِ سَبَبًا لِلْفِتْنَةِ، وَلِهَذَا لَا جَمَاعَةَ عَلَيْهِنَّ وَلَا جُمُعَةَ عَلَيْهِنَّ أَيْضًا.

और जहाँ तक औरत का मामला है, तो वह अपने शौहर की ख़िदमत में लगी रहती है। उसे मर्दों की महफ़िलों में जाने से रोका गया है, क्योंकि बाहर निकलना फ़ितने का कारण बन सकता है। इसी वजह से औरतों पर न जमाअत की नमाज़ ज़रूरी है और न ही जुमुआ की नमाज़” । (बदाइउ-स्सनाइʿ)

  • इसी किताब में यह भी लिखा है:

وَلَا يُبَاحُ لِلشَّوَابِّ مِنْهُنَّ الْخُرُوجُ إِلَى الْجَمَاعَاتِ، بِدَلِيلِ مَا رُوِيَ عَنْ عُمَرَ – رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ – أَنَّهُ نَهَى الشَّوَابَّ عَنِ الْخُرُوجِ؛ وَلِأَنَّ خُرُوجَهُنَّ إِلَى الْجَمَاعَةِ سَبَبُ الْفِتْنَةِ، وَالْفِتْنَةُ حَرَامٌ، وَمَا أَدَّى إِلَى الْحَرَامِ فَهُوَ حَرَامٌ.

और उनमें से जवान औरतों के लिए जमाअत की नमाज़ के लिए बाहर निकलना जायज़ नहीं है। इसकी दलील वह रिवायत है जो हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्वी है कि उन्होंने जवान औरतों को मस्जिद वगैरह की तरफ जाने से मना किया था।

इसके अलावा यह भी कारण है कि उनका जमाअत के लिए बाहर निकलना फ़ितने का कारण बन सकता है। और फ़ितना हराम है। और जो चीज़ किसी हराम काम तक पहुँचने का ज़रिया बन जाए, वह भी हराम होती है।

  • अल्लामा बदरुद्दीन ऐनी हनफ़ी रहमतुल्लाह अलैह (वफ़ात 855 हिजरी) लिखते हैं:

وَالْفَتْوَى فِي هَذَا الزَّمَانِ عَلَى عَدَمِ الْخُرُوجِ فِي حَقِّ الْكُلِّ مُطْلَقًا، لِشُيُوعِ الْفَسَادِ، وَعُمُومِ الْمُصِيبَةِ. (شرح سنن أبي داود للعيني، كتاب الصلاة)

इस ज़माने में फ़तवा यही है कि औरतें नमाज़ के लिए बिल्कुल भी घर से बाहर न निकलें, क्योंकि फ़ितना और बिगाड़ आम हो गया है।

  • तनवीरुल-अबसार दुर्रुल-मुख्तार में लिखा है:

وَيُكْرَهُ حُضُورُهُنَّ الْجَمَاعَةَ وَلَوْ لِجُمُعَةٍ وَعِيدٍ وَوَعْظٍ مُطْلَقًا، وَلَوْ عَجُوزًا لَيْلًا، عَلَى الْمَذْهَبِ الْمُفْتَى بِهِ لِفَسَادِ الزَّمَانِ.

औरतों का जमाअत में शामिल होना मुफ़्ता-बिही मज़हब के अनुसार इस ज़माने के फ़साद की वजह से बिल्कुल मक़रूह--तहरीमी है।
चाहे वह जुमुआ की नमाज़, ईद की नमाज़ या वअज़ (दीन की बात सुनने) के लिए ही क्यों न हो। चाहे औरतें बूढ़ी ही क्यों हों, और चाहे रात की नमाज़ ही क्यों न हो।

(तनवीरुल-अबसार दुर्रुल-मुख्तार, किताबुस्सलात)

  • फ़िक़्ह--हनफ़ी की मशहूर किताब अद-दुर्रुल-मुख़्तार लिल-हसकफ़ी में लिखा है:

وَيُكْرَهُ تَحْرِيمًا جَمَاعَةُ النِّسَاءِ وَلَوِ التَّرَاوِيحُ

"औरतों की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ना मक़रूह--तहरीमी है, चाहे वह तरावीह ही क्यों न हो"।

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी ने इसके नीचे लिखा:

(قَوْلُهُ وَلَوْ فِي التَّرَاوِيحِ) أَفَادَ أَنَّ الْكَرَاهَةَ فِي كُلِّ مَا تُشْرَعُ فِيهِ جَمَاعَةُ الرِّجَالِ فَرْضًا أَوْ نَفْلًا.

अल्लामा हसकफ़ी के इस वाक्य चाहे तरावीह ही क्यों हो से यह बात मालूम होती है कि हर वह नमाज़ जिसमें मर्दों के लिए जमाअत करना शरीअत में तय किया गया है — चाहे वह फ़र्ज़ नमाज़ हो या नफ़्ल नमाज़ — उस नमाज़ को औरतों का जमाअत से पढ़ना मक़रूह--तहरीमी है।

 (हाशिया इब्न आबिदीन शामी (वफ़ात 1252 हिजरी) = रद्दुल-मुहतार(

चर्चा का निष्कर्ष (खुलासा--बहस)

तरावीह की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ने के लिए औरतों का अपने घरों से निकलकर इकट्ठा होना जायज़ नहीं है।
तरावीह या किसी भी फ़र्ज़ या नफ़्ल नमाज़ की जमाअत में औरतों को शामिल करना — चाहे इमाम मर्द हो या औरत — यह रसूल ﷺ के पसंदीदा तरीक़े के खिलाफ है, सहाबा-ए-किराम की शिक्षाओं के खिलाफ है और ताबेईन के अमल के भी खिलाफ है।
और यही फ़िक़्ह--हनफ़ी में फ़तवा दिया हुआ (क़ौल--मुफ़्ता-बिही) है। अल्लाह का शुक्र है कि आज भी अहले-सुन्नत वल-जमाअत सहाबा-ए-किराम के इसी तरीक़े पर कायम हैं और उसी सही तरीके की पैरवी करने का हुक्म देते हैं।

चेतावनी

आजकल कुछ नए और गुमराह फ़िरक़ों में यह रुझान देखा जा रहा है कि वे सहाबा के इस फैसले के खिलाफ जाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि किसी तरह नमाज़ के बहाने लोगों को अपने पास बुला सकें।
क्योंकि अगर औरतें आएँगी तो संभव है कि उनके साथ उनके मर्द भी आएँ, और इस तरह उन्हें अपनी बात फैलाने का मौका मिल जाएगा।
इस तरह की हरकतों के जरिए वे सुन्नी घरानों को अपने फ़िरक़े में शामिल करना चाहते हैं। इसलिए मुसलमान अहले-सुन्नत को सतर्क रहने की जरूरत है।
मर्दों को चाहिए कि वे अपने घर की औरतों को इस काम से रोकें और घर में ही तरावीह की नमाज़ पढ़ने का माहौल बनाएँ।

एक सीमित गुंजाइश

हाँ, अगर घर का कोई हाफ़िज़--क़ुरआन अपने घर में ही तरावीह पढ़ाए, और घर की दो-चार महिलाएँ — जैसे माँ, बहनें, फूफियाँ आदि — भी शामिल हो जाएँ, और सफ़ (कतार) बनाने के शरीअती नियमों का ध्यान रखा जाए, तो हनफ़ी फिक़्ह के अनुसार इसकी गुंजाइश है, बशर्ते कि बाहर से मर्दों या औरतों को बुलाकर भीड़ न बनाई जाए।

और अगर कोई लड़की या महिला हाफ़िज़ा हो, तो उसके लिए यही हुक्म है कि वह अपनी तरावीह अकेले ही पढ़े और जितना हो सके उतना क़ुरआन पढ़े।
वह अपने घर में कतार बनाकर केवल घर की औरतों की भी इमामत नहीं कर सकती, बाहर की औरतों को बुलाने की तो बात ही बहुत दूर है; क्योंकि यह मक़रूह--तहरीमी और गुनाह है।

 (और अल्लाह तआला ही सबसे बेहतर जानता है।)

नीचे आपके लेख में इस्तेमाल की गई किताबों और हदीसों की संदर्भ सूची (References / راجع) हिंदी में व्यवस्थित रूप में दी जा रही है:

संदर्भ सूची (References)

  1. इमाम अहमद बिन हम्बल. मुस्नद अहमद.
  2. इमाम मुहम्मद बिन इस्माईल अल-बुख़ारी. सहीह अल-बुख़ारी.
  3. इमाम अबू बक्र बिन मसऊद अल-कासानी अल-हनफ़ी. बदाइउ-स्सनाइʿ फी तरतीबिश-शराइʿ.
  4. अल्लामा बदरुद्दीन ऐनी रहमतुल्लाह अलैह. शरह सुनन अबी दाऊद.
  5. अल्लामा अलाउद्दीन अल-हसकफ़ी. अद-दुर्रुल-मुख़्तार शरह तनवीरुल-अबसार.
  6. अल्लामा मुहम्मद अमीन इब्न आबिदीन शामी. रद्दुल-मुहतार अला अद-दुर्रुल-मुख़्तार (हाशिया इब्न आबिदीन).
  7. तनवीरुल-अबसार अद-दुर्रुल-मुख़्तार.


लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार

Disclaimer

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